गुरुवार, 20 जून 2019

श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध – पाँचवाँ अध्याय..(पोस्ट०१)


॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण
सप्तम स्कन्ध – पाँचवाँ अध्याय..(पोस्ट०१)

हिरण्यकशिपु के द्वारा प्रह्लादजी के वध का प्रयत्न

श्रीनारद उवाच

पौरोहित्याय भगवान्वृतः काव्यः किलासुरैः
षण्डामर्कौ सुतौ तस्य दैत्यराजगृहान्तिके ||१||
तौ राज्ञा प्रापितं बालं प्रह्लादं नयकोविदम्
पाठयामासतुः पाठ्यानन्यांश्चासुरबालकान् ||२||
यत्तत्र गुरुणा प्रोक्तं शुश्रुवेऽनुपपाठ च
न साधु मनसा मेने स्वपरासद्ग्रहाश्रयम् ||३||

नारदजी कहते हैं—युधिष्ठिर! दैत्यों ने भगवान्‌ श्रीशुक्राचार्य जी को अपना पुरोहित बनाया था । उनके दो पुत्र थे—शण्ड और अमर्क । वे दोनों राजमहल के पास ही रहकर हिरण्यकशिपु के द्वारा भेजे हुए नीतिनिपुण बालक प्रह्लाद को और दूसरे पढ़ानेयोग्य दैत्य-बालकोंको राजनीति, अर्थनीति आदि पढ़ाया करते थे ॥ १-२ ॥ प्रह्लाद गुरुजी का पढ़ाया हुआ पाठ सुन लेते थे और उसे ज्यों-का- त्यों उन्हें सुना भी दिया करते थे। किन्तु वे उसे मन से अच्छा नहीं समझते थे । क्योंकि उस पाठ का मूल आधार था अपने और पराये का झूठा आग्रह ॥ ३ ॥

शेष आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से




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