।।श्री हरि:।।
श्रीमद्गोस्वामी तुलसीदासजीकृत
वैराग्य- संदीपनी (Post 04)
संत- महिमा - वर्णन
सो०- को बरनै मुख एक, तुलसी महिमा संत की ।
जिन्ह के बिमल
बिबेक,
सेस महेस न कहि सकत ॥ ३४ ॥
तुलसीदासजी कहते हैं कि एक मुखसे संत की महिमा का वर्णन कौन कर सकता है |
जिनके मलरहित (मायारहित विशुद्ध) विवेक है,वे (सहस्रमुखवाले) शेषजी और (पंचमुख) महेश्वर
(शिवजी) भी उसका कथन नहीं कर सकते ॥ ३४ ॥
दोहा - महि पत्री करि सिंधु मसि, तरु लेखनी बनाइ ।
तुलसी गनपत
सों तदपि,
महिमा लिखी न जाइ ॥ ३५ ॥
तुलसीदासजी कहते हैं कि (संतकी महिमा इतनी अपार है कि) पृथ्वीको कागज, समुद्रको दवात और कल्पवृक्ष को कलम बनाकर भी, गणेशजी से भी उसकी महिमा नहीं लिखी जा सकती ॥ ३५ ॥
धन्य धन्य माता पिता, धन्य पुत्र बर सोइ ।
तुलसी जो रामहि भजे, जैसेहुँ कैसेहुँ होइ ॥ ३६ ॥
तुलसीदासजी कहते हैं कि उसके माता-पिता धन्य-धन्य हैं और वही श्रेष्ठ पुत्र धन्य
है,
जो जैसे-कैसे भी भगवान् श्रीरामचन्द्रजीका भजन करता है॥३६॥
तुलसी जाके बदन ते, धोखेहुँ निकसत राम ।
ताके पग की पगतरी, मेरे तन को चाम ॥ ३७॥
तुलसीदासजी कहते हैं कि जिसके मुख से धोखे से भी 'राम'
(नाम) निकल जाता है, उसके पग की जूती मेरे शरीरके चमड़े से बने ॥ ३७ ॥
तुलसी भगत सुपच भलौ, भजै रैन दिन राम ।
ऊँचो कुल केहि कामको, जहाँ न हरिको नाम ॥ ३८ ॥
तुलसीदासजी कहते हैं कि भक्त चाण्डाल भी अच्छा है, जो रात-दिन भगवान् रामचन्द्रजी का भजन करता है; जहाँ श्रीहरि का नाम न हो, वह ऊँचा कुल किस काम का ॥३८॥
अति ऊँचे भूधरनि पर, भुजगन के अस्थान ।
तुलसी अति नीचे सुखद, ऊख अन्न अरु पान॥ ३९॥
तुलसीदास जी कहते हैं कि बहुत ऊँचे पहाड़ों पर (विषधर) सर्पों के रहने के स्थान
होते हैं और बहुत नीची जगह में अत्यन्त सुखदायक ऊख, अन्न और जल होता है। (ऐसे ही भजनरहित ऊँचे कुल में अहंकार, मद,
काम,
क्रोधादि रहते हैं और भजनयुक्त नीच कुल में अति सुखदायिनी भक्ति, शान्ति, सुख आदि होते हैं; इससे वही श्रेष्ठ है) ॥ ३९॥
चौ०— अति अनन्य जो हरि
को दासा ।
रटै नाम निसिदिन
प्रति स्वासा ॥
तुलसी तेहि
समान नहिं कोई।
हम नीकें
देखा सब कोई ॥
जो श्रीहरिका अनन्य सेवक है और रात- दिन प्रत्येक श्वास में उनका नाम रटता है, तुलसीदासजी कहते हैं कि उसके समान कोई नहीं है, मैंने सब को अच्छी तरह से देख लिया है ॥ ४० ॥
चौ० - जदपि साधु सबही बिधि हीना ।
तद्यपि समता
के न कुलीना ॥
यह दिन रैन
नाम उच्चरै।
वह नित मान
अगिनि महँ जरै ॥
साधु यदि सभी प्रकारसे हीन भी हो तो भी कुलीन - (ऊँचे कुलवाले) की उसके साथ समता
नहीं हो सकती;
क्योंकि यह (साधु) दिन- रात भगवान् के नाम का उच्चारण करता
है और वह (कुलीन) नित्य अभिमान की अग्नि में जला करता है ॥ ४१ ॥
दोहा - दास रता एक नाम सों, उभय लोक सुख त्यागि ।
तुलसी न्यारो
है रहै,
दहै न दुख की आगि ॥ ४२ ॥
भगवान् का सेवक दोनों (पृथ्वी और स्वर्ग) लोकोंका सुख त्यागकर एकमात्र भगवान्
के नाम में ही प्रेम करता है । तुलसीदासजी कहते हैं कि वह संसार से अलग होकर (संसार
की आसक्ति को छोड़कर) रहता है, इसलिये दुःखकी अग्निमें
नहीं जलता ॥ ४२॥
शेष
आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्गोस्वामी तुलसीदासजीकृत
“वैराग्य संदीपनी ” पुस्तक कोड 114 से

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