सोमवार, 14 अक्टूबर 2019

श्रीमद्भागवतमहापुराण अष्टम स्कन्ध – तेरहवाँ अध्याय..(पोस्ट०४)


॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण
अष्टम स्कन्ध – तेरहवाँ अध्याय..(पोस्ट०४)

आगामी सात मन्वन्तरोंका वर्णन

नवमो दक्षसावर्णिर्मनुर्वरुणसम्भवः
भूतकेतुर्दीप्तकेतुरित्याद्यास्तत्सुता नृप ॥ १८ ॥
पारा मरीचिगर्भाद्या देवा इन्द्रो ऽद्भुतः स्मृतः
द्युतिमत्प्रमुखास्तत्र भविष्यन्त्यृषयस्ततः ॥ १९ ॥
आयुष्मतोऽम्बुधारायामृषभो भगवत्कला
भविता येन संराद्धां त्रिलोकीं भोक्ष्यतेऽद्भुतः ॥ २० ॥
दशमो ब्रह्मसावर्णिरुपश्लोकसुतो मनुः
तत्सुता भूरिषेणाद्या हविष्मत्प्रमुखा द्विजाः ॥ २१ ॥
हविष्मान्सुकृतः सत्यो जयो मूर्तिस्तदा द्विजाः
सुवासनविरुद्धाद्या देवाः शम्भुः सुरेश्वरः ॥ २२ ॥
विष्वक्सेनो विषूच्यां तु शम्भोः सख्यं करिष्यति
जातः स्वांशेन भगवान्गृहे विश्वसृजो विभुः ॥ २३ ॥

परीक्षित्‌ ! वरुण के पुत्र दक्षसावर्णि नवें मनु होंगे। भूतकेतु, दीप्तकेतु आदि उनके पुत्र होंगे ॥ १८ ॥ पार, मरीचिगर्भ आदि देवताओंके गण होंगे और अद्भुत नामके इन्द्र होंगे। उस मन्वन्तरमें द्युतिमान् आदि सप्तर्षि होंगे ॥ १९ ॥ आयुष्मान् की पत्नी अम्बुधाराके गर्भ से ऋषभके रूपमें भगवान्‌का कलावतार होगा। अद्भुत नामक इन्द्र उन्हींकी दी हुई त्रिलोकीका उपभोग करेंगे ॥ २० ॥
दसवें मनु होंगे उपश्लोकके पुत्र ब्रह्मसावर्णि। उनमें समस्त सद्गुण निवास करेंगे। भूरिषेण आदि उनके पुत्र होंगे और हविष्मान्, सुकृति, सत्य, जय, मूर्ति आदि सप्तर्षि। सुवासन, विरुद्ध आदि देवताओंके गण होंगे और इन्द्र होंगे शम्भु ॥ २१-२२ ॥ विश्वसृज्की पत्नी विषूचिके गर्भसे भगवान्‌ विष्वक्सेन के रूप में अंशावतार ग्रहण करके शम्भु नामक इन्द्रसे मित्रता करेंगे ॥ २३ ॥

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रविवार, 13 अक्टूबर 2019

श्रीमद्भागवतमहापुराण अष्टम स्कन्ध – तेरहवाँ अध्याय..(पोस्ट०३)


॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण
अष्टम स्कन्ध – तेरहवाँ अध्याय..(पोस्ट०३)

आगामी सात मन्वन्तरोंका वर्णन

दत्त्वेमां याचमानाय विष्णवे यः पदत्रयम्
राद्धमिन्द्र पदं हित्वा ततः सिद्धिमवाप्स्यति ॥ १३ ॥
योऽसौ भगवता बद्धः प्रीतेन सुतले पुनः
निवेशितोऽधिके स्वर्गादधुनास्ते स्वराडिव ॥ १४ ॥
गालवो दीप्तिमान्रामो द्रोणपुत्रः कृपस्तथा
ऋष्यशृङ्गः पितास्माकं भगवान्बादरायणः ॥ १५ ॥
इमे सप्तर्षयस्तत्र भविष्यन्ति स्वयोगतः
इदानीमासते राजन्स्वे स्व आश्रममण्डले ॥ १६ ॥
देवगुह्यात्सरस्वत्यां सार्वभौम इति प्रभुः
स्थानं पुरन्दराद्धृत्वा बलये दास्यतीश्वरः ॥ १७ ॥

विष्णु भगवान्‌ ने वामन अवतार ग्रहण करके इन्हीं से तीन पग पृथ्वी माँगी थी; परंतु इन्होंने उनको सारी त्रिलोकी दे दी। राजा बलिको एक बार तो भगवान्‌ ने बाँध दिया था, परंतु फिर प्रसन्न होकर उन्होंने इनको स्वर्गसे भी श्रेष्ठ सुतल लोकका राज्य दे दिया। वे इस समय वहीं इन्द्रके समान विराजमान हैं। आगे चलकर ये ही इन्द्र होंगे और समस्त ऐश्वर्योंसे परिपूर्ण इन्द्रपदका भी परित्याग करके परम सिद्धि प्राप्त करेंगे ॥ १३-१४ ॥ गालव, दीप्तिमान्, परशुराम, अश्वत्थामा, कृपाचार्य, ऋष्यशृङ्ग और हमारे पिता भगवान्‌ व्यासये आठवें मन्वन्तरमें सप्तर्षि होंगे। इस समय ये लोग योगबलसे अपने-अपने आश्रम-मण्डलमें स्थित हैं ॥ १५-१६ ॥ देवगुह्यकी पत्नी सरस्वतीके गर्भसे सार्वभौम नामक भगवान्‌का अवतार होगा। ये ही प्रभु पुरन्दर इन्द्रसे स्वर्गका राज्य छीनकर राजा बलिको दे देंगे ॥ १७ ॥

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श्रीमद्भागवतमहापुराण अष्टम स्कन्ध – तेरहवाँ अध्याय..(पोस्ट०२)


॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण
अष्टम स्कन्ध – तेरहवाँ अध्याय..(पोस्ट०२)

आगामी सात मन्वन्तरोंका वर्णन

सङ्क्षेपतो मयोक्तानि सप्तमन्वन्तराणि ते
भविष्याण्यथ वक्ष्यामि विष्णोः शक्त्यान्वितानि च
विवस्वतश्च द्वे जाये विश्वकर्मसुते उभे
संज्ञा छाया च राजेन्द्र ये प्रागभिहिते तव
तृतीयां वडवामेके तासां संज्ञासुतास्त्रयः
यमो यमी श्राद्धदेवश्छायायाश्च सुताञ्छृणु
सावर्णिस्तपती कन्या भार्या संवरणस्य या
शनैश्चरस्तृतीयोऽभूदश्विनौ वडवात्मजौ १०
अष्टमेऽन्तर आयाते सावर्णिर्भविता मनुः
निर्मोकविरजस्काद्याः सावर्णितनया नृप ११
तत्र देवाः सुतपसो विरजा अमृतप्रभाः
तेषां विरोचनसुतो बलिरिन्द्रो भविष्यति १२

परीक्षित्‌ ! इस प्रकार मैंने संक्षेपसे तुम्हें सात मन्वन्तरोंका वर्णन सुनाया; अब भगवान्‌की शक्तिसे युक्त अगले (आनेवाले) सात मन्वन्तरोंका वर्णन करता हूँ ॥ ७ ॥
परीक्षित्‌ ! यह तो मैं तुम्हें पहले (छठे स्कन्धमें) बता चुका हूँ कि विवस्वान् (भगवान्‌ सूर्य) की दो पत्नियाँ थींसंज्ञा और छाया। ये दोनों ही विश्वकर्माकी पुत्री थीं ॥ ८ ॥ कुछ लोग ऐसा कहते हैं कि उनकी एक तीसरी पत्नी बडवा भी थी। (मेरे विचारसे तो संज्ञाका ही नाम बडवा हो गया था।) उन सूर्यपत्नियोंमें संज्ञासे तीन सन्तानें हुर्ईंयम, यमी और श्राद्धदेव। छायाके भी तीन सन्तानें हुर्ईंसावर्णि, शनैश्चर और तपती नामकी कन्या, जो संवरणकी पत्नी हुई। जब संज्ञाने बडवाका रूप धारण कर लिया, तब उससे दोनों अश्विनीकुमार हुए ॥ ९-१० ॥ आठवें मन्वन्तरमें सावर्णि मनु होंगे। उनके पुत्र होंगे निर्मोक, विरजस्क आदि ॥ ११ ॥ परीक्षित्‌ ! उस समय सुतपा, विरजा और अमृतप्रभ नामक देवगण होंगे। इन देवताओंके इन्द्र होंगे विरोचनके पुत्र बलि ॥ १२ ॥

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शनिवार, 12 अक्टूबर 2019

श्रीमद्भागवतमहापुराण अष्टम स्कन्ध – तेरहवाँ अध्याय..(पोस्ट०१)


॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण
अष्टम स्कन्ध – तेरहवाँ अध्याय..(पोस्ट०१)

आगामी सात मन्वन्तरोंका वर्णन

मनुर्विवस्वतः पुत्रः श्राद्धदेव इति श्रुतः
सप्तमो वर्तमानो यस्तदपत्यानि मे शृणु
इक्ष्वाकुर्नभगश्चैव धृष्टः शर्यातिरेव च
नरिष्यन्तोऽथ नाभागः सप्तमो दिष्ट उच्यते
तरूषश्च पृषध्रश्च दशमो वसुमान्स्मृतः
मनोर्वैवस्वतस्यैते दशपुत्राः परन्तप
आदित्या वसवो रुद्रा विश्वेदेवा मरुद्गणाः
अश्विनावृभवो राजन्निन्द्रस्तेषां पुरन्दरः
कश्यपोऽत्रिर्वसिष्ठश्च विश्वामित्रोऽथ गौतमः
जमदग्निर्भरद्वाज इति सप्तर्षयः स्मृताः
अत्रापि भगवज्जन्म कश्यपाददितेरभूत्
आदित्यानामवरजो विष्णुर्वामनरूपधृक्

श्रीशुकदेवजी कहते हैंपरीक्षित्‌ ! विवस्वान् के पुत्र यशस्वी श्राद्धदेव ही सातवें (वैवस्वत) मनु हैं। यह वर्तमान मन्वन्तर ही उनका कार्यकाल है। उनकी सन्तानका वर्णन मैं करता हूँ ॥ १ ॥ वैवस्वत मनु के दस पुत्र हैंइक्ष्वाकु, नभग, धृष्ट, शर्याति, नरिष्यन्त, नाभाग, दिष्ट, करूष, पृषध्र और वसुमान ॥ २-३ ॥ परीक्षित्‌ ! इस मन्वन्तरमें आदित्य, वसु, रुद्र, विश्वेदेव, मरुद्गण, अश्विनीकुमार और ऋभुये देवताओंके प्रधान गण हैं और पुरन्दर उनका इन्द्र है ॥ ४ ॥ कश्यप, अत्रि, वसिष्ठ, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि और भरद्वाजये सप्तर्षि हैं ॥ ५ ॥ इस मन्वन्तरमें भी कश्यपकी पत्नी अदितिके गर्भसे आदित्योंके छोटे भाई वामनके रूपमें भगवान्‌ विष्णुने अवतार ग्रहण किया था ॥ ६ ॥

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श्रीमद्भागवतमहापुराण अष्टम स्कन्ध – बारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०७)


॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण
अष्टम स्कन्ध – बारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०७)

मोहिनीरूप को देखकर महादेवजी का मोहित होना

श्रीशुक उवाच -
एवं भगवता राजन् श्रीवत्सांकेन सत्कृतः ।
आमंत्र्य तं परिक्रम्य सगणः स्वालयं ययौ ॥ ४१ ॥
आत्मांशभूतां तां मायां भवानीं भगवान् भवः ।
शंसतां ऋषिमुख्यानां प्रीत्याचष्टाथ भारत ॥ ४२ ॥
अयि व्यपश्यस्त्वमजस्य मायां
     परस्य पुंसः परदेवतायाः ।
अहं कलानां ऋषभो विमुह्ये
     ययावशोऽन्ये किमुतास्वतंत्राः ॥ ४३ ॥
यं मां अपृच्छस्त्वमुपेत्य योगात्
     समासहस्रान्त उपारतं वै ।
स एष साक्षात्पुरुषः पुराणो
     न यत्र कालो विशते न वेदः ॥ ४४ ॥

श्रीशुक उवाच -
इति तेऽभिहितस्तात विक्रमः शारंगधन्वनः ।
सिन्धोर्निर्मथने येन धृतः पृष्ठे महाचलः ॥ ४५ ॥
एतन्मुहुः कीर्तयतोऽनुश्रृण्वतो
     न रिष्यते जातु समुद्यमः क्वचित् ।
यदुत्तमश्लोकगुणानुवर्णनं
     समस्तसंसारपरिश्रमापहम् ॥ ४६ ॥
असद् अविषयमङ्‌घ्रिं भावगम्यं प्रपन्नान्
     अमृतममरवर्यानाशयत् सिन्धुमथ्यम् ।
कपटयुवतिवेषो मोहयन् यः सुरारीन्
     तमहमुपसृतानां कामपूरं नतोऽस्मि ॥ ४७ ॥

श्रीशुकदेवजी कहते हैंपरीक्षित्‌ ! इस प्रकार भगवान्‌ विष्णु ने भगवान्‌ शङ्कर का सत्कार किया। तब उनसे विदा लेकर एवं परिक्रमा करके वे अपने गणोंके साथ कैलासको चले गये ॥ ४१ ॥ भरतवंशशिरोमणे ! भगवान्‌ शङ्करने बड़े-बड़े ऋषियोंकी सभामें अपनी अद्र्धाङ्गिनी सती देवीसे अपने विष्णुरूपकी अंशभूता मायामयी मोहिनीका इस प्रकार बड़े प्रेमसे वर्णन किया ॥ ४२ ॥ देवि ! तुमने परम पुरुष परमेश्वर भगवान्‌ विष्णुकी माया देखी ? देखो, यों तो मैं समस्त कलाकौशल, विद्या आदिका स्वामी और स्वतन्त्र हूँ, फिर भी उस मायासे विवश होकर मोहित हो जाता हूँ। फिर दूसरे जीव तो परतन्त्र हैं ही; अत: वे मोहित हो जायँइसमें कहना ही क्या है ॥ ४३ ॥ जब मैं एक हजार वर्षकी समाधिसे उठा था, तब तुमने मेरे पास आकर पूछा था कि तुम किसकी उपासना करते हो। वे यही साक्षात् सनातन पुरुष हैं। न तो काल ही इन्हें अपनी सीमामें बाँध सकता है और न वेद ही इनका वर्णन कर सकता है। इनका वास्तविक स्वरूप अनन्त और अनिर्वचनीय है॥ ४४ ॥
श्रीशुकदेवजी कहते हैंप्रिय परीक्षित्‌ ! मैंने विष्णुभगवान्‌की यह ऐश्वर्यपूर्ण लीला तुमको सुनायी, जिसमें समुद्र-मन्थनके समय अपनी पीठपर मन्दराचल धारण करनेवाले भगवान्‌का वर्णन है ॥ ४५ ॥ जो पुरुष बार-बार इसका कीर्तन और श्रवण करता है, उसका उद्योग कभी और कहीं निष्फल नहीं होता। क्योंकि पवित्रकीर्ति भगवान्‌के गुण और लीलाओंका गान संसारके समस्त क्लेश और परिश्रमको मिटा देनेवाला है ॥ ४६ ॥ दुष्ट पुरुषोंको भगवान्‌के चरणकमलोंकी प्राप्ति कभी हो नहीं सकती। वे तो भक्तिभावसे युक्त पुरुषको ही प्राप्त होते हैं। इसीसे उन्होंने स्त्रीका मायामय रूप धारण करके दैत्योंको मोहित किया और अपने चरणकमलोंके शरणागत देवताओंको समुद्र-मन्थनसे निकले हुए अमृतका पान कराया। केवल उन्हींकी बात नहींचाहे जो भी उनके चरणोंकी शरण ग्रहण करे, वे उसकी समस्त कामनाएँ पूर्ण कर देते हैं। मैं उन प्रभुके चरणकमलोंमें नमस्कार करता हूँ ॥ ४७ ॥

इति श्रीमद्‌भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां
अष्टमस्कन्धे शंकरमोहनं द्वादशोध्याऽयः ॥ १२ ॥

हरिः ॐ तत्सत् श्रीकृष्णार्पणमस्तु ॥

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शुक्रवार, 11 अक्टूबर 2019

श्रीमद्भागवतमहापुराण अष्टम स्कन्ध – बारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०६)


॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण
अष्टम स्कन्ध – बारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०६)

मोहिनीरूप को देखकर महादेवजी का मोहित होना

श्रीभगवानुवाच –

दिष्ट्या त्वं विबुधश्रेष्ठ स्वां निष्ठां आत्मना स्थितः ।
यन्मे स्त्रीरूपया स्वैरं मोहितोऽप्यङ्‌ग मायया ॥ ३८ ॥
को नु मेऽतितरेन्मायां विषक्तस्त्वदृते पुमान् ।
तान् तान् विसृजतीं भावान् दुस्तरामकृतात्मभिः ॥ ३९ ॥
सेयं गुणमयी माया न त्वां अभिभविष्यति ।
मया समेता कालेन कालरूपेण भागशः ॥ ४० ॥

श्रीभगवान्‌ ने कहादेवशिरोमणे ! मेरी स्त्रीरूपिणी माया से विमोहित होकर भी आप स्वयं ही अपनी निष्ठामें स्थित हो गये। यह बड़े ही आनन्दकी बात है ॥ ३८ ॥ मेरी माया अपार है। वह ऐसे-ऐसे हाव-भाव रचती है कि अजितेन्द्रिय पुरुष तो किसी प्रकार उससे छुटकारा पा ही नहीं सकते। भला, आपके अतिरिक्त ऐसा कौन पुरुष है, जो एक बार मेरी मायाके फंदेमें फँसकर फिर स्वयं ही उससे निकल सके ॥ ३९ ॥ यद्यपि मेरी यह गुणमयी माया बड़ों-बड़ोंको मोहित कर देती है, फिर भी अब यह आपको कभी मोहित नहीं करेगी। क्योंकि सृष्टि आदिके लिये समयपर उसे क्षोभित करनेवाला काल मैं ही हूँ, इसलिये मेरी इच्छाके विपरीत वह रजोगुण आदिकी सृष्टि नहीं कर सकती ॥ ४० ॥

शेष आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से




श्रीमद्भागवतमहापुराण अष्टम स्कन्ध – बारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०५)


॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण
अष्टम स्कन्ध – बारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०५)

मोहिनीरूप को देखकर महादेवजी का मोहित होना

आत्मानं मोचयित्वाङ्‌ग सुरर्षभभुजान्तरात् ।
प्राद्रवत्सा पृथुश्रोणी माया देवविनिर्मिता ॥ ३० ॥
तस्यासौ पदवीं रुद्रो विष्णोरद्‍भुतकर्मणः ।
प्रत्यपद्यत कामेन वैरिणेव विनिर्जितः ॥ ३१ ॥
तस्यानुधावतो रेतः चस्कन्दामोघरेतसः ।
शुष्मिणो यूथपस्येव वासितामनुधावतः ॥ ३२ ॥
यत्र यत्रापतन् मह्यां रेतस्तस्य महात्मनः ।
तानि रूप्यस्य हेम्नश्च क्षेत्राण्यासन् महीपते ॥ ३३ ॥
सरित्सरःसु शैलेषु वनेषु उपवनेषु च ।
यत्र क्व चासन् ऋषयः तत्र सन्निहितो हरः ॥ ३४ ॥
स्कन्ने रेतसि सोऽपश्यत् आत्मानं देवमायया ।
जडीकृतं नृपश्रेष्ठ सन्न्यवर्तत कश्मलात् ॥ ३५ ॥
अथ अवगतमाहात्म्य आत्मनो जगदात्मनः ।
अपरिज्ञेयवीर्यस्य न मेने तदु हाद्‍भुतम् ॥ ३६ ॥
तमविक्लवमव्रीडं आलक्ष्य मधुसूदनः ।
उवाच परमप्रीतो बिभ्रत् स्वां पौरुषीं तनुम् ॥ ३७ ॥

वास्तव में वह सुन्दरी भगवान्‌ की रची हुई माया ही थी, इससे उसने किसी प्रकार शङ्करजी के भुजपाश से अपनेको छुड़ा लिया और बड़े वेगसे भागी ॥ ३० ॥ भगवान्‌ शङ्कर भी उन मोहिनीवेषधारी अद्भुतकर्मा भगवान्‌ विष्णुके पीछे-पीछे दौडऩे लगे। उस समय ऐसा जान पड़ता था, मानो उनके शत्रु कामदेवने इस समय उनपर विजय प्राप्त कर ली है ॥ ३१ ॥ कामुक हथिनी के पीछे दौडऩेवाले मदोन्मत्त हाथी के समान वे मोहिनी के पीछे-पीछे दौड़ रह थे। यद्यपि भगवान्‌ शङ्कर का वीर्य अमोघ है, फिर भी मोहिनी की मायासे वह स्खलित हो गया ॥ ३२ ॥ भगवान्‌ शङ्करका वीर्य पृथ्वीपर जहाँ-जहाँ गिरा, वहाँ-वहाँ सोने-चाँदीकी खानें बन गयीं ॥ ३३ ॥ परीक्षित्‌ ! नदी, सरोवर, पर्वत, वन और उपवनमें एवं जहाँ-जहाँ ऋषि-मुनि निवास करते थे, वहाँ-वहाँ मोहिनीके पीछे-पीछे भगवान्‌ शङ्कर गये थे ॥ ३४ ॥ परीक्षित्‌ ! वीर्यपात हो जानेके बाद उन्हें अपनी स्मृति हुई। उन्होंने देखा कि अरे, भगवान्‌ की मायाने तो मुझे खूब छकाया ! वे तुरंत उस दु:खद प्रसङ्ग से अलग हो गये ॥ ३५ ॥ इसके बाद आत्मस्वरूप सर्वात्मा भगवान्‌ की यह महिमा जानकर उन्हें कोई आश्चर्य नहीं हुआ। वे जानते थे कि भला, भगवान्‌की शक्तियोंका पार कौन पा सकता है ॥ ३६ ॥ भगवान्‌ने देखा कि भगवान्‌ शङ्करको इससे विषाद या लज्जा नहीं हुई है, तब वे पुरुष-शरीर धारण करके फिर प्रकट हो गये और बड़ी प्रसन्नतासे उनसे कहने लगे ॥ ३७ ॥

शेष आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से



श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - नवाँ अध्याय..(पोस्ट०२)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ श्रीमद्भागवतमहापुराण  सप्तम स्कन्ध – नवाँ अध्याय..(पोस्ट०२) प्रह्लादजी के द्वारा नृसिंहभगवान्‌ की स्तुति श्रीप्रह्...