शुक्रवार, 6 दिसंबर 2019

श्रीमद्भागवतमहापुराण नवम स्कन्ध –छठा अध्याय..(पोस्ट०१)


॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण
नवम स्कन्ध छठा अध्याय..(पोस्ट०१)

इक्ष्वाकु के वंशका वर्णन, मान्धाता और सौभरि ऋषि की कथा

श्रीशुक उवाच ।
विरूपः केतुमान् शंभुः अंबरीषसुतास्त्रयः ।
विरूपात्पृषदश्वोऽभूत् तत्पुत्रस्तु रथीतरः ॥ १ ॥
रथीतरस्याप्रजस्य भार्यायां तन्तवेऽर्थितः ।
अङ्‌गिरा जनयामास ब्रह्मवर्चस्विनः सुतान् ॥ २ ॥
एते क्षेत्रप्रसूता वै पुनस्त्वाङ्‌गिरसाः स्मृताः ।
रथीतराणां प्रवराः क्षत्रोपेता द्विजातयः ॥ ३ ॥
क्षुवतस्तु मनोर्जज्ञे इक्ष्वाकुर्घ्राणतः सुतः ।
तस्य पुत्रशतज्येष्ठा विकुक्षिनिमिदण्डकाः ॥ ४ ॥
तेषां पुरस्ताद् अभवन् आर्यावर्ते नृपा नृप ।
पञ्चविंशतिः पश्चाच्च त्रयो मध्ये परेऽन्यतः ॥ ५ ॥
स एकदाष्टकाश्राद्धे इक्ष्वाकुः सुतमादिशत् ।
मांसमानीयतां मेध्यं विकुक्षे गच्छ मा चिरम् ॥ ६ ॥
तथेति स वनं गत्वा मृगान् हत्वा क्रियार्हणान् ।
श्रान्तो बुभुक्षितो वीरः शशं चाददपस्मृतिः ॥ ७ ॥
शेषं निवेदयामास पित्रे तेन च तद्‍गुरुः ।
चोदितः प्रोक्षणायाह दुष्टमेतद् अकर्मकम् ॥ ८ ॥
ज्ञात्वा पुत्रस्य तत्कर्म गुरुणाभिहितं नृपः ।
देशान्निःसारयामास सुतं त्यक्तविधिं रुषा ॥ ९ ॥
स तु विप्रेण संवादं जापकेन समाचरन् ।
त्यक्त्वा कलेवरं योगी स तेनावाप यत् परम् ॥ १० ॥
पितर्युपरतेऽभ्येत्य विकुक्षिः पृथिवीमिमाम् ।
शासदीजे हरिं यज्ञैः शशाद इति विश्रुतः ॥ ११ ॥
पुरञ्जयस्तस्य सुत इन्द्रवाह इतीरितः ।
ककुत्स्थ इति चाप्युक्तः शृणु नामानि कर्मभिः ॥ १२ ॥

श्रीशुकदेवजी कहते हैंपरीक्षित्‌ ! अम्बरीषके तीन पुत्र थेविरूप, केतुमान् और शम्भु। विरूपसे पृषदश्व और उसका पुत्र रथीतर हुआ ॥ १ ॥ रथीतर सन्तानहीन था। वंश परम्पराकी रक्षाके लिये उसने अङ्गिरा ऋषिसे प्रार्थना की, उन्होंने उसकी पत्नीसे ब्रह्मतेजसे सम्पन्न कई पुत्र उत्पन्न किये ॥ २ ॥ यद्यपि ये सब रथीतरकी भार्यासे उत्पन्न हुए थे, इसलिये इनका गोत्र वही होना चाहिये था जो रथीतर का था, फिर भी वे आङ्गिरस ही कहलाये। ये ही रथीतर-वंशियोंके प्रवर (कुलमें सर्वश्रेष्ठ पुरुष) कहलाये। क्योंकि ये क्षत्रोपेत ब्राह्मण थेक्षत्रिय और ब्राह्मण दोनों गोत्रों से इनका सम्बन्ध था ॥ ३ ॥
परीक्षित्‌ ! एक बार मनुजी के छींकने पर उनकी नासिका से इक्ष्वाकु नामका पुत्र उत्पन्न हुआ। इक्ष्वाकुके सौ पुत्र थे। उनमें सबसे बड़े तीन थेविकुक्षि, निमि और दण्डक ॥ ४ ॥ परीक्षित्‌ ! उनसे छोटे पचीस पुत्र आर्यावर्तके पूर्वभागके और पचीस पश्चिमभागके तथा उपर्युक्त तीन मध्यभागके अधिपति हुए। शेष सैंतालीस दक्षिण आदि अन्य प्रान्तोंके अधिपति हुए ॥ ५ ॥ एक बार राजा इक्ष्वाकु ने अष्टका-श्राद्ध के समय अपने बड़े पुत्रको आज्ञा दी—‘विकुक्षे ! शीघ्र ही जाकर श्राद्धके योग्य पवित्र पशुओंका मांस लाओ॥ ६ ॥ वीर विकुक्षिने बहुत अच्छाकहकर वनकी यात्रा की। वहाँ उसने श्राद्धके योग्य बहुत-से पशुओंका शिकार किया। वह थक तो गया ही था, भूख भी लग आयी थी; इसलिये यह बात भूल गया कि श्राद्धके लिये मारे हुए पशुको स्वयं न खाना चाहिये। उसने एक खरगोश खा लिया ॥ ७ ॥ विकुक्षिने बचा हुआ मांस लाकर अपने पिताको दिया। इक्ष्वाकुने अब अपने गुरुसे उसे प्रोक्षण करनेके लिये कहा, तब गुरुजीने बताया कि यह मांस तो दूषित एवं श्राद्धके अयोग्य है ॥ ८ ॥ परीक्षित्‌ ! गुरुजीके कहनेपर राजा इक्ष्वाकुको अपने पुत्रकी करतूतका पता चल गया। उन्होंने शास्त्रीय विधिका उल्लङ्घन करनेवाले पुत्रको क्रोधवश अपने देशसे निकाल दिया ॥ ९ ॥ तदनन्तर राजा इक्ष्वाकुने अपने गुरुदेव वसिष्ठसे ज्ञानविषयक चर्चा की। फिर योगके द्वारा शरीरका परित्याग करके उन्होंने परमपद प्राप्त किया ॥ १० ॥ पिताका  देहान्त हो जाने पर विकुक्षि अपनी राजधानी में लौट आया और इस पृथ्वी का शासन करने लगा। उसने बड़े-बड़े यज्ञोंसे भगवान्‌ की आराधना की और संसार में शशाद के नाम से प्रसिद्ध हुआ ॥ ११ ॥ विकुक्षि के पुत्र का नाम था पुरञ्जय। उसी को कोई इन्द्रवाहऔर कोई ककुत्स्थकहते हैं। जिन कर्मों के कारण उसके ये नाम पड़े थे, उन्हें सुनो ॥ १२ ॥

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गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से



गुरुवार, 5 दिसंबर 2019

श्रीमद्भागवतमहापुराण नवम स्कन्ध –पाँचवाँ अध्याय..(पोस्ट०५)


॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण
नवम स्कन्ध पाँचवाँ अध्याय..(पोस्ट०५)

दुर्वासाजीकी दु:खनिवृत्ति

संवत्सरोऽत्यगात् तावद् यावता नागतो गतः ।
मुनिस्तद्दर्शनाकांक्षो राजाऽब्भक्षो बभूव ह ॥ २३ ॥
गतेऽथ दुर्वाससि सोऽम्बरीषो
द्विजोपयोगातिपवित्रमाहरत् ।
ऋषेर्विमोक्षं व्यसनं च बुद्ध्वा
मेने स्ववीर्यं च परानुभावम् ॥ २४ ॥
एवं विधानेकगुणः स राजा
परात्मनि ब्रह्मणि वासुदेवे ।
क्रियाकलापैः समुवाह भक्तिं
ययाऽऽविरिञ्च्यान् निरयांश्चकार ॥ २५ ॥

श्रीशुक उवाच ।
अथाम्बरीषस्तनयेषु राज्यं
समानशीलेषु विसृज्य धीरः ।
वनं विवेशात्मनि वासुदेवे
मनो दधद् ध्वस्तगुणप्रवाहः ॥ २६ ॥
इत्येतत् पुण्यमाख्यानं अंबरीषस्य भूपतेः ।
संकीर्तयन् अनुध्यायन् भक्तो भगवतो भवेत् ॥ २७ ॥

परीक्षित्‌ ! जब सुदर्शन चक्रसे भयभीत होकर दुर्वासाजी भगे थे, तबसे लेकर उनके लौटने तक एक वर्षका समय बीत गया। इतने दिनोंतक राजा अम्बरीष उनके दर्शनकी आकाङ्क्षा से केवल जल पीकर ही रहे ॥ २३ ॥ जब दुर्वासाजी चले गये, तब उनके भोजनसे बचे हुए अत्यन्त पवित्र अन्न का उन्होंने भोजन किया। अपने कारण दुर्वासाजी का दु:ख में पडऩा और फिर अपनी ही प्रार्थना से उनका छूटनाइन दोनों बातों को उन्होंने अपनेद्वारा होनेपर भी भगवान्‌ की ही महिमा समझा ॥ २४ ॥ राजा अम्बरीषमें ऐसे-ऐसे अनेकों गुण थे। अपने समस्त कर्मोंके द्वारा वे परब्रह्म परमात्मा श्रीभगवान्‌ में भक्तिभाव की अभिवृद्धि करते रहते थे। उस भक्ति के प्रभाव से उन्होंने ब्रह्मलोक तक के समस्त भोगों को नरक के समान समझा ॥ २५ ॥ तदनन्तर राजा अम्बरीष ने अपने ही समान भक्त पुत्रोंपर राज्यका भार छोड़ दिया और स्वयं वे वनमें चले गये। वहाँ वे बड़ी धीरता के साथ आत्मस्वरूप भगवान्‌ में अपना मन लगाकर गुणों के प्रवाहरूप संसार से मुक्त हो गये ॥ २६ ॥ परीक्षित्‌ ! महाराज अम्बरीष का यह परम पवित्र आख्यान है। जो इसका सङ्कीर्तन और स्मरण करता है, वह भगवान्‌ का भक्त हो जाता है ॥ २७ ॥

इति श्रीमद्‍भागवते महापुराणे पारमहंस्यां
संहितायां नवमस्कन्धे पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥

 हरिः ॐ तत्सत् श्रीकृष्णार्पणमस्तु ॥

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श्रीमद्भागवतमहापुराण नवम स्कन्ध –पाँचवाँ अध्याय..(पोस्ट०४)


॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण
नवम स्कन्ध पाँचवाँ अध्याय..(पोस्ट०४)

दुर्वासाजीकी दु:खनिवृत्ति

राजा तं अकृताहारः प्रत्यागमनकांक्षया ।
चरणौ उवुपसंगृह्य प्रसाद्य समभोजयत् ॥ १८ ॥
सोऽशित्वादृतमानीतं आतिथ्यं सार्वकामिकम् ।
तृप्तात्मा नृपतिं प्राह भुज्यतां इति सादरम् ॥ १९ ॥
प्रीतोऽस्मि अनुगृहीतोऽस्मि तव भागवतस्य वै ।
दर्शनस्पर्शनालापैः आतिथ्येनात्ममेधसा ॥ २० ॥
कर्मावदातं एतत् ते गायन्ति स्वःस्त्रियो मुहुः ।
कीर्तिं परमपुण्यां च कीर्तयिष्यति भूरियम् ॥ २१ ॥

श्रीशुक उवाच ।
एवं संकीर्त्य राजानं दुर्वासाः परितोषितः ।
ययौ विहायसाऽऽमंत्र्य ब्रह्मलोकमहैतुकम् ॥ २२ ॥

परीक्षित्‌ ! जबसे दुर्वासाजी भागे थे, तबसे अबतक राजा अम्बरीषने भोजन नहीं किया था। वे उनके लौटनेकी बाट देख रहे थे। अब उन्होंने दुर्वासाजीके चरण पकड़ लिये और उन्हें प्रसन्न करके विधिपूर्वक भोजन कराया ॥ १८ ॥ राजा अम्बरीष बड़े आदरसे अतिथिके योग्य सब प्रकारकी भोजन-सामग्री ले आये। दुर्वासाजी भोजन करके तृप्त हो गये। अब उन्होंने आदरसे कहा—‘राजन् ! अब आप भी भोजन कीजिये ॥ १९ ॥ अम्बरीष ! आप भगवान्‌के परम प्रेमी भक्त हैं। आपके दर्शन, स्पर्श, बातचीत और मनको भगवान्‌की ओर प्रवृत्त करनेवाले आतिथ्यसे मैं अत्यन्त प्रसन्न और अनुगृहीत हुआ हूँ ॥ २० ॥ स्वर्गकी देवाङ्गनाएँ बार-बार आपके इस उज्ज्वल चरित्रका गान करेंगी। यह पृथ्वी भी आपकी परम पुण्यमयी कीर्तिका संकीर्तन करती रहेगी॥ २१ ॥
श्रीशुकदेवजी कहते हैंदुर्वासाजीने बहुत ही सन्तुष्ट होकर राजा अम्बरीषके गुणोंकी प्रशंसा की और उसके बाद उनसे अनुमति लेकर आकाशमार्गसे उस ब्रह्मलोककी यात्रा की, जो केवल निष्काम कर्मसे ही प्राप्त होता है ॥ २२ ॥

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बुधवार, 4 दिसंबर 2019

श्रीमद्भागवतमहापुराण नवम स्कन्ध –पाँचवाँ अध्याय..(पोस्ट०३)


॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण
नवम स्कन्ध पाँचवाँ अध्याय..(पोस्ट०३)

दुर्वासाजीकी दु:खनिवृत्ति

श्रीशुक उवाच ।
इति संस्तुवतो राज्ञो विष्णुचक्रं सुदर्शनम् ।
अशाम्यत् सर्वतो विप्रं प्रदहद् राजयाच्ञया ॥ १२ ॥
स मुक्तोऽस्त्राग्नितापेन दुर्वासाः स्वस्तिमान् ततः ।
प्रशशंस तमुर्वीशं युञ्जानः परमाशिषः ॥ १३ ॥

दुर्वासा उवाच ।
अहो अनन्तदासानां महत्त्वं दृष्टमद्य मे ।
कृतागसोऽपि यद् राजन् मंगलानि समीहसे ॥ १४ ॥
दुष्करः को नु साधूनां दुस्त्यजो वा महात्मनाम् ।
यैः संगृहीतो भगवान् सात्वतां ऋषभो हरिः ॥ १५ ॥
यन्नामश्रुतिमात्रेण पुमान् भवति निर्मलः ।
तस्य तीर्थपदः किं वा दासानां अवशिष्यते ॥ १६ ॥
राजन् अनुगृहीतोऽहं त्वयातिकरुणात्मना ।
मद् अघं पृष्ठतः कृत्वा प्राणा यन्मेऽभिरक्षिताः ॥ १७ ॥

श्रीशुकदेवजी कहते हैंजब राजा अम्बरीष ने दुर्वासाजी को सब ओर से जलानेवाले भगवान्‌ के सुदर्शन चक्र की इस प्रकार स्तुति की, तब उनकी प्रार्थना से चक्र शान्त हो गया ॥ १२ ॥ जब दुर्वासा चक्रकी आगसे मुक्त हो गये और उनका चित्त स्वस्थ हो गया, तब वे राजा अम्बरीषको अनेकानेक उत्तम आशीर्वाद देते हुए उनकी प्रशंसा करने लगे ॥ १३ ॥
दुर्वासाजीने कहाधन्य है ! आज मैंने भगवान्‌के प्रेमी भक्तोंका महत्त्व देखा। राजन् ! मैंने आपका अपराध किया, फिर भी आप मेरे लिये मङ्गलकामना ही कर रहे हैं ॥ १४ ॥ जिन्होंने भक्तवत्सल भगवान्‌ श्रीहरिके चरणकमलोंको दृढ़ प्रेमभावसे पकड़ लिया हैउन साधुपुरुषोंके लिये कौन-सा कार्य कठिन है ? जिनका हृदय उदार है, वे महात्मा भला, किस वस्तुका परित्याग नहीं कर सकते ? ॥ १५ ॥ जिनके मङ्गलमय नामोंके श्रवणमात्रसे जीव निर्मल हो जाता हैउन्हीं तीर्थपाद भगवान्‌के चरणकमलोंके जो दास हैं, उनके लिये कौन-सा कर्तव्य शेष रह जाता है ? ॥ १६ ॥ महाराज अम्बरीष ! आपका हृदय करुणाभावसे परिपूर्ण है। आपने मेरे ऊपर महान् अनुग्रह किया। अहो, आपने मेरे अपराधको भुलाकर मेरे प्राणोंकी रक्षा की है ! ॥ १७ ॥

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श्रीमद्भागवतमहापुराण नवम स्कन्ध –पाँचवाँ अध्याय..(पोस्ट०२)


॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण
नवम स्कन्ध पाँचवाँ अध्याय..(पोस्ट०२)

दुर्वासाजीकी दु:खनिवृत्ति

यदा विसृष्टस्त्वमनञ्जनेन वै
     बलं प्रविष्टोऽजित दैत्यदानवम् ।
 बाहूदरोर्वङ्‌घ्रिशिरोधराणि
     वृक्णन् अजस्रं प्रधने विराजसे ॥ ८ ॥
 स त्वं जगत्त्राण खलप्रहाणये
     निरूपितः सर्वसहो गदाभृता ।
 विप्रस्य चास्मत् कुलदैवहेतवे
     विधेहि भद्रं तदनुग्रहो हि नः ॥ ९ ॥
 यद्यस्ति दत्तमिष्टं वा स्वधर्मो वा स्वनुष्ठितः ।
 कुलं नो विप्रदैवं चेद् द्विजो भवतु विज्वरः ॥ १० ॥
 यदि नो भगवान् प्रीत एकः सर्वगुणाश्रयः ।
 सर्वभूतात्मभावेन द्विजो भवतु विज्वरः ॥ ११ ॥

सुदर्शन चक्र ! आपपर कोई विजय नहीं प्राप्त कर सकता। जिस समय निरंजन भगवान्‌ आपको चलाते हैं और आप दैत्य एवं दानवोंकी सेनामें प्रवेश करते हैं, उस समय युद्धभूमिमें उनकी भुजा, उदर, जंघा, चरण और गरदन आदि निरन्तर काटते हुए आप अत्यन्त शोभायमान होते हैं ॥ ८ ॥ विश्वके रक्षक ! आप रणभूमिमें सबका प्रहार सह लेते हैं, आपका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता। गदाधारी भगवान्‌ने दुष्टोंके नाशके लिये ही आपको नियुक्त किया है। आप कृपा करके हमारे कुलके भाग्योदयके लिये दुर्वासाजीका कल्याण कीजिये। हमारे ऊपर यह आपका महान् अनुग्रह होगा ॥ ९ ॥ यदि मैंने कुछ भी दान किया हो, यज्ञ किया हो अथवा अपने धर्मका पालन किया हो, यदि हमारे वंशके लोग ब्राह्मणोंको ही अपना आराध्यदेव समझते रहे हों, तो दुर्वासाजीकी जलन मिट जाय ॥ १० ॥ भगवान्‌ समस्त गुणोंके एकमात्र आश्रय हैं। यदि मैंने समस्त प्राणियोंके आत्मा के रूपमें उन्हें देखा हो और वे मुझपर प्रसन्न हों तो दुर्वासाजीके हृदयकी सारी जलन मिट जाय ॥ ११ ॥

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मंगलवार, 3 दिसंबर 2019

श्रीमद्भागवतमहापुराण नवम स्कन्ध –पाँचवाँ अध्याय..(पोस्ट०१)


॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण
नवम स्कन्ध पाँचवाँ अध्याय..(पोस्ट०१)

दुर्वासाजीकी दु:खनिवृत्ति

श्रीशुक उवाच ।
एवं भगवताऽऽदिष्टो दुर्वासाश्चक्रतापितः ।
अंबरीषं उपावृत्य तत्पादौ दुःखितोऽग्रहीत् ॥ १ ॥
तस्य सोद्यमनं वीक्ष्य पादस्पर्शविलज्जितः ।
अस्तावीत् तत् हरेः अस्त्रं कृपया पीडितो भृशम् ॥ २ ॥

अंबरीष उवाच ।
त्वमग्निर्भगवान् सूर्यः त्वं सोमो ज्योतिषां पतिः ।
त्वं आपस्त्वं क्षितिर्व्योम वायुर्मात्रेन्द्रियाणि च ॥ ३ ॥
सुदर्शन नमस्तुभ्यं सहस्राराच्युतप्रिय ।
सर्वास्त्रघातिन् विप्राय स्वस्ति भूया इडस्पते ॥ ४ ॥
त्वं धर्मस्त्वमृतं सत्यं त्वं यज्ञोऽखिलयज्ञभुक् ।
त्वं लोकपालः सर्वात्मा त्वं तेजः पौरुषं परम् ॥ ५ ॥
नमः सुनाभाखिलधर्मसेतवे
ह्यधर्मशीलासुरधूमकेतवे ।
त्रैलोक्यगोपाय विशुद्धवर्चसे
मनोजवायाद्‍भुतकर्मणे गृणे ॥ ६ ॥
त्वत्तेजसा धर्ममयेन संहृतं
तमः प्रकाशश्च दृशो महात्मनाम् ।
दुरत्ययस्ते महिमा गिरां पते
त्वद् रूपमेतत् सदसत् परावरम् ॥ ७ ॥

श्रीशुकदेवजी कहते हैंपरीक्षित्‌ ! जब भगवान्‌ने इस प्रकार आज्ञा दी, तब सुदर्शन चक्रकी ज्वालासे जलते हुए दुर्वासा लौटकर राजा अम्बरीषके पास आये और उन्होंने अत्यन्त दु:खी होकर राजाके पैर पकड़ लिये ॥ १ ॥ दुर्वासाजीकी यह चेष्टा देखकर और उनके चरण पकडऩेसे लज्जित होकर राजा अम्बरीष भगवान्‌के चक्रकी स्तुति करने लगे। उस समय उनका हृदय दयावश अत्यन्त पीडि़त हो रहा था ॥ २ ॥
अम्बरीषने कहाप्रभो ! सुदर्शन ! आप अग्निस्वरूप हैं। आप ही परम समर्थ सूर्य हैं। समस्त नक्षत्रमण्डलके अधिपति चन्द्रमा भी आपके स्वरूप हैं। जल, पृथ्वी, आकाश, वायु, पञ्चतन्मात्रा और सम्पूर्ण इन्द्रियोंके रूपमें भी आप ही हैं ॥ ३ ॥ भगवान्‌ के प्यारे, हजार दाँतवाले चक्रदेव ! मैं आपको नमस्कार करता हूँ। समस्त अस्त्र-शस्त्रोंको नष्ट कर देनेवाले एवं पृथ्वीके रक्षक ! आप इन ब्राह्मणकी रक्षा कीजिये ॥ ४ ॥ आप ही धर्म हैं, मधुर एवं सत्य वाणी हैं; आप ही समस्त यज्ञोंके अधिपति और स्वयं यज्ञ भी हैं। आप समस्त लोकोंके रक्षक एवं सर्वलोकस्वरूप भी हैं। आप परमपुरुष परामात्मा के श्रेष्ठ तेज हैं ॥ ५ ॥ सुनाभ ! आप समस्त धर्मोंकी मर्यादाके रक्षक हैं। अधर्मका आचरण करनेवाले असुरोंको भस्म करनेके लिये आप साक्षात् अग्नि हैं। आप ही तीनों लोकोंके रक्षक एवं विशुद्ध तेजोमय हैं। आपकी गति मनके वेगके समान है और आपके कर्म अद्भुत हैं। मैं आपको नमस्कार करता हूँ, आपकी स्तुति करता हूँ ॥ ६ ॥ वेदवाणीके अधीश्वर ! आपके धर्ममय तेजसे अन्धकारका नाश होता है और सूर्य आदि महापुरुषोंके प्रकाशकी रक्षा होती है। आपकी महिमाका पार पाना अत्यन्त कठिन है। ऊँचे-नीचे और छोटे-बड़ेके भेद-भावसे युक्त यह समस्त कार्यकारणात्मक संसार आपका ही स्वरूप है ॥ ७ ॥

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श्रीमद्भागवतमहापुराण नवम स्कन्ध –चौथा अध्याय..(पोस्ट१०)


॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण
नवम स्कन्ध चौथा अध्याय..(पोस्ट१०)

नाभाग और अम्बरीष की कथा

श्रीभगवानुवाच ।
 अहं भक्तपराधीनो हि अस्वतंत्र इव द्विज ।
 साधुभिर्ग्रस्तहृदयो भक्तैर्भक्तजनप्रियः ॥ ६३ ॥
 नाहं आत्मानमाशासे मद्‍भक्तैः साधुभिर्विना ।
 श्रियं चात्यन्तिकीं ब्रह्मन् येषां गतिः अहं परा ॥ ६४ ॥
 ये दारागारपुत्राप्तान् प्राणान् वित्तमिमं परम् ।
 हित्वा मां शरणं याताः कथं तान् त्यक्तुमुत्सहे ॥ ६५ ॥
 मयि निर्बद्धहृदयाः साधवः समदर्शनाः ।
 वशीकुर्वन्ति मां भक्त्या सत्स्त्रियः सत्पतिं यथा ॥ ६६ ॥
 मत्सेवया प्रतीतं च सालोक्यादि चतुष्टयम् ।
 नेच्छन्ति सेवया पूर्णाः कुतोऽन्यत् कालविद्रुतम् ॥ ६७ ॥
 साधवो हृदयं मह्यं साधूनां हृदयं त्वहम् ।
 मदन्यत् ते न जानन्ति नाहं तेभ्यो मनागपि ॥ ६८ ॥
 उपायं कथयिष्यामि तव विप्र श्रृणुष्व तत् ।
 अयं ह्यात्माभिचारस्ते यतस्तं याहि मा चिरम् ।
 साधुषु प्रहितं तेजः प्रहर्तुः कुरुतेऽशिवम् ॥ ६९ ॥
 तपो विद्या च विप्राणां निःश्रेयसकरे उभे ।
 ते एव दुर्विनीतस्य कल्पेते कर्तुरन्यथा ॥ ७० ॥
 ब्रह्मन् तद् गच्छ भद्रं ते नाभागतनयं नृपम् ।
 क्षमापय महाभागं ततः शान्तिर्भविष्यति ॥ ७१ ॥

श्रीभगवान्‌ ने कहादुर्वासाजी ! मैं सर्वथा भक्तोंके अधीन हूँ। मुझमें तनिक भी स्वतन्त्रता नहीं है। मेरे सीधे-सादे सरल भक्तोंने मेरे हृदय को अपने हाथ में कर रखा है। भक्तजन मुझ से प्यार करते हैं और मैं उनसे ॥ ६३ ॥ ब्रह्मन् ! अपने भक्तों का एकमात्र आश्रय मैं ही हूँ। इसलिये अपने साधुस्वभाव भक्तों को छोडक़र मैं न तो अपने-आपको चाहता हूँ और न अपनी अर्धाङ्गिनी विनाश- रहित लक्ष्मी को  ॥ ६४ ॥ जो भक्त स्त्री, पुत्र, गृह, गुरुजन, प्राण, धन, इहलोक और परलोकसब को छोडक़र केवल मेरी शरण में आ गये हैं, उन्हें छोडऩे का संकल्प भी मैं कैसे कर सकता हूँ ? ॥ ६५ ॥ जैसे सती स्त्री अपने पातिव्रत्यसे सदाचारी पतिको वशमें कर लेती है, वैसे ही मेरे साथ अपने हृदयको प्रेम-बन्धनसे बाँध रखनेवाले समदर्शी साधु भक्तिके द्वारा मुझे अपने वशमें कर लेते हैं ॥ ६६ ॥ मेरे अनन्यप्रेमी भक्त सेवासे ही अपनेको परिपूर्णकृतकृत्य मानते हैं। मेरी सेवाके फलस्वरूप जब उन्हें सालोक्य-सारूप्य आदि मुक्तियाँ प्राप्त होती हैं, तब वे उन्हें भी स्वीकार करना नहीं चाहते; फिर समयके फेरसे नष्ट हो जानेवाली वस्तुओंकी तो बात ही क्या है ॥ ६७ ॥ दुर्वासाजी ! मैं आपसे और क्या कहूँ, मेरे प्रेमी भक्त तो मेरे हृदय हैं और उन प्रेमी भक्तोंका हृदय स्वयं मैं हूँ। वे मेरे अतिरिक्त और कुछ नहीं जानते तथा मैं उनके अतिरिक्त और कुछ भी नहीं जानता ॥ ६८ ॥ दुर्वासाजी ! सुनिये, मैं आपको एक उपाय बताता हूँ। जिसका अनिष्ट करनेसे आपको इस विपत्तिमें पडऩा पड़ा है, आप उसीके पास जाइये। निरपराध साधुओंके अनिष्टकी चेष्टासे अनिष्ट करनेवालेका ही अमङ्गल होता है ॥ ६९ ॥ इसमें सन्देह नहीं कि ब्राह्मणोंके लिये तपस्या और विद्या परम कल्याणके साधन हैं। परंतु यदि ब्राह्मण उद्दण्ड और अन्यायी हो जाय, तो वे ही दोनों उलटा फल देने लगते हैं ॥ ७० ॥ दुर्वासाजी ! आपका कल्याण हो। आप नाभागनन्दन परम भाग्यशाली राजा अम्बरीषके पास जाइये और उनसे क्षमा माँगिये। तब आपको शान्ति मिलेगी ॥ ७१ ॥

इति श्रीमद्‍भागवते महापुराणे पारमहंस्यां
संहितायां नवमस्कन्धे चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥

हरिः ॐ तत्सत् श्रीकृष्णार्पणमस्तु ॥

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श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - नवाँ अध्याय..(पोस्ट०४)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ श्रीमद्भागवतमहापुराण  सप्तम स्कन्ध – नवाँ अध्याय..(पोस्ट०४) प्रह्लादजी के द्वारा नृसिंहभगवान्‌ की स्तुति सर्वे ह्य...