शुक्रवार, 30 अगस्त 2024

श्रीमद्भागवतमहापुराण द्वितीय स्कन्ध-सातवां अध्याय..(पोस्ट१०)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
द्वितीय स्कन्ध- सातवाँ अध्याय..(पोस्ट१०)

भगवान्‌ के लीलावतारों की कथा

यद्वै व्रजे व्रजपशून् विषतोयपीतान् ।
    पालांस्त्वजीव यदनुग्रहदृष्टिवृष्ट्या ।
तच्छुद्धयेऽतिविषवीर्य विलोलजिह्वम् ।
    उच्चाटयिष्यदुरगं विहरन् ह्रदिन्याम् ॥ २८ ॥
तत्कर्म दिव्यमिव यन्निशि निःशयानं ।
    दावाग्निना शुचिवने परिदह्यमाने ।
उन्नेष्यति व्रजमतोऽवसितान्तकालं ।
    नेत्रे पिधाप्य सबलोऽनधिगम्यवीर्यः ॥ २९ ॥
गृह्णीत यद् यदुपबन्धममुष्य माता ।
    शुल्बं सुतस्य न तु तत् तदमुष्य माति ।
यज्जृम्भतोऽस्य वदने भुवनानि गोपी ।
    संवीक्ष्य शंकितमनाः प्रतिबोधिताऽऽसीत् ॥ ३० ॥
नन्दं च मोक्ष्यति भयाद् वरुणस्य पाशात् ।
    गोपान् बिलेषु पिहितान् मयसूनुना च ।
अह्न्यापृतं निशि शयानमतिश्रमेण ।
    लोकं विकुण्ठ मुपनेष्यति गोकुलं स्म ॥ ३१ ॥

जब कालियानाग के विषसे दूषित हुआ यमुना-जल पीकर बछड़े और गोपबालक मर जायँगे, तब वे अपनी सुधामयी कृपा-दृष्टिकी वर्षासे ही उन्हें जीवित कर देंगे और यमुना-जलको शुद्ध करनेके लिये वे उसमें विहार करेंगे तथा विषकी शक्तिसे जीभ लपलपाते हुए कालियनाग को वहाँसे निकाल देंगे ॥ २८ ॥ उसी दिन रात को जब सब लोग वहीं यमुना-तटपर सो जायँगे और दावाग्नि से आस-पास का मूँज का वन चारों ओर से जलने लगेगा, तब बलरामजीके साथ वे प्राण सङ्कट में पड़े हुए व्रजवासियों को उनकी आँखें बंद कराकर उस अग्नि से बचा लेंगे। उनकी यह लीला भी अलौकिक ही होगी। उनकी शक्ति वास्तव में अचिन्त्य है ॥ २९ ॥ उनकी माता उन्हें बाँधनेके लिये जो-जो रस्सी लायेंगी वही उनके उदर में पूरी नहीं पड़ेगी, दो अंगुल छोटी ही रह जायगी। तथा जँभाई लेते समय श्रीकृष्णके मुख में चौदहों भुवन देखकर पहले तो यशोदा भयभीत हो जायँगी, परन्तु फिर वे सम्हल जायँगी ॥ ३० ॥ वे नन्दबाबा को अजगर के भयसे और वरुण के पाश से छुड़ायेंगे। मय दानव का पुत्र व्योमासुर जब गोपबालों को पहाड क़ी गुफाओं में बंद कर देगा, तब वे उन्हें भी वहाँसे बचा लायेंगे। गोकुल के लोगों को, जो दिनभर तो काम-धंधों में व्याकुल रहते हैं और रात को अत्यन्त थककर सो जाते हैं, साधनाहीन होनेपर भी, वे अपने परमधाम में ले जायँगे ॥ ३१ ॥

शेष आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


गुरुवार, 29 अगस्त 2024

श्रीगर्ग-संहिता (गिरिराज खण्ड) दूसरा अध्याय (पोस्ट 01)


 

# श्रीहरि: #

 

श्रीगर्ग-संहिता

(गिरिराज खण्ड)

दूसरा अध्याय (पोस्ट 01)

 

गोपों द्वारा गिरिराज-पूजन का महोत्सव

 

श्रीनारद उवाच -
श्रुत्वा वचो नन्दसुतस्य साक्षा-
च्छ्रीनन्दसन्नन्दवरा व्रजेशाः ।
सुविस्मिताः पूर्वकृतं विहाय
प्रचक्रिरे श्रीगिरिराजपूजाम् ॥१॥
नीत्वा बलीन्मैथिल नन्दराजः
सुतौ समानीय च रामकृष्णौ ।
यशोदया श्रीगिरिपूजनार्थं
समुत्सको गर्गयुतः प्रसन्नः ॥२॥
त्वरं समारुह्य महोन्नतं गजं
विचित्रवर्णं धृतहेमशृङ्खलम् ।
गोवर्धनान्तं प्रययौ गवां गणैः
शरद्घनैः शक्र इव प्रियायुतः ॥३॥
नन्दोपनन्दा वृषभानवश्च
पुत्रैश्च पौत्रैश्च सहांगनाभिः ।
समाययुः श्रीगिरिराजपार्श्वं
सर्वं समानीय च यज्ञभारम् ॥४॥
सहस्रबालार्कपरिस्फुरद्द्युति-
मारुह्य राधा शिबिकां सखीगणैः ।
शचीव दिव्याम्बररत्‍नभूषणा
बभौ चकोरीभ्रमरीसमाकुला ॥५॥
समागते पार्श्वगते स्वलंकृते
राजन्सखीकोटिसमावृते परे ।
सख्यौ विभाते ललिताविशाखे
चन्द्रानने चालितचारुचामरे ॥६॥
एवं रमा वै विरजा च माधवी
माया च कृष्णा नृप जह्नुनंदिनी ।
द्वात्रिंशदष्टौ च तथा हि षोडश
सख्यश्च तासां किल यूथ आगतः ॥७॥
श्रीमैथिलानां किल कोसलानां
तथा श्रुतीनां ऋषिरूपकाणाम् ।
तथा त्वयोध्यापुरवासिनीनां
श्रीयज्ञसीतावनवासिनीनाम् ॥८॥
रमादिवैकुण्ठनिवासिनीनां
तथोर्ध्ववैकुण्ठनिवासिनीनाम् ।
महोज्ज्वलद्वीपनिवासिनीनां
ध्रुवादिलोकाचलवासिनीनाम् ॥९॥

श्रीनारदजी कहते हैं— साक्षात् श्रीनन्दनन्दन की यह बात सुनकर श्रीनन्द और सनन्द आदि व्रजेश्वरगण बड़े विस्मित हुए। फिर उन्होंने पहलेका निश्चय त्यागकर श्रीगिरिराज-पूजनका आयोजन किया। मिथिलेश्वर ! नन्दराज अपने दोनों पुत्र - बलराम और श्रीकृष्णको तथा भेंटपूजाकी सामग्रीको लेकर यशोदाजीके साथ गिरिराज-पूजनके लिये उत्कण्ठित हो प्रसन्नतापूर्वक गये । उनके साथ गर्गजी भी थे। वे अपनी पत्नीके साथ बहुत ऊँचे चित्र-विचित्र व रँगे हुए तथा सोनेकी साँकल धारण करनेवाले हाथी पर  आरूढ़ हो, गौओंके साथ गोवर्धन पर्वतके समीप गये। मानो इन्द्राणीके साथ इन्द्र ऐरावतपर आरूढ़ शरदऋतु के श्वेत बादलोंके साथ उपस्थित हुए  हों  |नन्द, उपनन्द और वृषभानुगण अपने पुत्रों, पोतों पत्नियोंके साथ यज्ञका सारा सम्भार लिये गिरिराज के पास आ पहुँचे ।। - ।।

सहस्रों बालरविके दीप्ति से प्रकासहित  शिबिकामें आरूढ़ हो दिव्य वस्त्रों तथा रत्नमय आभूषणों से विभूषित श्रीराधा सखी समुदाय के साथ वहाँ आकर उसी प्रकार सुशोभित हुईं, जैसे शची चकोरी और भ्रमरियों के साथ शोभा पाती हों ॥ ५

राजन् ! श्रीराधाके दोनों बगलमें आयी हुई विविध सहस्रों ब्राह्मण-वृन्द गिरिराजका दर्शन करनेके लिये अलंकारोंसे अलंकृत तथा करोड़ों सखियोंसे आवृत दो सर्वश्रेष्ठ चन्द्रमुखी सखियाँ-ललिता और विशाखा- चारु चंवर डुलाती हुई शोभा पाती थीं। नरेश्वर । इसी प्रकार रमा, विरजा, माधवी, माया, यमुना और गङ्गा आदि बत्तीस सखियाँ, आठ सखियाँ, सोलह सखियाँ और उन सबके यूथमें सम्मिलित असंख्य सखियाँ वहाँ आयीं ।। - ।।

मिथिलानिवासिनी, कोसल-प्रदेशवासिनी तथा अयोध्यापुरनिवासिनी, श्रुतिरूपा, ऋषिरूपा, यज्ञसीतास्वरूपा तथा वनवासिनी गोपियोंका समुदाय भी वहाँ उपस्थित हुआ । रमा आदि वैकुण्ठवासिनी देवियाँ, वैकुण्ठसे भी ऊपरके लोकोंमें रहनेवाली दिव्याङ्गनाएँ, परम उज्ज्वल श्वेतद्वीपकी निवासिनी बालाएँ और ध्रुवादि लोकों तथा लोकाचलमें रहने- वाली देवीरूपा गोपाङ्गनाओंका दल भी वहाँ आ गया ।। ८-९ ।।

 

शेष आगामी पोस्ट में --

गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीगर्ग-संहिता  पुस्तक कोड 2260 से



श्रीमद्भागवतमहापुराण द्वितीय स्कन्ध-सातवां अध्याय..(पोस्ट०९)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
द्वितीय स्कन्ध- सातवाँ अध्याय..(पोस्ट०९)

भगवान्‌ के लीलावतारों की कथा

भूमेः सुरेतरवरूथविमर्दितायाः ।
    क्लेशव्ययाय कलया सितकृष्णकेशः ।
जातः करिष्यति जनानुपलक्ष्यमार्गः ।
    कर्माणि चाऽऽत्ममहिमोपनिबन्धनानि ॥ २६ ॥
तोकेन जीवहरणं यदुलूकिकायाः ।
    त्रैमासिकस्य च पदा शकटोऽपवृत्तः ।
यद् रिङ्गतान्तरगतेन दिविस्पृशोर्वा ।
    उन्मूलनं त्वितरथाऽर्जुनयोर्न भाव्यम् ॥ २७ ॥

जिस समय झुंड-के-झुंड दैत्य पृथ्वीको रौंद डालेंगे उस समय उसका भार उतारने के लिये भगवान्‌ अपने सफेद और काले केशसे बलराम और श्रीकृष्णके रूपमें कलावतार ग्रहण करेंगे।[*] वे अपनी महिमा को प्रकट करनेवाले इतने अद्भुत चरित्र करेंगे कि संसारके मनुष्य उनकी लीलाओंका रहस्य बिलकुल नहीं समझ सकेंगे ॥ २६ ॥ बचपन में ही पूतनाके प्राण हर लेना, तीन महीने की अवस्था में पैर उछालकर बड़ा भारी छकड़ा उलट देना और घुटनों के बल चलते-चलते आकाश को छूनेवाले यमलार्जुन वृक्षों के बीच में जाकर उन्हें उखाड़ डालना—ये सब ऐसे कर्म हैं, जिन्हें भगवान्‌ के सिवा और कोई नहीं कर सकता ॥ २७ ॥ 

...................................................................
 [*] केशों के अवतार कहने का अभिप्राय यह है कि पृथ्वी का भार उतारने के लिये तो भगवान्‌ का एक केश ही काफी है । इसके अतिरिक्त श्रीबलराम जी और श्रीकृष्ण के वर्णोंकी सूचना देने के लिये भी उन्हें क्रमश: सफेद और काले केशों का अवतार कहा गया है। वस्तुत: श्रीकृष्ण तो पूर्णपुरुष स्वयं भगवान्‌ हैं—कृष्णस्तु भगवान्‌ स्वयम्।

शेष आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


बुधवार, 28 अगस्त 2024

श्रीगर्ग-संहिता ( गिरिराज खण्ड ) पहला अध्याय (पोस्ट 02)

# श्रीहरि: #

 

श्रीगर्ग-संहिता

( गिरिराज खण्ड )

पहला अध्याय (पोस्ट 02)

 

श्रीकृष्ण के द्वारा गोवर्धनपूजन का प्रस्ताव और उसकी विधि का वर्णन

 

सनंद उवाच -
हे नन्दसूनो हे तात त्वं साक्षाज्ज्ञानशेवधिः ।
कर्तव्या केन विधिना पूजाऽद्रेर्वद तत्त्वतः ॥१४॥


श्रीभगवानुवाच -
आलिप्य गोमयेनापि गिरिराजभुवं ह्यधः ।
धृत्वाऽथ सर्वसम्भारं भक्तियुक्तो जितेन्द्रियः ॥१५॥
सहस्रशीर्षामंत्रेणाद्रये स्नानं च कारयेत् ।
गंगाजलेन यमुनाजलेनापि द्विजैः सह ॥१६॥
शुक्लगोदुग्धधाराभिस्ततः पञ्चामृतैर्गिरिम् ।
स्नापयित्वा गन्धपुष्पैः पुनः कृष्णाजलेन वै ॥१७॥
वस्त्रं दिव्यं च नैवेद्यमासनं सर्वतोऽधिकम् ।
मालालंकारनिचयं दत्त्वा दीपावलिं पराम् ॥१८॥
ततः प्रदक्षिणां कुर्यान्नमस्कुर्यात्ततः परम् ।
कृतांजलिपुटो भूत्वा त्विदमेतदुदीरयेत् ॥१९॥
नमो वृन्दावनाङ्काय तुभ्यं गोलोकमौलिने ।
पूर्णब्रह्मातपत्राय नमो गोवर्धनाय च ॥२०॥
पुष्पांजलिं ततः कुर्यान्नीराजनमतः परम् ।
घण्टकांस्यमृदङ्गाद्यैर्वादित्रैर्मधुरस्वनैः ॥२१॥
वेदाहमेतं मंत्रेण वर्षलाजैः समाचरेत् ।
तत्समीपे चान्नकूटं कुर्याच्छ्रद्धासमन्वितः ॥२२॥
कचोलानां चतुःषष्टिपञ्चपंक्तिसमन्वितम् ।
तुलसीदलमिश्रैश्च श्रीगंगायमुनाजलैः ॥२३॥
षट्पञ्चाशत्तमैर्भागैः कुर्यात्सेवां समाहितः ।
ततोऽग्नीन् ब्राह्मणान्पूज्य गाः सुरान् गन्धपुष्पकैः ॥२४॥
भोजयित्वा द्विजवरान् सौगंधैर्मिष्टभोजनैः ।
अन्येभ्यश्चाश्वपाकेभ्यो दद्याद्‌भोजनमुत्तमम् ॥२५॥
गोपीगोपालवृन्दैश्च गवां नृत्यं च कारयेत् ।
मंगलैर्जयशब्दैश्च कुर्याद्‌गोवर्द्धनोत्सवम् ॥२६॥
यत्र गोवर्धनाभावस्तत्र पूजाविधिं शृणु ।
गोमयैर्वर्द्धनं कुर्यात्तदाकारं परोन्नतम् ॥२७॥
पुष्पव्यूहैर्लताजालैरिषिकाभिः समन्वितः ।
पूजनीयः सदा मर्त्यैर्गिरिर्गोवर्धनो भुवि ॥२८॥
शिलासमानं पुरटं क्षिप्त्वाऽद्रौ तच्छिलां नयेत् ।
गृह्णीयाद्यो विना स्वर्णं स महारौरवं व्रजेत् ॥२९॥
शालग्रामस्य देवस्य सेवनं कारयेत्सदा ।
पातकं न स्पृशेत्तं वै पद्मपत्रं यथा जलम् ॥३०॥
गिरिराजशिलासेवां यः करोति द्विजोत्तमः ।
सप्तद्वीपमहीतीर्थावगाहफलमेति सः ॥३१॥
गिरिराजमहापूजां वर्षे वर्षे करोति यः ।
इह सर्वसुखं भुक्त्वाऽमुत्र मोक्षं प्रयाति सः ॥३२॥

सन्नन्द बोले- नन्दनन्दन ! तात ! तुम तो साक्षात् ज्ञानकी निधि हो । गिरिराजकी पूजा किस विधिसे करनी होगी, यह ठीक-ठीक बताओ ॥ १४ ॥

श्रीभगवान् ने कहा- जहाँ गिरिराजकी पूजा करनी हो, वहाँ उनके नीचेकी धरतीको गोबर से लीप- पोतकर वहीं सब सामग्री रखनी चाहिये । इन्द्रियोंको वशमें रखकर बड़े भक्ति-भावसे 'सहस्रशीर्षा' मन्त्र पढ़ते हुए, ब्राह्मणोंके साथ रहकर गङ्गाजल या यमुनाजलसे गिरिराजको स्नान कराना चाहिये। फिर श्वेत गोदुग्ध की धारा से तथा पञ्चामृत से स्नान कराकर, पुनः यमुना- जलसे नहलाये। उसके बाद गन्ध, पुष्प, वस्त्र, आसन, भाँति-भाँतिके नैवेद्य, माला, आभूषण- समूह तथा उत्तम दीपमाला समर्पित करके गिरिराजकी परिक्रमा करे । इसके बाद साष्टाङ्ग प्रणाम करके, दोनों हाथ जोड़कर, इस प्रकार कहे — 'जो श्रीवृन्दावन के अङ्क में अवस्थित तथा गोलोक के मुकुट हैं, पूर्णब्रह्म परमात्मा के छत्ररूप उन गिरिराज गोवर्धन को हमारा बारंबार नमस्कार है ।' ॥१७-२०॥  

तदनन्तर पुष्पाञ्जलि अर्पित करे। उसके बाद घंटा, झाँझ और मृदङ्ग आदि मधुर ध्वनि करनेवाले बाजे बजाते हुए गिरिराजकी आरती करे। तदनन्तर 'वेदाहमेतं पुरुषं महान्तम्' इत्यादि मन्त्र पढ़ते हुए उनके ऊपर लावाकी वर्षा करे और श्रद्धा पूर्वक गिरिराजके समीप अन्नकूट स्थापित करे। फिर चौसठ कटोरों को पाँच पङ्क्तियों में रखे और उनमें तुलसीदल- मिश्रित गङ्गा-यमुनाका जल भर दे। फिर एकाग्रचित्त हो गिरिराजकी सेवामें छप्पन भोग अर्पित करे । तत्पश्चात् अग्नि में होम करके ब्राह्मणोंकी पूजा करे तथा गौओं और देवताओंपर भी गन्ध-पुष्प चढ़ाये। अन्तमें श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको सुगन्धित मिष्टान्न भोजन कराकर, अन्य लोगों को —यहाँतक कि चण्डाल भी छूटने न पायें- उत्तम भोजन दे। इसके बाद गोपियों और गोपों के समुदाय गौओं के सामने नृत्य करें, मङ्गल- गीत गायें और जय-जयकार करते पूजनोत्सव सम्पन्न करें ।। २४ - २६ ।।

जहाँ गोवर्धन नहीं हैं, वहाँ गोवर्धन पूजाकी क्या विधि है, यह सुनो। गोबर से गोवर्धनका बहुत ऊँचा आकार बनाये। फिर उन्हें पुष्प-समूहों, लता - जालें और सींकोंसे सुशोभित करके, उसे ही गोवर्धन-गिरि मानकर सदा भूतलपर मनुष्योंको उसकी पूजा करनी चाहिये ।। २७ - २।।

यदि कोई गोवर्धनकी शिला ले जाकर पूजन करना चाहे तो जितना बड़ा प्रस्तर ले जाय, उतना ही सुवर्ण उस पर्वतपर छोड़ दे। जो बिना सुवर्ण दिन वहाँकी शिला ले जायगा, वह महारौरव नरक में पड़ेगा। शालग्राम भगवान्‌ की सदा सेवा करनी चाहिये। शालग्रामके पूजक को पातक उसी तरह स्पर्श नहीं करते, जैसे पद्मपत्र पर जलका लेप नहीं होता। जो श्रेष्ठ द्विज गिरिराज-शिलाकी सेवा करता है, वह सा द्वीपोंसे युक्त भूमण्डलके तीर्थोंमें स्नान करनेका फपाता है। जो प्रतिवर्ष गिरिराजकी महापूजा करता वह इस लोकमें सम्पूर्ण सुख भोगकर परलोक में मोक्ष प्राप्त कर लेता है ।। २७ – ३२ ॥

 

इस प्रकार श्रीगर्गसंहिता में गिरिराजखण्ड के अन्तर्गत श्रीनारद - बहुलाश्व-संवाद में 'श्रीगिरिराज की पूजा-विधिवर्णन' नामक पहला अध्याय पूरा हुआ ॥ १ ॥

 

शेष आगामी पोस्ट में --

गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीगर्ग-संहिता  पुस्तक कोड 2260 से 

 



श्रीमद्भागवतमहापुराण द्वितीय स्कन्ध-सातवां अध्याय..(पोस्ट०८)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
द्वितीय स्कन्ध- सातवाँ अध्याय..(पोस्ट०८)

भगवान्‌ के लीलावतारों की कथा

अस्मत्प्रसादसुमुखः कलया कलेश ।
इक्ष्वाकुवंश अवतीर्य गुरोर्निदेशे ।
तिष्ठन् वनं सदयितानुज आविवेश ।
यस्मिन् विरुध्य दशकन्धर आर्तिमार्च्छत् ॥ २३ ॥
यस्मा अदादुदधिरूढभयाङ्गवेपो ।
मार्गं सपद्यरिपुरं हरवद् दिधक्षोः ।
दूरे सुहृन्मथितरोष सुशोणदृष्ट्या ।
तातप्यमानमकरोरगनक्रचक्रः ॥ २४ ॥
वक्षःस्थलस्पर्शरुग्णमहेन्द्रवाह ।
दन्तैर्विडम्बितककुब्जुष ऊढहासम् ।
सद्योऽसुभिः सह विनेष्यति दारहर्तुः ।
विस्फूर्जितैर्धनुष उच्चरतोऽधि सैन्ये ॥ २५ ॥

मायापति भगवान्‌ हम पर अनुग्रह करनेके लिये अपनी कलाओं—भरत, शत्रुघ्न और लक्ष्मणके साथ श्रीराम के रूपसे इक्ष्वाकु के वंश में अवतीर्ण होते हैं। इस अवतार में अपने पिता की आज्ञा का पालन करनेके लिये अपनी पत्नी और भाई के साथ वे वनमें निवास करते हैं। उसी समय उनसे विरोध करके रावण उनके हाथों मरता है ॥ २३ ॥ त्रिपुर विमान को जलानेके लिये उद्यत शङ्कर के समान, जिस समय भगवान्‌ राम शत्रुकी नगरी लङ्काको भस्म करनेके लिये समुद्रतटपर पहुँचते हैं, उस समय सीताके वियोगके कारण बढ़ी हुई क्रोधाग्निसे उनकी आँखें इतनी लाल हो जाती हैं कि उनकी दृष्टिसे ही समुद्रके मगरमच्छ, साँप और ग्राह आदि जीव जलने लगते हैं और भयसे थर-थर काँपता हुआ समुद्र झटपट उन्हें मार्ग दे देता है ॥ २४ ॥ जब रावण की कठोर छाती से टकराकर इन्द्र के वाहन ऐरावत के दाँत चूर-चूर होकर चारों ओर फैल गये थे, जिससे दिशाएँ सफेद हो गयी थीं, तब दिग्विजयी रावण घमंड से फूलकर हँसने लगा था। वही रावण जब श्रीरामचन्द्रजी की पत्नी सीताजी को चुराकर ले जाता है और लड़ाई के मैदान में उनसे लडऩे के लिये गर्वपूर्वक आता है, तब भगवान्‌ श्रीराम के धनुषकी टङ्कार से ही उसका वह घमंड प्राणों के साथ तत्क्षण विलीन हो जाता है ॥ २५ ॥

शेष आगामी पोस्ट में --

गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण (विशिष्टसंस्करण) पुस्तककोड 1535 से


मंगलवार, 27 अगस्त 2024

श्रीगर्ग-संहिता (गिरिराज खण्ड) पहला अध्याय (पोस्ट 01)


 

# श्रीहरि: #

 

श्रीगर्ग-संहिता

(गिरिराज खण्ड)

पहला अध्याय (पोस्ट 01)

 

श्रीकृष्ण के द्वारा गोवर्धनपूजन का प्रस्ताव और उसकी विधि का वर्णन

 

बहुलाश्व उवाच –

कथं दधार भगवान् गिरिं गोवर्धनं वरम् ।
उच्छिलींध्रं यथा बालो ह्स्तेनैकेन लीलया ॥१॥
परिपूर्णतमस्यास्य श्रीकृष्णस्य महात्मनः ।
वदैतच्चरितं दिव्यमद्‌भुतं मुनिसत्तम ॥२॥


श्रीनारद उवाच -
वार्षिकं हि करं राज्ञे यथा शक्राय वै तथा ।
बलिं ददुः प्रावृडन्ते गोपाः सर्वे कृषीवलाः ॥३॥
महेन्द्रयागसंभारचयं दृष्ट्वैकदा हरिः ।
नन्दं पप्रच्छ सदसि वल्लभानां च शृण्वताम् ॥४॥


श्रीभगवानुवाच -
शक्रस्य पूजनं ह्येतत्किं फलं चास्य विद्यते ।
लौकिकं वा वदन्त्येतदथवा पारलौकिकम् ॥५॥


श्रीनन्द उवाच -
शक्रस्य पूजनं ह्येतद्‌भुक्तिमुक्तिकरं परम् ।
एतद्विना नरो भूमौ जायते न सुखी क्वचित् ॥६॥


श्रीभगवानुवाच -
शक्रादयो देवगणाश्च सर्वतो
भुंजन्ति ये स्वर्गसुखं स्वकर्मभिः ।
विशन्ति ते मर्त्यपदं शुभक्षये
तत्सेवनं विद्धि न मुक्तिकारणम् ॥७॥
भयं भवेद्वै परमेष्ठिने यतो
वार्ता तु का कौ किल तत्कृतात्मनाम् ।
तस्मात्परं कालमनंतमेव हि
सर्वं बलिष्ठं सुबुधा विदुः परे ॥८॥
ततस्तमाश्रित्य सुकर्मभिः परं
भजेद्धरिं यज्ञपतिं सुरेश्वरम् ।
विसृज्य सर्वं मनसा कृतेः फलं
व्रजेत्परं मोक्षमसौ न चान्यथा ॥९॥
गोविप्रसाध्वग्निसुराः श्रुतिस्तथा
धर्मश्च यज्ञाधिपतेर्विभूतयः ।
धिष्ण्येषु चैतेषु हरिं भजन्ति ये
सदा त्विहामुत्र सुखं व्रजन्ति ते ॥१०॥
समुत्थितोऽसौ हरिवक्षसो गिरि-
र्गोवर्धनो नाम गिरीन्द्रराजराट् ।
समागतो ह्यत्र पुलस्त्यतेजसा
यद्दर्शनाज्जन्म पुनर्न विद्यते ॥११॥
सम्पूज्य गोविप्रसुरान्महाद्रये
दातव्यमद्यैव परं ह्युपायनम् ।
एष प्रियो मे मखराज एव हि
न चेद्यथेच्छास्ति तथा कुरु व्रज ॥१२॥


श्रीनारद उवाच -
तेषां मध्येऽथ सन्नन्दो गोपो वृद्धोऽतिनीतिवित् ।
अतिप्रसन्नः श्रीकृष्णमाह नन्दस्य शृण्वतः ॥१३॥

 

राजा बहुलाश्वने पूछा- देवर्षे ! जैसे बालक खेल-ही-खेलमें गोबर – छत्ते को उखाड़कर हाथमें ले लेता है, उसी प्रकार भगवान्ने एक ही हाथसे महान् पर्वत गोवर्धनको लीलापूर्वक उठाकर छत्रकी भाँति धारण कर लिया था- ऐसी बात सुनी जाती है। सो यह प्रसङ्ग कैसे आया ? मुनिसत्तम ! इन परिपूर्णतम परमात्मा श्रीकृष्णचन्द्रके उसी दिव्य अद्भुत चरित्रका आप वर्णन कीजिये ॥ १-२ ॥

श्रीनारदजी कहते हैं- राजन् ! जैसे खेती करनेवाले किसान राजाको वार्षिक कर देते हैं, उसी प्रकार समस्त गोप प्रतिवर्ष शरदऋतुमें देवराज इन्द्रके लिये बलि (पूजा और भोग) अर्पित करते थे। एक समय श्रीहरिने महेन्द्रयागके लिये सामग्रीका संचय होता देख गोपसभामें नन्दजीसे प्रश्न किया। उनके उस प्रश्न को अन्यान्य गोप भी सुन रहे थे ।। ३-४ ॥

श्रीभगवान् बोले- यह जो इन्द्रकी पूजा की जाती है, इसका क्या फल है ? विद्वान् लोग इसका कोई लौकिक फल बताते हैं या पारलौकिक ? ॥ ५ ॥

श्रीनन्द ने कहा - श्यामसुन्दर ! देवराज इन्द्रका यह पूजन भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाला परम उत्तम साधन है । भूतलपर इसके बिना मनुष्य कहीं और कभी सुखी नहीं हो सकता ॥ ६ ॥

श्रीभगवान् बोले- पिताजी ! इन्द्र आदि देवता अपने पूर्वकृत पुण्यकर्मो के प्रभावसे ही सब ओर स्वर्गका सुख भोगते हैं। भोगद्वारा शुभकर्मका क्षय हो जानेपर उन्हें भी मर्त्यलोकमें आना पड़ता है। अतः उनकी सेवाको आप मोक्षका साधन मत मानिये । जिससे परमेष्ठी ब्रह्माको भी भय प्राप्त होता है, फिर उनके द्वारा पृथ्वीपर उत्पन्न किये गये प्राणियोंकी तो बात ही क्या है, उस कालको ही श्रेष्ठ विद्वान् सब से उत्कृष्ट, अनन्त तथा सब प्रकारसे बलिष्ठ मानते हैं ॥-

इसलिये उस काल का ही आश्रय लेकर मनुष्य को सत्कर्मों द्वारा सुरेश्वर यज्ञपति परमात्मा श्रीहरिका भजन करना चाहिये । अपने सम्पूर्ण सत्कर्मों के फलका मनसे परित्याग करके जो श्रीहरिका भजन करता है, वही परममोक्षको प्राप्त होता है; दूसरे किसी प्रकारसे उसको मोक्ष नहीं मिलता। गौ, ब्राह्मण, साधु, अग्नि, देवता, वेद तथा धर्म — ये भगवान् यज्ञेश्वरकी विभूतियाँ हैं । इनको आधार बनाकर जो श्रीहरिका भजन करते हैं, वे सदा इस लोक और परलोकमें सुख पाते हैं ॥-१०

भगवान्- के वक्षःस्थलसे प्रकट हुआ वह गिरीन्द्रोंका सम्राट् गोवर्धन नामक पर्वत महर्षि पुलस्त्यके प्रभावसे इस व्रजमण्डलमें आया है। उसके दर्शनसे मनुष्यका इस जगत् में पुनर्जन्म नहीं होता। गौओं, ब्राह्मणों तथा देवताओंका पूजन करके आज ही यह उत्तम भेंट- सामग्री महान् गिरिराजको अर्पित की जाय । यह यज्ञ नहीं, यज्ञोंका राजा है। यही मुझे प्रिय है। यदि आप यह काम नहीं करना चाहते तो जाइये; जैसी इच्छा हो, वैसा कीजिये ॥ ११- १२ ॥

श्रीनारदजी कहते हैं राजन् ! उन गोपोंमें सन्नन्द नामक एक बड़े-बूढ़े गोप थे, जो बड़े नीतिवेत्ता थे। उन्होंने अत्यन्त प्रसन्न होकर नन्दजीके सुनते हुए श्रीकृष्णसे कहा ॥ १३ ॥

 

शेष आगामी पोस्ट में --

गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीगर्ग-संहिता  पुस्तक कोड 2260 से



श्रीमद्भागवतमहापुराण द्वितीय स्कन्ध-सातवां अध्याय..(पोस्ट०७)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
द्वितीय स्कन्ध- सातवाँ अध्याय..(पोस्ट०७)

भगवान्‌ के लीलावतारों की कथा

तुभ्यं च नारद भृशं भगवान्विवृद्ध ।
    भावेन साधु परितुष्ट उवाच योगम् ।
ज्ञानं च भागवतमात्मसतत्त्वदीपं ।
    यद्वासुदेवशरणा विदुरञ्जसैव ॥ १९ ॥
चक्रं च दिक्ष्वविहतं दशसु स्वतेजो ।
    मन्वन्तरेषु मनुवंशधरो बिभर्ति ।
दुष्टेषु राजसु दमं व्यदधात्स्वकीर्तिं ।
    सत्ये त्रिपृष्ठ उशतीं प्रथयंश्चरित्रैः ॥ २० ॥
धन्वन्तरिश्च भगवान् स्वयमेव कीर्तिः ।
    नाम्ना नृणां पुरुरुजां रुज आशु हन्ति ।
यज्ञे च भागममृतायुरवावचन्ध ।
    आयुश्च वेदमनुशास्त्यवतीर्य लोके ॥ २१ ॥
क्षत्रं क्षयाय विधिनोपभृतं महात्मा ।
    ब्रह्मध्रुगुज्झितपथं नरकार्तिलिप्सु ।
उद्धन्त्यसाववनिकण्टकमुग्रवीर्यः ।
    त्रिःसप्तकृत्व उरुधारपरश्वधेन ॥ २२ ॥

(ब्रह्माजी कहरहे हैं) नारद ! तुम्हारे अत्यन्त प्रेमभावसे परम प्रसन्न होकर हंसके रूपमें भगवान्‌ने तुम्हें योग, ज्ञान और आत्मतत्त्वको प्रकाशित करनेवाले भागवतधर्मका उपदेश किया। वह केवल भगवान्‌के शरणागत भक्तोंको ही सुगमतासे प्राप्त होता है ॥ १९ ॥ वे ही भगवान्‌ स्वायम्भुव आदि मन्वन्तरोंमें मनुके रूपमें अवतार लेकर मनुवंशकी रक्षा करते हुए दसों दिशाओंमें अपने सुदर्शनचक्रके समान तेजसे बेरोक-टोक—निष्कण्टक राज्य करते हैं। तीनों लोकोंके ऊपर सत्यलोकतक उनके चरित्रोंकी कमनीय कीर्ति फैल जाती है और उसी रूपमें वे समय-समयपर पृथ्वीके भारभूत दुष्ट राजाओंका दमन भी करते रहते हैं ॥ २० ॥
स्वनामधन्य भगवान्‌ धन्वन्तरि अपने नामसे ही बड़े-बड़े रोगियोंके रोग तत्काल नष्ट कर देते हैं। उन्होंने अमृत पिलाकर देवताओंको अमर कर दिया और दैत्योंके द्वारा हरण किये हुए उनके यज्ञ-भाग उन्हें फिर से दिला दिये। उन्होंने ही अवतार लेकर संसार में आयुर्वेद का प्रवर्तन किया ॥२१॥
जब संसार में ब्राह्मणद्रोही आर्यमर्यादा का उल्लङ्घन करने वाले नारकीय क्षत्रिय अपने नाश के लिये ही दैववश बढ़ जाते हैं और पृथ्वी के काँटे बन जाते हैं, तब भगवान्‌ महापराक्रमी परशुराम के रूपमें अवतीर्ण होकर अपनी तीखी धारवाले फरसे से इक्कीस बार उनका संहार करते हैं॥२२॥

शेष आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


सोमवार, 26 अगस्त 2024

श्रीगर्ग-संहिता ( श्रीवृन्दावनखण्ड ) छब्बीसवाँ अध्याय (पोस्ट 03)

# श्रीहरि: #

 

श्रीगर्ग-संहिता

( श्रीवृन्दावनखण्ड )

छब्बीसवाँ अध्याय (पोस्ट 03)

 

श्रीकृष्णका विरजाके साथ विहार; श्रीराधाके भयसे विरजाका नदीरूप होना, उसके सात पुत्रोंका उसी शापसे सात समुद्र होना तथा राधाके शापसे श्रीदामाका अंशतः शङ्खचूड होना

 

श्रीनारद उवाच -
इति श्त्वाऽथ भगवान् तन्निकुंजं जगाम ह ॥ ३१ ॥
श्रीकृष्ण मित्रं श्रीदामा राधां प्राह रुषा वचः ।
परिपूर्णतमः साक्षाच्छ्रीकृष्णो भगवान् स्वयम् ॥ ३२ ॥
असंख्यब्रह्मांडपतिर्गोलोकेषु विराजते ।
त्वादृशीः कोटिशः शक्तीः कर्तुं शक्तः परात्परः ॥ ३३ ॥
तं विनिंदसि राधे त्वं मानं मा कुरु मा कुरु ।


राधोवाच -
हे मूढ पितरं स्तुत्वा मातरं मां विनिन्दसि ॥ ३४ ॥
राक्षसो भव दुर्बुद्धे गोलोकाच्च बहिर्भव ।


श्रीदामोवाच -
अनुकूलेन कृष्णेन जातं मानं शुभे तव ॥ ३५ ॥
तस्माद्‌भुवि परात्कृष्णात् परिपूर्णतमात्प्रभो ।
शतवर्षं ते वियोगो भविष्यति न संशयः ॥ ३६ ॥


श्रीनारद उवाच -
एवं परस्परं शापात् स्वकृताद्‌भयभीतयोः ।
अतीव चिन्तां गतयोराविरासीत्स्वयं प्रभुः ॥ ३७ ॥


श्रीभगवानुवाच -
वचनं वै स्वनिगमं दूरीकृर्तुं क्षमोऽस्म्यहम् ।
भक्तानां वचनं राधे दूरीकर्तुं न च क्षमः ॥ ३८ ॥
मा शोचं कुरु कल्याणि वरं मे शृणु राधिके ।
मासं मासं वियोगांते दर्शनं मे भविष्यति ॥ ३९ ॥
भुवो भारावताराय कल्पे वाराहसंज्ञके ।
भक्तानां दर्शनं दातुं गमिष्यामि त्वया सह ॥ ४० ॥

श्रीदमन् शृणु मे वाक्यमंशेन त्वसुरो भव ।
वैवस्वतान्तरे रासे हेलनं मे करिष्यसि ॥ ४१ ॥
मद्धस्तेन च ते मृत्युर्भविष्यति न संशयः ।
पुनः स्वविरहं पूर्वं प्राप्स्यसि त्वं वरान्मम ॥ ४२ ॥


श्रीनारद उवाच -
एवं शापेन श्रीदामा पुरा पुण्यजनालये ।
सुधनस्य गृहे जन्म लेभे राजन् महातपाः ॥ ४३ ॥
शंखचूड इति ख्यातो धनदानुचरोऽभवत् ।
तस्माच्छ्रीदाम्नि तज्ज्योतिः लीनं जातं विदेहराट् ॥ ४४ ॥
स्वात्मारमो लीलया सर्वकार्यं
     स्वस्मिन् धाम्नि ह्यद्वितीयः करोति ।
यः सर्वेशः सर्वरूपो महात्मा
     चित्रं नेदं नौमि कृष्णाय तस्मै ॥ ४५ ॥
इदं मया ते कथितं मनोहरं
     वैदेह वृंदावनखंडमग्रतः ।
श्रृणोति चैतच्चरितं नरो वरः
     परंपदं पुण्यतमं प्रयाति सः ॥ ४६ ॥

 

श्रीनारदजी कहते हैं- राजन् ! यह सुनकर भगवान् विरजा के निकुञ्ज में चले गये । तब श्रीकृष्ण के मित्र श्रीदामा ने राधा से रोषपूर्वक कहा ।। ३१ ।।

श्रीदामा बोला - राधे ! श्रीकृष्ण साक्षात् परिपूर्णतम भगवान् हैं। वे स्वयं असंख्य ब्रह्माण्डोंके अधिपति और गोलोकके स्वामीके रूपमें विराजमान हैं। परात्पर श्रीकृष्ण तुम- जैसी करोड़ों शक्तियोंको बना सकते हैं। उनकी तुम निन्दा करती हो ? ऐसा मान न करो, न करो ।। ३२-३३ ॥

राधा बोली - ओ मूर्ख ! तू बापकी स्तुति करके मुझ माताकी निन्दा करता है ! अतः दुर्बुद्धे ! राक्षस हो जा और गोलोकसे बाहर चला जा || ३४ ॥

श्रीदामा बोला - शुभे ! श्रीकृष्ण सदा तुम्हारे अनुकूल रहते हैं, इसीलिये तुम्हें इतना मान हो गया है। अतः परिपूर्णतम परमात्मा श्रीकृष्णसे भूतलपर तुम्हारा सौ वर्षोंके लिये वियोग हो संशय नहीं है । ३५-३६ ।।

श्रीनारदजी कहते हैं- राजन् ! इस प्रकार परस्पर शाप देकर अपनी ही करनी से भयभीत हो, जब राधा और श्रीदामा अत्यन्त चिन्तामें डूब गये, तब स्वयं भगवान् श्रीकृष्ण वहाँ प्रकट हुए ।। ३७ ।।

श्रीभगवान् ने कहा- राधे ! मैं अपने निगम- स्वरूप वचन को तो छोड़ सकता हूँ, किंतु भक्तों की बात अन्यथा करनेमें सर्वथा असमर्थ हूँ।  कल्याणि राधिके ! शोक मत करो, मेरी बात सुनो। वियोग- कालमें भी प्रतिमास एक बार तुम्हें मेरा दर्शन हुआ करेगा। वाराहकल्पमें भूतलका भार उतारने और भक्तजनोंको दर्शन देनेके लिये मैं तुम्हारे साथ पृथ्वीपर चलूँगा । श्रीदामन् ! तुम भी मेरी बात सुनो। तुम अपने एक अंशसे असुर हो जाओ। वैवस्वत मन्वन्तर- में रासमण्डलमें आकर जब तुम मेरी अवहेलना करोगे, तब मेरे हाथसे तुम्हारा वध होगा, इसमें संशय नहीं है। तत्पश्चात् फिर मेरे वरदानसे तुम अपना पूर्व शरीर प्राप्त कर लोगे ॥ ३८–४२ ।।

श्रीनारदजी कहते हैं- राजन् ! इस प्रकार शापवश महातपस्वी श्रीदामाने पूर्वकालमें यक्षलोकमें सुधनके घर जन्म लिया। वह शङ्खचूड नामसे विख्यात हो यक्षराज कुबेरका सेवक हो गया। यही कारण है कि शङ्खचूडकी ज्योति श्रीदामामें लीन हुई ।। ४३-४४ ।।

भगवान् श्रीकृष्ण स्वात्माराम हैं, एकमात्र अद्वितीय परमात्मा हैं। वे अपने ही धाममें लीलापूर्वक सारा कार्य करते हैं। जो सर्वेश्वर, सर्वरूप एवं महान् आत्मा हैं, उनके लिये यह सब कार्य अद्भुत नहीं है; मैं उन श्रीकृष्णचन्द्रको नमस्कार करता हूँ ।। ४५ ।।

विदेहराज ! यह मनोहर वृन्दावनखण्ड मैंने तुम्हारे सामने कहा है। जो नरश्रेष्ठ इस चरित्रका श्रवण करता है, वह पुण्यतम परमपदको प्राप्त होता है ॥ ४६ ॥

 

इस प्रकार श्रीगर्गसंहिता में वृन्दावनखण्ड के अन्तर्गत नारद-बहुलाश्व-संवाद में 'शङ्खचूडोपाख्यान' नामक छब्बीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २६ ॥

 

॥ श्रीवृन्दावनखण्ड सम्पूर्ण ||

 

शेष आगामी पोस्ट में --

गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीगर्ग-संहिता  पुस्तक कोड 2260 से

 

 



श्रीमद्भागवतमहापुराण द्वितीय स्कन्ध-सातवां अध्याय..(पोस्ट०६)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
द्वितीय स्कन्ध- सातवाँ अध्याय..(पोस्ट०६)

भगवान्‌ के लीलावतारों की कथा

ज्यायान् गुणैरवरजोऽप्यदितेः सुतानां ।
    लोकान् विचक्रम इमान् यदथाधियज्ञः ।
क्ष्मां वामनेन जगृहे त्रिपदच्छलेन ।
    याच्ञामृते पथि चरन् प्रभुभिर्न चाल्यः ॥ १७ ॥
नार्थो बलेरयमुरुक्रमपादशौचम् ।
    आपः शिखाधृतवतो विबुधाधिपत्यम् ।
यो वै प्रतिश्रुतमृते न चिकीर्षदन्यद् ।
    आत्मानमङ्ग शिरसा हरयेऽभिमेने ॥ १८ ॥

भगवान्‌ वामन अदिति के पुत्रों में सबसे छोटे थे, परन्तु गुणों की दृष्टि से वे सबसे बड़े थे। क्योंकि यज्ञपुरुष भगवान्‌ ने इस अवतार में बलि के संकल्प छोड़ते ही सम्पूर्ण लोकोंको अपने चरणों से ही नाप लिया था। वामन बनकर उन्होंने तीन पग पृथ्वी के बहाने बलि से सारी पृथ्वी ले तो ली, परन्तु इससे यह बात सिद्ध कर दी कि सन्मार्ग पर चलनेवाले पुरुषों को याचना के सिवा और किसी उपाय से समर्थ पुरुष भी अपने स्थान से नहीं हटा सकते, ऐश्वर्य से च्युत नहीं कर सकते ॥ १७ ॥ दैत्यराज बलि ने अपने सिरपर स्वयं वामन भगवान्‌ का चरणामृत धारण किया था। ऐसी स्थिति में उन्हें जो देवताओं के राजा इन्द्रकी पदवी मिली, इसमें कोई बलि का पुरुषार्थ नहीं था। अपने गुरु शुक्राचार्य के मना करनेपर भी वे अपनी प्रतिज्ञा के विपरीत कुछ भी करने को तैयार नहीं हुए। और तो क्या, भगवान्‌ का तीसरा पग पूरा करने के लिये उनके चरणों में सिर रखकर उन्होंने अपने आपको भी समर्पित कर दिया ॥ १८ ॥

शेष आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


रविवार, 25 अगस्त 2024

श्रीगर्ग-संहिता ( श्रीवृन्दावनखण्ड ) छब्बीसवाँ अध्याय (पोस्ट 02)


# श्रीहरि: #

 

श्रीगर्ग-संहिता

( श्रीवृन्दावनखण्ड )

छब्बीसवाँ अध्याय (पोस्ट 02)

 

श्रीकृष्णका विरजाके साथ विहार; श्रीराधाके भयसे विरजाका नदीरूप होना, उसके सात पुत्रोंका उसी शापसे सात समुद्र होना तथा राधाके शापसे श्रीदामाका अंशतः शङ्खचूड होना

 

अथ कृष्णो नदीभूतां विरजां विरजांबराम् ।
सविग्रहां चकाराशु स्ववरेण नृपेश्वर ॥ १५ ॥
पुनर्विरजया सार्धं विरजातीरजे वने ।
निकुंजवृंदकारण्ये चक्रे रासं हरिः स्वयम् ॥ १६ ॥
विरजायां सप्त सुता बभूवुः कृष्णतेजसा ।
निकुंजं ते ह्यलंचक्रुः शिशवो बाललीलया ॥ १७ ॥
एकदा तैः कलिरभूल्लघुर्ज्येष्ठश्च ताडितः ।
पलायमानो भयभृन्मातुः क्रोडे जगाम ह ॥ १८ ॥
तल्लालनं समारेभे समाश्वास्य सुतं सती ।
तदा वै भगवान् साक्षात्तत्रैवान्तरधीयत ॥ १९ ॥
रुषा सुतं शशापेयं श्रीकृष्णविरहातुरा ।
त्वं जलं भव दुर्बुद्धे कृष्णविच्छेदकारकः ॥ २० ॥
कदापि त्वं जलं मर्त्या न पिबंतु कदाचन ।
ज्येष्ठान् शशाप व्रजत मेदिनीं कलिकारकाः ॥ २१ ॥
जलरूपा पृथग्याना न समेता भविष्यथ ।
नैमित्तिकं च भवतां मेलनं स्यात्सदा लये ॥ २२ ॥


श्रीनारद उवाच -
इत्थं ते मातृशापेन धरणीं वै समागताः ।
प्रियव्रतरथांगानां परिखासु समास्थिताः ॥ २३ ॥
लवणेक्षुसुरासर्पिर्दधिदुग्धजलार्णवाः ।
बभूवुः सप्त ते राजन्नक्षोभ्याश्च दुरत्ययाः ॥ २४ ॥
दुर्विगाह्याश्च गंभीरा आयामं लक्षयोजनात् ।
द्विगुणं द्विगुणं जातं द्वीपे द्वीपे पृथक् पृथक ॥ २५ ॥
अथ पुत्रेषु यातेषु पुत्रस्नेहातिविह्वला ।
स्वप्रियां तां विरहिणीमेत्य कृष्णो वरं ददौ ॥ २६ ॥
कदा न ते मे विच्छेदो मयि भीरु भविष्यति ।
स्वतेजसा स्वपुत्राणां सदा रक्षां करिष्यसि ॥ २७ ॥
अथ राधां विरहिणीं ज्ञात्वा कृष्णो हरिः स्वयम् ।
श्रीदाम्ना सह वैदेह तन्निकुंजं समाययौ ॥ २८ ॥
निकुञ्जद्वारि संप्राप्तं ससखं प्राणवल्लभम् ।
वीक्ष्य मानवती भूत्वा राधा प्राह हरिं वचः ॥ २९ ॥
तत्रैव गच्छ यत्राभूत्स्नेहस्ते नूतनो हरे ।
नदीभूता हि विरजा नदो भवितुमर्हसि ॥ ३० ॥
कुरु वासं तन्निकुंजे मया ते किं प्रयोजनम् ।

 

नृपेश्वर ! तदनन्तर नदीरूपमें परिणत हुई विरजाको श्रीकृष्णने शीघ्र ही अपने वरके प्रभावसे मूर्तिमती एवं विमल वस्त्राभूषणोंसे विभूषित दिव्य नारी बना दिया। इसके बाद वे विरजा-तटवर्ती वनमें वृन्दावन के निकुञ्ज में विरजा के साथ स्वयं रास करने लगे। श्रीकृष्णके तेजसे विरजाके गर्भसे सात पुत्र हुए। वे सातों शिशु अपनी बालक्रीड़ासे निकुञ्ज की शोभा बढ़ाने लगे ॥ १-१७

एक दिन उन बालकोंमें झगड़ा हुआ। उनमें जो बड़े थे, उन सबने मिलकर छोटेको मारा । छोटा भयभीत होकर भागा और माताकी गोदमें चला गया। सती विरजा पुत्रको आश्वासन दे उसे दुलारने लगीं। उस समय साक्षात् भगवान् वहाँसे अन्तर्धान हो गये। तब श्रीकृष्णके विरहसे व्याकुल हो, रोषसे अपने पुत्रको शाप देते हुए विरजाने कहा- 'दुर्बुद्धे ! तू श्रीकृष्णसे वियोग करानेवाला है, अतः जल हो जा; तेरा जल मनुष्य कभी न पीयें। फिर उसने बड़ोंको शाप देते हुए कहा— 'तुम सब-के-सब झगड़ालू हो; अतः पृथ्वीपर जाओ और वहाँ जल होकर रहो । तुम सबकी पृथक्-पृथक् गति होगी। एक-दूसरेसे कभी मिल न सकोगे। सदा ही प्रलयकालमें तुम्हारा नैमित्तिक मिलन होगा' ॥। १ - २२ ॥

श्रीनारदजी कहते हैं- राजन् ! इस प्रकार माताके शापसे वे सब पृथ्वीपर आ गये और राजा प्रियव्रतके रथके पहियोंसे बनी हुई परिखाओंमें समाविष्ट हो गये। खारा जल, इक्षुरस, मदिरा, घृत, दधि, क्षीर तथा शुद्ध जलके वे सात सागर हो गये । राजन् ! वे सातों समुद्र अक्षोभ्य तथा दुर्लङ्घय हैं। उनके भीतर प्रवेश करना अत्यन्त कठिन है । वे बहुत ही गहरे तथा लाख योजनसे लेकर क्रमशः द्विगुण विस्तारवाले होकर पृथक्-पृथक् द्वीपोंमें स्थित हैं ॥२३-२

पुत्रों के चले जाने पर विरजा उनके स्नेह से अत्यन्त व्याकुल हो उठी । तब अपनी उस विरहिणी प्रिया के पास आकर श्रीकृष्णने वर दिया- 'भीरु ! तुम्हारा कभी मुझसे वियोग नहीं होगा। तुम अपने तेजसे सदैव पुत्रों की रक्षा करती रहोगी।' विदेहराज ! तदनन्तर श्रीराधाको विरह-दुःख से व्यथित जान श्यामसुन्दर श्रीहरि स्वयं श्रीदामाके साथ उनके निकुञ्ज में आये । निकुञ्जके द्वारपर सखाके साथ आये हुए प्राणवल्लभकी ओर देखकर राधा मानवती हो उनसे इस प्रकार बोलीं ।। २ - २९ ॥

श्रीराधाने कहा - हरे ! वहीं चले जाओ, जहाँ तुम्हारा नया नेह जुड़ा है। विरजा तो नदी हो गयी, अब तुम्हें उसके साथ नद हो जाना चाहिये। जाओ, उसीके कुञ्जमें रहो। मुझसे तुम्हारा क्या मतलब है ? ॥ ३०

 

शेष आगामी पोस्ट में --

गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीगर्ग-संहिता  पुस्तक कोड 2260 से 

 



श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध - चौदहवाँ अध्याय..(पोस्ट०५)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ श्रीमद्भागवतमहापुराण  षष्ठ स्कन्ध – चौदहवाँ अध्याय..(पोस्ट०५) वृत्रासुर का पूर्वचरित्र चित्रकेतुरुवाच –  भगवन् किं...