गुरुवार, 24 अक्टूबर 2019

श्रीमद्भागवतमहापुराण अष्टम स्कन्ध – सत्रहवाँ अध्याय..(पोस्ट०२)


ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण
अष्टम स्कन्ध – सत्रहवाँ अध्याय..(पोस्ट०२)

भगवान्‌ का प्रकट होकर अदिति को वर देना

अदितिरुवाच -
यज्ञेश यज्ञपुरुषाच्युत तीर्थपाद
     तीर्थश्रवः श्रवणमंगलनामधेय ।
आपन्नलोकवृजिनोपशमोदयाद्य
     शं नः कृधीश भगवन् असि दीननाथः ॥ ८ ॥
विश्वाय विश्वभवनस्थितिसंयमाय
     स्वैरं गृहीतपुरुशक्तिगुणाय भूम्ने ।
स्वस्थाय शश्वदुपबृंहितपूर्णबोध
     व्यापादितात्मतमसे हरये नमस्ते ॥ ९ ॥
आयुः परं वपुरभीष्टमतुल्यलक्ष्मीः
     द्योभूरसाः सकलयोगगुणास्त्रिवर्गः ।
ज्ञानं च केवलमनन्त भवन्ति तुष्टात्
     त्वत्तो नृणां किमु सपत्‍नजयादिराशीः ॥ १० ॥

श्रीशुक उवाच -
अदित्यैवं स्तुतो राजन् भगवान् पुष्करेक्षणः ।
क्षेत्रज्ञः सर्वभूतानां इति होवाच भारत ॥ ११ ॥

अदितिने कहाआप यज्ञके स्वामी हैं और स्वयं यज्ञ भी आप ही हैं। अच्युत ! आपके चरणकमलोंका आश्रय लेकर लोग भवसागरसे तर जाते हैं। आपके यश-कीर्तनका श्रवण भी संसारसे तारनेवाला है। आपके नामोंके श्रवणमात्रसे ही कल्याण हो जाता है। आदि पुरुष ! जो आपकी शरणमें आ जाता है, उसकी सारी विपत्तियोंका आप नाश कर देते हैं। भगवन् ! आप दीनोंके स्वामी हैं। आप हमारा कल्याण कीजिये ॥ ८ ॥ आप विश्वकी उत्पत्ति, स्थिति और प्रलयके कारण हैं और विश्वरूप भी आप ही हैं। अनन्त होनेपर भी स्वच्छन्दतासे आप अनेक शक्ति और गुणोंको स्वीकार कर लेते हैं। आप सदा अपने स्वरूपमें ही स्थित रहते हैं। नित्य-निरन्तर बढ़ते हुए पूर्ण बोधके द्वारा आप हृदयके अन्धकारको नष्ट करते रहते हैं। भगवन्! मैं आपको नमस्कार करती हूँ ॥ ९ ॥ प्रभो! अनन्त! जब आप प्रसन्न हो जाते हैं, तब मनुष्योंको ब्रह्माजीकी दीर्घ आयु, उनके ही समान दिव्य शरीर, प्रत्येक अभीष्ट वस्तु, अतुलित धन, स्वर्ग, पृथ्वी, पाताल, योगकी समस्त सिद्धियाँ, अर्थ-धर्म-कामरूप त्रिवर्ग और केवल ज्ञानतक प्राप्त हो जाता है। फिर शत्रुओंपर विजय प्राप्त करना आदि जो छोटी-छोटी कामनाएँ हैं, उनके सम्बन्धमें तो कहना ही क्या है ॥ १० ॥
श्रीशुकदेवजी कहते हैंपरीक्षित्‌ ! जब अदितिने इस प्रकार कमलनयन भगवान्‌की स्तुति की, तब समस्त प्राणियोंके हृदयमें रहकर उनकी गति-विधि जाननेवाले भगवान्‌ने यह बात कही ॥ ११ ॥

शेष आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से



श्रीमद्भागवतमहापुराण अष्टम स्कन्ध – सत्रहवाँ अध्याय..(पोस्ट०१)


ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण
अष्टम स्कन्ध – सत्रहवाँ अध्याय..(पोस्ट०१)

भगवान्‌ का प्रकट होकर अदिति को वर देना

श्रीशुक उवाच -
इत्युक्ता सादिती राजन् स्वभर्त्रा कश्यपेन वै ।
अन्वतिष्ठद् व्रतमिदं द्वादशाहं अतन्द्रिता ॥ १ ॥
चिन्तयन्ति एकया बुद्ध्या महापुरुषमीश्वरम् ।
प्रगृह्येन्द्रियदुष्टाश्वान् मनसा बुद्धिसारथिः ॥ २ ॥
मनश्चैकाग्रया बुद्ध्या भगवति अखिलात्मनि ।
वासुदेवे समाधाय चचार ह पयोव्रतम् ॥ ३ ॥
तस्याः प्रादुरभूत् तात भगवान् आदिपुरुषः ।
पीतवासाश्चतुर्बाहुः शंखचक्रगदाधरः ॥ ४ ॥
तं नेत्रगोचरं वीक्ष्य सहसोत्थाय सादरम् ।
ननाम भुवि कायेन दण्डवत् प्रीतिविह्वला ॥ ५ ॥
सोत्थाय बद्धाञ्जलिरीडितुं स्थिता
     नोत्सेह आनन्दजलाकुलेक्षणा ।
बभूव तूष्णीं पुलकाकुलाकृतिः
     तद् दर्शनात्युत्सवगात्रवेपथुः ॥ ६ ॥
प्रीत्या शनैर्गद्‍गदया गिरा हरिं
     तुष्टाव सा देव्यदितिः कुरूद्वह ।
उद्वीक्षती सा पिबतीव चक्षुषा
     रमापतिं यज्ञपतिं जगत्पतिम् ॥ ७ ॥

श्रीशुकेदवजी कहते हैंपरीक्षित्‌ ! अपने पतिदेव महर्षि कश्यपजीका उपदेश प्राप्त करके अदितिने बड़ी सावधानीसे बारह दिनतक इस व्रतका अनुष्ठान किया ॥ १ ॥ बुद्धिको सारथि बनाकर मन की लगाम से उसने इन्द्रियरूप दुष्ट घोड़ोंको अपने वशमें कर लिया और एकनिष्ठ बुद्धिसे वह पुरुषोत्तम भगवान्‌का चिन्तन करती रही ॥ २ ॥ उसने एकाग्र बुद्धिसे अपने मनको सर्वात्मा भगवान्‌ वासुदेवमें पूर्णरूपसे लगाकर पयोव्रतका अनुष्ठान किया ॥ ३ ॥ तब पुरुषोत्तम भगवान्‌ उसके सामने प्रकट हुए। परीक्षित्‌ ! वे पीताम्बर धारण किये हुए थे, चार भुजाएँ थीं और शङ्ख, चक्र, गदा लिये हुए थे ॥ ४ ॥ अपने नेत्रोंके सामने भगवान्‌को सहसा प्रकट हुए देख अदिति सादर उठ खड़ी हुई और फिर प्रेमसे विह्वल होकर उसने पृथ्वीपर लोटकर उन्हें दण्डवत् प्रणाम किया ॥ ५ ॥ फिर उठकर, हाथ जोड़, भगवान्‌की स्तुति करनेकी चेष्टा की; परंतु नेत्रोंमें आनन्दके आँसू उमड़ आये, उससे बोला न गया। सारा शरीर पुलकित हो रहा था, दर्शनके आनन्दोल्लाससे उसके अङ्गोंमें कम्प होने लगा था, वह चुपचाप खड़ी रही ॥ ६ ॥ परीक्षित्‌ ! देवी अदिति अपने प्रेमपूर्ण नेत्रोंसे लक्ष्मीपति, विश्वपति, यज्ञेश्वर भगवान्‌को इस प्रकार देख रही थी, मानो वह उन्हें पी जायगी। फिर बड़े प्रेमसे, गद्गद वाणीसे, धीरे-धीरे उसने भगवान्‌ की स्तुति की ॥ ७ ॥

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बुधवार, 23 अक्टूबर 2019

श्रीमद्भागवतमहापुराण अष्टम स्कन्ध – सोलहवाँ अध्याय..(पोस्ट०८)


॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण
अष्टम स्कन्ध – सोलहवाँ अध्याय..(पोस्ट०८)

कश्यपजी के द्वारा अदिति को पयोव्रत का उपदेश

एतत् पयोव्रतं नाम पुरुषाराधनं परम् ।
पितामहेनाभिहितं मया ते समुदाहृतम् ॥ ५८ ॥
त्वं चानेन महाभागे सम्यक् चीर्णेन केशवम् ।
आत्मना शुद्धभावेन नियतात्मा भजाव्ययम् ॥ ५९ ॥
अयं वै सर्वयज्ञाख्यः सर्वव्रतमिति स्मृतम् ।
तपःसारं इदं भद्रे दानं च ईश्वरतर्पणम् ॥ ६० ॥
ते एव नियमाः साक्षात् ते एव च यमोत्तमाः ।
तपो दानं व्रतं यज्ञो येन तुष्यति अधोक्षजः ॥ ६१ ॥
तस्मात् एतद्व्रतं भद्रे प्रयता श्रद्धयाचर ।
भगवान् परितुष्टस्ते वरानाशु विधास्यति ॥ ६२ ॥

(कश्यपजी अदिति से कहरहे हैं) प्रिये ! यह भगवान्‌ की श्रेष्ठ आराधना है। इसका नाम है पयोव्रत। ब्रह्माजीने मुझे जैसा बताया था, वैसा ही मैंने तुम्हें बता दिया ॥ ५८ ॥ देवि ! तुम भाग्यवती हो। अपनी इन्द्रियोंको वशमें करके शुद्ध भाव एवं श्रद्धापूर्ण चित्तसे इस व्रतका भलीभाँति अनुष्ठान करो और इसके द्वारा अविनाशी भगवान्‌की आराधना करो ॥ ५९ ॥ कल्याणी ! यह व्रत भगवान्‌को सन्तुष्ट करनेवाला है, इसलिये इसका नाम है सर्वयज्ञऔर सर्वव्रत। यह समस्त तपस्याओंका सार और मुख्य दान है ॥ ६० ॥ जिनसे भगवान्‌ प्रसन्न होंवे ही सच्चे नियम हैं, वे ही उत्तम यम हैं, वे ही वास्तवमें तपस्या, दान, व्रत और यज्ञ हैं ॥ ६१ ॥ इसलिये देवि ! संयम और श्रद्धासे तुम इस व्रतका अनुष्ठान करो। भगवान्‌ शीघ्र ही तुमपर प्रसन्न होंगे और तुम्हारी अभिलाषा पूर्ण करेंगे ॥ ६२ ॥

इति श्रीमद्‌भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां
अष्टमस्कन्धे अदिति पयोव्रतकथनं नाम षोडशोऽध्यायः ॥ १६ ॥

हरिः ॐ तत्सत् श्रीकृष्णार्पणमस्तु ॥

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श्रीमद्भागवतमहापुराण अष्टम स्कन्ध – सोलहवाँ अध्याय..(पोस्ट०७)


॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण
अष्टम स्कन्ध – सोलहवाँ अध्याय..(पोस्ट०७)

कश्यपजी के द्वारा अदिति को पयोव्रत का उपदेश

पयोभक्षो व्रतमिदं चरेत् विष्णु अर्चनादृतः ।
पूर्ववत् जुहुयादग्निं ब्राह्मणांश्चापि भोजयेत् ॥ ४६ ॥
एवं तु अहः अहः कुर्याद् द्वादशाहं पयोव्रतम् ।
हरेः आराधनं होमं अर्हणं द्विजतर्पणम् ॥ ४७ ॥
प्रतिपत्-दिनं आरभ्य यावत् शुक्लत्रयोदशीम् ।
ब्रह्मचर्यमधःस्वप्नं स्नानं त्रिषवणं चरेत् ॥ ४८ ॥
वर्जयेत् असद् आलापं भोगान् उच्चावचान् तथा ।
अहिंस्रः सर्वभूतानां वासुदेवपरायणः ॥ ४९ ॥
त्रयोदश्यां अथो विष्णोः स्नपनं पञ्चकैर्विभोः ।
कारयेत् शास्त्रदृष्टेन विधिना विधिकोविदैः ॥ ५० ॥
पूजां च महतीं कुर्यात् वित्त शाठ्य विवर्जितः ।
चरुं निरूप्य पयसि शिपिविष्टाय विष्णवे ॥ ५१ ॥
श्रृतेन तेन पुरुषं यजेत सुसमाहितः ।
नैवेद्यं चातिगुणवद् दद्यात् पुरुषतुष्टिदम् ॥ ५२ ॥
आचार्यं ज्ञानसम्पन्नं वस्त्राभरणधेनुभिः ।
तोषयेत् ऋत्विजश्चैव तद् विद्धि आराधनं हरेः ॥ ५३ ॥
भोजयेत् तान्गुणवता सदन्नेन शुचिस्मिते ।
अन्यांश्च ब्राह्मणान् शक्त्या ये च तत्र समागताः ॥ ५४ ॥
दक्षिणां गुरवे दद्याद् ऋत्विग्भ्यश्च यथार्हतः ।
अन्नाद्येन अश्वपाकांश्च प्रीणयेत् समुपागतान् ॥ ५५ ॥
भुक्तवत्सु च सर्वेषु दीनान्ध कृपणादिषु ।
विष्णोस्तत् प्रीणनं विद्वान् भुञ्जीत सह बन्धुभिः ॥ ५६ ॥
नृत्यवादित्रगीतैश्च स्तुतिभिः स्वस्तिवाचकैः ।
कारयेत् तत्कथाभिश्च पूजां भगवतोऽन्वहम् ॥ ५७ ॥

भगवान्‌ की पूजा में आदर-बुद्धि रखते हुए केवल पयोव्रती रहकर यह व्रत करना चाहिये। पूर्ववत् प्रतिदिन हवन और ब्राह्मण-भोजन भी कराना चाहिये ॥ ४६ ॥ इस प्रकार पयोव्रती रहकर बारह दिनतक प्रतिदिन भगवान्‌की आराधना, होम और पूजा करे तथा ब्राह्मण-भोजन कराता रहे ॥ ४७ ॥
फाल्गुन शुक्ल प्रतिपदासे लेकर त्रयोदशीपर्यन्त ब्रह्मचर्यसे रहे, पृथ्वीपर शयन करे और तीनों समय स्नान करे ॥ ४८ ॥ झूठ न बोले। पापियोंसे बात न करे। पापकी बात न करे। छोटे-बड़े सब प्रकारके भोगोंका त्याग कर दे। किसी भी प्राणीको किसी प्रकारसे कष्ट न पहुँचावे। भगवान्‌की आराधनामें लगा ही रहे ॥ ४९ ॥ त्रयोदशीके दिन विधि जाननेवाले ब्राह्मणोंके द्वारा शास्त्रोक्त विधिसे भगवान्‌ विष्णुको पञ्चामृतस्नान करावे ॥ ५० ॥ उस दिन धनका संकोच छोडक़र भगवान्‌की बहुत बड़ी पूजा करनी चाहिये और दूधमें चरु (खीर) पकाकर विष्णुभगवान्‌को अर्पित करना चाहिये ॥ ५१ ॥ अत्यन्त एकाग्र चित्तसे उसी पकाये हुए चरुके द्वारा भगवान्‌का यजन करना चाहिये और उनको प्रसन्न करनेवाला गुणयुक्त तथा स्वादिष्ट नैवेद्य अर्पण करना चाहिये ॥ ५२ ॥ इसके बाद ज्ञानसम्पन्न आचार्य और ऋत्विजोंको वस्त्र, आभूषण और गौ आदि देकर सन्तुष्ट करना चाहिये। प्रिये! इसे भी भगवान्‌की ही आराधना समझो ॥ ५३ ॥ प्रिये! आचार्य और ऋत्विजोंको शुद्ध, सात्त्विक और गुणयुक्त भोजन कराना ही चाहिये; दूसरे ब्राह्मण और आये हुए अतिथियोंको भी अपनी शक्तिके अनुसार भोजन कराना चाहिए ॥ ५४ ॥ गुरु और ऋत्विजोंको यथायोग्य दक्षिणा देनी चाहिये। जो चाण्डाल आदि अपने-आप वहाँ आ गये हों, उन सभीको तथा दीन, अंधे और असमर्थ पुरुषोंको भी अन्न आदि देकर सन्तुष्ट करना चाहिये। जब सब लोग खा चुकें, तब उन सबके सत्कारको भगवान्‌की प्रसन्नताका साधन समझते हुए अपने भाई-बन्धुओंके साथ स्वयं भोजन करे ॥ ५५-५६ ॥ प्रतिपदासे लेकर त्रयोदशीतक प्रतिदिन नाच-गान, बाजे-गाजे, स्तुति, स्वस्तिवाचन और भगवत्कथाओं से भगवान्‌ की पूजा करे-करावे ॥ ५७ ॥

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मंगलवार, 22 अक्टूबर 2019

श्रीमद्भागवतमहापुराण अष्टम स्कन्ध – सोलहवाँ अध्याय..(पोस्ट०६)


॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण
अष्टम स्कन्ध – सोलहवाँ अध्याय..(पोस्ट०६)

कश्यपजी के द्वारा अदिति को पयोव्रत का उपदेश

एतैः मंत्रैः हृर्हृषीकेशं आवाहनपुरस्कृतम् ।
अर्चयेत् श्रद्धया युक्तः पाद्योपस्पर्शनादिभिः ॥ ३८ ॥
अर्चित्वा गन्धमाल्याद्यैः पयसा स्नपयेद् विभुम् ।
वस्त्रोपवीताभरण पाद्योपस्पर्शनैस्ततः ॥
गन्धधूपादिभिश्चार्चेद् द्वादशाक्षरविद्यया ॥ ३९ ॥
श्रृतं पयसि नैवेद्यं शाल्यन्नं विभवे सति ।
ससर्पिः सगुडं दत्त्वा जुहुयान् मूलविद्यया ॥ ४० ॥
निवेदितं तद्‍भक्ताय दद्याद्‍भुञ्जीत वा स्वयम् ।
दत्त्वाऽऽचमनमर्चित्वा तांबूलं च निवेदयेत् ॥ ४१ ॥
जपेत् अष्टोत्तरशतं स्तुवीत स्तुतिभिः प्रभुम् ।
कृत्वा प्रदक्षिणं भूमौ प्रणमेद् दण्डवन्मुदा ॥ ४२ ॥
कृत्वा शिरसि तच्छेषां देवं उद्वासयेत् ततः ।
द्व्यवरान् भोजयेद् विप्रान् पायसेन यथोचितम् ॥ ४३ ॥
भुञ्जीत तैरनुज्ञातः सेष्टः शेषं सभाजितैः ।
ब्रह्मचार्यथ तद् रात्र्यां श्वो भूते प्रथमेऽहनि ॥ ४४ ॥
स्नातः शुचिर्यथोक्तेन विधिना सुसमाहितः ।
पयसा स्नापयित्वार्चेद् यावद् व्रतसमापनम् ॥ ४५ ॥

(कश्यप जी अदिति से कहरहे हैं) प्रिये ! भगवान्‌ हृषीकेशका आवाहन पहले ही कर ले। फिर इन मन्त्रोंके द्वारा पाद्य, आचमन आदि के साथ श्रद्धापूर्वक मन लगाकर पूजा करे ॥ ३८ ॥ गन्ध, माला आदि से पूजा करके भगवान्‌ को दूध से स्नान करावे । उसके बाद वस्त्र, यज्ञोपवीत, आभूषण, पाद्य, आचमन, गन्ध, धूप आदि के द्वारा द्वादशाक्षर मन्त्र से भगवान्‌ की पूजा करे ॥ ३९ ॥ यदि सामर्थ्य    हो तो दूध में पकाये हुए तथा घी और गुड़ मिले हुए शालि के चावल का नैवेद्य लगावे और उसी का द्वादशाक्षर मन्त्रसे हवन करे ॥ ४० ॥ उस नैवेद्य को भगवान्‌ के भक्तों में बाँट दे या स्वयं पा ले। आचमन और पूजाके बाद ताम्बूल निवेदन करे ॥ ४१ ॥ एक सौ आठ बार द्वादशाक्षर मन्त्रका जप करे और स्तुतियोंके द्वारा भगवान्‌का स्तवन करे। प्रदक्षिणा करके बड़े प्रेम और आनन्दसे भूमिपर लोटकर दण्डवत्-प्रणाम करे ॥ ४२ ॥ निर्माल्यको सिरसे लगाकर देवताका विसर्जन करे। कम-से-कम दो ब्राह्मणोंको यथोचित रीतिसे खीरका भोजन करावे ॥ ४३ ॥ दक्षिणा आदिसे उनका सत्कार करे। इसके बाद उनसे आज्ञा लेकर अपने इष्ट-मित्रोंके साथ बचे हुए अन्न को स्वयं ग्रहण करे। उस दिन ब्रह्मचर्यसे रहे और दूसरे दिन प्रात:काल ही स्नान आदि करके पवित्रतापूर्वक पूर्वोक्त विधिसे एकाग्र होकर भगवान्‌की पूजा करे। इस प्रकार जबतक व्रत समाप्त न हो, तबतक दूधसे स्नान कराकर प्रतिदिन भगवान्‌की पूजा करे ॥ ४४-४५ ॥

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श्रीमद्भागवतमहापुराण अष्टम स्कन्ध – सोलहवाँ अध्याय..(पोस्ट०५)


॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण
अष्टम स्कन्ध – सोलहवाँ अध्याय..(पोस्ट०५)

कश्यपजी के द्वारा अदिति को पयोव्रत का उपदेश

निर्वर्तितात्मनियमो देवं अर्चेत् समाहितः ।
अर्चायां स्थण्डिले सूर्ये जले वह्नौ गुरौ अपि ॥ २८ ॥
नमस्तुभ्यं भगवते पुरुषाय महीयसे ।
सर्वभूतनिवासाय वासुदेवाय साक्षिणे ॥ २९ ॥
नमोऽव्यक्ताय सूक्ष्माय प्रधानपुरुषाय च ।
चतुर्विंशद्‍गुणज्ञाय गुणसंख्यानहेतवे ॥ ३० ॥
नमो द्विशीर्ष्णे त्रिपदे चतुःश्रृंगाय तन्तवे ।
सप्तहस्ताय यज्ञाय त्रयीविद्यात्मने नमः ॥ ३१ ॥
नमः शिवाय रुद्राय नमः शक्तिधराय च ।
सर्वविद्याधिपतये भूतानां पतये नमः ॥ ३२ ॥
नमो हिरण्यगर्भाय प्राणाय जगदात्मने ।
योगैश्वर्यशरीराय नमस्ते योगहेतवे ॥ ३३ ॥
नमस्ते आदिदेवाय साक्षिभूताय ते नमः ।
नारायणाय ऋषये नराय हरये नमः ॥ ३४ ॥
नमो मरकतश्याम वपुषेऽधिगतश्रिये ।
केशवाय नमस्तुभ्यं नमस्ते पीतवाससे ॥ ३५ ॥
त्वं सर्ववरदः पुंसां वरेण्य वरदर्षभ ।
अतस्ते श्रेयसे धीराः पादरेणुं उपासते ॥ ३६ ॥
अन्ववर्तन्त यं देवाः श्रीश्च तत्पादपद्मयोः ।
स्पृहयन्त इवामोदं भगवान् मे प्रसीदताम् ॥ ३७ ॥

इसके बाद अपने नित्य और नैमित्तिक नियमोंको पूरा करके एकाग्रचित्तसे मूर्ति, वेदी, सूर्य, जल, अग्नि और गुरुदेवके रूपमें भगवान्‌की पूजा करे ॥ २८ ॥ (और इस प्रकार स्तुति करे—) ‘प्रभो ! आप सर्वशक्तिमान् हैं। अन्तर्यामी और आराधनीय हैं। समस्त प्राणी आपमें और आप समस्त प्राणियोंमें निवास करते हैं। इसीसे आपको वासुदेवकहते हैं। आप समस्त चराचर जगत् और उसके कारणके भी साक्षी हैं। भगवन् ! मेरा आपको नमस्कार है ॥ २९ ॥ आप अव्यक्त और सूक्ष्म हैं। प्रकृति और पुरुषके रूपमें भी आप ही स्थित हैं। आप चौबीस गुणोंके जाननेवाले और गुणोंकी संख्या करनेवाले सांख्यशास्त्रके प्रवर्तक हैं। आपको मेरा नमस्कार है ॥ ३० ॥ आप वह यज्ञ हैं, जिसके प्रायणीय और उदयनीयये दो कर्म सिर हैं। प्रात:, मध्याह्न और सायंये तीन सवन ही तीन पाद हैं। चारों वेद चार सींग हैं। गायत्री आदि सात छन्द ही सात हाथ हैं। यह धर्ममय वृषभरूप यज्ञ वेदोंके द्वारा प्रतिपादित है और इसकी आत्मा हैं स्वयं आप ! आपको मेरे नमस्कार हैं ॥ ३१ ॥ आप ही लोककल्याणकारी शिव और आप ही प्रलयकारी रुद्र हैं। समस्त शक्तियोंको धारण करनेवाले भी आप ही हैं। आपको मेरा बार-बार नमस्कार है। आप समस्त विद्याओंके अधिपति एवं भूतोंके स्वामी हैं। आपको मेरा नमस्कार ॥ ३२ ॥ आप ही सबके प्राण और आप ही इस जगत्के स्वरूप भी हैं। आप योगके कारण तो हैं ही स्वयं योग और उससे मिलनेवाला ऐश्वर्य भी आप ही हैं। हे हिरण्यगर्भ ! आपके लिये मेरे नमस्कार ॥ ३३ ॥ आप ही आदिदेव हैं। सबके साक्षी हैं। आप ही नरनारायण ऋषिके रूपमें प्रकट स्वयं भगवान्‌ हैं। आपको मेरे नमस्कार ॥ ३४ ॥ आपका शरीर मरकतमणिके समान साँवला है। समस्त सम्पत्ति और सौन्दर्यकी देवी लक्ष्मी आपकी सेविका हैं। पीताम्बरधारी केशव ! आपको मेरे बार-बार नमस्कार ॥ ३५ ॥ आप सब प्रकारके वर देनेवाले हैं। वर देनेवालों में श्रेष्ठ हैं। तथा जीवोंके एकमात्र वरणीय हैं। यही कारण है कि धीर विवेकी पुरुष अपने कल्याण के लिये आपके चरणोंकी रजकी उपासना करते हैं ॥ ३६ ॥ जिनके चरणकमलों की सुगन्ध प्राप्त करने की लालसा से समस्त देवता और स्वयं लक्ष्मीजी भी सेवा में लगी रहती हैं, वे भगवान्‌ मुझपर प्रसन्न हों ॥ ३७ ॥

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सोमवार, 21 अक्टूबर 2019

श्रीमद्भागवतमहापुराण अष्टम स्कन्ध – सोलहवाँ अध्याय..(पोस्ट०४)


॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण
अष्टम स्कन्ध – सोलहवाँ अध्याय..(पोस्ट०४)

कश्यपजी के द्वारा अदिति को पयोव्रत का उपदेश

कश्यप उवाच -
एतन्मे भगवान् पृष्टः प्रजाकामस्य पद्मजः ।
यदाह ते प्रवक्ष्यामि व्रतं केशवतोषणम् ॥ २४ ॥
फाल्गुनस्यामले पक्षे द्वादशाहं पयोव्रतम् ।
अर्चयेत् अरविन्दाक्षं भक्त्या परमयान्वितः ॥ २५ ॥
सिनीवाल्यां मृदालिप्य स्नायात् क्रोडविदीर्णया ।
यदि लभ्येत वै स्रोतसि एतं मंत्रं उदीरयेत् ॥ २६ ॥
त्वं देव्यादिवराहेण रसायाः स्थानमिच्छता ।
उद्‌धृतासि नमस्तुभ्यं पाप्मानं मे प्रणाशय ॥ २७ ॥

कश्यपजीने कहादेवि ! जब मुझे सन्तान की कामना हुई थी, तब मैंने भगवान्‌ ब्रह्माजीसे यही बात पूछी थी। उन्होंने मुझे भगवान्‌ को प्रसन्न करनेवाले जिस व्रतका उपदेश किया था, वही मैं तुम्हें बतलाता हूँ ॥ २४ ॥ फाल्गुनके शुक्लपक्षमें बारह दिनतक केवल दूध पीकर रहे और परम भक्तिसे भगवान्‌ कमलनयनकी पूजा करे ॥ २५ ॥ अमावस्याके दिन यदि मिल सके तो सूअरकी खोदी हुई मिट्टीसे अपना शरीर मलकर नदीमें स्नान करे। उस समय यह मन्त्र[*] पढऩा चाहिये ॥ २६ ॥ हे देवि ! प्राणियोंको स्थान देने की इच्छा से वराहभगवान्‌ ने रसातल से तुम्हारा उद्धार किया था। तुम्हें मेरा नमस्कार है। तुम मेरे पापोंको नष्ट कर दो ॥ २७ ॥
...............................................
[*] त्वं देव्यादिवराहेण रसाया: स्थानमिच्छता। उद्धृतासि नमस्तुभ्यं पाप्मानं मे प्रणाशय ।।

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श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - नवाँ अध्याय..(पोस्ट०२)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ श्रीमद्भागवतमहापुराण  सप्तम स्कन्ध – नवाँ अध्याय..(पोस्ट०२) प्रह्लादजी के द्वारा नृसिंहभगवान्‌ की स्तुति श्रीप्रह्...