सोमवार, 2 दिसंबर 2019

श्रीमद्भागवतमहापुराण नवम स्कन्ध –चौथा अध्याय..(पोस्ट०९)


॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण
नवम स्कन्ध चौथा अध्याय..(पोस्ट०९)

नाभाग और अम्बरीष की कथा

श्रीरुद्र उवाच ।
 वयं न तात प्रभवाम भूम्नि
     यस्मिन् परेऽन्येऽप्यजजीवकोशाः ।
 भवन्ति काले न भवन्ति हीदृशाः
     सहस्रशो यत्र वयं भ्रमामः ॥ ५६ ॥
 अहं सनत्कुमारश्च नारदो भगवानजः ।
 कपिलो अपान्तरतमो देवलो धर्म आसुरिः ॥ ५७ ॥
 मरीचिप्रमुखाश्चान्ये सिद्धेशाः पारदर्शनाः ।
 विदाम न वयं सर्वे यन्मायां माययाऽऽवृताः ॥ ५८ ॥
 तस्य विश्वेश्वरस्येदं शस्त्रं दुर्विषहं हि नः ।
 तमेवं शरणं याहि हरिस्ते शं विधास्यति ॥ ५९ ॥
 ततो निराशो दुर्वासाः पदं भगवतो ययौ ।
 वैकुण्ठाख्यं यदध्यास्ते श्रीनिवासः श्रिया सह ॥ ६० ॥
 सन्दह्यमानोऽजितशस्त्रवह्निना
     तत्पादमूले पतितः सवेपथुः ।
 आहाच्युतानन्त सदीप्सित प्रभो
     कृतागसं माव हि विश्वभावन ॥ ६१ ॥
 अजानता ते परमानुभावं
     कृतं मयाघं भवतः प्रियाणाम् ।
 विधेहि तस्यापचितिं विधातः
     मुच्येत यन्नाम्न्युदिते नारकोऽपि ॥ ६२ ॥

श्रीमहादेवजी ने कहा—‘दुर्वासाजी ! जिन अनन्त परमेश्वर में ब्रह्मा-जैसे जीव और उनके उपाधिभूत कोश, इस ब्रह्माण्ड के समान ही अनेकों ब्रह्माण्ड समय पर पैदा होते हैं और समय आनेपर फिर उनका पता भी नहीं चलता, जिनमें हमारे-जैसे हजारों चक्कर काटते रहते हैंउन प्रभुके सम्बन्धमें हम कुछ भी करनेकी सामथ्र्य नहीं रखते ॥ ५६ ॥ मैं, सनत्कुमार, नारद, भगवान्‌ ब्रह्मा, कपिलदेव, अपान्तरतम, देवल, धर्म, आसुरि तथा मरीचि आदि दूसरे सर्वज्ञ सिद्धेश्वरये हम सभी भगवान्‌की मायाको नहीं जान सकते। क्योंकि हम उसी मायाके घेरेमें हैं ॥ ५७-५८ ॥ यह चक्र उन विश्वेश्वरका शस्त्र है। यह हमलोगोंके लिये असह्य है। तुम उन्हींकी शरणमें जाओ। वे भगवान्‌ ही तुम्हारा मङ्गल करेंगे॥ ५९ ॥ वहाँसे भी निराश होकर दुर्वासा भगवान्‌के परमधाम वैकुण्ठमें गये। लक्ष्मीपति भगवान्‌ लक्ष्मीके साथ वहीं निवास करते हैं ॥ ६० ॥ दुर्वासाजी भगवान्‌के चक्रकी आगसे जल रहे थे। वे काँपते हुए भगवान्‌के चरणोंमें गिर पड़े। उन्होंने कहा—‘हे अच्युत ! हे अनन्त ! आप संतोंके एकमात्र वाञ्छनीय हैं। प्रभो ! विश्वके जीवनदाता ! मैं अपराधी हूँ। आप मेरी रक्षा कीजिये ॥ ६१ ॥ आपका परम प्रभाव न जाननेके कारण ही मैंने आपके प्यारे भक्तका अपराध किया है। प्रभो ! आप मुझे उससे बचाइये। आपके तो नामका ही उच्चारण करनेसे नारकी जीव भी मुक्त हो जाता है॥ ६२ ॥

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श्रीमद्भागवतमहापुराण नवम स्कन्ध –चौथा अध्याय..(पोस्ट०८)


॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण
नवम स्कन्ध चौथा अध्याय..(पोस्ट०८)

नाभाग और अम्बरीष की कथा

दिशो नभः क्ष्मां विवरान् समुद्रान्
     लोकान् सपालान् त्रिदिवं गतः सः ।
 यतो यतो धावति तत्र तत्र
     सुदर्शनं दुष्प्रसहं ददर्श ॥ ५१ ॥
 अलब्धनाथः स सदा कुतश्चित्
     संत्रस्तचित्तोऽरणमेषमाणः ।
 देवं विरिञ्चं समगाद्विधातः
     त्राह्यात्मयोनेऽजिततेजसो माम् ॥ ५२ ॥
 श्रीब्रह्मोवाच ।
 स्थानं मदीयं सहविश्वमेतत्
     क्रीडावसाने द्विपरार्धसंज्ञे ।
 भ्रूभंगमात्रेण हि संदिधक्षोः
     कालात्मनो यस्य तिरोभविष्यति ॥ ५३ ॥
 अहं भवो दक्षभृगुप्रधानाः
     प्रजेशभूतेश सुरेशमुख्याः ।
 सर्वे वयं यत् नियमं प्रपन्ना
     मूर्ध्न्यर्पितं लोकहितं वहामः ॥ ५४ ॥
 प्रत्याख्यातो विरिञ्चेन विष्णुचक्रोपतापितः ।
 दुर्वासाः शरणं यातः शर्वं कैलासवासिनम् ॥ ५५ ॥

दुर्वासाजी दिशा, आकाश, पृथ्वी, अतल-वितल आदि नीचेके लोक, समुद्र, लोकपाल और उनके द्वारा सुरक्षित लोक एवं स्वर्गतकमें गये; परंतु जहाँ-जहाँ वे गये, वहीं-वहीं उन्होंने असह्य तेजवाले सुदर्शन चक्रको अपने पीछे लगा देखा ॥ ५१ ॥ जब उन्हें कहीं भी कोई रक्षक न मिला, तब तो वे और भी डर गये। अपने लिये त्राण ढूँढ़ते हुए वे देवशिरोमणि ब्रह्माजीके पास गये और बोले— ‘ब्रह्माजी ! आप स्वयम्भू हैं। भगवान्‌के इस तेजोमय चक्रसे मेरी रक्षा कीजिये॥ ५२ ॥
ब्रह्माजीने कहा—‘जब मेरी दो परार्धकी आयु समाप्त होगी और कालस्वरूप भगवान्‌ अपनी यह सृष्टि-लीला समेटने लगेंगे और इस जगत् को जलाना चाहेंगे, उस समय उनके भ्रूभङ्गमात्र से यह सारा संसार और मेरा यह लोक भी लीन हो जायगा ॥ ५३ ॥ मैं, शङ्करजी, दक्ष-भृगु आदि प्रजापति, भूतेश्वर, देवेश्वर आदि सब जिनके बनाये नियमोंमें बँधे हैं तथा जिनकी आज्ञा शिरोधार्य करके हमलोग संसारका हित करते हैं, (उनके भक्तके द्रोहीको बचानेके लिये हम समर्थ नहीं हैं)॥ ५४ ॥ जब ब्रह्माजीने इस प्रकार दुर्वासाको निराश कर दिया, तब भगवान्‌के चक्रसे संतप्त होकर वे कैलासवासी भगवान्‌ शङ्करकी शरणमें गये ॥ ५५ ॥

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रविवार, 1 दिसंबर 2019

श्रीमद्भागवतमहापुराण नवम स्कन्ध –चौथा अध्याय..(पोस्ट०७)


॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण
नवम स्कन्ध चौथा अध्याय..(पोस्ट०७)

नाभाग और अम्बरीष की कथा

दुर्वासा यमुनाकूलात् कृत आवश्यक आगतः ।
 राज्ञाभिनन्दितस्तस्य बुबुधे चेष्टितं धिया ॥ ४२ ॥
 मन्युना प्रचलद्‍गात्रो भ्रुकुटीकुटिलाननः ।
 बुभुक्षितश्च सुतरां कृताञ्जलिमभाषत ॥ ४३ ॥
 अहो अस्य नृशंसस्य श्रियोन्मत्तस्य पश्यत ।
 धर्मव्यतिक्रमं विष्णोः अभक्तस्य ईशमानिनः ॥ ४४ ॥
 यो मां अतिथिं आयातं आतिथ्येन निमंत्र्य च ।
 अदत्त्वा भुक्तवान् तस्य सद्यस्ते दर्शये फलम् ॥ ४५ ॥
 एवं ब्रुवाण उत्कृत्य जटां रोषप्रदीपितः ।
 तया स निर्ममे तस्मै कृत्यां कालानलोपमाम् ॥ ४६ ॥
 तां आपतन्तीं ज्वलतीं असिहस्तां पदा भुवम् ।
 वेपयन्तीं समुद्वीक्ष्य न चचाल पदान्नृपः ॥ ४७ ॥
 प्राग् दिष्टं भृत्यरक्षायां पुरुषेण महात्मना ।
 ददाह कृत्यां तां चक्रं क्रुद्धाहिमिव पावकः ॥ ४८ ॥
 तद् अभिद्रवद् उद्वीक्ष्य स्वप्रयासं च निष्फलम् ।
 दुर्वासा दुद्रुवे भीतो दिक्षु प्राणपरीप्सया ॥ ४९ ॥
 तमन्वधावद्‍भगवद्रथांगं
     दावाग्निः उद्धूतशिखो यथाहिम् ।
 तथानुषक्तं मुनिरीक्षमाणो
     गुहां विविक्षुः प्रससार मेरोः ॥ ५० ॥

दुर्वासा जी आवश्यक कर्मोंसे निवृत्त होकर यमुनातट से लौट आये। जब राजा ने आगे बढक़र उनका अभिनन्दन किया तब उन्होंने अनुमान से ही समझ लिया कि राजा ने पारण कर लिया है ॥ ४२ ॥ उस समय दुर्वासाजी बहुत भूखे थे। इसलिये यह जानकर कि राजाने पारण कर लिया है, वे क्रोधसे थर-थर काँपने लगे। भौंहोंके चढ़ जानेसे उनका मुँह विकट हो गया। उन्होंने हाथ जोडक़र खड़े अम्बरीषसे डाँटकर कहा ॥ ४३ ॥ अहो ! देखो तो सही, यह कितना क्रूर है ! यह धनके मदमें मतवाला हो रहा है। भगवान्‌की भक्ति तो इसे छूतक नहीं गयी और यह अपनेको बड़ा समर्थ मानता है। आज इसने धर्मका उल्लङ्घन करके बड़ा अन्याय किया है ॥ ४४ ॥ देखो, मैं इसका अतिथि होकर आया हूँ। इसने अतिथि-सत्कार करनेके लिये मुझे निमन्त्रण भी दिया है, किन्तु फिर भी मुझे खिलाये बिना ही खा लिया है। अच्छा देख, ‘तुझे अभी इसका फल चखाता हूँ॥ ४५ ॥ यों कहते-कहते वे क्रोधसे जल उठे। उन्होंने अपनी एक जटा उखाड़ी और उससे अम्बरीषको मार डालनेके लिये एक कृत्या उत्पन्न की। वह प्रलय-कालकी आगके समान दहक रही थी ॥ ४६ ॥ वह आगके समान जलती हुई, हाथमें तलवार लेकर राजा अम्बरीषपर टूट पड़ी। उस समय उसके पैरोंकी धमकसे पृथ्वी काँप रही थी। परंतु राजा अम्बरीष उसे देखकर उससे तनिक भी विचलित नहीं हुए। वे एक पग भी नहीं हटे, ज्यों-के-त्यों खड़े रहे ॥ ४७ ॥ परमपुरुष परमात्माने अपने सेवककी रक्षाके लिये पहलेसे ही सुदर्शन चक्रको नियुक्त कर रखा था। जैसे आग क्रोधसे गुर्राते हुए साँपको भस्म कर देती है, वैसे ही चक्रने दुर्वासाजीकी कृत्याको जलाकर राखका ढेर कर दिया ॥ ४८ ॥ जब दुर्वासाजीने देखा कि मेरी बनायी हुई कृत्या तो जल रही है और चक्र मेरी ओर आ रहा है, तब वे भयभीत हो अपने प्राण बचानेके लिये जी छोडक़र एकाएक भाग निकले ॥ ४९ ॥ जैसे ऊँची-ऊँची लपटोंवाला दावानल साँपके पीछे दौड़ता है, वैसे ही भगवान्‌ का चक्र उनके पीछे-पीछे दौडऩे लगा। जब दुर्वासाजीने देखा कि चक्र तो मेरे पीछे लग गया है, तब सुमेरु पर्वतकी गुफामें प्रवेश करनेके लिये वे उसी ओर दौड़ पड़े ॥ ५० ॥

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श्रीमद्भागवतमहापुराण नवम स्कन्ध –चौथा अध्याय..(पोस्ट०६)


॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण
नवम स्कन्ध चौथा अध्याय..(पोस्ट०६)

नाभाग और अम्बरीष की कथा

तं आनर्चातिथिं भूपः प्रत्युत्थान् आसनार्हणैः ।
 ययाचेऽभ्यवहाराय पादमूलमुपागतः ॥ ३६ ॥
 प्रतिनन्द्य स तां याच्ञां कर्तुमावश्यकं गतः ।
 निममज्ज बृहद् ध्यायन् कालिन्दीसलिले शुभे ॥ ३७ ॥
 मुहूर्तार्धावशिष्टायां द्वादश्यां पारणं प्रति ।
 चिन्तयामास धर्मज्ञो द्विजैः तद् धर्मसंकटे ॥ ३८ ॥
 ब्राह्मणातिक्रमे दोषो द्वादश्यां यदपारणे ।
 यत्कृत्वा साधु मे भूयाद् अधर्मो वा न मां स्पृशेत् ॥ ३९ ॥
 अम्भसा केवलेनाथ करिष्ये व्रतपारणम् ।
 आहुरब्भक्षणं विप्रा हि अशितं नाशितं च तत् ॥ ४० ॥
 इत्यपः प्राश्य राजर्षिः चिन्तयन् मनसाच्युतम् ।
 प्रत्यचष्ट कुरुश्रेष्ठ द्विज आगमनमेव सः ॥ ४१ ॥


राजा अम्बरीष उन्हें (दुर्वासा जी को) देखते ही उठकर खड़े हो गये, आसन देकर बैठाया और विविध सामग्रियों से अतिथि के रूपमें आये हुए दुर्वासाजी की पूजा की। उनके चरणों में प्रणाम करके अम्बरीष ने भोजनके लिये प्रार्थना की ॥ ३६ ॥ दुर्वासाजी ने अम्बरीष की प्रार्थना स्वीकार कर ली और इसके बाद आवश्यक कर्मों से निवृत्त होनेके लिये वे नदीतटपर चले गये। वे ब्रह्म का ध्यान करते हुए यमुनाके पवित्र जलमें स्नान करने लगे ॥ ३७ ॥ इधर द्वादशी केवल घड़ीभर शेष रह गयी थी। धर्मज्ञ अम्बरीषने धर्म-संकटमें पडक़र ब्राह्मणोंके साथ परामर्श किया ॥ ३८ ॥ उन्होंने कहा— ‘ब्राह्मणदेवताओ ! ब्राह्मणको बिना भोजन कराये स्वयं खा लेना और द्वादशी रहते पारण न करनादोनों ही दोष हैं। इसलिये इस समय जैसा करनेसे मेरी भलाई हो और मुझे पाप न लगे, ऐसा काम करना चाहिये ॥ ३९ ॥ तब ब्राह्मणोंके साथ विचार करके उन्होंने कहा—‘ब्राह्मणो ! श्रुतियोंमें ऐसा कहा गया है कि जल पी लेना भोजन करना भी है, नहीं भी करना है। इसलिये इस समय केवल जलसे पारण किये लेता हूँ ॥ ४० ॥ ऐसा निश्चय करके मन-ही-मन भगवान्‌ का चिन्तन करते हुए राजर्षि अम्बरीषने जल पी लिया और परीक्षित्‌ ! वे केवल दुर्वासाजीके आनेकी बाट देखने लगे ॥ ४१ ॥

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शनिवार, 30 नवंबर 2019

श्रीमद्भागवतमहापुराण नवम स्कन्ध –चौथा अध्याय..(पोस्ट०५)


॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण
नवम स्कन्ध चौथा अध्याय..(पोस्ट०५)

नाभाग और अम्बरीष की कथा

आरिराधयिषुः कृष्णं महिष्या तुल्यशीलया ।
युक्तः सांवत्सरं वीरो दधार द्वादशीव्रतम् ॥ २९ ॥
व्रतान्ते कार्तिके मासि त्रिरात्रं समुपोषितः ।
स्नातः कदाचित् कालिन्द्यां हरिं मधुवनेऽर्चयत् ॥ ३० ॥
महाभिषेकविधिना सर्वोपस्करसम्पदा ।
अभिषिच्याम्बराकल्पैः गन्धमाल्यार्हणादिभिः ॥ ३१ ॥
तद्‍गतान्तरभावेन पूजयामास केशवम् ।
ब्राह्मणांश्च महाभागान् सिद्धार्थानपि भक्तितः ॥ ३२ ॥
गवां रुक्मविषाणीनां रूप्याङ्‌घ्रीणां सुवाससाम् ।
पयःशीलवयोरूप वत्सोपस्करसंपदाम् ॥ ३३ ॥
प्राहिणोत् साधुविप्रेभ्यो गृहेषु न्यर्बुदानि षट् ।
भोजयित्वा द्विजानग्रे स्वाद्वन्नं गुणवत्तमम् ॥ ३४ ॥
लब्धकामैः अनुज्ञातः पारणायोपचक्रमे ।
तस्य तर्ह्यतिथिः साक्षात् दुर्वासा भगवानभूत् ॥ ३५ ॥

राजा अम्बरीषकी पत्नी भी उन्हींके समान धर्मशील, संसार से विरक्त एवं भक्तिपरायण थीं। एक बार उन्होंने अपनी पत्नीके साथ भगवान्‌ श्रीकृष्णकी आराधना करनेके लिये एक वर्षतक द्वादशीप्रधान एकादशी-व्रत करनेका नियम ग्रहण किया ॥ २९ ॥ व्रतकी समाप्ति होनेपर कार्तिक महीनेमें उन्होंने तीन रातका उपवास किया और एक दिन यमुनाजीमें स्नान करके मधुवनमें भगवान्‌ श्रीकृष्णकी पूजा की ॥ ३० ॥ उन्होंने महाभिषेककी विधिसे सब प्रकारकी सामग्री और सम्पत्ति द्वारा भगवान्‌का अभिषेक किया और हृदयसे तन्मय होकर वस्त्र, आभूषण, चन्दन, माला एवं अघ्र्य आदिके द्वारा उनकी पूजा की। यद्यपि महाभाग्यवान् ब्राह्मणोंको इस पूजाकी कोई आवश्यकता नहीं थी, स्वयं ही उनकी सारी कामनाएँ पूर्ण हो चुकी थींवे सिद्ध थेतथापि राजा अम्बरीषने भक्तिभावसे उनका पूजन किया। तत्पश्चात् पहले ब्राह्मणोंको स्वादिष्ट और अत्यन्त गुणकारी भोजन कराकर उन लोगोंके घर साठ करोड़ गौएँ सुसज्जित करके भेज दीं। उन गौओंके सींग सुवर्णसे और खुर चाँदीसे मढ़े हुए थे। सुन्दर-सुन्दर वस्त्र उन्हें ओढ़ा दिये गये थे। वे गौएँ बड़ी सुशील, छोटी अवस्थाकी, देखनेमें सुन्दर, बछड़ेवाली और खूब दूध देनेवाली थीं। उनके साथ दुहनेकी उपयुक्त सामग्री भी उन्होंने भेजवा दी थी ॥ ३१३४ ॥ जब ब्राह्मणोंको सब कुछ मिल चुका, तब राजाने उन लोगोंसे आज्ञा लेकर व्रतका पारण करनेकी तैयारी की। उसी समय शाप और वरदान देनेमें समर्थ स्वयं दुर्वासाजी भी उनके यहाँ अतिथिके रूपमें पधारे ॥ ३५ ॥

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श्रीमद्भागवतमहापुराण नवम स्कन्ध –चौथा अध्याय..(पोस्ट०४)


॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण
नवम स्कन्ध चौथा अध्याय..(पोस्ट०४)

नाभाग और अम्बरीष की कथा

पादौ हरेः क्षेत्रपदानुसर्पणे
     शिरो हृषीकेश पदाभिवन्दने ।
 कामं च दास्ये न तु कामकाम्यया
     यथोत्तमश्लोक जनाश्रया रतिः ॥ २० ॥
 एवं सदा कर्मकलापमात्मनः
     परेऽधियज्ञे भगवत्यधोक्षजे ।
 सर्वात्मभावं विदधन्महीमिमां
     तन्निष्ठविप्राभिहितः शशास ह ॥ २१ ॥
 ईजेऽश्वमेधैरधियज्ञमीश्वरं
     महाविभूत्योपचितांगदक्षिणैः ।
 ततैर्वसिष्ठासितगौतमादिभिः
     धन्वन्यभिस्रोतमसौ सरस्वतीम् ॥ २२ ॥
 यस्य क्रतुषु गीर्वाणैः सदस्या ऋत्विजो जनाः ।
 तुल्यरूपाः चानिमिषा व्यदृश्यन्त सुवाससः ॥ २३ ॥
 स्वर्गो न प्रार्थितो यस्य मनुजैः अमरप्रियः ।
 श्रृण्वद्भिः उपगायद्‌भिः उत्तमश्लोकचेष्टितम् ॥ २४ ॥
 समर्द्धयन्ति तान् कामाः स्वाराज्यपरिभाविताः ।
 दुर्लभा नापि सिद्धानां मुकुन्दं हृदि पश्यतः ॥ २५ ॥
 स इत्थं भक्तियोगेन तपोयुक्तेन पार्थिवः ।
 स्वधर्मेण हरिं प्रीणन् संगान् सर्वान् शनैर्जहौ ॥ २६ ॥
 गृहेषु दारेषु सुतेषु बन्धुषु
     द्विपोत्तमस्यन्दन वाजिवस्तुषु ।
 अक्षय्यरत्‍नाभरणाम्बरादिषु
     अनन्तकोशेषु अकरोत् असन् मतिम् ॥ २७ ॥
 तस्मा अदाद् हरिश्चक्रं प्रत्यनीक-भयावहम् ।
 एकान्तभक्तिभावेन प्रीतो भृत्याभिरक्षणम् ॥ २८ ॥

अम्बरीष के पैर भगवान्‌ के क्षेत्र आदि की पैदल यात्रा करने में ही लगे रहते और वे सिर से भगवान्‌ श्रीकृष्ण के चरणकमलों की वन्दना किया करते। राजा अम्बरीष ने माला, चन्दन आदि भोग-सामग्री को भगवान्‌ की सेवामें समर्पित कर दयिा था। भोगनेकी इच्छासे नहीं, बल्कि इसलिये कि इससे वह भगवत्प्रेम प्राप्त हो, जो पवित्रकीर्ति भगवान्‌ के निज-जनों में ही निवास करता है ॥ २० ॥ इस प्रकार उन्होंने अपने सारे कर्म यज्ञपुरुष, इन्द्रियातीत भगवान्‌ के प्रति उन्हें सर्वात्मा एवं सर्वस्वरूप समझकर समर्पित कर दिये थे और भगवद्भक्त ब्राह्मणों की आज्ञा के अनुसार वे इस पृथ्वी का शासन करते थे ॥ २१ ॥ उन्होंने धन्वनाम के निर्जल देश में सरस्वती नदी के प्रवाहके सामने वसिष्ठ, असित, गौतम आदि भिन्न-भिन्न आचार्यों द्वारा महान् ऐश्वर्य के कारण सर्वाङ्गपरिपूर्ण तथा बड़ी-बड़ी दक्षिणावाले अनेकों अश्वमेध यज्ञ करके यज्ञाधिपति भगवान्‌ की आराधना की थी ॥ २२ ॥ उनके यज्ञोंमें देवताओंके साथ जब सदस्य और ऋत्विज् बैठ जाते थे, तब उनकी पलकें नहीं पड़ती थीं और वे अपने सुन्दर वस्त्र और वैसे ही रूपके कारण देवताओंके समान दिखायी पड़ते थे ॥ २३ ॥ उनकी प्रजा महात्माओंके द्वारा गाये हुए भगवान्‌के उत्तम चरित्रोंका किसी समय बड़े प्रेमसे श्रवण करती और किसी समय उनका गान करती। इस प्रकार उनके राज्यके मनुष्य देवताओंके अत्यन्त प्यारे स्वर्गकी भी इच्छा नहीं करते ॥ २४ ॥ वे अपने हृदयमें अनन्त प्रेमका दान करनेवाले श्रीहरिका नित्य-निरन्तर दर्शन करते रहते थे। इसलिये उन लोगोंको वह भोग-सामग्री भी हर्षित नहीं कर पाती थी, जो बड़े-बड़े सिद्धोंको भी दुर्लभ है। वे वस्तुएँ उनके आत्मानन्दके सामने अत्यन्त तुच्छ और तिरस्कृत थीं ॥ २५ ॥ राजा अम्बरीष इस प्रकार तपस्यासे युक्त भक्तियोग और प्रजापालनरूप स्वधर्मके द्वारा भगवान्‌को प्रसन्न करने लगे और धीरे- धीरे उन्होंने सब प्रकारकी आसक्तियोंका परित्याग कर दिया ॥ २६ ॥ घर, स्त्री, पुत्र, भाई-बन्धु, बड़े-बड़े हाथी, रथ, घोड़े एवं पैदलोंकी चतुरङ्गिणी सेना, अक्षय रत्न, आभूषण और आयुध आदि समस्त वस्तुओं तथा कभी समाप्त न होनेवाले कोशोंके सम्बन्धमें उनका ऐसा दृढ़ निश्चय था कि वे सब-के-सब असत्य हैं ॥ २७ ॥ उनकी अनन्य प्रेममयी भक्तिसे प्रसन्न होकर भगवान्‌ने उनकी रक्षाके लिये सुदर्शन चक्रको नियुक्त कर दिया था, जो विरोधियोंको भयभीत करनेवाला एवं भगवद्भक्तोंकी रक्षा करनेवाला है ॥ २८ ॥

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शुक्रवार, 29 नवंबर 2019

श्रीमद्भागवतमहापुराण नवम स्कन्ध –चौथा अध्याय..(पोस्ट०३)


॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण
नवम स्कन्ध चौथा अध्याय..(पोस्ट०३)

नाभाग और अम्बरीष की कथा

श्रीराजोवाच ।
भगवन् श्रोतुमिच्छामि राजर्षेः तस्य धीमतः ।
न प्राभूद् यत्र निर्मुक्तो ब्रह्मदण्डो दुरत्ययः ॥ १४ ॥

श्रीशुक उवाच ।
अंबरीषो महाभागः सप्तद्वीपवतीं महीम् ।
अव्ययां च श्रियं लब्ध्वा विभवं चातुलं भुवि ॥ १५ ॥
मेनेऽतिदुर्लभं पुंसां सर्वं तत् स्वप्नसंस्तुतम् ।
विद्वान् विभवनिर्वाणं तमो विशति यत् पुमान् ॥ १६ ॥
वासुदेवे भगवति तद्‍भक्तेषु च साधुषु ।
प्राप्तो भावं परं विश्वं येनेदं लोष्टवत् स्मृतम् ॥ १७ ॥
स वै मनः कृष्णपदारविन्दयोः
     वचांसि वैकुण्ठगुणानुवर्णने ।
 करौ हरेर्मन्दिरमार्जनादिषु
     श्रुतिं चकाराच्युतसत्कथोदये ॥ १८ ॥
 मुकुन्दलिंगालयदर्शने दृशौ
     तद्‍भृत्यगात्रस्पर्शेङ्‌गसंगमम् ।
 घ्राणं च तत्पादसरोजसौरभे
     श्रीमत् तुलस्या रसनां तदर्पिते ॥ १९ ॥

राजा परीक्षित्‌ने पूछाभगवन् ! मैं परमज्ञानी राजर्षि अम्बरीषका चरित्र सुनना चाहता हूँ। ब्राह्मणने क्रोधित होकर उन्हें ऐसा दण्ड दिया, जो किसी प्रकार टाला नहीं जा सकता; परंतु वह भी उनका कुछ न बिगाड़ सका ॥ १४ ॥
श्रीशुकदेवजीने कहापरीक्षित्‌ ! अम्बरीष बड़े भाग्यवान् थे। पृथ्वीके सातों द्वीप, अचल सम्पत्ति और अतुलनीय ऐश्वर्य उनको प्राप्त था। यद्यपि ये सब साधारण मनुष्योंके लिये अत्यन्त दुर्लभ वस्तुएँ हैं, फिर भी वे इन्हें स्वप्नतुल्य समझते थे। क्योंकि वे जानते थे कि जिस धन-वैभवके लोभमें पडक़र मनुष्य घोर नरकमें जाता है, वह केवल चार दिनकी चाँदनी है। उसका दीपक तो बुझा-बुझाया है ॥ १५-१६ ॥ भगवान्‌ श्रीकृष्णमें और उनके प्रेमी साधुओंमें उनका परम प्रेम था। उस प्रेमके प्राप्त हो जानेपर तो यह सारा विश्व और इसकी समस्त सम्पत्तियाँ मिट्टी के ढेले के समान जान पड़ती हैं ॥ १७ ॥ उन्होंने अपने मनको श्रीकृष्णचन्द्र के चरणारविन्द युगल में, वाणीको भगवद्गुणानुवर्णन में, हाथोंको श्रीहरिमन्दिर के मार्जन-सेवन में और अपने कानोंको भगवान्‌ अच्युतकी मङ्गलमयी कथाके श्रवणमें लगा रखा था ॥ १८ ॥ उन्होंने अपने नेत्र मुकुन्दमूर्ति एवं मन्दिरोंके दर्शनोंमें, अङ्ग-सङ्ग भगवद्भक्तोंके शरीर-स्पर्श में, नासिका उनके चरणकमलोंपर चढ़ी श्रीमती तुलसीके दिव्य गन्धमें और रसना (जिह्वा) को भगवान्‌ के प्रति अर्पित नैवेद्य-प्रसादमें संलग्र कर दिया था ॥ १९ ॥

शेष आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से



श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - नवाँ अध्याय..(पोस्ट०४)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ श्रीमद्भागवतमहापुराण  सप्तम स्कन्ध – नवाँ अध्याय..(पोस्ट०४) प्रह्लादजी के द्वारा नृसिंहभगवान्‌ की स्तुति सर्वे ह्य...