सोमवार, 21 अक्टूबर 2019

श्रीमद्भागवतमहापुराण अष्टम स्कन्ध – सोलहवाँ अध्याय..(पोस्ट०३)


॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण
अष्टम स्कन्ध – सोलहवाँ अध्याय..(पोस्ट०३)

कश्यपजी के द्वारा अदिति को पयोव्रत का उपदेश

श्रीशुक उवाच -
एवं अभ्यर्थितोऽदित्या कस्तामाह स्मयन्निव ।
अहो मायाबलं विष्णोः स्नेहबद्धं इदं जगत् ॥ १८ ॥
क्व देहो भौतिकोऽनात्मा क्व चात्मा प्रकृतेः परः ।
कस्य के पतिपुत्राद्या मोह एव हि कारणम् ॥ १९ ॥
उपतिष्ठस्व पुरुषं भगवन्तं जनार्दनम् ।
सर्वभूतगुहावासं वासुदेवं जगद्‍गुरुम् ॥ २० ॥
स विधास्यति ते कामान् हरिर्दीनानुकंपनः ।
अमोघा भगवद्‍भक्तिः न इतरेति मतिर्मम ॥ २१ ॥

अदितिरुवाच -
केनाहं विधिना ब्रह्मन् उपस्थास्ये जगत्पतिम् ।
यथा मे सत्यसंकल्पो विदध्यात् स मनोरथम् ॥ २२ ॥
आदिश त्वं द्विजश्रेष्ठ विधिं तदुपधावनम् ।
आशु तुष्यति मे देवः सीदन्त्याः सह पुत्रकैः ॥ २३ ॥

श्रीशुकदेवजी कहते हैंइस प्रकार अदितिने जब कश्यपजीसे प्रार्थना की, तब वे कुछ विस्मित-से होकर बोले—‘बड़े आश्चर्यकी बात है। भगवान्‌की माया भी कैसी प्रबल है ! यह सारा जगत् स्नेहकी रज्जुसे बँधा हुआ है ॥ १८ ॥ कहाँ यह पञ्चभूतोंसे बना हुआ अनात्मा शरीर और कहाँ प्रकृतिसे परे आत्मा ? न किसीका कोई पति है, न पुत्र है और न तो सम्बन्धी ही है। मोह ही मनुष्यको नचा रहा है ॥ १९ ॥ प्रिये ! तुम सम्पूर्ण प्राणियोंके हृदयमें विराजमान, अपने भक्तोंके दु:ख मिटानेवाले जगद्गुरु भगवान्‌ वासुदेवकी आराधना करो ॥ २० ॥ वे बड़े दीनदयालु हैं। अवश्य ही श्रीहरि तुम्हारी कामनाएँ पूर्ण करेंगे। मेरा यह दृढ़ निश्चय है कि भगवान्‌की भक्ति कभी व्यर्थ नहीं होती। इसके सिवा कोई दूसरा उपाय नहीं है ॥ २१ ॥
अदितिने पूछाभगवन् ! मैं जगदीश्वर भगवान्‌की आराधना किस प्रकार करूँ, जिससे वे सत्यसङ्कल्प प्रभु मेरा मनोरथ पूर्ण करें ॥ २२ ॥ पतिदेव ! मैं अपने पुत्रोंके साथ बहुत ही दु:ख भोग रही हूँ। जिससे वे शीघ्र ही मुझपर प्रसन्न हो जायँ, उनकी आराधनाकी वही विधि मुझे बतलाइये ॥ २३ ॥

शेष आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से




रविवार, 20 अक्टूबर 2019

श्रीमद्भागवतमहापुराण अष्टम स्कन्ध – सोलहवाँ अध्याय..(पोस्ट०२)


॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण
अष्टम स्कन्ध – सोलहवाँ अध्याय..(पोस्ट०२)

कश्यपजी के द्वारा अदिति को पयोव्रत का उपदेश

अदितिरुवाच -
भद्रं द्विजगवां ब्रह्मन् धर्मस्यास्य जनस्य च ।
त्रिवर्गस्य परं क्षेत्रं गृहमेधिन् गृहा इमे ॥ ११ ॥
अग्नयोऽतिथयो भृत्या भिक्षवो ये च लिप्सवः ।
सर्वं भगवतो ब्रह्मन् अनुध्यानान्न रिष्यति ॥ १२ ॥
को नु मे भगवन् कामो न सम्पद्येत मानसः ।
यस्या भवान् प्रजाध्यक्ष एवं धर्मान् प्रभाषते ॥ १३ ॥
तवैव मारीच मनःशरीरजाः
     प्रजा इमाः सत्त्वरजस्तमोजुषः ।
समो भवान् तास्वसुरादिषु प्रभो
     तथापि भक्तं भजते महेश्वरः ॥ १४ ॥
तस्मादीश भजन्त्या मे श्रेयश्चिन्तय सुव्रत ।
हृतश्रियो हृतस्थानान् सपत्‍नैः पाहि नः प्रभो ॥ १५ ॥
परैर्विवासिता साहं मग्ना व्यसनसागरे ।
ऐश्वर्यं श्रीर्यशः स्थानं हृतानि प्रबलैर्मम ॥ १६ ॥
यथा तानि पुनः साधो प्रपद्येरन् ममात्मजाः ।
तथा विधेहि कल्याणं धिया कल्याणकृत्तम ॥ १७ ॥

अदितिने कहाभगवन्! ब्राह्मण, गौ, धर्म और आपकी यह दासीसब सकुशल हैं। मेरे स्वामी! यह गृहस्थ-आश्रम ही अर्थ, धर्म और कामकी साधनामें परम सहायक है ॥ ११ ॥ प्रभो! आपके निरन्तर स्मरण और कल्याण-कामनासे अग्रि, अतिथि, सेवक, भिक्षुक और दूसरे याचकोंका भी मैंने तिरस्कार नहीं किया है ॥ १२ ॥ भगवन् ! जब आप-जैसे प्रजापति मुझे इस प्रकार धर्म-पालन का उपदेश करते है; तब भला मेरे मन की ऐसी कौन-सी कामना है जो पूरी न हो जाय ? ॥ १३ ॥ आर्यपुत्र ! समस्त प्रजावह चाहे सत्त्वगुणी, रजोगुणी या तमोगुणी होआपकी ही सन्तान है। कुछ आपके संकल्पसे उत्पन्न हुए हैं और कुछ शरीरसे ! भगवन् ! इसमें सन्देह नहीं कि आप सब सन्तानोंके प्रतिचाहे असुर हों या देवताएक-सा भाव रखते हैं, सम हैं। तथापि स्वयं परमेश्वर भी अपने भक्तोंकी अभिलाषा पूर्ण किया करते हैं ॥ १४ ॥ मेरे स्वामी ! मैं आपकी दासी हूँ। आप मेरी भलाईके सम्बन्धमें विचार कीजिये। मर्यादापालक प्रभो ! शत्रुओंने हमारी सम्पत्ति और रहनेका स्थानतक छीन लिया है। आप हमारी रक्षा कीजिये ॥ १५ ॥ बलवान् दैत्योंने मेरे ऐश्वर्य, धन, यश और पद छीन लिये हैं तथा हमें घरसे बाहर निकाल दिया है। इस प्रकार मैं दु:खके समुद्रमें डूब रही हूँ ॥ १६ ॥ आपसे बढक़र हमारी भलाई करनेवाला और कोई नहीं है। इसलिये मेरे हितैषी स्वामी ! आप सोच-विचारकर अपने संकल्पसे ही मेरे कल्याण का कोई ऐसा उपाय कीजिये जिससे कि मेरे पुत्रोंको वे वस्तुएँ फिरसे प्राप्त हो जायँ ॥ १७ ॥

शेष आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से




श्रीमद्भागवतमहापुराण अष्टम स्कन्ध – सोलहवाँ अध्याय..(पोस्ट०१)


॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण
अष्टम स्कन्ध – सोलहवाँ अध्याय..(पोस्ट०१)

कश्यपजी के द्वारा अदिति को पयोव्रत का उपदेश

श्रीशुक उवाच -
एवं पुत्रेषु नष्टेषु देवमातादितिस्तदा ।
हृते त्रिविष्टपे दैत्यैः पर्यतप्यद् अनाथवत् ॥ १ ॥
एकदा कश्यपस्तस्या आश्रमं भगवान् अगात् ।
निरुत्सवं निरानन्दं समाधेर्विरतश्चिरात् ॥ २ ॥
स पत्‍नीं दीनवदनां कृतासनपरिग्रहः ।
सभाजितो यथान्यायं इदमाह कुरूद्वह ॥ ३ ॥
अप्यभद्रं न विप्राणां भद्रे लोकेऽधुनाऽऽगतम् ।
न धर्मस्य न लोकस्य मृत्योश्छन्दानुवर्तिनः ॥ ४ ॥
अपि वाकुशलं किञ्चिद्‍गृहेषु गृहमेधिनि ।
धर्मस्यार्थस्य कामस्य यत्र योगो ह्ययोगिनाम् ॥ ५ ॥
अपि वा अतिथयोऽभ्येत्य कुटुंबासक्तया त्वया ।
गृहादपूजिता याताः प्रत्युत्थानेन वा क्वचित् ॥ ६ ॥
गृहेषु येष्वतिथयो नार्चिताः सलिलैरपि ।
यदि निर्यान्ति ते नूनं फेरुराजगृहोपमाः ॥ ७ ॥
अप्यग्नयस्तु वेलायां न हुता हविषा सति ।
त्वयोद्विग्नधिया भद्रे प्रोषिते मयि कर्हिचित् ॥ ८ ॥
यत्पूजया कामदुघान् याति लोकान् गृहान्वितः ।
ब्राह्मणोऽग्निश्च वै विष्णोः सर्वदेवात्मनो मुखम् ॥ ९ ॥
अपि सर्वे कुशलिनः तव पुत्रा मनस्विनि ।
लक्षयेऽस्वस्थमात्मानं भवत्या लक्षणैरहम् ॥ १० ॥

श्रीशुकदेवजी कहते हैंपरीक्षित्‌ ! जब देवता इस प्रकार भागकर छिप गये और दैत्योंने स्वर्गपर अधिकार कर लिया; तब देवमाता अदिति को बड़ा दु:ख हुआ। वे अनाथ-सी हो गयीं ॥ १ ॥ एक बार बहुत दिनों के बाद जब परमप्रभावशाली कश्यप मुनिकी समाधि टूटी, तब वे अदितिके आश्रमपर आये। उन्होंने देखा कि न तो वहाँ सुख-शान्ति है और न किसी प्रकारका उत्साह या सजावट ही ॥ २ ॥ परीक्षित्‌ ! जब वे वहाँ जाकर आसनपर बैठ गये और अदितिने विधिपूर्वक उनका सत्कार कर लिया, तब वे अपनी पत्नी अदितिसेजिसके चेहरेपर बड़ी उदासी छायी हुई थीबोले ॥ ३ ॥ कल्याणी ! इस समय संसारमें ब्राह्मणोंपर कोई विपत्ति तो नहीं आयी है ? धर्मका पालन तो ठीक-ठीक होता है ? कालके कराल गालमें पड़े हुए लोगोंका कुछ अमङ्गल तो नहीं हो रहा है ? ॥ ४ ॥ प्रिये ! गृहस्थाश्रम तो, जो लोग योग नहीं कर सकते, उन्हें भी योगका फल देनेवाला है। इस गृहस्थाश्रममें रहकर धर्म, अर्थ और कामके सेवनमें किसी प्रकारका विघ्र तो नहीं हो रहा है ? ॥ ५ ॥ यह भी सम्भव है कि तुम कुटुम्बके भरण-पोषणमें व्यग्र रही हो, अतिथि आये हों और तुमसे बिना सम्मान पाये ही लौट गये हों; तुम खड़ी होकर उनका सत्कार करनेमें भी असमर्थ रही हो। इसीसे तो तुम उदास नहीं हो रही हो ? ॥ ६ ॥ जिन घरोंमें आये हुए अतिथिका जलसे भी सत्कार नहीं किया जाता और वे ऐसे ही लौट जाते हैं, वे घर अवश्य ही गीदड़ोंके घरके समान हैं ॥ ७ ॥ प्रिये ! सम्भव है, मेरे बाहर चले जानेपर कभी तुम्हारा चित्त उद्विग्र रहा हो और समयपर तुमने हविष्यसे अग्रियोंमें हवन न किया हो ॥ ८ ॥ सर्वदेवमय भगवान्‌के मुख हैंब्राह्मण और अग्रि। गृहस्थ पुरुष यदि इन दोनोंकी पूजा करता है तो उसे उन लोकोंकी प्राप्ति होती है, जो समस्त कामनाओंको पूर्ण करनेवाले हैं ॥ ९ ॥ प्रिये ? तुम तो सर्वदा प्रसन्न रहती हो; परंतु तुम्हारे बहुत-से लक्षणों से मैं देख रहा हूँ कि इस समय तुम्हारा चित्त अस्वस्थ है । तुम्हारे सब लडक़े तो कुशल-मङ्गल से हैं न ?’ ॥ १० ॥

शेष आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से




शनिवार, 19 अक्टूबर 2019

श्रीमद्भागवतमहापुराण अष्टम स्कन्ध – पंद्रहवाँ अध्याय..(पोस्ट०६)


॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण
अष्टम स्कन्ध – पंद्रहवाँ अध्याय..(पोस्ट०६)

राजा बलि की स्वर्गपर विजय

श्रीगुरुरुवाच
जानामि मघवञ्छत्रोरुन्नतेरस्य कारणम्
शिष्यायोपभृतं तेजो भृगुभिर्ब्रह्मवादिभिः ॥ २८ ॥
भवद्विधो भवान्वापि वर्जयित्वेश्वरं हरिम् ॥
नास्य शक्तः पुरः स्थातुं कृतान्तस्य यथा जनाः ॥ २९ ॥
तस्मान्निलयमुत्सृज्य यूयं सर्वे त्रिविष्टपम्
यात कालं प्रतीक्षन्तो यतः शत्रोर्विपर्ययः ॥ ३० ॥
एष विप्रबलोदर्कः सम्प्रत्यूर्जितविक्रमः
तेषामेवापमानेन सानुबन्धो विनङ्क्ष्यति ॥ ३१ ॥
एवं सुमन्त्रितार्थास्ते गुरुणार्थानुदर्शिना
हित्वा त्रिविष्टपं जग्मुर्गीर्वाणाः कामरूपिणः ॥ ३२ ॥
देवेष्वथ निलीनेषु बलिर्वैरोचनः पुरीम्
देवधानीमधिष्ठाय वशं निन्ये जगत्त्रयम् ॥ ३३ ॥
तं विश्वजयिनं शिष्यं भृगवः शिष्यवत्सलाः
शतेन हयमेधानामनुव्रतमयाजयन् ॥ ३४ ॥
ततस्तदनुभावेन भुवनत्रयविश्रुताम्
कीर्तिं दिक्षु वितन्वानः स रेज उडुराडिव ॥ ३५ ॥
बुभुजे च श्रियं स्वृद्धां द्विजदेवोपलम्भिताम्
कृतकृत्यमिवात्मानं मन्यमानो महामनाः ॥ ३६ ॥

देवगुरु बृहस्पतिजीने कहा—‘इन्द्र! मैं तुम्हारे शत्रु बलिकी उन्नतिका कारण जानता हूँ। ब्रह्मवादी भृगुवंशियोंने अपने शिष्य बलिको महान् तेज देकर शक्तियोंका खजाना बना दिया है ॥ २८ ॥ सर्वशक्तिमान् भगवान्‌ को छोडक़र तुम या तुम्हारे-जैसा और कोई भी बलिके सामने उसी प्रकार नहीं ठहर सकता, जैसे कालके सामने प्राणी ॥ २९ ॥ इसलिये तुमलोग स्वर्गको छोडक़र कहीं छिप जाओ और उस समयकी प्रतीक्षा करो, जब तुम्हारे शत्रुका भाग्यचक्र पलटे ॥ ३० ॥ इस समय ब्राह्मणोंके तेजसे बलिकी उत्तरोत्तर वृद्धि हो रही है। उसकी शक्ति बहुत बढ़ गयी है। जब यह उन्हीं ब्राह्मणोंका तिरस्कार करेगा, तब अपने परिवार-परिकरके साथ नष्ट हो जायगा॥ ३१ ॥ बृहस्पतिजी देवताओंके समस्त स्वार्थ और परमार्थके ज्ञाता थे। उन्होंने जब इस प्रकार देवताओंको सलाह दी, तब वे स्वेच्छानुसार रूप धारण करके स्वर्ग छोडक़र चले गये ॥ ३२ ॥ देवताओंके छिप जानेपर विरोचननन्दन बलिने अमरावतीपुरीपर अपना अधिकार कर लिया और फिर तीनों लोकों- को जीत लिया ॥ ३३ ॥ जब बलि विश्वविजयी हो गये, तब शिष्यप्रेमी भृगुवंशियोंने अपने अनुगत शिष्यसे सौ अश्वमेध यज्ञ करवाये ॥ ३४ ॥ उन यज्ञोंके प्रभावसे बलिकी कीर्ति-कौमुदी तीनों लोकोंसे बाहर भी दसों दिशाओंमें फैल गयी और वे नक्षत्रोंके राजा चन्द्रमाके समान शोभायमान हुए ॥ ३५ ॥ ब्राह्मण-देवताओंकी कृपासे प्राप्त समृद्ध राज्यलक्ष्मी का वे बड़ी उदारतासे उपभोग करने लगे और अपनेको कृतकृत्य-सा मानने लगे ॥ ३६ ॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायामष्टमस्कन्धे
पञ्चदशोऽध्यायः

शेष आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से








श्रीमद्भागवतमहापुराण अष्टम स्कन्ध – पंद्रहवाँ अध्याय..(पोस्ट०५)


॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण
अष्टम स्कन्ध – पंद्रहवाँ अध्याय..(पोस्ट०५)

राजा बलि की स्वर्गपर विजय

मघवांस्तमभिप्रेत्य बलेः परममुद्यमम्
सर्वदेवगणोपेतो गुरुमेतदुवाच ह ॥ २४ ॥
भगवन्नुद्यमो भूयान्बलेर्नः पूर्ववैरिणः
अविषह्यमिमं मन्ये केनासीत्तेजसोर्जितः ॥ २५ ॥
नैनं कश्चित्कुतो वापि प्रतिव्योढुमधीश्वरः
पिबन्निव मुखेनेदं लिहन्निव दिशो दश
दहन्निव दिशो दृग्भिः संवर्ताग्निरिवोत्थितः ॥ २६ ॥
ब्रूहि कारणमेतस्य दुर्धर्षत्वस्य मद्रिपोः
ओजः सहो बलं तेजो यत एतत्समुद्यमः ॥ २७ ॥

इन्द्रने देखा कि बलि ने युद्धकी बहुत बड़ी तैयारी की है। अत: सब देवताओं के साथ वे अपने गुरु बृहस्पतिजीके पास गये और उनसे बोले॥ २४ ॥ भगवन् ! मेरे पुराने शत्रु बलिने इस बार युद्धकी बहुत बड़ी तैयारी की है। मुझे ऐसा जान पड़ता है कि हमलोग उनका सामना नहीं कर सकेंगे। पता नहीं, किस शक्तिसे इनकी इतनी बढ़ती हो गयी है ॥ २५ ॥ मैं देखता हूँ कि इस समय बलिको कोई भी किसी प्रकारसे रोक नहीं सकता। वे प्रलयकी आगके समान बढ़ गये हैं और जान पड़ता है, मुखसे इस विश्व को पी जाँयगे, जीभ से दसों दिशाओं को चाट जायँगे और नेत्रोंकी ज्वालासे दिशाओंको भस्म कर देंगे ॥ २६ ॥ आप कृपा करके मुझे बतलाइये कि मेरे शत्रुकी इतनी बढ़तीका, जिसे किसी प्रकार भी दबाया नहीं जा सकता, क्या कारण है ? इसके शरीर, मन और इन्द्रियोंमें इतना बल और इतना तेज कहाँसे आ गया है कि इसने इतनी बड़ी तैयारी करके चढ़ाई की है॥ २७ ॥

शेष आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से



शुक्रवार, 18 अक्टूबर 2019

श्रीमद्भागवतमहापुराण अष्टम स्कन्ध – पंद्रहवाँ अध्याय..(पोस्ट०४)


॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण
अष्टम स्कन्ध – पंद्रहवाँ अध्याय..(पोस्ट०४)

राजा बलि की स्वर्गपर विजय

सुरस्त्रीकेशविभ्रष्ट नवसौगन्धिकस्रजाम्
यत्रामोदमुपादाय मार्ग आवाति मारुतः ॥ १८ ॥
हेमजालाक्षनिर्गच्छद्धूमेनागुरुगन्धिना
पाण्डुरेण प्रतिच्छन्न मार्गे यान्ति सुरप्रियाः ॥ १९ ॥
मुक्तावितानैर्मणिहेमकेतुभि-
र्नानापताकावलभीभिरावृताम्
शिखण्डिपारावतभृङ्गनादितां
वैमानिकस्त्रीकलगीतमङ्गलाम् ॥ २० ॥
मृदङ्गशङ्खानकदुन्दुभिस्वनैः
सतालवीणामुरजेष्टवेणुभिः
नृत्यैः सवाद्यैरुपदेवगीतकै-
र्मनोरमां स्वप्रभया जितप्रभाम् ॥ २१ ॥
यां न व्रजन्त्यधर्मिष्ठाः खला भूतद्रुहः शठाः
मानिनः कामिनो लुब्धा एभिर्हीना व्रजन्ति यत् ॥ २२ ॥
तां देवधानीं स वरूथिनीपति-
र्बहिः समन्ताद्रुरुधे पृतन्यया
आचार्यदत्तं जलजं महास्वनं
दध्मौ प्रयुञ्जन्भयमिन्द्रयोषिताम् ॥ २३ ॥

(अमरावती में) देवाङ्गनाओं के जूड़े से गिरे हुए नवीन सौगन्धित पुष्पोंकी सुगन्ध लेकर वहाँ के मार्गोंमें मन्द-मन्द हवा चलती रहती है ॥ १८ ॥ सुनहली खिड़कियोंमें से अगर की सुगन्ध से युक्त सफेद धूआँ निकल-निकलकर वहाँके मार्गोंको ढक दिया करता है। उसी मार्गसे देवाङ्गनाएँ जाती-आती हैं ॥ १९ ॥ स्थान-स्थानपर मोतियोंकी झालरोंसे सजाये हुए चँदोवे तने रहते हैं। सोनेकी मणिमय पताकाएँ फहराती रहती हैं। छज्जोंपर अनेकों झंडियाँ लहराती रहती हैं। मोर, कबूतर और भौंरे कलगान करते रहते हैं। देवाङ्गनाओंके मधुर संगीतसे वहाँ सदा ही मङ्गल छाया रहता है ॥ २० ॥ मृदङ्ग, शङ्ख, नगारे, ढोल, वीणा, वंशी, मँजीरे और ऋष्टियाँ बजती रहती हैं। गन्धर्व बाजोंके साथ गाया करते हैं और अप्सराएँ नाचा करती हैं। इनसे अमरावती इतनी मनोहर जान पड़ती है, मानो उसने अपनी छटासे छटाकी अधिष्ठात्री देवीको भी जीत लिया है ॥ २१ ॥ उस पुरीमें अधर्मी, दुष्ट, जीवद्रोही, ठग, मानी, कामी और लोभी नहीं जा सकते। जो इन दोषोंसे रहित हैं, वे ही वहाँ जाते हैं ॥ २२ ॥ असुरोंकी सेनाके स्वामी राजा बलिने अपनी बहुत बड़ी सेनासे बाहरकी ओर सब ओरसे अमरावतीको घेर लिया और इन्द्रपत्नियोंके हृदयमें भयका सञ्चार करते हुए उन्होंने शुक्राचार्यजीके दिये हुए महान् शङ्खको बजाया। उस शङ्ख की ध्वनि सर्वत्र फैल गयी ॥ २३ ॥

शेष आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से





श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - नवाँ अध्याय..(पोस्ट०२)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ श्रीमद्भागवतमहापुराण  सप्तम स्कन्ध – नवाँ अध्याय..(पोस्ट०२) प्रह्लादजी के द्वारा नृसिंहभगवान्‌ की स्तुति श्रीप्रह्...