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सोमवार, 20 मई 2024
श्रीमद्भागवतमहापुराण प्रथम स्कन्ध पंद्रहवां अध्याय..(पोस्ट..०५)
रविवार, 19 मई 2024
श्रीगर्ग-संहिता (गोलोकखण्ड) सोलहवाँ अध्याय (पोस्ट 01)
श्रीगर्ग-संहिता
(गोलोकखण्ड)
सोलहवाँ अध्याय (पोस्ट
01)
भाण्डीर-वनमें
नन्दजीके द्वारा श्रीराधाजीकी स्तुति; श्रीराधा और श्रीकृष्णका
ब्रह्माजीके द्वारा विवाह; ब्रह्माजीके द्वारा श्रीकृष्णका
स्तवन तथा नव-दम्पति की मधुर लीलाएँ
श्रीनारद
उवाच –
गाश्चारयन् नन्दनमङ्कदेशे
संलालयन् दूरतमं सकाशात् ।
कलिंदजातीरसमीरकंपितं
नंदोऽपि भांडीरवनं जगाम ॥१॥
कृष्णेच्छया वेगतरोऽथ वातो
घनैरभून्मेदुरमंबरं च ।
तमालनीपद्रुमपल्लवैश्च
पतद्भिरेजद्भिरतीव भाः कौ ॥२॥
तदांधकारे महति प्रजाते
बाले रुदत्यंकगतेऽतिभीते ।
नंदो भयं प्राप शिशुं स बिभ्र-
द्धरिं परेशं शरणं जगाम ॥३॥
तदैव कोट्यर्कसमूहदीप्ति-
रागच्छतीवाचलती दिशासु ।
बभूव तस्यां वृषभानुपुत्रीं
ददर्श राधां नवनंदराजः ॥४॥
कोटींदुबिंबद्युतिमादधानां
नीलांबरां सुंदरमादिवर्णाम् ।
मंजीरधीरध्वनिनूपुराणा-
माबिभ्रतीं शब्दमतीव मंजुम् ॥५॥
कांचीकलाकंकणशब्दमिश्रां
हारांगुलीयांगदविस्फुरंतीम् ।
श्रीनासिकामौक्तिकहंसिकीभिः
श्रीकंठचूडामणिकुंडलाढ्याम् ॥६॥
तत्तेजसा धर्षित आशु नंदो
नत्वाथ तामाह कृतांजलिः सन् ।
अयं तु साक्षात्पुरुषोत्तमस्त्वं
प्रियास्य मुख्यासि सदैव राधे ॥७॥
गुप्तं त्विदं गर्गमुखेन वेद्मि
गृहाण राधे निजनाथमंकात् ।
एनं गृहं प्रापय मेघभीतं
वदामि चेत्थं प्रकृतेर्गुणाढ्यम् ॥८॥
श्रीनारदजी
कहते हैं- राजन् ! एक दिन नन्दजी अपने नन्दनको अङ्कमें लेकर लाड़ लड़ाते और गौएँ
चराते हुए खिरकके पाससे बहुत दूर निकल गये। धीरे-धीरे भाण्डीर-वन जा पहुँचे,
जो कालिन्दी-नीरका स्पर्श करके बहनेवाले तीरवर्ती शीतल समीरके
झोंकेसे कम्पित हो रहा था। थोड़ी ही देरमें श्रीकृष्णकी इच्छासे वायुका वेग
अत्यन्त प्रखर हो उठा । आकाश मेघोंकी घटासे आच्छादित हो गया । तमाल और कदम्ब
वृक्षों- के पल्लव टूट-टूटकर गिरने, उड़ने और अत्यन्त भयका
उत्पादन करने लगे। उस समय महान् अन्धकार छा गया। नन्दनन्दन रोने लगे। वे पिताकी
गोदमें बहुत भयभीत दिखायी देने लगे। नन्दको भी भय हो गया। वे शिशुको गोद में लिये
परमेश्वर श्रीहरिकी शरणमें गये ॥ १-३ ॥
उसी
क्षण करोड़ों सूर्योंके समूहकी सी दिव्य दीप्ति उदित हुई,
जो सम्पूर्ण दिशाओं में व्याप्त थी; वह क्रमशः
निकट आती-सी जान पड़ी उस दीप्तिराशि के भीतर नौ नन्दों के राजा ने वृषभानुनन्दिनी
श्रीराधा को देखा। वे करोड़ों चन्द्रमण्डलों की कान्ति धारण किये हुए थीं। उनके
श्रीअङ्गोंपर आदिवर्ण नील रंगके सुन्दर वस्त्र शोभा पा रहे थे। चरणप्रान्त में
मञ्जीरों की धीर-ध्वनिसे युक्त नूपुरोंका अत्यन्त मधुर शब्द हो रहा था । उस
शब्दमें काञ्चीकलाप और कङ्कणों की झनकार भी मिली थी । रत्नमय हार, मुद्रिका और बाजूबंदोंकी प्रभासे वे और भी उद्भासित हो रही थीं । नाकमें
मोतीकी बुलाक और नकबेसरकी अपूर्व शोभा हो रही थी। कण्ठमें कंठा, सीमन्तपर चूड़ामणि और कानोंमें कुण्डल झलमला रहे थे ॥ ४-६ ॥
श्रीराधाके
दिव्य तेज से अभिभूत हो नन्द ने तत्काल उनके सामने मस्तक झुकाया और हाथ जोड़कर
कहा— 'राधे ! ये साक्षात् पुरुषोत्तम हैं और तुम इनकी मुख्य प्राणवल्लभा हो,
यह गुप्त रहस्य मैं गर्गजीके मुखसे सुनकर जानता हूँ। राधे! अपने
प्राणनाथको मेरे अङ्क से ले लो। ये बादलोंकी गर्जनासे डर गये हैं । इन्होंने
लीलावश यहाँ प्रकृतिके गुणोंको स्वीकार किया है। इसीलिये इनके विषयमें इस प्रकार
भयभीत होनेकी बात कही गयी है। देवि ! मैं तुम्हें नमस्कार करता हूँ। तुम इस भूतलपर
मेरी यथेष्ट रक्षा करो। तुमने कृपा करके ही मुझे दर्शन दिया है, वास्तव में तो तुम सब लोगोंके लिये दुर्लभ हो' ॥ ७ – ८ ॥
शेष
आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीगर्ग-संहिता पुस्तक कोड 2260 से
श्रीमद्भागवतमहापुराण प्रथम स्कन्ध पंद्रहवां अध्याय..(पोस्ट..०४)
शनिवार, 18 मई 2024
श्रीगर्ग-संहिता (गोलोकखण्ड) पंद्रहवाँ अध्याय (पोस्ट 05)
# श्रीहरि:
#
श्रीगर्ग-संहिता
(गोलोकखण्ड)
पंद्रहवाँ
अध्याय (पोस्ट 05)
यशोदाद्वारा
श्रीकृष्णके मुखमें सम्पूर्ण ब्रह्माण्डका दर्शन;
नन्द और यशोदाके पूर्व- पुण्य का परिचय; गर्गाचार्यका
नन्द भवनमें जाकर बलराम और श्रीकृष्णके नामकरण - संस्कार करना तथा वृषभानुके यहाँ
जाकर उन्हें श्रीराधा-कृष्णके नित्य-सम्बन्ध एवं माहात्म्यका ज्ञान कराना
श्रीगर्ग
उवाच -
अहं न कारयिष्यामि विवाहमनयोर्नृप ।
तयोर्विवाहो भविता भांडीरे यमुनातटे ॥६०॥
वृंदावनसमीपे च निर्जने सुंदरस्थले ।
परमेष्ठी समागत्य विवाहं कारयिष्यति ॥६१॥
तस्माद्राधां गोपवर विद्ध्यर्धांगीं वरस्य च ।
लोके चूडामणिः साक्षाद्राज्ञीं गोलोकमंदिरे ॥६२॥
यूयं सर्वेऽपि गोपाला गोलोकादागता भुवि ।
तथा गोपीगणा गोपा गोलोके राधिकेच्छया ॥६३॥
यद्दर्शनं दुर्लभमेव दुर्घटं
देवैश्च यज्ञैर्न च जन्मभिः किमु ।
सविग्रहां तां तव मंदिराजिरे
लक्ष्यंति गुप्तां बहुगोपगोपिकाः ॥६४॥
श्रीनारद उवाच -
तदा च विस्मितौ राजन् दंपती हर्षितौ परम् ।
राधाकृष्णप्रभावं च श्रुत्वा श्रीगर्गमूचतुः ॥६५॥
दंपती ऊचतुः -
राधाशब्दस्य हे ब्रह्मन् व्याख्यानं वद तत्त्वतः ।
त्वत्तो न संशयच्छेत्ता कोऽपि भूमौ महामुने ॥६६॥
श्रीगर्ग उवाच -
सामवेदस्य भावार्थं गंधमादनपर्वते ।
शिष्येणापि मया तत्र नारायणमुखाच्छ्रुतम् ॥६७॥
रमया तु रकारः स्यादाकारस्त्वादिगोपिका ।
धकारो धरया हि स्यादाकारो विरजा नदी ॥६८॥
श्रीकृष्णस्य परस्यापि चतुर्द्धा तेजसोऽभवत् ।
लीलाभूः श्रीश्च विरजा चतस्रः पत्न्य एव हि ॥६९॥
संप्रलीनाश्च ताः सर्वा राधायां कुंजमंदिरे ।
परिपूर्णतमां राधां तस्मादाहुर्मनिषिणः ॥७०॥
श्रीनारद उवाच -
राधाकृष्णेति हे गोप ये जपंति पुनः पुनः ।
चतुष्पदार्थं किं तेषां साक्षात्कृष्णोऽपि लभ्यते ॥७१॥
तदातिविस्मितो राजन् वृषभानुः प्रियायुतः ।
राधाकृष्णप्रभावं तं ज्ञात्वाऽऽनंदमयो ह्यभूत् ॥७२॥
इत्थं गर्गो ज्ञानिवरः पूजितो वृषभानुना ।
जगाम स्वगृहं साक्षान्मुनीन्द्रः सर्ववित्कविः ॥७३॥
श्रीगर्गजीने कहा- राजन् ! श्रीराधा और
श्रीकृष्णका पाणिग्रहण-संस्कार मैं नहीं कराऊँगा । यमुनाके तटपर भाण्डीर वनमें
इनका विवाह होगा । वृन्दावनके निकट जनशून्य सुरम्य स्थानमें स्वयं श्रीब्रह्माजी
पधारकर इन दोनोंका विवाह करायेंगे । गोपवर ! तुम इन श्रीराधिकाको भगवान्
श्रीकृष्णकी वल्लभा समझो। संसारमें राजाओंके शिरोमणि तुम हो और लोकोंका शिरोमणि
गोलोकधाम है। तुम सम्पूर्ण गोप गोलोकधामसे ही इस भूमण्डलपर आये हो। वैसे ही समस्त
गोपियाँ भी श्रीराधिकाजीकी आज्ञा मानकर गोलोकसे आयी हैं। बड़े-बड़े यज्ञ करनेपर
देवताओं- को भी अनेक जन्मों तक जिनकी झाँकी सुलभ नहीं होती,
उनके लिये भी जिनका दर्शन दुर्घट है, वे
साक्षात् श्रीराधिका जी तुम्हारे मन्दिर के आँगन में गुप्तरूप से विराज रही हैं और
बहुसंख्यक गोप और गोपियाँ उनका साक्षात् दर्शन करती हैं ।। ६० - ६४ ।।
श्रीनारदजी
कहते हैं- राजन् ! श्रीराधिकाजी और भगवान् श्रीकृष्णका यह प्रशंसनीय प्रभाव सुनकर
श्रीवृषभानु और कीर्ति — दोनों अत्यन्त विस्मित तथा आनन्दसे आह्लादित हो उठे और
गर्गजीसे कहने लगे ॥ ६५ ॥
दम्पती
बोले- ब्रह्मन् ! 'राधा' शब्दकी तात्त्विक व्याख्या बताइये। महामुने ! इस भूतलपर मन के संदेह को
दूर करने वाला आपके समान दूसरा कोई नहीं है ॥ ६६ ॥
श्रीगर्गजीने
कहा- एक समयकी बात है, मैं गन्धमादन पर्वतपर
गया। साथमें शिष्यवर्ग भी थे। वहीं भगवान् नारायण के श्रीमुख से मैंने सामवेद का
यह सारांश सुना है। 'रकार' से रमा का,
'आकार' से गोपिकाओं का, 'धकार' से धराका तथा 'आकार'
से विरजा नदीका ग्रहण होता है । परमात्मा भगवान् श्रीकृष्णका
सर्वोत्कृष्ट तेज चार रूपोंमें विभक्त हुआ । लीला, भू,
श्री और विरजा ये चार पत्नियाँ ही उनका चतुर्विध तेज हैं। ये सब की
सब कुञ्जभवनमें जाकर श्रीराधिकाजी के श्रीविग्रह में लीन हो गयीं। इसीलिये विज्ञजन
श्रीराधाको 'परिपूर्णतमा' कहते हैं ।
गोप ! जो मनुष्य बारंबार 'राधाकृष्ण' के
इस नामका उच्चारण करते हैं, उन्हें चारों पदार्थ तो क्या,
साक्षात् भगवान् श्रीकृष्ण भी सुलभ हो जाते हैं ॥ ६७-७१ ॥
श्रीनारदजी
कहते हैं— राजन् ! उस समय भार्या- सहित श्रीवृषभानुके आश्चर्यकी सीमा न रही।
श्रीराधा- कृष्णके दिव्य प्रभावको जानकर वे आनन्दके मूर्तिमान् विग्रह बन गये । इस
प्रकार श्रीवृषभानुने ज्ञानिशिरोमणि श्रीगर्गजीकी पूजा की। तब वे सर्वज्ञ एवं
त्रिकालदर्शी मुनीन्द्र गर्ग स्वयं अपने स्थानको सिधारे ।। ७२-७३ ।।
इस
प्रकार श्रीगर्गसंहितामें गोलोकखण्डके अन्तर्गत नारद- बहुलाश्व-संवादमें 'नन्द-पत्नीका विश्वरूपदर्शन तथा श्रीकृष्ण-बलरामका नामकरण संस्कार'
नामक पंद्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १५ ॥
शेष
आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीगर्ग-संहिता पुस्तक कोड 2260 से
श्रीमद्भागवतमहापुराण प्रथम स्कन्ध पंद्रहवां अध्याय..(पोस्ट..०३)
शुक्रवार, 17 मई 2024
श्रीगर्ग-संहिता (गोलोकखण्ड) पंद्रहवाँ अध्याय (पोस्ट 04)
#
श्रीहरि: #
श्रीगर्ग-संहिता
(गोलोकखण्ड)
पंद्रहवाँ
अध्याय (पोस्ट 04)
यशोदाद्वारा
श्रीकृष्णके मुखमें सम्पूर्ण ब्रह्माण्डका दर्शन;
नन्द और यशोदाके पूर्व- पुण्य का परिचय; गर्गाचार्यका
नन्द भवनमें जाकर बलराम और श्रीकृष्णके नामकरण - संस्कार करना तथा वृषभानुके यहाँ
जाकर उन्हें श्रीराधा-कृष्णके नित्य-सम्बन्ध एवं माहात्म्यका ज्ञान कराना
श्रीवृषभानुरुवाच
-
सतां पर्यटनं शांतं गृहिणां शांतये स्मृतम् ।
नृणामंतस्तमोहारी साधुरेव न भास्करः ॥४६॥
तीर्थीभूता वयं गोपा जातास्त्वद्दर्शनात्प्रभो ।
तीर्थानि तीर्थीकुर्वंति त्वादृशाः साधवः क्षितौ ॥४७॥
हे मुने राधिकानाम कन्या मे मंगलायना ।
कस्मै वराय दातव्या वद त्वं मे सुनिश्चितम् ॥४८॥
त्वं पर्यटन्नर्क इव त्रिलोकीं दिव्यदर्शनः ।
वरोऽनया समो यो वै तस्मै दास्यामि कन्यकाम् ॥४९॥
श्रीनारद उवाच -
हस्तं गृहीत्वा श्रीगर्गो वृषभानोर्महामुनिः ।
जगाम यमुनातीरं निर्जनं सुंदरस्थलम् ॥५०॥
कालिन्दीजलकल्लोककोलाहलसमाकुलम् ।
तत्रोपवेश्य गोपेशं मुनींद्रः प्राह धर्मवित् ॥५१॥
श्रीगर्ग उवाच -
हे गोप गुप्तमाख्यानं कथनीयं न च त्वया ।
परिपूर्णतमः साक्षाच्छ्रीकृष्णो भगवान्स्वयम् ॥५२॥
असंख्यब्रह्मांडपतिर्गोलोकेशः परात्परः ।
तस्मात्परो वरो नास्ति जातो नंदगृहे पतिः ॥५३॥
श्रीवृषभानुरुवाच -
अहोभाग्यमहोभाग्यं नंदस्यापि महामुने ।
श्रीकृष्णस्यावतारस्य सर्वं त्वं वद कारणम् ॥५४॥
श्रीगर्ग उवाच -
भुवो भारावताराय कंसादीनां वधाय च ।
ब्रह्मणा प्राथितः कृष्णो बभूव जगतीतले ॥५५॥
श्रीकृष्णपट्टराज्ञी या गोलोके राधिकाभिधा ।
त्वद्गृहे सापि संजाता त्वं न जानासि तां पराम् ॥५६॥
श्रीनारद उवाच -
तदा प्रहर्षितो गोपो वृषभानुः सुविस्मितः ।
कलावतीं समाहूय तया सार्द्धं विचार्य च ॥५७॥
राधाकृष्णानुभावं च ज्ञात्वा गोपवरः परः ।
आनंदाश्रुकलां मुंचन्पुनराह महामुनिम् ॥५८॥
श्रीवृषभानुरुवाच -
तस्मै दास्यामि हे ब्रह्मन् कन्यां कमललोचनाम् ।
त्वया पंथा दर्शितो मे त्वया कार्योऽयमुद्वहः ॥५९॥
श्रीवृषभानु
ने कहा- संत पुरुषों का विचरण शान्तिमय है; क्योंकि
वह गृहस्थजनों को परम शान्ति प्रदान करनेवाला है। मनुष्यों के भीतरी अन्धकार का
नाश महात्माजन ही करते हैं, सूर्यदेव नहीं। भगवन् ! आपका
दर्शन पाकर हम सभी गोप पवित्र हो गये। भूमण्डल पर आप जैसे साधु-महात्मा पुरुष
तीर्थों को भी पावन बनानेवाले होते हैं। मुने! मेरे यहाँ एक कन्या हुई है, जो मङ्गल की धाम है और जिसका 'राधिका' नाम है। आप भली-भाँति विचारकर यह बताने की कृपा कीजिये कि इसका शुभ विवाह
किसके साथ किया जाय। सूर्य की भाँति आप तीनों लोकों में विचरण करते हैं। आप
दिव्यदर्शन हैं, जो इसके अनुरूप सुयोग्य वर होगा, उसीके हाथ में इस कल्याणमयी कन्या को दूँगा । ४६ – ४९ ।।
श्रीनारदजी
कहते हैं— राजन् ! तदनन्तर मुनिवर गर्गजी वृषभानुजीका हाथ पकड़े यमुनाके तटपर गये।
वहाँ एक निर्जन और अत्यन्त सुन्दर स्थान था, जहाँ
कालिन्दीजलकी कल्लोलमालाओंकी कल-कल ध्वनि सदा गूँजती रहती थी। वहीं गोपेश्वर
वृषभानुको बैठाकर धर्मज्ञ मुनीन्द्र गर्ग इस प्रकार कहने लगे । ५०-५१ ॥
श्रीगर्गजी
बोले- वृषभानुजी ! एक गुप्त बात है, यह
तुम्हें किसीसे नहीं कहनी चाहिये। जो असंख्य ब्रह्माण्डोंके अधिपति, गोलोकधामके स्वामी, परात्पर तथा साक्षात् परिपूर्णतम
हैं; जिनसे बढ़कर दूसरा कोई नहीं है; स्वयं
वे ही भगवान् श्रीकृष्ण नन्दके घरमें प्रकट हुए हैं ।। ५२-५३ ।।
श्रीवृषभानुने
कहा- महामुने ! नन्दजीका भी भाग्य अद्भुत है, धन्य
एवं अवर्णनीय है। अब आप भगवान् श्रीकृष्ण के अवतार का सम्पूर्ण कारण मुझे बताइये ॥
५४ ॥
श्रीगर्ग
जी बोले- पृथ्वी का भार उतारने और कंस आदि दुष्टों का विनाश करने के लिये
ब्रह्माजी के प्रार्थना करने पर भगवान् श्रीकृष्ण पृथ्वीपर अवतीर्ण हुए हैं।
उन्हीं परम प्रभु श्रीकृष्णकी पटरानी, जो
प्रिया श्रीराधिकाजी गोलोकधाममें विराजती हैं, वे ही
तुम्हारे
घर
पुत्रीरूप से प्रकट हुई हैं। तुम उन पराशक्ति राधिकाको नहीं जानते ।। ५५-५६ ॥
श्रीनारदजी
कहते हैं - राजन् ! उस समय गोप वृषभानुके मनमें आनन्दकी बाढ़ आ गयी और वे अत्यन्त
विस्मित हो गये। उन्होंने कलावती (कीर्ति) को बुलाकर उनके साथ विचार किया। पुनः
श्रीराधा- कृष्णके प्रभावको जानकर गोपवर वृषभानु आनन्दके आँसू बहाते हुए पुनः
महामुनि गर्गसे कहने लगे ।। ५७-५८ ॥
श्रीवृषभानुने
कहा – द्विजवर ! उन्हीं भगवान् श्रीकृष्णको मैं अपनी यह कमलनयनी कन्या समर्पण
करूँगा। आपने ही मुझे यह सन्मार्ग दिखलाया है; अतः
आपके द्वारा ही इसका शुभ विवाह-संस्कार सम्पन्न होना चाहिये ।। ५९ ।।
शेष
आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीगर्ग-संहिता पुस्तक कोड 2260 से
श्रीमद्भागवतमहापुराण प्रथम स्कन्ध पंद्रहवां अध्याय..(पोस्ट..०२)
गुरुवार, 16 मई 2024
श्रीगर्ग-संहिता (गोलोकखण्ड) पंद्रहवाँ अध्याय (पोस्ट 03)
#
श्रीहरि: #
श्रीगर्ग-संहिता
(गोलोकखण्ड)
पंद्रहवाँ
अध्याय (पोस्ट 03)
यशोदाद्वारा
श्रीकृष्णके मुखमें सम्पूर्ण ब्रह्माण्डका दर्शन;
नन्द और यशोदाके पूर्व- पुण्य का परिचय; गर्गाचार्यका
नन्द भवनमें जाकर बलराम और श्रीकृष्णके नामकरण - संस्कार करना तथा वृषभानुके यहाँ
जाकर उन्हें श्रीराधा-कृष्णके नित्य-सम्बन्ध एवं माहात्म्यका ज्ञान कराना
वसवश्चेंद्रियाणीति
तद्देवश्चित्तमेव हि ।
तस्मिन्यश्चेष्टते सोऽपि वासुदेव इति स्मृतः ॥३३॥
वृषभानुसुता राधा या जाता कीर्तिमंदिरे ।
तस्याः पतिरयं साक्षात्तेन राधापतिः स्मृतः ॥३४॥
परिपूर्णतमः साक्षाच्छ्रीकृष्णो भगवान्स्वयम् ।
असंख्यब्रह्माण्डपतिः गोलोके धाम्नि राजते ॥३५॥
सोऽयं तव शिशुर्जातो भारावतरणाय च ।
कंसादीनां वधार्थाय भक्तानां रक्षणाय च ॥३६॥
अनंतान्यस्य नामानि वेदगुह्यानि भारत ।
लीलाभिश्च भविष्यंति तत्कर्मसु न विस्मयः ॥३७॥
अहोभाग्यं तु ते नंद साक्षाच्छ्रीपुरुषोत्तमः ।
त्वद्गृहे वर्तमानोऽयं शिशुरूपः परात्परः ॥३८॥
इत्युक्त्वाथ गते गर्गे स्वात्मानं पूर्णमाशिषाम् ।
मेने प्रमुदितः पत्न्या नंदराजो महामतिः ॥३९॥
अर्थ गर्गो ज्ञानिवरो ज्ञानदो मुनिसत्तमः ।
कालिंदीतीरशोभाढ्यां वृषभानुपुरं गतः ॥४०॥
छत्रेण शोभितं विप्रं द्वितीयमिव वासवम् ।
दंडेन राजितं साक्षाद्धर्मराजमिव स्थितम् ॥४१॥
तेजसा द्योतितदिशं साक्षात्सूर्यमिवापरम् ।
पुस्तकीमेखलायुक्तं द्वितीयमिव पद्मजम् ॥४२॥
शोभितं शुक्लवासोभिर्देवं विष्णुमिव स्थितम् ।
तं दृष्ट्वा मुनिशार्दूलं सहसोत्थाय सादरम् ॥४३॥
प्रणम्य शिरसा सद्यः संमुखोऽभूत् कृतांजलिः ।
मुनिं च पीठके स्थाप्य पाद्याद्यैरुपचारवित् ॥४४॥
पूजयामास विधिवच्छ्रीगर्गं ज्ञानिनां वरम् ।
ततः प्रदक्षिणीकृत्य वृषभानुवरो महान् ॥४५॥
इनका
एक नाम 'वासुदेव' भी है। इसकी व्युत्पत्ति इस प्रकार है- 'वसु' नाम है इन्द्रियोंका । इनका देवता है— चित्त ।
उस चित्त में स्थित रहकर जो चेष्टाशील हैं, उन अन्तर्यामी
भगवान् को 'वासुदेव' कहते हैं।
वृषभानुकी पुत्री राधा जो कीर्तिके भवनमें प्रकट हुई हैं, उनके
ये साक्षात् प्राणनाथ बनेंगे; अतः इनका एक नाम 'राधापति' भी है ॥ ३३-३४ ॥
जो
साक्षात् परिपूर्णतम स्वयं भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र हैं,
असंख्य ब्रह्माण्ड जिनके अधीन हैं और जो गोलोकधाम में विराजते हैं,
वे ही परम प्रभु तुम्हारे यहाँ बालकरूपसे प्रकट हुए हैं। पृथ्वीका
भार उतारना, कंस आदि दुष्टोंका संहार करना और भक्तोंकी रक्षा
करना — ये ही इनके अवतार के उद्देश्य हैं ।। ३५-३६ ।।
भरतवंशोद्भव
नन्द ! इनके नामोंका अन्त नहीं है । वे सब नाम वेदोंमें गूढ़रूपसे कहे गये हैं ।
इनकी लीलाओंके कारण भी उन-उन कर्मों के अनुसार इनके नाम विख्यात होंगे। इनके
अद्भुत कर्मोंको लेकर आश्चर्य नहीं करना चाहिये। तुम्हारा अहोभाग्य है;
क्योंकि जो साक्षात् परिपूर्णतम परात्पर श्रीपुरुषोत्तम प्रभु हैं,
वे तुम्हारे घर पुत्रके रूपमें शोभा पा रहे हैं ।। ३७-३८ ।।
श्रीनारदजी
कहते हैं- राजन् ! यों कहकर श्रीगर्गजी जब चले गये, तब प्रमुदित हुए महामति नन्दरायने यशोदा-सहित अपनेको पूर्णकाम एवं
कृतकृत्य माना ॥ तदनन्तर ज्ञानिशिरोमणि ज्ञानदाता मुनिश्रेष्ठ श्रीगर्गजी
यमुनातटपर सुशोभित वृषभानुजीकी पुरी में पधारे। छत्र धारण करनेसे वे दूसरे
इन्द्रकी तथा दण्ड धारण करने से साक्षात् धर्मराज की भाँति सुशोभित होते थे ॥ ३९-४१
॥
साक्षात्
दूसरे सूर्य की भाँति वे अपने तेजसे सम्पूर्ण दिशाओंको प्रकाशित कर रहे थे। पुस्तक
तथा मेखलासे युक्त विप्रवर गर्ग दूसरे ब्रह्माकी भाँति प्रतीत होते थे। शुक्ल
वस्त्रोंसे सुशोभित होनेके कारण वे भगवान् विष्णुकी-सी शोभा पाते थे । उन
मुनिश्रेष्ठको देखकर वृषभानुजीने तुरंत उठकर अत्यन्त आदरके साथ सिर झुकाकर उन्हें
प्रणाम किया और हाथ जोड़कर वे उनके सामने खड़े हो गये। पूजनोपचारके ज्ञाता
वृषभानुने मुनिको एक मङ्गलमय आसनपर बिठाकर पाद्य आदिके द्वारा उन ज्ञानिशिरोमणि
गर्गका विधिवत् पूजन किया। फिर उनकी परिक्रमा करके महान् 'वृषभानुवर' इस प्रकार बोले ।। ४२–४५ ॥
शेष
आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीगर्ग-संहिता पुस्तक कोड 2260 से
श्रीमद्भागवतमहापुराण प्रथम स्कन्ध पंद्रहवां अध्याय..(पोस्ट..०१)
बुधवार, 15 मई 2024
श्रीगर्ग-संहिता (गोलोकखण्ड) पंद्रहवाँ अध्याय (पोस्ट 02)
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श्रीहरि: #
श्रीगर्ग-संहिता
(गोलोकखण्ड)
पंद्रहवाँ
अध्याय (पोस्ट 02)
यशोदाद्वारा
श्रीकृष्णके मुखमें सम्पूर्ण ब्रह्माण्डका दर्शन;
नन्द और यशोदाके पूर्व- पुण्य का परिचय; गर्गाचार्यका
नन्द भवनमें जाकर बलराम और श्रीकृष्णके नामकरण - संस्कार करना तथा वृषभानुके यहाँ
जाकर उन्हें श्रीराधा-कृष्णके नित्य-सम्बन्ध एवं माहात्म्यका ज्ञान कराना
श्रीबहुलाश्व उवाच -
नंदगेहे हरिः साक्षाच्छिशुरूपः सनातनः ।
किं चकार बलेनापि तन्मे ब्रूहि महामुने ॥१७॥
श्रीनारद उवाच -
एकदा शिष्यसहोतो गर्गाचार्यो महामुनिः ।
शौरिणा नोदितः साक्षादाययौ नंदमंदिरम् ॥१८॥
नंदः संपूज्य विधिवत्पाद्याद्यैर्मुनिसत्तमम् ।
ततः प्रदक्षिणीकृत्य साष्टांगं प्रणनाम ह ॥१९॥
श्रीनन्द उवाच -
अद्य नः पितरो देवाः संतुष्टा अग्नयश्च नः ।
पवित्रं मंदिरं जातं युष्मच्चरणरेणुभिः ॥२०॥
मत्पुत्रनामकरणं कुरु द्विज महामुने ।
पुण्यैस्तीर्थैश्च दुष्प्राप्यं भवदागमनं प्रभो ॥२१॥
श्रीगर्ग उवाच -
ते पुत्रनामकरणं करिष्यामि न संशयः ।
पूर्ववार्तां गदिष्यामि गच्छ नंद रहःस्थलम् ॥२२॥
श्रीनारद उवाच -
उत्थाप्य गर्गो नन्देन बालाभ्यां च यशोदया ।
एकांते गोव्रजे गत्वा तयोर्नाम चकार ह ।
संपूज्य गणनाथादीन् ग्रहान्संशोध्य यत्नतः ।
नंदं प्राह प्रसन्नांगो गर्गाचार्यो महामुनिः ॥२४॥
रोहिणीनंदनस्यास्य नामोच्चारं शृणुष्व च ।
रमन्ते योगिनो ह्यस्मिन्सर्वत्र रमतीति वा ॥२५॥
गुणैश्च रमयन् भक्ताण्स्तेन रामं विदुः परे ।
गर्भसंकर्षणादस्य संकर्षण इति स्मृतः ॥२६॥
सर्वावशेषाद्यं शेषं बलाधिक्याद्बलं विदुः ।
स्वपुत्रस्यापि नामानि शृणु नंद ह्यतन्द्रितः ॥२७॥
सद्यः प्राणिपवित्राणि जगतां मंगलानि च ।
ककारः कमलाकांत ऋकारो राम इत्यपि ॥२८॥
षकारः षड्गुणपतिः श्वेतद्वीपनिवासकृत् ।
णकारो नारसिंहोऽयमकारो ह्यक्षरोऽग्निभुक् ॥२९॥
विसर्गौ च तथा ह्येतौ नरनारायणावृषी ।
संप्रलीनाश्च षट् पूर्णा यस्मिञ्छुद्धे महात्मनि ॥३०॥
परिपूर्णतमे साक्षात्तेन कृष्णः प्रकीर्तितः ।
शुक्लो रक्तस्तथा पीतो वर्णोऽस्यानुयुगं धृतः ॥३१॥
द्वापरान्ते कलेरादौ बालोऽयं कृष्णतां गतः ।
तस्मात्कृष्ण इति ख्यातो नाम्नायं नंदनंदनः ॥३२॥
श्रीबहुलाश्वने
पूछा- महामुने ! शिशुरूपधारी उन सनातन पुरुष भगवान् श्रीहरिने बलरामजीके साथ
कौन-कौन-सी लीलाएँ कीं, यह मुझे बताइये ॥ १७
॥
श्रीनारदजीने
कहा- राजन् ! एक दिन वसुदेव- जीके भेजे हुए महामुनि गर्गाचार्य अपने शिष्योंके साथ
नन्दभवनमें पधारे। नन्दजीने पाद्य आदि उत्तम उपचारों- द्वारा मुनिश्रेष्ठ गर्गकी
विधिवत् पूजा की और प्रदक्षिणा करके उन्हें साष्टाङ्ग प्रणाम किया ॥ १८-१९ ॥
नन्दजी
बोले - आज हमारे पितर देवता और अग्नि- सभी संतुष्ट हो गये। आपके चरणोंकी धूलि
पड़नेसे हमारा घर परम पवित्र हो गया। महामुने ! आप मेरे बालकका नामकरण कीजिये ।
विप्रवर प्रभो ! अनेक पुण्यों और तीर्थोंका सेवन करनेपर भी आपका शुभागमन सुलभ नहीं
होता ।। २०-२१ ॥
श्रीगर्गजीने
कहा –नन्दरायजी ! मैं तुम्हारे पुत्रका नामकरण करूँगा,
इसमें संशय नहीं है; किंतु कुछ पूर्वकालकी बात
बताऊँगा, अतः एकान्त स्थानमें चलो ॥ २२ ॥
श्रीनारदजी
कहते हैं- राजन् ! तदनन्तर गर्गजी नन्द-यशोदा तथा दोनों बालक- श्रीकृष्ण एवं
बलरामको साथ लेकर गोशालामें, जहाँ दूसरा कोई
नहीं था, चले गये। वहाँ उन्होंने उन बालकोंका नामकरण संस्कार
किया । सर्वप्रथम उन्होंने गणेश आदि देवताओंका पूजन किया, फिर
यत्नपूर्वक ग्रहोंका शोधन (विचार) करके हर्षसे पुलकित हुए महामुनि गर्गाचार्य
नन्दसे बोले ॥ २३-२४ ॥
गर्गजीने
कहा- ये जो रोहिणीके पुत्र हैं, इनका नाम बताता
हूँ — सुनो । इनमें योगीजन रमण करते हैं अथवा ये सब में रमते हैं या अपने गुणों द्वारा
भक्तजनों के मन को रमाया करते हैं, इन कारणोंसे उत्कृष्ट
ज्ञानीजन इन्हें 'राम' नामसे जानते
हैं। योगमायाद्वारा गर्भका संकर्षण होनेसे इनका प्रादुर्भाव हुआ है, अतः ये 'संकर्षण' नामसे
प्रसिद्ध होंगे। अशेष जगत् का संहार होनेपर भी ये शेष रह जाते हैं, अतः इन्हें लोग 'शेष' नामसे
जानते हैं। सबसे अधिक बलवान् होनेसे ये 'बल' नामसे भी विख्यात होंगे ॥२५-२६॥
नन्द
! अब अपने पुत्रके नाम सावधानीके साथ सुनो- ये सभी नाम तत्काल प्राणिमात्रको पावन
करनेवाले तथा चराचर समस्त जगत् के लिये परम कल्याणकारी हैं। 'क' का अर्थ है— कमलाकान्त; 'ऋ'कारका अर्थ है— राम; 'ष' अक्षर
षड्विध ऐश्वर्यके स्वामी श्वेतद्वीपनिवासी भगवान् विष्णुका - वाचक है। 'ण' नरसिंहका प्रतीक है और 'अकार'
अक्षर अग्निभुक् (अग्निरूप से हविष्य के भोक्ता अथवा अग्निदेव के
रक्षक) का वाचक है तथा दोनों विसर्गरूप बिंदु (:) नर-नारायण के बोधक हैं। ये छहों
पूर्ण तत्त्व जिस महामन्त्ररूप परिपूर्णतम शब्दमें लीन हैं, वह
इसी व्युत्पत्तिके कारण 'कृष्ण' कहा
गया है। अतः इस बालकका एक नाम 'कृष्ण' है।
सत्ययुग, त्रेता, द्वापर और कलियुग —
इन युगोंमें इन्होंने शुक्ल, रक्त, पीत
तथा कृष्ण कान्ति ग्रहण की है। द्वापरके अन्त और कलिके आदिमें यह बालक 'कृष्ण' अङ्गकान्तिको प्राप्त हुआ है, इस कारणसे भी यह नन्दनन्दन 'कृष्ण' नामसे विख्यात होगा ॥ २७-३२ ॥
शेष
आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीगर्ग-संहिता पुस्तक कोड 2260 से
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