बुधवार, 30 सितंबर 2026

वैराग्य- संदीपनी (Post 02)


 

।।श्री हरि:।।

 

श्रीमद्गोस्वामी तुलसीदासजीकृत

 

वैराग्य- संदीपनी (Post 02)

 

मंगलाचरण और भगवत्स्वरूप - वर्णन

 

दोहा --राम बाम दिसि जानकी, लखन दाहिनी ओर ।

         ध्यान सकल कल्यानमय, सुरतरु तुलसी तोर ॥ १ ॥

 

भगवान् श्रीरामजीकी बायीं ओर श्रीजानकीजी और दाहिनी ओर श्रीलक्ष्मणजी हैं; यह ध्यान सम्पूर्णरूपसे कल्याणमय है । तुलसीदासजी कहते हैं कि मेरे लिये तो यह कल्पवृक्ष ही है ॥ १ ॥

 

तुलसी मिटै न मोह तम, किएँ कोटि गुन ग्राम ।

हृदय कमल फूलै नहीं, बिनु रबि-कुल- रबि राम ॥ २ ॥

 

तुलसीदासजी कहते हैं कि सूर्यकुलके सूर्य श्रीरामजीके बिना करोड़ों गुणसमूहों का सम्पादन करने पर भी अज्ञान का अन्धकार नहीं मिटता और न हृदयकमल ही प्रफुल्लित होता है ॥२॥

 

सुनत लखत श्रुति नयन बिनु, रसना बिनु रस लेत ।

बास नासिका बिनु लहै, परसै बिना निकेत ॥ ३॥

 

जो बिना कान के सुनता है, बिना आँखके देखता है, बिना जीभ के रस लेता है, बिना नाक के गन्ध लेता (सूँघता) है और बिना शरीर (त्वचा)- के स्पर्श करता है ॥ ३ ॥

 

सो० - अज अद्वैत अनाम, अलख रूप-गुन-रहित जो ।

माया पति सोइ राम, दास हेतु नर-तनु-धरेउ ॥४॥

 

जो जन्मरहित है, अद्वितीय है, नामरहित है, अलक्ष्य है, (प्राकृत) रूप और (मायाके तीनों ) गुणोंसे रहित है और मायाका स्वामी है, वही तत्त्व श्रीरामचन्द्रजी हैं, जिन्होंने (अपने) दास — भक्तोंके लिये मनुष्य- शरीर धारण किया है॥४॥

 

दोहा - तुलसी यह तनु खेत है, मन बच कर्म किसान।

         पाप-पुन्य द्वै बीज हैं, बवै सो लवै निदान॥५॥

 

तुलसीदासजी कहते हैं - यह शरीर खेत है; मन-वचन-कर्म किसान हैं; पाप-पुण्य दो बीज हैं । जो बोया जायगा, वही अन्तमें काटा जायगा (जैसा कर्म किया जायगा, वैसा ही फल प्राप्त होगा ) ॥ ५ ॥

 

तुलसी यह तनु तवा है, तपत सदा त्रैताप ।

सांति होइ जब सांतिपद, पावै राम प्रताप ॥ ६॥

 

तुलसीदासजी कहते हैं कि यह शरीर तवा है, जो सदा (आध्यात्मिक, आधिभौतिक, आधिदैविक) तीनों तापोंसे जलता रहता है। इस जलन से तभी शान्ति होती है, जब भगवान् श्रीरामजी के प्रताप से शान्तिपद (परम शान्तिस्वरूप भगवान् के परमपद)- की प्राप्ति हो जाती है ॥ ६ ॥

 

तुलसी बेद-पुरान-मत, पूरन सास्त्र बिचार |

यह बिराग-संदीपनी, अखिल ग्यानको सार ॥७॥

 

तुलसीदासजी कहते हैं - इस वैराग्य- संदीपनी में वेद-पुराणों का सिद्धान्त और शास्त्रोंका पूर्ण विचार है । यह समस्त ज्ञानका सारतत्त्व है ॥ ७ ॥

 

शेष आगामी पोस्ट में --

गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित  श्रीमद्गोस्वामी तुलसीदासजीकृत

“वैराग्य संदीपनी ”  पुस्तक कोड 114 से



1 टिप्पणी:

  1. 🌹💟🥀जय श्रीराम लखन वैदेही 🙏
    श्रीराम जय राम जय जय राम 🙏🙏

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