॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥
श्रीमद्भागवतमहापुराण
षष्ठ स्कन्ध – चौथा अध्याय..(पोस्ट०६)
दक्ष के द्वारा भगवान् की स्तुति और भगवान् का प्रादुर्भाव
यदोपरामो मनसो नामरूप-
रूपस्य दृष्टस्मृतिसम्प्रमोषात्
य ईयते केवलया स्वसंस्थया
हंसाय तस्मै शुचिसद्मने नमः ||२६||
मनीषिणोऽन्तर्हृदि सन्निवेशितं
स्वशक्तिभिर्नवभिश्च त्रिवृद्भिः
वह्नि यथा दारुणि पाञ्चदश्यं
मनीषया निष्कर्षन्ति गूढम् ||२७||
स वै ममाशेषविशेषमाया
निषेधनिर्वाणसुखानुभूतिः
स सर्वनामा स च विश्वरूपः
प्रसीदतामनिरुक्तात्मशक्तिः ||२८||
यद्यन्निरुक्तं वचसा निरूपितं
धियाक्षभिर्वा मनसा वोत यस्य
मा भूत्स्वरूपं गुणरूपं हि तत्तत्
स वै गुणापायविसर्गलक्षणः ||२९||
जब समाधि- कालमें प्रमाण, विकल्प और विपर्ययरूप विविध ज्ञान और स्मरण-शक्तिका लोप हो जानेसे इस नाम- रूपात्मक जगत् का निरूपण करनेवाला मन उपरत हो जाता है, उस समय बिना मनके भी केवल सच्चिदानन्दमयी अपनी स्वरूपस्थितिके द्वारा आप प्रकाशित होते रहते हैं। प्रभो ! आप शुद्ध हैं और शुद्ध हृदय-मन्दिर ही आपका निवासस्थान है। आपको मेरा नमस्कार है ॥ २६ ॥ जैसे याज्ञिक लोग काष्ठमें छिपे हुए अग्नि को ‘सामिधेनी’ नामके पंद्रह मन्त्रोंके द्वारा प्रकट करते हैं, वैसे ही ज्ञानी पुरुष अपनी सत्ताईस शक्तियोंके भीतर गूढभाव से छिपे हुए आपको अपनी शुद्ध बुद्धिके द्वारा हृदयमें ही ढूँढ़ निकालते हैं ॥ २७ ॥ जगत् में जितनी भिन्नताएँ देख पड़ती हैं, वे सब मायाकी ही हैं। मायाका निषेध कर देनेपर केवल परम सुखके साक्षात्कारस्वरूप आप ही अवशेष रहते हैं। परंतु जब विचार करने लगते हैं, तब आपके स्वरूपमें मायाकी उपलब्धि—निर्वचन नहीं हो सकता। अर्थात् माया भी आप ही हैं। अत: सारे नाम और सारे रूप आपके ही हैं। प्रभो ! आप मुझपर प्रसन्न होइये। मुझे आत्म- प्रसादसे पूर्ण कर दीजिये ॥ २८ ॥
प्रभो ! जो कुछ वाणीसे कहा जाता है अथवा जो कुछ मन, बुद्धि और इन्द्रियोंसे ग्रहण किया जाता है, वह आपका स्वरूप नहीं है; क्योंकि वह तो गुणरूप है और आप गुणोंकी उत्पत्ति और प्रलयके अधिष्ठान हैं। आपमें केवल उनकी प्रतीतिमात्र है ॥ २९ ॥
शेष आगामी पोस्ट में --