।।श्री हरि:।।
श्रीमद्गोस्वामी तुलसीदासजीकृत
वैराग्य- संदीपनी (Post 03)
संत-स्वभाव - वर्णन
दोहा - सरल बरन भाषा सरल, सरल अर्थमय मानि ।
तुलसी सरलै
संतजन,
ताहि परी पहिचानि ॥ ८ ॥
इसमें सरल अक्षर हैं,
इसकी सरल भाषा है, इसे सरल अर्थसे भरी हुई मानना चाहिये । तुलसीदासजी कहते हैं, जो सरल हृदयके संतजन हैं, उनको इसकी पहचान हो गयी है अर्थात् वे इस वैराग्य-संदीपनीको सरलतासे समझते हैं
॥ ८ ॥
चौ०—अति सीतल अति ही सुखदाई ।
सम दम राम
भजन अधिकाई ॥
जड़ जीवन कौं करै सचेता ।
जग महँ बिचरत
है एहि हेता ॥
(संतजन) अत्यन्त शीतल (शान्त-स्वभाव) और अत्यन्त सुखदायक होते
हैं। वे मनपर विजय पाये हुए और इन्द्रियोंको दमन करनेवाले तो हैं ही, श्रीराम - भजनकी उनमें विशेषता होती है। वे मूर्ख (संसारासक्त)
जीवों को सचेत करते हैं— सावधान करके भगवान् की ओर लगाते हैं और इसी हेतु से जगत्
में विचरण करते हैं॥९॥
दोहा - तुलसी ऐसे कहुँ कहूँ, धन्य धरनि वह संत ।
परकाजे परमारथी, प्रीति लिये निबहंत ॥ १० ॥
तुलसीदासजी कहते हैं- ऐसे संत कहीं-कहीं (विरले ही) होते हैं। वह पृथ्वी धन्य है
जहाँ ऐसे संत हैं,
जो पराये कार्यमें तथा परमार्थमें अर्थात् दूसरोंकी सेवामें
और परमार्थ-साधनमें निमग्न रहते हैं तथा प्रीतिके साथ (अपने) इस व्रतका निर्वाह करते
हैं ॥ १० ॥
की मुख पट दीन्हे रहैं, जथा अर्थ भाषंत ।
तुलसी या संसारमें, सो बिचारजुत संत ॥ ११ ॥
तुलसीदासजी कहते हैं कि जो या तो मुखपर पर्दा डाले रहता यानी मौन ही रहता है या
केवल यथार्थ (सत्य) भाषण करता है, इस संसारमें वही
विचारयुक्त (विवेकी) संत है ॥ ११॥
बोलै बचन बिचारि कै, लीन्हें संत सुभाव।
तुलसी दुख दुर्बचन के, पंथ देत नहिं पाँव ॥ १२॥
तुलसीदासजी कहते हैं कि हैं कि वह संत (साधु) स्वभाव को धारण किये हुए विचारकर
वचन बोलता है और दुःख तथा दुष्ट वचन के मार्गपर कभी पैर नहीं रखता अर्थात् वह न तो
किसीका जी दुखाता है और न दुष्ट वचन बोलता है ॥ १२॥
सत्रु न काहू करि गनै, मित्र गनै नहिं काहि ।
तुलसी यह मत संतको, बोलै समता माहि ॥ १३॥
तुलसीदासजी कहते हैं कि वह न तो किसीको शत्रु करके मानता है और न किसीको मित्र
ही मानता है। संतका यही सिद्धान्त है कि वह समता में ही यानी सबको समान समझकर ही बोलता
है ॥ १३॥
चौ० – अति अनन्यगति इंद्री जीता ।
जाको हरि बिनु
कतहुँ न चीता ॥
मृग तृष्ना सम जग जिय
जानी ।
तुलसी ताहि संत पहिचानी ॥
जो सर्वथा अनन्यगति हो अर्थात् भगवान् के सिवा अन्य किसीको भी इष्ट मानकर न भजता हो, इन्द्रियोंपर विजय प्राप्त किये हुए हो, जिसका चित्त श्रीहरिको छोड़कर कहीं भी न लगता हो और जो जगत्
को अपने जी में मृगतृष्णाके * समान मिथ्या
जानता हो,
तुलसीदासजी कहते हैं कि उसीको संत
समझो ॥ १४ ॥
………………………..
*सूर्यकी किरणोंके पड़नेसे बालूमें जल प्रतीत होता है, परंतु वस्तुतः वहाँ जल नहीं होता और हरिण उसीको जल समझकर प्यास
बुझानेके लिये दौड़ता है । उसीको 'मृगतृष्णा'
कहते हैं ।
दोहा - एक भरोसो एक बल, एक आस बिस्वास ।
रामरूप स्वाती जलद, चातक तुलसीदास ॥ १५ ॥
तुलसीदासजी कहते हैं कि जिसको एकमात्र (भगवान् का ही) आश्रय है, एकमात्र (भगवान् का ही जिसको) बल है, एकमात्र (उन्हींसे जिसको) आशा है और (उन्हींका) भरोसा है, (जिसके लिये) भगवान् श्रीरामचन्द्रजीका रूप ही स्वाती नक्षत्रका
मेघ है और (जो स्वयं ) चातक (की भाँति उन्हींकी ओर देख रहा है,) वह संत है ॥ १५ ॥
सो जन जगत जहाज है, जाके राग न दोष ।
तुलसी तृष्णा त्यागि कै, गहै सील संतोष ॥ १६॥
तुलसीदासजी कहते कहते हैं कि जिसके राग-द्वेष नहीं है और जो तृष्णाको त्यागकर शील
तथा संतोषको ग्रहण किये हुए है, वह संत पुरुष जगत्
के (लोगोंको भवसागरसे तारने के) लिये जहाज
है ॥ १६॥
सील गहनि सब की सहनि, कहनि हीय मुख राम ।
तुलसी रहिए एहि रहनि, संत जनन को काम ॥ १७॥
शील (विनय तथा सुशीलता) - को पकड़े रहना, सबकी कठोर बातों और व्यवहारों को सहना; हृदयसे और मुखसे सदा राम- (के नाम तथा लीला - गुणोंको) कहते रहना — तुलसीदासजी
कहते हैं कि इस रहनी से रहना ही संतजनोंका काम है ॥ १७॥
निज संगी निज सम करत, दुरजन मन दुख दून ।
मलयाचल है संतजन, तुलसी दोष बिहून ॥ १८ ॥
वे अपने संगियों को (जो उनका सत्संग करते हैं, उनको) अपने ही समान बना लेते हैं; किंतु दुर्जनों के मनका दुःख दूना करते हैं (द्वेष की अग्नि से जलते हुए दुर्जनलोग
संतों के साथ विशेष द्वेष करके अपने दुःखको बढ़ा लेते हैं) । (परंतु ) तुलसीदासजी कहते
हैं कि संत तो (वस्तुतः सदा ) चन्दन के समान शीतल और दोषरहित ही हैं ॥ १८ ॥
कोमल बानी संत की, स्रवत अमृतमय आइ |
तुलसी ताहि कठोर मन, सुनत मैन होइ जाइ ॥ १९ ॥
संत की वाणी कोमल होती है, उससे अमृतमय (रस)
झरा करता है । तुलसीदासजी कहते हैं कि उसे सुनते ही कठोर मन भी (पिघलाये हुए) मोमके
समान (कोमल) हो जाता है॥१९॥
अनुभव सुख उतपति करत, भय-भ्रम धेरै उठाइ ।
ऐसी बानी संत की, जो उर भेदै आइ ॥ २० ॥
संतकी वाणी ऐसी होती है कि जो अनुभव - सुख - (आत्मानुभूतिके आनन्द) को उत्पन्न
करती है,
भय और भ्रमको उठाकर अलग रख देती है और आकर हृदयको भेद डालती
(हृदयकी अज्ञानग्रन्थिको तोड़ डालती) है॥२०॥
सीतल बानी संत की, ससिहू ते अनुमान ।
तुलसी कोटि तपन हरै, जो कोउ धारै कान ॥ २१ ॥
संत की शीतल वाणी चन्द्रमा से भी बढ़कर अनुमान की जाती है, तुलसीदासजी कहते हैं कि जो कोई उसको कानों में धारण करता है, उसके करोड़ों तापों को हर लेती है॥२१॥
चौ० – पाप ताप सब सूल नसावै ।
मोह अंध रबि
बचन बहावै ॥
तुलसी ऐसे सदगुन
साधू ।
बेद मध्य गुन
बिदित अगाधू ॥
संतजन पाप,
ताप और सब प्रकारके शूलोंको नष्ट कर देते हैं। उनके सूर्य-सदृश
वचन मोहरूपी अन्धकारका नाश कर डालते हैं । तुलसीदासजी कहते हैं कि साधु ऐसे सद्गुणी
होते हैं। उनके अगाध गुण वेदोंमें विख्यात हैं ॥ २२॥
दोहा- तन करि मन करि
बचन करि,
काहू दूखत नाहिं ।
तुलसी ऐसे संतजन, रामरूप जग माहिं ॥ २३ ॥
जो शरीरसे,
मनसे और वचनसे किसीपर दोषारोपण नहीं करते, तुलसीदासजी कहते हैं कि जगत् में ऐसे संतजन श्रीरामचन्द्रजीके रूप ही हैं॥२३॥
मुख दीखत पातक हरै, परसत कर्म बिलाहिं ।
बचन सुनत मन मोहगत, पूरुब भाग मिलाहिं ॥ २४ ॥
जिनका मुख दीखते ही पाप नष्ट हो जाते हैं, स्पर्श होते ही कर्म विलीन हो जाते हैं और वचन सुनते ही मनका मोह (अज्ञान) चला
जाता है,
ऐसे संत पूर्व (जन्मकृत कर्मोंके कारण) सद्भाग्य से ही मिलते
हैं ॥ २४॥
अति कोमल अरु बिमल रुचि, मानस में मल नाहिं |
तुलसी रत मन होइ रहै, अपने साहिब माहिं ॥ २५॥
(संतजन) अत्यन्त कोमल और निर्मल रुचिवाले होते हैं। उनके मनमें
पाप नहीं होता । तुलसीदासजी कहते हैं कि वे अपने स्वामीमें नित्य लगे हुए मनवाले होते
हैं ॥ २५ ॥
जाके मन ते उठि गई, तिल-तिल तृष्ना चाहि ।
मनसा बाचा कर्मना, तुलसी बंदत ताहि ॥ २६॥
जिसके मनसे तृष्णा और चाह तिल-तिल उठ गयी है (जरा भी नहीं रही है), तुलसीदास मनसे, वचनसे और कर्मसे उसकी वन्दना करता है॥२६॥
कंचन काँचहि सम गनै, कामिनि काष्ठ पषान ।
तुलसी ऐसे संतजन, पृथ्वी ब्रह्म समान ॥२७॥
जो सोने और काँचको समान समझते हैं और स्त्रीको काठ-पत्थर-(के समान देखते हैं), तुलसीदासजी कहते हैं कि ऐसे संतजन पृथ्वीमें (शुद्ध सच्चिदानन्द)
ब्रह्म के समान हैं ॥ २७ ॥
चौ० – कंचन को मृतिका
करि मानत ।
कामिनि काष्ठ
सिला पहिचानत ॥
तुलसी भूलि
गयो रस एहा ।
ते जन प्रगट
राम की देहा ॥
जो सोने को मिट्टी के समान मानते हैं और स्त्री को काठ-पत्थर के रूप में देखते
हैं,
तुलसीदासजी कहते हैं कि जो इस (विषय) रस को भूल गये हैं, वे (संत) जन श्रीरामचन्द्रजी के मूर्तिमान् शरीर ही हैं ॥ २८
॥
दोहा – आकिंचन इंद्रीदमन, रमन राम इक तार ।
तुलसी ऐसे
संत जन,
बिरले या संसार ॥ २९ ॥
जो अकिंचन हैं (जिनके पास ममता की कोई भी वस्तु नहीं है), जो इन्द्रियों का दमन किये हुए हैं और जो एकतार (निरन्तर ) राम
में ही रमण करते हैं,
तुलसीदास जी कहते हैं ऐसे संतजन इस संसारमें बिरले ही हैं ॥
२९॥
अहंबाद 'मैं'
'तैं' नहीं,
दुष्ट संग नहिं कोइ ।
दुख ते दुख नहिं ऊपजै, सुख तैं सुख नहिं होइ ॥ ३० ॥
सम कंचन काँचै गिनत, सत्रु मित्र सम दोइ ।
तुलसी या संसारमें, कहत संत जन सोइ ॥ ३१ ॥
जिसमें न तो अहंकार है,
न मैं-तू (या मेरा-तेरा) है, जिसके कोई भी दुष्ट संग नहीं है, जिसको दुःख-(दुःखजनक घटना) से दुःख नहीं होता तथा सुखसे हर्ष नहीं होता, जो सोने और काँच को समान समझता है, जिसको शत्रु-मित्र दोनों समान हैं— तुलसीदासजी कहते हैं कि इस
संसार में उसी को संतजन कहते हैं॥ ३०-३१॥
बिरले बिरले पाइए, माया त्यागी संत ।
तुलसी कामी कुटिल कलि, केकी केक अनंत ॥ ३२ ॥
तुलसीदासजी कहते हैं कि कलियुग में मायाका त्याग कर देनेवाले संत कोई-कोई ही मिलते
हैं,
पर (ऊपरसे मीठा बोलनेवाले और मौका लगते ही साँपों को खा जानेवाले)
मोर- मोरिनी- जैसे कामी - कुटिल लोगों का अन्त (पार) नहीं है॥३२॥
मैं तैं मेट्यो मोह तम, उग्यो आतमा भानु ।
संत राज सो जानिये, तुलसी या सहिदानु ॥ ३३ ॥
जिसके आत्मारूपी सूर्य का उदय हो गया और मैं - तू - रूप अज्ञानान्धकार का नाश हो
गया,
तुलसीदासजी कहते हैं कि उसको संतराज (संतशिरोमणि) जानना चाहिये; क्योंकि यही उसकी पहचान है ॥ ३३ ॥
शेष
आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्गोस्वामी तुलसीदासजीकृत
“वैराग्य संदीपनी ” पुस्तक कोड 114 से

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें