सोमवार, 29 जुलाई 2019

श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध – दसवाँ अध्याय..(पोस्ट०६)


॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण
सप्तम स्कन्ध – दसवाँ अध्याय..(पोस्ट०६)

प्रह्लादजी के राज्याभिषेक और त्रिपुरदहन की कथा

आख्यातं सर्वमेतत्ते यन्मां त्वं परिपृष्टवान्
दमघोषसुतादीनां हरेः सात्म्यमपि द्विषाम् ॥ ४१ ॥
एषा ब्रह्मण्यदेवस्य कृष्णस्य च महात्मनः
अवतारकथा पुण्या वधो यत्रादिदैत्ययोः ॥ ४२ ॥
प्रह्लादस्यानुचरितं महाभागवतस्य च
भक्तिर्ज्ञानं विरक्तिश्च याथार्थ्यं चास्य वै हरेः ॥ ४३ ॥
सर्गस्थित्यप्ययेशस्य गुणकर्मानुवर्णनम्
परावरेषां स्थानानां कालेन व्यत्ययो महान् ॥ ४४ ॥
धर्मो भागवतानां च भगवान्येन गम्यते
आख्यानेऽस्मिन्समाम्नातमाध्यात्मिकमशेषतः ॥ ४५ ॥
य एतत्पुण्यमाख्यानं विष्णोर्वीर्योपबृंहितम्
कीर्तयेच्छ्रद्धया श्रुत्वा कर्मपाशैर्विमुच्यते ॥ ४६ ॥
एतद्य आदिपुरुषस्य मृगेन्द्र लीलां
दैत्येन्द्र यूथपवधं प्रयतः पठेत
दैत्यात्मजस्य च सतां प्रवरस्य पुण्यं
श्रुत्वानुभावमकुतोभयमेति लोकम् ॥ ४७ ॥

युधिष्ठिर ! तुमने मुझसे पूछा था कि भगवान्‌ से द्वेष करनेवाले शिशुपाल आदि को उनके सारूप्य की प्राप्ति कैसे हुई। उसका उत्तर मैंने तुम्हें दे दिया ॥ ४१ ॥ ब्रह्मण्यदेव परमात्मा श्रीकृष्ण का यह परम पवित्र अवतार-चरित्र है। इसमें हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु इन दोनों दैत्यों के वध का वर्णन है ॥ ४२ ॥ इस प्रसङ्ग में भगवान्‌ के परम भक्त प्रह्लादका चरित्र, भक्ति, ज्ञान, वैराग्य; एवं संसारकी सृष्टि, स्थिति और प्रलयके स्वामी श्रीहरिके यथार्थ स्वरूप तथा उनके दिव्य गुण एवं लीलाओंका वर्णन है। इस आख्यानमें देवता और दैत्योंके पदोंमें कालक्रमसे जो महान् परिवर्तन होता है, उसका भी निरूपण किया गया है ॥ ४३-४४ ॥ जिसके द्वारा भगवान्‌की प्राप्ति होती है, उस भागवतधर्मका भी वर्णन है। अध्यात्मके सम्बन्धमें भी सभी जाननेयोग्य बातें इसमें हैं ॥ ४५ ॥ भगवान्‌के पराक्रमसे पूर्ण इस पवित्र आख्यानको जो कोई पुरुष श्रद्धासे कीर्तन करता और सुनता है, वह कर्मबन्धनसे मुक्त हो जाता है ॥ ४६ ॥ जो मनुष्य परम पुरुष परमात्माकी यह श्रीनृसिंह- लीला, सेनापतियोंसहित हिरण्यकशिपुका वध और संतशिरोमणि प्रह्लादजीका पावन प्रभाव एकाग्र मनसे पढ़ता और सुनता है, वह भगवान्‌के अभयपद वैकुण्ठको प्राप्त होता है ॥ ४७ ॥

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श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध – दसवाँ अध्याय..(पोस्ट०५)


॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण
सप्तम स्कन्ध – दसवाँ अध्याय..(पोस्ट०५)

प्रह्लादजी के राज्याभिषेक और त्रिपुरदहन की कथा

श्रीनारद उवाच
इत्युक्त्वा भगवान्राजंस्ततश्चान्तर्दधे हरिः
अदृश्यः सर्वभूतानां पूजितः परमेष्ठिना ॥ ३१ ॥
ततः सम्पूज्य शिरसा ववन्दे परमेष्ठिनम्
भवं प्रजापतीन्देवान्प्रह्लादो भगवत्कलाः ॥ ३२ ॥
ततः काव्यादिभिः सार्धं मुनिभिः कमलासनः
दैत्यानां दानवानां च प्रह्लादमकरोत्पतिम् ॥ ३३ ॥
प्रतिनन्द्य ततो देवाः प्रयुज्य परमाशिषः
स्वधामानि ययू राजन्ब्रह्माद्याः प्रतिपूजिताः ॥ ३४ ॥
एवं च पार्षदौ विष्णोः पुत्रत्वं प्रापितौ दितेः
हृदि स्थितेन हरिणा वैरभावेन तौ हतौ ॥ ३५ ॥
पुनश्च विप्रशापेन राक्षसौ तौ बभूवतुः
कुम्भकर्णदशग्रीवौ हतौ तौ रामविक्रमैः ॥ ३६ ॥
शयानौ युधि निर्भिन्न हृदयौ रामशायकैः
तच्चित्तौ जहतुर्देहं यथा प्राक्तनजन्मनि ॥ ३७ ॥
ताविहाथ पुनर्जातौ शिशुपालकरूषजौ
हरौ वैरानुबन्धेन पश्यतस्ते समीयतुः ॥ ३८ ॥
एनः पूर्वकृतं यत्तद्राजानः कृष्णवैरिणः
जहुस्तेऽन्ते तदात्मानः कीटः पेशस्कृतो यथा ॥ ३९ ॥
यथा यथा भगवतो भक्त्या परमयाभिदा
नृपाश्चैद्यादयः सात्म्यं हरेस्तच्चिन्तया ययुः ॥ ४० ॥

नारदजी कहते हैंयुधिष्ठिर ! नृसिंहभगवान्‌ इतना कहकर और ब्रह्माजीके द्वारा की हुई पूजाको स्वीकार करके वहीं अन्तर्धानसमस्त प्राणियोंके लिये अदृश्य हो गये ॥ ३१ ॥ इसके बाद प्रह्लादजीने भगवत्स्वरूप ब्रह्मा-शङ्करकी तथा प्रजापति और देवताओंकी पूजा करके उन्हें माथा टेककर प्रणाम किया ॥ ३२ ॥ तब शुक्राचार्य आदि मुनियोंके साथ ब्रह्माजीने प्रह्लादजीको समस्त दानव और दैत्योंका अधिपति बना दिया ॥ ३३ ॥ फिर ब्रह्मादि देवताओं ने प्रह्लाद का अभिनन्दन किया और उन्हें शुभाशीर्वाद दिये। प्रह्लादजीने भी यथायोग्य सबका सत्कार किया और वे लोग अपने-अपने लोकोंको चले गये ॥ ३४ ॥
युधिष्ठिर ! इस प्रकार भगवान्‌के वे दोनों पार्षद जय और विजय दितिके पुत्र दैत्य हो गये थे। वे भगवान्‌से वैरभाव रखते थे। उनके हृदयमें रहनेवाले भगवान्‌ने उनका उद्धार करेनेके लिये उन्हें मार डाला ॥ ३५ ॥ ऋषियोंके शापके कारण उनकी मुक्ति नहीं हुई, वे फिरसे कुम्भकर्ण और रावणके रूपमें राक्षस हुए। उस समय भगवान्‌ श्रीरामके पराक्रमसे उनका अन्त हुआ ॥ ३६ ॥ युद्धमें भगवान्‌ रामके बाणोंसे उनका कलेजा फट गया। वहीं पड़े-पड़े पूर्वजन्मकी भाँति भगवान्‌का स्मरण करते-करते उन्होंने अपने शरीर छोड़े ॥ ३७ ॥ वे ही अब इस युगमें शिशुपाल और दन्तवक्त्रके रूपमें पैदा हुए थे। भगवान्‌के प्रति वैरभाव होनेके कारण तुम्हारे सामने ही वे उनमें समा गये ॥ ३८ ॥ युधिष्ठिर ! श्रीकृष्णसे शत्रुता रखनेवाले सभी राजा अन्तसमयमें श्रीकृष्णके स्मरणसे तद्रूप होकर अपने पूर्वकृत पापोंसे सदाके लिये मुक्त हो गये। जैसे भृंगीके द्वारा पकड़ा हुआ कीड़ा भयसे ही उसका स्वरूप प्राप्त कर लेता है ॥ ३९ ॥ जिस प्रकार भगवान्‌के प्यारे भक्त अपनी भेदभावरहित अनन्य भक्तिके द्वारा भगवत्स्वरूपको प्राप्त कर लेते हैं, वैसे ही शिशुपाल आदि नरपति भी भगवान्‌के वैरभावजनित अनन्य चिन्तनसे भगवान्‌के सारूप्यको प्राप्त हो गये ॥ ४० ॥

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रविवार, 28 जुलाई 2019

श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध – दसवाँ अध्याय..(पोस्ट०४)


॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण
सप्तम स्कन्ध – दसवाँ अध्याय..(पोस्ट०४)

प्रह्लादजी के राज्याभिषेक और त्रिपुरदहन की कथा

श्रीनारद उवाच
प्रह्रादोऽपि तथा चक्रे पितुर्यत्साम्परायिकम्
यथाह भगवान्राजन्नभिषिक्तो द्विजातिभिः ॥ २४ ॥
प्रसादसुमुखं दृष्ट्वा ब्रह्मा नरहरिं हरिम्
स्तुत्वा वाग्भिः पवित्राभिः प्राह देवादिभिर्वृतः ॥ २५ ॥

श्रीब्रह्मोवाच
देवदेवाखिलाध्यक्ष भूतभावन पूर्वज
दिष्ट्या ते निहतः पापो लोकसन्तापनोऽसुरः ॥ २६ ॥
योऽसौ लब्धवरो मत्तो न वध्यो मम सृष्टिभिः
तपोयोगबलोन्नद्धः समस्तनिगमानहन् ॥ २७ ॥
दिष्ट्या तत्तनयः साधुर्महाभागवतोऽर्भकः
त्वया विमोचितो मृत्योर्दिष्ट्या त्वां समितोऽधुना ॥ २८ ॥
एतद्वपुस्ते भगवन्ध्यायतः परमात्मनः
सर्वतो गोप्तृ सन्त्रासान्मृत्योरपि जिघांसतः ॥ २९ ॥

श्रीभगवानुवाच
मैवं विभोऽसुराणां ते प्रदेयः पद्मसम्भव
वरः क्रूरनिसर्गाणामहीनाममृतं यथा ॥ ३० ॥

नारदजी कहते हैंयुधिष्ठिर ! भगवान्‌की आज्ञाके अनुसार प्रह्लादजीने अपने पिताकी अन्त्येष्टि- क्रिया की, इसके बाद श्रेष्ठ ब्राह्मणोंने उनका राज्याभिषेक किया ॥ २४ ॥ इसी समय देवता, ऋषि आदिके साथ ब्रह्माजीने नृसिंहभगवान्‌को प्रसन्नवदन देखकर पवित्र वचनोंके द्वारा उनकी स्तुति की और उनसे यह बात कही ॥ २५ ॥
ब्रह्माजीने कहादेवताओंके आराध्यदेव ! आप सर्वान्तर्यामी, जीवोंके जीवनदाता और मेरे भी पिता हैं। यह पापी दैत्य लोगोंको बहुत ही सता रहा था। यह बड़े सौभाग्यकी बात है कि आपने इसे मार डाला ॥ २६ ॥ मैंने इसे वर दे दिया था कि मेरी सृष्टिका कोई भी प्राणी तुम्हारा वध न कर सकेगा। इससे यह मतवाला हो गया था। तपस्या, योग और बलके कारण उच्छृङ्खल होकर इसने वेदविधियोंका उच्छेद कर दिया था ॥ २७ ॥ यह भी बड़े सौभाग्यकी बात है कि इसके पुत्र परमभागवत शुद्धहृदय नन्हें-से-शिशु प्रह्लादको आपने मृत्युके मुखसे छुड़ा दिया तथा यह भी बड़े आनन्द और मङ्गलकी बात है कि वह अब आपकी शरणमें है ॥ २८ ॥ भगवन् ! आपके इस नृसिंहरूपका ध्यान जो कोई एकाग्र मनसे करेगा, उसे यह सब प्रकारके भयोंसे बचा लेगा। यहाँतक कि मारनेकी इच्छासे आयी हुई मृत्यु भी उसका कुछ न बिगाड़ सकेगी ॥ २९ ॥
श्रीनृसिंहभगवान्‌ बोलेब्रह्माजी ! आप दैत्योंको ऐसा वर न दिया करें। जो स्वभावसे ही क्रूर हैं, उनको दिया हुआ वर तो वैसा ही है जैसा साँपोंको दूध पिलाना ॥ ३० ॥

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श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध – दसवाँ अध्याय..(पोस्ट०३)


॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण
सप्तम स्कन्ध – दसवाँ अध्याय..(पोस्ट०३)

प्रह्लादजी के राज्याभिषेक और त्रिपुरदहन की कथा

श्रीप्रह्लाद उवाच
वरं वरय एतत्ते वरदेशान्महेश्वर
यदनिन्दत्पिता मे त्वामविद्वांस्तेज ऐश्वरम् ॥ १५ ॥
विद्धामर्षाशयः साक्षात्सर्वलोकगुरुं प्रभुम्
भ्रातृहेति मृषादृष्टिस्त्वद्भक्ते मयि चाघवान् ॥ १६ ॥
तस्मात्पिता मे पूयेत दुरन्ताद्दुस्तरादघात्
पूतस्तेऽपाङ्गसंदृष्टस्तदा कृपणवत्सल ॥ १७ ॥

श्रीभगवानुवाच
त्रिःसप्तभिः पिता पूतः पितृभिः सह तेऽनघ
यत्साधोऽस्य कुले जातो भवान्वै कुलपावनः ॥ १८ ॥
यत्र यत्र च मद्भक्ताः प्रशान्ताः समदर्शिनः
साधवः समुदाचारास्ते पूयन्तेऽपि कीकटाः ॥ १९ ॥
सर्वात्मना न हिंसन्ति भूतग्रामेषु किञ्चन
उच्चावचेषु दैत्येन्द्र मद्भावविगतस्पृहाः ॥ २० ॥
भवन्ति पुरुषा लोके मद्भक्तास्त्वामनुव्रताः
भवान्मे खलु भक्तानां सर्वेषां प्रतिरूपधृक् ॥ २१ ॥
कुरु त्वं प्रेतकृत्यानि पितुः पूतस्य सर्वशः
मदङ्गस्पर्शनेनाङ्ग लोकान्यास्यति सुप्रजाः ॥ २२ ॥
पित्र्यं च स्थानमातिष्ठ यथोक्तं ब्रह्मवादिभिः
मय्यावेश्य मनस्तात कुरु कर्माणि मत्परः ॥ २३ ॥

प्रह्लादजीने कहामहेश्वर ! आप वर देनेवालोंके स्वामी हैं। आपसे मैं एक वर और माँगता हूँ। मेरे पिताने आपके ईश्वरीय तेजको और सर्वशक्तिमान् चराचरगुरु स्वयं आपको न जानकर आपकी बड़ी निन्दा की है। इस विष्णुने मेरे भाईको मार डाला हैऐसी मिथ्या दृष्टि रखनेके कारण पिताजी क्रोधके वेगको सहन करनेमें असमर्थ हो गये थे। इसीसे उन्होंने आपका भक्त होनेके कारण मुझसे भी द्रोह किया ॥ १५-१६ ॥ दीनबन्धो ! यद्यपि आपकी दृष्टि पड़ते ही वे पवित्र हो चुके, फिर भी मैं आपसे प्रार्थना करता हूँ कि उस जल्दी नाश न होनेवाले दुस्तर दोषसे मेरे पिता शुद्ध हो जायँ ॥ १७ ॥
श्रीनृसिंहभगवान्‌ने कहानिष्पाप प्रह्लाद ! तुम्हारे पिता स्वयं पवित्र होकर तर गये, इसकी तो बात ही क्या है, यदि उनकी इक्कीस पीढिय़ोंके पितर होते तो उन सबके साथ भी वे तर जाते। क्योंकि तुम्हारे-जैसा कुलको पवित्र करनेवाला पुत्र उनको प्राप्त हुआ ॥ १८ ॥ मेरे शान्त, समदर्शी और सुखसे सदाचार पालन करनेवाले प्रेमी भक्तजन जहाँ-जहाँ निवास करते हैं, वे स्थान चाहे कीकट ही क्यों न हों, पवित्र हो जाते हैं ॥ १९ ॥ दैत्यराज ! मेरे भक्तिभावसे जिनकी कामनाएँ नष्ट हो गयी हैं, वे सर्वत्र आत्मभाव हो जानेके कारण छोटे-बड़े किसी भी प्राणीको किसी भी प्रकारसे कष्ट नहीं पहुँचाते ॥ २० ॥ संसारमें जो लोग तुम्हारे अनुयायी होंगे, वे भी मेरे भक्त हो जायँगे। बेटा ! तुम मेरे सभी भक्तोंके आदर्श हो ॥ २१ ॥ यद्यपि मेरे अङ्गोंका स्पर्श होनेसे तुम्हारे पिता पूर्णरूपसे पवित्र हो गये हैं, तथापि तुम उनकी अन्त्येष्टि-क्रिया करो। तुम्हारे-जैसी सन्तानके कारण उन्हें उत्तम लोकोंकी प्राप्ति होगी ॥ २२ ॥ वत्स ! तुम अपने पिताके पदपर स्थित हो जाओ और वेदवादी मुनियोंकी आज्ञाके अनुसार मुझमें अपना मन लगाकर और मेरी शरणमें रहकर मेरी सेवाके लिये ही अपने सारे कार्य करो ॥ २३ ॥


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शनिवार, 27 जुलाई 2019

श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध – दसवाँ अध्याय..(पोस्ट०२)


॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण
सप्तम स्कन्ध – दसवाँ अध्याय..(पोस्ट०२)

प्रह्लादजी के राज्याभिषेक और त्रिपुरदहन की कथा

श्रीभगवानुवाच
नैकान्तिनो मे मयि जात्विहाशिष
आशासतेऽमुत्र च ये भवद्विधाः
तथापि मन्वन्तरमेतदत्र
दैत्येश्वराणामनुभुङ्क्ष्व भोगान् ॥ ११ ॥
कथा मदीया जुषमाणः प्रियास्त्व-
मावेश्य मामात्मनि सन्तमेकम्
सर्वेषु भूतेष्वधियज्ञमीशं
यजस्व योगेन च कर्म हिन्वन् ॥ १२ ॥
भोगेन पुण्यं कुशलेन पापं
कलेवरं कालजवेन हित्वा
कीर्तिं विशुद्धां सुरलोकगीतां
विताय मामेष्यसि मुक्तबन्धः ॥ १३ ॥
य एतत्कीर्तयेन्मह्यं त्वया गीतमिदं नरः
त्वां च मां च स्मरन्काले कर्मबन्धात्प्रमुच्यते ॥ १४ ॥

श्रीनृसिंहभगवान्‌ने कहाप्रह्लाद ! तुम्हारे-जैसे मेरे एकान्तप्रेमी इस लोक अथवा परलोककी किसी भी वस्तुके लिये कभी कोई कामना नहीं करते। फिर भी अधिक नहीं, केवल एक मन्वन्तर- तक मेरी प्रसन्नताके लिये तुम इस लोकमें दैत्याधिपतियोंके समस्त भोग स्वीकार कर लो ॥ ११ ॥ समस्त प्राणियोंके हृदयमें यज्ञोंके भोक्ता ईश्वरके रूपमें मैं ही विराजमान हूँ। तुम अपने हृदयमें मुझे देखते रहना और मेरी लीला-कथाएँ, जो तुम्हें अत्यन्त प्रिय हैं, सुनते रहना। समस्त कर्मोंके द्वारा मेरी ही आराधना करना और इस प्रकार अपने प्रारब्ध-कर्मका क्षय कर देना ॥ १२ ॥ भोगके द्वारा पुण्यकर्मोंके फल और निष्काम पुण्यकर्मोंके द्वारा पापका नाश करते हुए समयपर शरीरका त्याग करके समस्त बन्धनोंसे मुक्त होकर तुम मेरे पास आ जाओगे। देवलोकमें भी लोग तुम्हारी विशुद्ध कीर्तिका गान करेंगे ॥ १३ ॥ तुम्हारे द्वारा की हुई मेरी इस स्तुतिका जो मनुष्य कीर्तन करेगा और साथ ही मेरा और तुम्हारा स्मरण भी करेगा, वह समयपर कर्मोंके बन्धनसे मुक्त हो जायगा ॥ १४ ॥

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श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध – दसवाँ अध्याय..(पोस्ट०१)


॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण
सप्तम स्कन्ध – दसवाँ अध्याय..(पोस्ट०१)

प्रह्लादजी के राज्याभिषेक और त्रिपुरदहन की कथा

श्रीनारद उवाच
भक्तियोगस्य तत्सर्वमन्तरायतयार्भकः
मन्यमानो हृषीकेशं स्मयमान उवाच ह ॥ १

श्रीप्रह्लाद उवाच
मा मां प्रलोभयोत्पत्त्या सक्तंकामेषु तैर्वरैः
तत्सङ्गभीतो निर्विण्णो मुमुक्षुस्त्वामुपाश्रितः ॥ २ ॥
भृत्यलक्षणजिज्ञासुर्भक्तं कामेष्वचोदयत्
भवान्संसारबीजेषु हृदयग्रन्थिषु प्रभो ॥ ३ ॥
नान्यथा तेऽखिलगुरो घटेत करुणात्मनः
यस्त आशिष आशास्ते न स भृत्यः स वै वणिक् ॥ ४ ॥
आशासानो न वै भृत्यः स्वामिन्याशिष आत्मनः
न स्वामी भृत्यतः स्वाम्यमिच्छन्यो राति चाशिषः ॥ ५ ॥
अहं त्वकामस्त्वद्भक्तस्त्वं च स्वाम्यनपाश्रयः
नान्यथेहावयोरर्थो राजसेवकयोरिव ॥ ६ ॥
यदि दास्यसि मे कामान्वरांस्त्वं वरदर्षभ
कामानां हृद्यसंरोहं भवतस्तु वृणे वरम् ॥ ७ ॥
इन्द्रि याणि मनः प्राण आत्मा धर्मो धृतिर्मतिः
ह्रीः श्रीस्तेजः स्मृतिः सत्यं यस्य नश्यन्ति जन्मना ॥ ८ ॥
विमुञ्चति यदा कामान्मानवो मनसि स्थितान्
तर्ह्येव पुण्डरीकाक्ष भगवत्त्वाय कल्पते ॥ ९ ॥
ॐ नमो भगवते तुभ्यं पुरुषाय महात्मने
हरयेऽद्भुतसिंहाय ब्रह्मणे परमात्मने ॥ १० ॥


नारदजी कहते हैंप्रह्लादजीने बालक होनेपर भी यही समझा कि वरदान माँगना प्रेम-भक्ति का विघ्न है; इसलिये कुछ मुसकराते हुए वे भगवान्‌ से बोले ॥ १ ॥
प्रह्लादजीने कहाप्रभो ! मैं जन्म से ही विषय-भोगों में आसक्त हूँ, अब मुझे इन वरों के द्वारा आप लुभाइये नहीं । मैं उन भोगों के सङ्ग से डरकर, उनके द्वारा होने वाली तीव्र वेदना का अनुभव कर उनसे छूटने की अभिलाषा से ही आपकी शरणमें आया हूँ ॥ २ ॥ भगवन् ! मुझ में भक्त के लक्षण हैं या नहींयह जाननेके लिये आपने अपने भक्तको वरदान माँगने की ओर प्रेरित किया है। ये विषय-भोग हृदयकी गाँठको और भी मजबूत करनेवाले तथा बार-बार जन्म-मृत्युके चक्कर में डालनेवाले हैं ॥ ३ ॥ जगद्गुरो ! परीक्षा के सिवा ऐसा कहनेका और कोई कारण नहीं दीखता; क्योंकि आप परम दयालु हैं। (अपने भक्तको भोगोंमें फँसानेवाला वर कैसे दे सकते हैं ?) आपसे जो सेवक अपनी कामनाएँ पूर्ण करना चाहता है, वह सेवक नहीं; वह तो लेन-देन करनेवाला निरा बनिया है ॥ ४ ॥ जो स्वामीसे अपनी कामनाओंकी पूर्ति चाहता है, वह सेवक नहीं; और जो सेवकसे सेवा करानेके लिये, उसका स्वामी बननेके लिये, उसकी कामनाएँ पूर्ण करता है, वह स्वामी नहीं ॥ ५ ॥ मैं आपका निष्काम सेवक हूँ और आप मेरे निरपेक्ष स्वामी हैं। जैसे राजा और उसके सेवकोंका प्रयोजनवश स्वामी-सेवकका सम्बन्ध रहता है, वैसा तो मेरा और आपका सम्बन्ध है नहीं ॥ ६ ॥ मेरे वरदानिशिरोमणि स्वामी ! यदि आप मुझे मुँहमाँगा वर देना ही चाहते हैं तो यह वर दीजिये कि मेरे हृदयमें कभी किसी कामनाका बीज अङ्कुरित ही न हो ॥ ७ ॥ हृदयमें किसी भी कामनाके उदय होते ही इन्द्रिय, मन, प्राण, देह, धर्म, धैर्य, बुद्धि, लज्जा, श्री, तेज, स्मृति और सत्यये सब-के-सब नष्ट हो जाते हैं ॥ ८ ॥ कमलनयन ! जिस समय मनुष्य अपने मनमें रहनेवाली कामनाओंका परित्याग कर देता है, उसी समय वह भगवत्स्वरूपको प्राप्त कर लेता है ॥ ९ ॥ भगवन् ! आपको नमस्कार है। आप सबके हृदयमें विराजमान, उदारशिरोमणि स्वयं परब्रह्म परमात्मा हैं। अद्भुत नृसिंहरूपधारी श्रीहरिके चरणोंमें मैं बार-बार प्रणाम करता हूँ ॥ १० ॥

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शुक्रवार, 26 जुलाई 2019

श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध – नवाँ अध्याय..(पोस्ट१८)


॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण
सप्तम स्कन्ध – नवाँ अध्याय..(पोस्ट१८)

प्रह्लादजी के द्वारा नृसिंहभगवान्‌ की स्तुति

श्रीनारद उवाच
एतावद्वर्णितगुणो भक्त्या भक्तेन निर्गुणः
प्रह्रादं प्रणतं प्रीतो यतमन्युरभाषत ||५१||

श्रीभगवानुवाच
प्रह्लाद भद्र भद्रं ते प्रीतोऽहं तेऽसुरोत्तम
वरं वृणीष्वाभिमतं कामपूरोऽस्म्यहं नृणाम् ||५२||
मामप्रीणत आयुष्मन्दर्शनं दुर्लभं हि मे
दृष्ट्वा मां न पुनर्जन्तुरात्मानं तप्तुमर्हति ||५३||
प्रीणन्ति ह्यथ मां धीराः सर्वभावेन साधवः
श्रेयस्कामा महाभाग सर्वासामाशिषां पतिम् ||५४||
एवं प्रलोभ्यमानोऽपि वरैर्लोकप्रलोभनैः
एकान्तित्वाद्भगवति नैच्छत्तानसुरोत्तमः ||५५||
  
नारदजी कहते हैंइस प्रकार भक्त प्रह्लादने बड़े प्रेमसे प्रकृति और प्राकृत गुणोंसे रहित भगवान्‌के स्वरूपभूत गुणोंका वर्णन किया। इसके बाद वे भगवान्‌के चरणोंमें सिर झुकाकर चुप हो गये। नृसिंहभगवान्‌का क्रोध शान्त हो गया और वे बड़े प्रेम तथा प्रसन्नतासे बोले ॥ ५१ ॥
श्रीनृसिंहभगवान्‌ने कहापरम कल्याणस्वरूप प्रह्लाद ! तुम्हारा कल्याण हो। दैत्यश्रेष्ठ ! मैं तुमपर अत्यन्त प्रसन्न हूँ। तुम्हारी जो अभिलाषा हो, मुझसे माँग लो। मैं जीवोंकी इच्छाओंको पूर्ण करनेवाला हूँ ॥ ५२ ॥ आयुष्मन् ! जो मुझे प्रसन्न नहीं कर लेता, उसे मेरा दर्शन मिलना बहुत ही कठिन है। परंतु जब मेरे दर्शन हो जाते हैं, तब फिर प्राणीके हृदयमें किसी प्रकारकी जलन नहीं रह जाती ॥ ५३ ॥ मैं समस्त मनोरथोंको पूर्ण करनेवाला हूँ। इसलिये सभी कल्याणकामी परम भाग्यवान् साधुजन जितेन्द्रिय होकर अपनी समस्त वृत्तियोंसे मुझे प्रसन्न करनेका ही यत्न करते हैं ॥ ५४ ॥

असुरकुलभूषण प्रह्लाद जी भगवान्‌ के अनन्य प्रेमी थे। इसलिये बड़े-बड़े लोगों को प्रलोभन में डालनेवाले वरों के द्वारा प्रलोभित किये जाने पर भी उन्होंने उनकी इच्छा नहीं की ॥ ५५ ॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां सप्तमस्कन्धे प्रह्लादचरिते भगवत्स्तवो नाम नवमोऽध्यायः

शेष आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से



श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध – नवाँ अध्याय..(पोस्ट१७)


॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण
सप्तम स्कन्ध – नवाँ अध्याय..(पोस्ट१७)

प्रह्लादजी के द्वारा नृसिंहभगवान्‌ की स्तुति

नैते गुणा न गुणिनो महदादयो ये
सर्वे मनः प्रभृतयः सहदेवमर्त्याः
आद्यन्तवन्त उरुगाय विदन्ति हि त्वाम्
एवं विमृश्य सुधियो विरमन्ति शब्दात् ||४९||
तत्तेऽर्हत्तम नमः स्तुतिकर्मपूजाः
कर्म स्मृतिश्चरणयोः श्रवणं कथायाम्
संसेवया त्वयि विनेति षडङ्गया किं
भक्तिं जनः परमहंसगतौ लभेत ||५०||

समग्र कीर्तिके आश्रय भगवन् ! ये सत्त्वादि गुण और इन गुणोंके परिणाम महत्तत्त्वादि, देवता, मनुष्य एवं मन आदि कोई भी आपका स्वरूप जाननेमें समर्थ नहीं है; क्योंकि ये सब आदि-अन्तवाले हैं और आप अनादि एवं अनन्त हैं। ऐसा विचार करके ज्ञानीजन शब्दोंकी मायासे उपरत हो जाते हैं ॥ ४९ ॥ परम पूज्य ! आपकी सेवाके छ: अङ्ग हैंनमस्कार, स्तुति, समस्त कर्मोंका समर्पण, सेवा-पूजा, चरणकमलोंका चिन्तन और लीला-कथाका श्रवण। इस षडङ्ग-सेवा के बिना आप के चरण कमलों की भक्ति कैसे प्राप्त हो सकती है ? और भक्ति के बिना आपकी प्राप्ति कैसे होगी ? प्रभो ! आप तो अपने परम प्रिय भक्तजनों के, परमहंसों के ही सर्वस्व हैं ॥ ५० ॥

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गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से





श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध - तेरहवाँ अध्याय..(पोस्ट०२)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ श्रीमद्भागवतमहापुराण  षष्ठ स्कन्ध – तेरहवाँ अध्याय..(पोस्ट०२) इन्द्रपर ब्रह्महत्याका आक्रमण इन्द्र उवाच स्त्रीभूद्...