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मंगलवार, 25 जून 2024
श्रीमद्भागवतमहापुराण प्रथम स्कन्ध उन्नीसवां अध्याय..(पोस्ट ०६)
सोमवार, 24 जून 2024
श्रीगर्ग-संहिता ( श्रीवृन्दावनखण्ड ) छठा अध्याय ( पोस्ट 02 )
# श्रीहरि: #
श्रीगर्ग-संहिता
( श्रीवृन्दावनखण्ड
)
छठा अध्याय ( पोस्ट 02 )
अघासुर का उद्धार और
उसके पूर्वजन्म का परिचय
कोऽयं
दैत्यः पूर्वकाले श्रीकृष्णे लीनतां गतः ।
अहो वैरानुबन्धेन शीघ्रं दैत्यो हरिं गतः ॥ ९ ॥
श्रीनारद उवाच -
शंखासुरसुतो राजन् अघो नाम महाबलः ।
युवातिसुन्दरः साक्षात् कामदेव इवापरः ॥ १० ॥
अष्टावक्रं मुनिं यान्तं विरूपं मलयाचले ।
दृष्ट्वा जहास तमघः कुरूपोऽयमिति ब्रुवन् ॥ ११ ॥
तं शशाप महादुष्टं त्वं सर्पो भव दुर्मते ।
कुरूपो वक्रगा जातिः सर्पाणां भूमिमंडले ॥ १२ ॥
तत्पादयोर्निपतितं दैत्यं दीनं गतस्मयम् ।
दृष्ट्वा प्रसन्नः स मुनिर्वरं तस्मै ददौ पुनः ॥ १३ ॥
अष्टावक्र उवाच -
कोटिकन्दर्पलावण्यः श्रीकृष्णस्तु तवोदरे ।
यदाऽऽगच्छेत्सर्परूपात्तदा मुक्तिर्भविष्यति ॥ १४ ॥
राजा
बोले- देवर्षे ! यह दैत्य पूर्वकालमें कौन जो इस प्रकार भगवान् श्रीकृष्णमें विलीन
हुआ ?
अहो ! कितने आश्चर्यकी बात है कि वह दैत्य वैर बाँधनेके कारण शीघ्र
ही श्रीहरिको प्राप्त हुआ ॥ ९ ॥
श्रीनारदजी
कहते हैं- राजन् ! शङ्खासुर के एक पुत्र था, जो 'अघ' नामसे विख्यात था। महाबली अघ युवावस्थामें
अत्यन्त सुन्दर होनेके कारण साक्षात् दूसरे कामदेव सा जान पड़ता था। एक दिन
मलयाचलपर जाते हुए अष्टावक्र मुनिको देखकर अघासुर जोर- जोर से हँसने लगा और बोला- 'यह कैसा कुरूप है !' ।। १०-११॥
उस
महादुष्टको शाप देते हुए मुनिने कहा— 'दुर्मते
! तू सर्प हो जा; क्योंकि भूमण्डलपर सर्पों की ही जाति कुरूप
एवं कुटिल गतिसे चलनेवाली होती है।' ज्यों- ही उसने यह सुना,
उस दैत्यका सारा अभिमान गल गया और वह दीनभावसे मुनिके चरणोंमें गिर
पड़ा। उसे इस अवस्थामें देखकर मुनि प्रसन्न हो गये और पुनः उसे वर देते हुए बोले-
॥ १२ - १३॥
अष्टावक्र
ने कहा -करोड़ों कंदर्पोंसे भी अधिक लावण्यशाली भगवान् श्रीकृष्ण जब तुम्हारे
उदरमें प्रवेश करेंगे, तब इस सर्परूपसे
तुम्हें छुटकारा मिल जायगा ॥ १४ ॥
इस
प्रकार श्रीगर्गसंहितामें श्रीवृन्दावनखण्डके अन्तर्गत 'अघासुरका मोक्ष' नामक छठा अध्याय पूरा हुआ ॥ ६ ॥
शेष
आगामी पोस्ट में --
श्रीमद्भागवतमहापुराण प्रथम स्कन्ध उन्नीसवां अध्याय..(पोस्ट ०५)
रविवार, 23 जून 2024
श्रीगर्ग-संहिता ( श्रीवृन्दावनखण्ड ) छठा अध्याय ( पोस्ट 01 )
#
श्रीहरि: #
श्रीगर्ग-संहिता
(
श्रीवृन्दावनखण्ड )
छठा
अध्याय ( पोस्ट 01 )
अघासुर
का उद्धार और उसके पूर्वजन्म का परिचय
एकदा
बालकैः साकं गोवत्सांश्चारयन् हरिः ।
कालिन्दीनिकटे रम्ये बालक्रीडां चकार ह ॥ १ ॥
अघासुरो नाम महान् दैत्यस्तत्र स्थितोऽभवत् ।
क्रोशदीर्घं वपुः कृत्वा प्रसार्य मुखमंडलम् ॥ २ ॥
दूराद्यं पर्वताकारं वीक्ष्य वृन्दावने वने ।
गोपा जग्मुर्मुखे तस्य वत्सैः कृत्वांजलिध्वनिम् ॥ ३ ॥
तद्रक्षार्थं च सबलः तन्मुखे प्राविशद्धरिः ।
निगीर्णेषु सवत्सेषु बालेषु त्वहिरूपिणा ॥ ४ ॥
हाशब्दोऽभूत्सुराणां तु दैत्यानां हर्ष एव हि ।
कृष्णो वपुः स्वं वैराजं ततानाघोदरे ततः ॥ ५ ॥
तस्य संरोधगाः प्राणाः शिरोप् भित्वा विनिर्गताः ।
तन्मुखान्निर्गतः कृष्णो बालैर्वत्सैश्च मैथिल ॥ ६ ॥
सवत्सकान् शिशून् दृष्ट्वा जीवयामास माधवः ।
तज्ज्योतिः श्रीघनश्यामे लीनं जातं तडिद्यथा ॥ ७ ॥
तदैव ववृषुर्देवा पुष्पवर्षाणि पार्थिव ।
एवं श्रुत्वा मुनेर्वाक्यं मैथिलो वाक्यमब्रवीत् ॥ ८ ॥
श्रीनारदजी
कहते हैं- राजन् ! एक दिन असुर ने जब बछड़ों और ग्वाल-बालों को निगल ग्वाल-बालों के
साथ बछड़े चराते हुए श्रीहरि कालिन्दीके निकट किसी रमणीय स्थानपर बालोचित खेल
खेलने लगे। उसी समय अघासुर नामक महान् दैत्य एक कोस लंबा शरीर धारण करके भीषण
मुखको फैलाये वहाँ मार्गमें स्थित हो गया। दूरसे ऐसा जान पड़ता था,
मानो कोई पर्वत खड़ा हो। वृन्दावन में उसे देखकर सब ग्वाल-बाल ताली
बजाते हुए बछड़ोंके साथ उसके मुँह में घुस गये ।। १-३ ॥
उन
सबकी रक्षा के लिये बलराम सहित श्रीकृष्ण भी अघासुरके मुखमें प्रविष्ट हो गये। उस
सर्परूपधारी ने जब बछड़ों और ग्वाल-बालों को निगल लिया,
तब देवताओं में हाहाकार मच गया; किंतु
दैत्योंके मनमें हर्ष ही हुआ। उस समय श्रीकृष्णने अघासुरके उदरमें अपने विराट्
स्वरूपको बढ़ाना आरम्भ किया ।। ४-५ ॥
इससे
अवरुद्ध हुए अघासुर- के प्राण उसका मस्तक फोड़कर बाहर निकल गये । मिथिलेश्वर! फिर
बालकों और बछड़ों के साथ श्रीकृष्ण अघासुर के मुखसे बाहर निकले । जो बछड़े और बालक
मर गये थे, उन्हें माधव ने अपनी कृपा-
दृष्टिसे देखकर जीवित कर दिया। अघासुर की जीवन- ज्योति श्यामघन में विद्युत् की
भाँति श्रीघनश्याम में विलीन हो गयी । राजन् ! उसी समय देवताओंने पुष्पवर्षा की।
देवर्षि नारदके मुखसे यह वृत्तान्त सुनकर मिथिलेश्वर बहुलाश्व ने कहा ॥६-८॥
शेष
आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीगर्ग-संहिता पुस्तक कोड 2260 से
शनिवार, 22 जून 2024
श्रीगर्ग-संहिता ( श्रीवृन्दावनखण्ड ) पाँचवाँ अध्याय ( पोस्ट 04 )
#
श्रीहरि: #
श्रीगर्ग-संहिता
(
श्रीवृन्दावनखण्ड )
पाँचवाँ
अध्याय ( पोस्ट 04 )
वकासुरका
उद्धार
उत्कल उवाच -
न जाने ते तपश्चंडं मुने मां पाहि जाजले ।
साधुनां भवतां संगं मोक्षद्वारं परं विदुः ॥ ३६ ॥
मित्रे शत्रौ समा मानेऽपमाने हेमलोष्टयोः ।
सुखे दुःखसमा ये वै त्वादृशाः साधवश्च ते ॥ ३७ ॥
किं किं न जातं महतां दर्शनात्कौ मुने नृणाम् ।
पारमेष्ठ्यं च साम्राज्यमैन्द्रयोगपदं लभेत् ॥ ३८ ॥
जाजले मुनिशार्दूल त्रैवर्ग्यं किमभूज्जनैः ।
साधूनां कृपया साक्षात्पूर्णं ब्रह्मापि लभ्यते ॥ ३९ ॥
श्रीनारद उवाच -
तदा प्रसन्नः स मुनिर्जाजलिस्तमुवाच ह ।
वर्षषष्टिसहस्राणि तपस्तप्तं च येन वै ॥ ४० ॥
वैवस्वतान्तरे प्राप्ते ह्यष्टाविंशतिमे युगे ।
द्वापरान्ते भारतेऽपि माथुरे व्रजमंडले ॥ ४१ ॥
परिपूर्णतमः साक्षाच्छ्रीकृष्णो भगवान् स्वयम् ।
वृंदावने गवां वत्सान् चारयन् विचरिष्यति ॥ ४२ ॥
तदा तन्मयतां कृष्णे यास्यसि त्वं न संशयः
हिरण्याक्षादयो दैत्या वैरेणापि परं गताः ॥ ४३ ॥
इत्थं बकासुरो दैत्य उत्कलो जाजलेर्वरात् ।
श्रीकृष्णे लीनतां प्राप्तः सत्सम्गात्किं न जायते ॥ ४४ ॥
उत्कल
बोला - मुने! मैं आपके प्रचण्ड तपोबलको नहीं जानता था । जाजलिजी ! मेरी रक्षा
कीजिये । आप जैसे साधु-महात्माओंका सङ्ग तो उत्तम मोक्षका द्वार माना गया है। जो
शत्रु और मित्र में, मान और अपमान में,
सुवर्ण और मिट्टी के ढेले में तथा सुख और दुःख में भी समभाव रखते
हैं, वे आप जैसे महात्मा ही सच्चे साधु हैं ।। ३६-३७ ॥
मुने!
इस भूतलपर महात्माओं के दर्शनसे मनुष्योंका कौन-कौन मनोरथ नहीं पूरा हुआ ?
ब्रह्मपद, इन्द्रपद, सम्राट्का पद तथा
योगसिद्धि – सब कुछ संतों की कृपासे सुलभ हो सकते हैं। मुनिश्रेष्ठ जाजले ! आप
जैसे महात्माओं से लोगों को धर्म, अर्थ और काम की प्राप्ति
हुई तो क्या हुई ? साधुपुरुषों की कृपा से तो साक्षात्
पूर्णब्रह्म परमात्मा भी मिल जाता है ।। ३८-३९ ॥
श्रीनारदजी
कहते हैं- नरेश्वर ! उस समय उत्कलकी विनययुक्त बात सुनकर वे जाजलि मुनि प्रसन्न हो
गये। इन्होंने साठ हजार वर्षोंतक तपस्या की थी। उन्होंने उत्कलसे कहा ॥ ४० ॥
जाजलि
बोले- वैवस्वत मन्वन्तर प्राप्त होने पर जब अट्ठाईसवें द्वापर का अन्तिम समय बीतता
होगा,
उस समय भारतवर्ष के माथुर जनपद में स्थित व्रजमण्डल के भीतर
साक्षात् परिपूर्णतम भगवान् श्रीकृष्ण वृन्दावन में गोवत्स चराते हुए विचरेंगे।
उन्हीं दिनों तुम भगवान् श्रीकृष्णमें लीन हो जाओगे, इसमें
संशय नहीं है। हिरण्याक्ष आदि दैत्य भगवान् के प्रति वैरभाव रखनेपर भी उनके परमपद को
प्राप्त हो गये हैं ॥ ४१-४३॥
श्रीनारदजी
कहते हैं - इस प्रकार बकासुरके रूपमें परिणत हुआ उत्कल दैत्य जाजलिके वरदानसे
भगवान् श्रीकृष्णमें लयको प्राप्त हुआ। संतोंके सङ्गसे क्या नहीं सुलभ हो सकता ?
॥ ४४ ॥
इस
प्रकार श्रीगर्गसंहितामें श्रीवृन्दावनखण्डके अन्तर्गत 'वकासुरका मोक्ष' नामक पाँचवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५ ॥
शेष
आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीगर्ग-संहिता पुस्तक कोड 2260 से
श्रीमद्भागवतमहापुराण प्रथम स्कन्ध उन्नीसवां अध्याय..(पोस्ट ०४)
शुक्रवार, 21 जून 2024
श्रीगर्ग-संहिता ( श्रीवृन्दावनखण्ड ) पाँचवाँ अध्याय ( पोस्ट 03 )
#
श्रीहरि: #
श्रीगर्ग-संहिता
(
श्रीवृन्दावनखण्ड )
पाँचवाँ
अध्याय ( पोस्ट 03 )
वकासुरका
उद्धार
तदा
मृतस्य दैतस्य ज्योतिः कृष्णे समाविशत् ।
देवता ववृषुः पुष्पैः जयारावैः समन्विताः ॥ २५ ॥
गोपाला विस्मिताः सर्वे कृष्णं संश्लिष्य सर्वतः ।
ऊचुस्त्वं कुशलीभूतो मुक्तो मृत्युमुखात्सखे ॥ २६ ॥
एवं कृष्णो बकं हत्वा सबलो बालकैः सह ।
गोवत्सैर्हर्षितो गायन्नाययौ राजमंदिरे ॥ २७ ॥
परिपूर्णतमस्यास्य श्रीकृष्णस्य महात्मनः ।
जगुर्गृहे गता बालाः श्रुत्वेदं तेऽतिविस्मिताः ॥ २८ ॥
श्रीबहुलाश्व उवाच -
कोऽयं दैत्यः पूर्वकाले कस्मात्केन बकोऽभवत् ।
पूर्णब्रह्मणि सर्वेशे श्रीकृष्णे लीनतां गतः ॥ २९ ॥
श्रीनारद उवाच -
हयग्रीवसुतो दैत्य उत्कलो नाम हे नृप ।
रणेऽमरान् विनिर्जित्य शक्रछत्रं जहार ह ॥ ३० ॥
तथा नृणां नृपाणां च राज्यं हृत्वा महाबलः ।
चकार वर्षाणि शतं राज्यं सर्वविभूतिमत् ॥ ३१ ॥
एकदा विचरन् दैत्यः सिंधुसागरसंगमे ।
जाजलेर्मुनिसिद्धस्य पर्णशालासमीपतः ॥ ३२ ॥
जले निक्षिप्य बडिशं मीनानाकर्षयन् मुहुः ।
निषेधितोऽपि मुनिना नामन्यत स दुर्मतिः ॥ ३३ ॥
तस्मै शापं ददौ सिद्धो जाजलिर्मुनिसत्तमः ।
बकवत्त्वं झषानत्सि त्वं बको भव दुर्मते ॥ ३४ ॥
तत्क्षणाद्बकरूपोऽभूद्भ्रष्टतेजा गतस्मयः ।
पतितः पादयोस्तस्य नत्वा प्राह कृतांजलिः ॥ ३५ ॥
उस
समय मृत्यु को प्राप्त हुए दैत्य की देह से एक ज्योति निकली और श्रीकृष्ण में समा
गयी । फिर तो देवता जय-जयकार करते हुए दिव्य पुष्पों की वर्षा करने लगे । तब समस्त
ग्वाल-बाल आश्चर्यचकित हो, सब ओर से आकर
श्रीकृष्ण से लिपट गये और बोले- 'सखे ! आज तो तुम मौत के मुख
से कुशलपूर्वक निकल आये' ।। २५-२६ ॥
इस
प्रकार वकासुर को मारने के पश्चात् बछड़ों को आगे करके श्रीकृष्ण बलराम और
ग्वाल-बालों के साथ गीत गाते हुए सहर्ष राजभवनमें लौट आये । परिपूर्णतम परमात्मा
श्रीकृष्णके इस पराक्रमपूर्ण चरित्र का घर लौटे हुए ग्वाल-बालोंने विस्तारपूर्वक
वर्णन किया। उसे सुनकर समस्त गोप अत्यन्त विस्मित हुए ।। २७-२८ ।।
बहुलाश्वने
पूछा- देवर्षे ! यह वकासुर पूर्वकालमें कौन था और किस कारणसे उसको बगुलेका शरीर
प्राप्त हुआ था ? वह पूर्णब्रह्म
सर्वेश्वर श्रीकृष्णमें लीन हुआ, यह कितने सौभाग्य- की बात
है ! ॥ २९ ॥
श्रीनारदजीने
कहा- नरेश्वर ! 'हयग्रीव' नामक दैत्यके एक पुत्र था, जो 'उत्कल' नाम से प्रसिद्ध हुआ । उसने समराङ्गण में
देवताओं को परास्त करके देवराज इन्द्र के छत्र को छीन लिया था । उस महाबली दैत्य ने
और भी बहुत-से मनुष्यों तथा नरेशों की राज्य-सम्पत्ति का अपहरण करके सौ वर्षों- तक
सर्ववैभवसम्पन्न राज्य का उपभोग किया ।। ३०-३१ ॥
एक
दिन इधर-उधर विचरता हुआ दैत्य उत्कल गङ्गा- सागरसंगम पर सिद्ध मुनि जाजलिकी
पर्णशालाके समीप गया और पानी में बंसी डालकर बारंबार मछलियों को पकड़ने लगा ।
यद्यपि मुनि ने मना किया, तथापि उस दुर्बुद्धि ने
उनकी बात नहीं मानी। मुनिश्रेष्ठ जाजलि सिद्ध महात्मा थे, उन्होंने
उत्कल को शाप देते हुए कहा- 'दुर्मते ! तू बगुले की भाँति
मछली पकड़ता और खाता है, इसलिये बगुला ही हो जा।' फिर क्या था ? उत्कल उसी क्षण बगुले के रूप में
परिणत हो गया। तेजोभ्रष्ट हो जानेके कारण उसका सारा गर्व गल गया। उसने हाथ जोड़कर
मुनिको प्रणाम किया और उनके दोनों चरणों में पड़कर कहा ॥३२-३५॥
शेष
आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीगर्ग-संहिता पुस्तक कोड 2260 से
श्रीमद्भागवतमहापुराण प्रथम स्कन्ध उन्नीसवां अध्याय..(पोस्ट ०३)
गुरुवार, 20 जून 2024
श्रीगर्ग-संहिता ( श्रीवृन्दावनखण्ड ) पाँचवाँ अध्याय ( पोस्ट 02 )
#
श्रीहरि: #
श्रीगर्ग-संहिता
(
श्रीवृन्दावनखण्ड )
पाँचवाँ
अध्याय ( पोस्ट 02 )
वकासुरका
उद्धार
धनदस्तं
च खड्गेन सुतीक्ष्णेन जघान ह ।
छिन्नद्वितीयपक्षोऽभूतन्न मृतो दैत्यपुंगवः ॥ १२ ॥
नीहारास्त्रेण तं सोमः संजघान महाबकम् ।
शीतार्त्तो मूर्छितो दैत्यो न मृतः पुनरुत्थितः ॥ १३ ॥
आग्नेयास्त्रेण तं ह्यग्निः सन्तताड महाबकम् ।
भस्मरोमाभवद्दैत्यो न ममार महाखलः ॥ १४ ॥
अपां पतिस्तं पाशेन बद्ध्वा कौ विचकर्ष ह ।
कर्षणात्स महापापः छिन्नोऽभूतन्न मृतश्च वै ॥ १५ ॥
तताड गदया तं वै भद्रकाली तरस्विनी ।
मूर्छितस्तत् प्रहारेण परं कश्मलतां ययौ ॥ १६ ॥
क्षतमूर्धा समुत्थाय विधुन्वन् स्वतनुं पुनः ।
जगर्ज घनवद्वीरो बको दैत्यो महाखलः ॥ १७ ॥
तदा शक्तिधरः शक्तिं तस्मै चिक्षेप सत्वरः ।
तयैकपादो भग्नोऽभून्न मृतः पक्षिणां वरः ॥ १८ ॥
तदा क्रोधेन सहसा धावन् दैत्यस्तडित्स्वनः ।
देवान् विद्रावयामास स्वचंच्वा तीक्ष्णतुण्डया ॥ १९ ॥
अग्रे पलायितान् देवानन्वधावद्बकोऽम्बरे ।
पुनस्तत्र गतो दैत्यो नादयन्मंडलं दिशाम् ॥ २० ॥
तदा देवर्षयः सर्वे सर्वे ब्रह्मर्षयो द्विजाः ।
श्रीनन्दनन्दनायाशु सफलां चाशिषं ददुः ॥ २१ ॥
तदैव कृष्णस्तन्मध्ये ततान वपुरुज्ज्वलम् ।
चच्छर्द कृष्णं सहसा क्षतकंठो महाबकः ॥ २२ ॥
पुनः कृष्णं समाहर्तुं तीक्ष्णया तुंडयाऽगतम् ।
पुच्छे गृहीत्वा तं कृष्णः पोथयामास भूतले ॥ २३ ॥
पुनरुत्थाय तुण्डं स्वं प्रसार्य्यावस्थितं बकम् ।
ददार तुंडे हस्ताभ्यां कृष्णः शाखां गजो यथा ॥ २४ ॥
तब
कुबेर ने तीखी तलवार से उसके ऊपर चोट की। इससे उसकी दूसरी पाँख भी कट गयी,
किंतु वह दैत्यपुंगव मृत्युको नहीं प्राप्त हुआ। तदनन्तर सोमदेवता ने
उस महावकपर नीहारास्त्र का प्रयोग किया। उसके प्रहार से शीतपीड़ित हो वकासुर
मूर्च्छित तो हो गया, किंतु मरा नहीं, फिर
उठकर खड़ा हो गया ।। १२-१३ ॥
अब
अग्निदेवता ने उस महावकपर आग्नेयास्त्र- से प्रहार किया;
इससे उसके रोएँ जल गये, परंतु उस महादुष्ट
दैत्यकी मृत्यु नहीं हुई। तत्पश्चात् जलके स्वामी वरुणने उसको पाशसे बाँधकर धरतीपर
घसीटा। घसीटनेसे वह महापापी असुर क्षत-विक्षत हो गया; किंतु
मरा नहीं ॥ १४-१५ ॥
तदनन्तर
वेगशालिनी भद्रकालीने आकर उसपर गदासे प्रहार किया । गदाके प्रहारसे मूर्च्छित हो
वकासुर अत्यन्त वेदनाके कारण सुध-बुध खो बैठा। उसके मस्तकपर चोट पहुँची थी,
तथापि वह अपने शरीरको कँपाता और फड़फड़ाता हुआ फिर उठकर खड़ा हो गया
और वह महादुष्ट दैत्य धीरतापूर्वक समराङ्गणमें स्थित हो मेघोंकी भाँति गर्जना करने
लगा। उस समय शक्तिधारी स्कन्दने बड़ी उतावलीके साथ उसके ऊपर अपनी शक्ति चलायी।
उसके प्रहारसे उस पक्षिप्रवर असुरकी एक टॉंग टूट गयी, किंतु
वह मर न सका । तदनन्तर विद्युत्की गड़गड़ाहटके समान गर्जना करते हुए उस दैत्यने
सहसा क्रोधपूर्वक धावा किया और अपनी तीखी चोंच से मार-मारकर सब देवताओंको खदेड़
दिया। आकाशमें आगे-आगे देवता भाग रहे थे और पीछे से वकासुर उन्हें खदेड़ रहा था ।
इसके बाद वह दैत्य पुनः वहीं लौट आया और समस्त दिङ्मण्डल को अपने सिंहनाद से
निनादित करने लगा ॥ १६-२० ॥
उस
समय समस्त देवर्षियों, ब्रह्मर्षियों तथा
द्विजोंने श्रीनन्दनन्दनको शीघ्र ही सफल आशीर्वाद प्रदान किया। उसी समय
श्रीकृष्णने वकासुरके शरीरके भीतर अपने ज्योतिर्मय दिव्य देह को बढ़ाकर विस्तृत कर
लिया। फिर तो उस महावक का कण्ठ फटने लगा और उसने सहसा श्रीकृष्ण को उगल दिया ।। २१-२२
॥
फिर
तीखी चोंच से श्रीकृष्ण को पकड़नेके लिये जब वह पास आया,
तब श्रीकृष्णने झपटकर उसकी पूँछ पकड़ ली और उसे पृथ्वीपर दे मारा;
किंतु वह पुनः उठकर चोंच फैलाये उनके सामने खड़ा हो गया। तब
श्रीकृष्णने दोनों हाथोंसे उसकी दोनों चोंचें पकड़ लीं और जैसे हाथी किसी वृक्षकी
शाखाको चीर डाले, उसी तरह उसे विदीर्ण कर दिया ॥ २३ - २४ ॥
शेष
आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीगर्ग-संहिता पुस्तक कोड 2260 से
श्रीमद्भागवतमहापुराण प्रथम स्कन्ध उन्नीसवां अध्याय..(पोस्ट ०२)
श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध - चौदहवाँ अध्याय..(पोस्ट०५)
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