रविवार, 27 अक्टूबर 2019

श्रीमद्भागवतमहापुराण अष्टम स्कन्ध – अठारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०४)


ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण
अष्टम स्कन्ध – अठारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०४)

वामन भगवान्‌ का प्रकट होकर
राजा बलि की यज्ञशाला में पधारना

तं वटुं वामनं दृष्ट्वा मोदमाना महर्षयः
कर्माणि कारयामासुः पुरस्कृत्य प्रजापतिम् ॥ १३ ॥
तस्योपनीयमानस्य सावित्रीं सविताब्रवीत्
बृहस्पतिर्ब्रह्मसूत्रं मेखलां कश्यपोऽददात् ॥ १४ ॥
ददौ कृष्णाजिनं भूमिर्दण्डं सोमो वनस्पतिः
कौपीनाच्छादनं माता द्यौश्छत्रं जगतः पतेः ॥ १५ ॥
कमण्डलुं वेदगर्भः कुशान्सप्तर्षयो ददुः
अक्षमालां महाराज सरस्वत्यव्ययात्मनः ॥ १६ ॥
तस्मा इत्युपनीताय यक्षराट्पात्रिकामदात्
भिक्षां भगवती साक्षादुमादादम्बिका सती ॥ १७ ॥
स ब्रह्मवर्चसेनैवं सभां सम्भावितो वटुः
ब्रह्मर्षिगणसञ्जुष्टामत्यरोचत मारिषः ॥ १८ ॥
समिद्धमाहितं वह्निं कृत्वा परिसमूहनम्
परिस्तीर्य समभ्यर्च्य समिद्भिरजुहोद्द्विजः ॥ १९ ॥

भगवान्‌ को वामन ब्रह्मचारीके रूपमें देखकर महर्षियोंको बड़ा आनन्द हुआ। उन लोगोंने कश्यप प्रजापतिको आगे करके उनके जातकर्म आदि संस्कार करवाये ॥ १३ ॥ जब उनका उपनयन-संस्कार होने लगा, तब गायत्रीके अधिष्ठातृ-देवता स्वयं सविताने उन्हें गायत्रीका उपदेश किया। देवगुरु बृहस्पतिजीने यज्ञोपवीत और कश्यपने मेखला दी ॥ १४ ॥ पृथ्वीने कृष्णमृगका चर्म, वनके स्वामी चन्द्रमाने दण्ड, माता अदितिने कौपीन और कटिवस्त्र एवं आकाशके अभिमानी देवताने वामन-वेषधारी भगवान्‌को छत्र दिया ॥ १५ ॥ परीक्षित्‌ ! अविनाशी प्रभुको ब्रह्माजीने कमण्डलु, सप्तर्षियोंने कुश और सरस्वतीने रुद्राक्षकी माला समर्पित की ॥ १६ ॥ इस रीतिसे जब वामनभगवान्‌का उपनयन-संस्कार हुआ, तब यक्षराज कुबेरने उनको भिक्षाका पात्र और सतीशिरो- मणि जगज्जननी स्वयं भगवती उमाने भिक्षा दी ॥ १७ ॥ इस प्रकार जब सब लोगोंने वटुवेष-धारी भगवान्‌का सम्मान किया, तब वे ब्रहमर्षियोंसे भरी हुई सभामें अपने ब्रह्मतेजके कारण अत्यन्त शोभायमान हुए ॥ १८ ॥ इसके बाद भगवान्‌ने स्थापित और प्रज्वलित अग्रिका कुशोंसे परिसमूहन और परिस्तरण करके पूजा की और समिधाओंसे हवन किया ॥ १९ ॥

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श्रीमद्भागवतमहापुराण अष्टम स्कन्ध – अठारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०३)


ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण
अष्टम स्कन्ध – अठारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०३)

वामन भगवान्‌ का प्रकट होकर
राजा बलि की यज्ञशाला में पधारना

दृष्ट्वादितिस्तं निजगर्भसम्भवं
परं पुमांसं मुदमाप विस्मिता
गृहीतदेहं निजयोगमायया
प्रजापतिश्चाह जयेति विस्मितः ॥ ११ ॥
यत्तद्वपुर्भाति विभूषणायुधै-
रव्यक्तचिद्व्यक्तमधारयद्धरिः
बभूव तेनैव स वामनो वटुः
सम्पश्यतोर्दिव्यगतिर्यथा नटः ॥ १२ ॥

जब अदितिने अपने गर्भसे प्रकट हुए परम पुरुष परमात्माको देखा, तो वह अत्यन्त आश्चर्य- चकित और परमानन्दित हो गयी। प्रजापति कश्यपजी भी भगवान्‌को अपनी योगमायासे शरीर धारण किये हुए देख विस्मित हो गये और कहने लगे जय हो ! जय हो॥ ११ ॥ परीक्षित्‌ ! भगवान्‌ स्वयं अव्यक्त एवं चित्स्वरूप हैं। उन्होंने जो परम कान्तिमय आभूषण एवं आयुधोंसे युक्त वह शरीर ग्रहण किया था, उसी शरीरसे, कश्यप और अदितिके देखते-देखते वामन ब्रह्मचारीका रूप धारण कर लियाठीक वैसे ही, जैसे नट अपना वेष बदल ले। क्यों न हो, भगवान्‌की लीला तो अद्भुत है ही ॥ १२ ॥

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शनिवार, 26 अक्टूबर 2019

श्रीमद्भागवतमहापुराण अष्टम स्कन्ध – अठारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०२)


ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण
अष्टम स्कन्ध – अठारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०२)

वामन भगवान्‌ का प्रकट होकर
राजा बलि की यज्ञशाला में पधारना

श्रोणायां श्रवणद्वादश्यां मुहूर्तेऽभिजिति प्रभुः
सर्वे नक्षत्रताराद्याश्चक्रुस्तज्जन्म दक्षिणम् ॥ ५ ॥
द्वदश्यां सवितातिष्ठमध्यन्दिनगतो नृप
विजयानाम सा प्रोक्ता यस्यां जन्म विदुर्हरेः ॥ ६ ॥
शङ्खदुन्दुभयो नेदुर्मृदङ्गपणवानकाः
चित्रवादित्रतूर्याणां निर्घोषस्तुमुलोऽभवत् ॥ ७ ॥
प्रीताश्चाप्सरसोऽनृत्यन्गन्धर्वप्रवरा जगुः
तुष्टुवुर्मुनयो देवा मनवः पितरोऽग्नयः ॥ ८ ॥
सिद्धविद्याधरगणाः सकिम्पुरुषकिन्नराः
चारणा यक्षरक्षांसि सुपर्णा भुजगोत्तमाः ॥ ९ ॥
गायन्तोऽतिप्रशंसन्तो नृत्यन्तो विबुधानुगाः
अदित्या आश्रमपदं कुसुमैः समवाकिरन् ॥ १० ॥

परीक्षित्‌ ! जिस समय भगवान्‌ने जन्म ग्रहण किया, उस समय चन्द्रमा श्रवण नक्षत्रपर थे। भाद्रपद मासके शुक्लपक्षकी श्रवणनक्षत्रवाली द्वादशी थी। अभिजित् मुहूर्तमें भगवान्‌का जन्म हुआ था। सभी नक्षत्र और तारे भगवान्‌के जन्मको मङ्गलमय सूचित कर रहे थे ॥ ५ ॥ परीक्षित्‌ ! जिस तिथिमें भगवान्‌का जन्म हुआ था, उसे विजया द्वादशीकहते हैं। जन्मके समय सूर्य आकाशके मध्यभागमें स्थित थे ॥ ६ ॥ भगवान्‌ के अवतारके समय शङ्ख, ढोल, मृदङ्ग, डफ और नगाड़े आदि बाजे बजने लगे। इन तरह-तरहके बाजों और तुरहियोंकी तुमुल ध्वनि होने लगी ॥ ७ ॥ अप्सराएँ प्रसन्न होकर नाचने लगीं। श्रेष्ठ गन्धर्व गाने लगे। मुनि, देवता, मनु, पितर और अग्नि स्तुति करने लगे ॥ ८ ॥ सिद्ध, विद्याधर, किम्पुरुष, किन्नर, चारण, यक्ष, राक्षस, पक्षी, मुख्य-मुख्य नागगण और देवताओंके अनुचर नाचने-गाने एवं भूरि-भूरि प्रशंसा करने लगे तथा उन लोगोंने अदितिके आश्रमको पुष्पोंकी वर्षासे ढक दिया ॥ ९-१० ॥

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श्रीमद्भागवतमहापुराण अष्टम स्कन्ध – अठारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०१)


ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण
अष्टम स्कन्ध – अठारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०१)

वामन भगवान्‌ का प्रकट होकर
राजा बलि की यज्ञशाला में पधारना

श्रीशुक उवाच
इत्थं विरिञ्चस्तुतकर्मवीर्यः
प्रादुर्बभूवामृतभूरदित्याम्
चतुर्भुजः शङ्खगदाब्जचक्रः
पिशङ्गवासा नलिनायतेक्षणः ॥ १ ॥
श्यामावदातो झषराजकुण्डल-
त्विषोल्लसच्छ्रीवदनाम्बुजः पुमान्
श्रीवत्सवक्षा बलयाङ्गदोल्लस-
त्किरीटकाञ्चीगुणचारुनूपुरः ॥ २ ॥
मधुव्रातव्रतविघुष्टया स्वया
विराजितः श्रीवनमालया हरिः
प्रजापतेर्वेश्मतमः स्वरोचिषा
विनाशयन्कण्ठनिविष्टकौस्तुभः ॥ ३ ॥
दिशः प्रसेदुः सलिलाशयास्तदा
प्रजाः प्रहृष्टा ऋतवो गुणान्विताः
द्यौरन्तरीक्षं क्षितिरग्निजिह्वा
गावो द्विजाः सञ्जहृषुर्नगाश्च ॥ ४ ॥

श्रीशुकदेवजी कहते हैंपरीक्षित्‌ ! इस प्रकार जब ब्रह्माजीने भगवान्‌ की शक्ति और लीलाकी स्तुति की, तब जन्म-मृत्युरहित भगवान्‌ अदिति के सामने प्रकट हुए। भगवान्‌ के चार भुजाएँ थीं; उनमें वे शङ्ख, गदा, कमल और चक्र धारण किये हुए थे। कमलके समान कोमल और बड़े-बड़े नेत्र थे। पीताम्बर शोभायमान हो रहा था ॥ १ ॥ विशुद्ध श्यामवर्णका शरीर था। मकराकृति कुण्डलोंकी कान्तिसे मुख-कमलकी शोभा और भी उल्लसित हो रही थी। वक्ष:स्थलपर श्रीवत्सका चिह्न, हाथोंमें कंगन और भुजाओंमें बाजूबंद, सिरपर किरीट, कमरमें करधनीकी लडिय़ाँ और चरणोंमें सुन्दर नूपुर जगमगा रहे थे ॥ २ ॥ भगवान्‌ गलेमें अपनी स्वरूपभूत वनमाला धारण किये हुए थे, जिसके चारों ओर झुंड-के-झुंड भौंरे गुंजार कर रहे थे। उनके कण्ठमें कौस्तुभमणि सुशोभित थी। भगवान्‌की अङ्गकान्तिसे प्रजापति कश्यपजीके घरका अन्धकार नष्ट हो गया ॥ ३ ॥ उस समय दिशाएँ निर्मल हो गयीं। नदी और सरोवरोंका जल स्वच्छ हो गया। प्रजाके हृदयमें आनन्दकी बाढ़ आ गयी। सब ऋतुएँ एक साथ अपना-अपना गुण प्रकट करने लगीं। स्वर्गलोक, अन्तरिक्ष, पृथ्वी, देवता, गौ, द्विज और पर्वतइन सबके हृदयमें हर्षका सञ्चार हो गया ॥ ४ ॥

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शुक्रवार, 25 अक्टूबर 2019

श्रीमद्भागवतमहापुराण अष्टम स्कन्ध – सत्रहवाँ अध्याय..(पोस्ट०४)



ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण
अष्टम स्कन्ध – सत्रहवाँ अध्याय..(पोस्ट०४)

भगवान्‌ का प्रकट होकर अदिति को वर देना

श्रीशुक उवाच -
एतावदुक्त्वा भगवान् तत्रैवान्तरधीयत ।
अदितिर्दुर्लभं लब्ध्वा हरेर्जन्मात्मनि प्रभोः ॥ २१ ॥
उपाधावत् पतिं भक्त्या परया कृतकृत्यवत् ।
स वै समाधियोगेन कश्यपस्तदबुध्यत ॥ २२ ॥
प्रविष्टं आत्मनि हरेः अंशं हि अवितथेक्षणः ।
सोऽदित्यां वीर्यमाधत्त तपसा चिरसम्भृतम् ।
समाहितमना राजन् दारुण्यग्निं यथानिलः ॥ २३ ॥
अदितेर्धिष्ठितं गर्भं भगवन्तं सनातनम् ।
हिरण्यगर्भो विज्ञाय समीडे गुह्यनामभिः ॥ २४ ॥

श्रीब्रह्मोवाच -
जयोरुगाय भगवन् उरुक्रम नमोऽस्तु ते ।
नमो ब्रह्मण्यदेवाय त्रिगुणाय नमो नमः ॥ २५ ॥
नमस्ते पृश्निगर्भाय वेदगर्भाय वेधसे ।
त्रिनाभाय त्रिपृष्ठाय शिपिविष्टाय विष्णवे ॥ २६ ॥
त्वमादिरन्तो भुवनस्य मध्यं
     अनन्तशक्तिं पुरुषं यमाहुः ।
कालो भवानाक्षिपतीश विश्वं
     स्रोतो यथान्तः पतितं गभीरम् ॥ २७ ॥
त्वं वै प्रजानां स्थिरजंगमानां
     प्रजापतीनामसि सम्भविष्णुः ।
दिवौकसां देव दिवश्च्युतानां
     परायणं नौरिव मज्जतोऽप्सु ॥ २८ ॥

श्रीशुकदेवजी कहते हैंइतना कहकर भगवान्‌ वहीं अन्तर्धान हो गये। उस समय अदिति यह जानकर कि स्वयं भगवान्‌ मेरे गर्भसे जन्म लेंगे, अपनी कृतकृत्यताका अनुभव करने लगी। भला, यह कितनी दुर्लभ बात है ! वह बड़े प्रेमसे अपने पतिदेव कश्यपकी सेवा करने लगी। कश्यपजी सत्यदर्शी थे, उनके नेत्रोंसे कोई बात छिपी नहीं रहती थी। अपने समाधि-योगसे उन्होंने जान लिया कि भगवान्‌का अंश मेरे अंदर प्रविष्ट हो गया है। जैसे वायु काठमें अग्रिका आधान करती है, वैसे ही कश्यपजीने समाहित चित्तसे अपनी तपस्याके द्वारा चिर-सञ्चित वीर्यका अदितिमें आधान किया ॥ २१२३ ॥ जब ब्रह्माजीको यह बात मालूम हुई कि अदितिके गर्भमें तो स्वयं अविनाशी भगवान्‌ आये हैं, तब वे भगवान्‌के रहस्यमय नामोंसे उनकी स्तुति करने लगे ॥ २४ ॥
ब्रह्माजीने कहासमग्र कीर्ति के आश्रय भगवन् ! आपकी जय हो। अनन्त शक्तियोंके अधिष्ठान ! आपके चरणोंमें नमस्कार है। ब्रह्मण्यदेव ! त्रिगुणोंके नियामक ! आपके चरणोंमें मेरे बार-बार प्रणाम हैं ॥ २५ ॥ पृश्नि  के पुत्ररूप में उत्पन्न होनेवाले ! वेदोंके समस्त ज्ञानको अपने अंदर रखनेवाले प्रभो ! वास्तवमें आप ही सबके विधाता हैं। आपको मैं बार-बार नमस्कार करता हूँ। ये तीनों लोक आपकी नाभिमें स्थित हैं। तीनों लोकोंसे परे वैकुण्ठमें आप निवास करते हैं। जीवोंके अन्त:करणमें आप सर्वदा विराजमान रहते हैं। ऐसे सर्वव्यापक विष्णुको मैं नमस्कार करता हूँ ॥ २६ ॥ प्रभो ! आप ही संसारके आदि, अन्त और इसलिये मध्य भी हैं। यही कारण है कि वेद अनन्तशक्ति पुरुषके रूपमें आपका वर्णन करते हैं। जैसे गहरा स्रोत अपने भीतर पड़े हुए तिनकेको बहा ले जाता है, वैसे ही आप कालरूपसे संसारका धाराप्रवाह सञ्चालन करते रहते हैं ॥ २७ ॥ आप चराचर प्रजा और प्रजापतियोंको भी उत्पन्न करनेवाले मूल कारण हैं। देवाधिदेव! जैसे जलमें डूबते हुएके लिये नौका ही सहारा है, वैसे ही स्वर्गसे भगाये हुए देवताओंके लिये एकमात्र आप ही आश्रय हैं ॥ २८ ॥

इति श्रीमद्‌भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां
अष्टमस्कन्धे वामनप्रादुर्भावे सप्तदशोऽध्यायः ॥ १७ ॥

हरिः ॐ तत्सत् श्रीकृष्णार्पणमस्तु ॥

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श्रीमद्भागवतमहापुराण अष्टम स्कन्ध – सत्रहवाँ अध्याय..(पोस्ट०३)


ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण
अष्टम स्कन्ध – सत्रहवाँ अध्याय..(पोस्ट०३)

भगवान्‌ का प्रकट होकर अदिति को वर देना

श्रीभगवानुवाच -
देवमातर्भवत्या मे विज्ञातं चिरकांक्षितम् ।
यत् सपत्‍नैः हृतश्रीणां च्यावितानां स्वधामतः ॥ १२ ॥
तान्विनिर्जित्य समरे दुर्मदान् असुरर्षभान् ।
प्रतिलब्धजयश्रीभिः पुत्रैः इच्छसि उपासितुम् ॥ १३ ॥
इन्द्रज्येष्ठैः स्वतनयैः हतानां युधि विद्विषाम् ।
स्त्रियो रुदन्तीरासाद्य द्रष्टुमिच्छसि दुःखिताः ॥ १४ ॥
आत्मजान् सुसमृद्धान् त्व प्रत्याहृतयशःश्रियः ।
नाकपृष्ठं अधिष्ठाय क्रीडतो द्रष्टुमिच्छसि ॥ १५ ॥
प्रायोऽधुना तेऽसुरयूथनाथा
     अपारणीया इति देवि मे मतिः ।
यत्तेऽनुकूलेश्वरविप्रगुप्ता
     न विक्रमस्तत्र सुखं ददाति ॥ १६ ॥
अथाप्युपायो मम देवि चिन्त्यः
     सन्तोषितस्य व्रतचर्यया ते ।
ममार्चनं नार्हति गन्तुमन्यथा
     श्रद्धानुरूपं फलहेतुकत्वात् ॥ १७ ॥
त्वयार्चितश्चाहमपत्यगुप्तये
     पयोव्रतेनानुगुणं समीडितः ।
स्वांशेन पुत्रत्वमुपेत्य ते सुतान्
     गोप्तास्मि मारीचतपस्यधिष्ठितः ॥ १८ ॥
उपधाव पतिं भद्रे प्रजापतिं अकल्मषम् ।
मां च भावयती पत्यौ एवं रूपमवस्थितम् ॥ १९ ॥
नैतत् परस्मा आख्येयं पृष्टयापि कथञ्चन ।
सर्वं संपद्यते देवि देवगुह्यं सुसंवृतम् ॥ २० ॥

श्रीभगवान्‌ ने कहादेवताओं की जननी अदिति ! तुम्हारी चिरकालीन अभिलाषा को मैं जानता हूँ। शत्रुओंने तुम्हारे पुत्रों की सम्पत्ति छीन ली है, उन्हें उनके लोक (स्वर्ग) से खदेड़ दिया है ॥ १२ ॥ तुम चाहती हो कि युद्धमें तुम्हारे पुत्र उन मतवाले और बली असुरोंको जीतकर विजयलक्ष्मी प्राप्त करें, तब तुम उनके साथ भगवान्‌ की उपासना करो ॥ १३ ॥ तुम्हारी इच्छा यह भी है कि तुम्हारे इन्द्रादि पुत्र जब शत्रुओंको मार डालें, तब तुम उनकी रोती हुई दुखी स्त्रियोंको अपनी आँखों देख सको ॥ १४ ॥ अदिति ! तुम चाहती हो कि तुम्हारे पुत्र धन और शक्तिसे समृद्ध हो जायँ, उनकी कीर्ति और ऐश्वर्य उन्हें फिरसे प्राप्त हो जायँ तथा वे स्वर्गपर अधिकार जमाकर पूर्ववत् विहार करें ॥ १५ ॥ परंतु देवि ! वे असुर-सेनापति इस समय जीते नहीं जा सकते, ऐसा मेरा निश्चय है। क्योंकि ईश्वर और ब्राह्मण इस समय उनके अनुकूल हैं। इस समय उनके साथ यदि लड़ाई छेड़ी जायगी, तो उससे सुख मिलनेकी आशा नहीं है ॥ १६ ॥ फिर भी देवि ! तुम्हारे इस व्रतके अनुष्ठानसे मैं बहुत प्रसन्न हूँ, इसलिये मुझे इस सम्बन्धमें कोई-न-कोई उपाय सोचना ही पड़ेगा। क्योंकि मेरी आराधना व्यर्थ तो होनी नहीं चाहिये। उससे श्रद्धाके अनुसार फल अवश्य मिलता है ॥ १७ ॥ तुमने अपने पुत्रोंकी रक्षाके लिये ही विधिपूर्वक पयोव्रतसे मेरी पूजा एवं स्तुति की है। अत: मैं अंशरूपसे कश्यपके वीर्यमें प्रवेश करूँगा और तुम्हारा पुत्र बनकर तुम्हारी सन्तानकी रक्षा करूँगा ॥ १८ ॥ कल्याणी ! तुम अपने पति कश्यपमें मुझे इसी रूपमें स्थित देखो और उन निष्पाप प्रजापतिकी सेवा करो ॥ १९ ॥ देवि ! देखो, किसीके पूछनेपर भी यह बात दूसरेको मत बतलाना। देवताओंका रहस्य जितना गुप्त रहता है, उतना ही सफल होता है ॥ २० ॥

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गुरुवार, 24 अक्टूबर 2019

हनुमान जी में दास्य भक्ति

जय सियाराम जय सियाराम जय सियाराम जय जय सियाराम

हनुमान जी में दास्य भक्ति

“ सो अनन्य जाकें असि मति न टरइ हनुमंत |
मैं सेवक सचराचर रूप स्वामि भगवन्त ||”

भगवान् के गुण,तत्व, रहस्य और प्रभाव को जानकर श्रद्धा-प्रेमपूर्वक उनकी सेवा करना और उनकी आज्ञा का पालन करना दास्य भक्ति है |

मंदिरों में भगवान् के विग्रहों की सेवा करना, मंदिर-मार्जनादी करना, मन से प्रभु के स्वरुप का ध्यान करके उनकी सेवा करना सम्पूर्ण चराचर को प्रभु का स्वरुप समझकर,सब की यथाशक्ति, यथायोग्य सेवा करना, गीता आदि शास्त्रों को भगवान् की आज्ञा मानकर उसके अनुसार आचरण करना और जो कर्म भगवान् की रूचि, प्रसन्नता और इच्छा के अनुकूल हों उन्हीं कर्मों को करना, ये सभी दास्य भक्ति के प्रकार हैं |

भगवान् के रहस्य जानने वाले प्रेमी भक्तों के संग और सेवन से दास्य भक्ति की प्राप्ति होती है |
भगवान् में अनन्य प्रेम की प्राप्ति और नित्य-निरंतर सेवा के लिए भगवान् के समीप रहने के उद्देश्य से दास्य भक्ति की जाती है |
केवल इस दास्य भक्ति से भी मनुष्य को सहज ही भगवान् की प्राप्ति हो जाती है |

गोस्वामी जी तो कहते हैं कि दास्य-भक्ति के बिना भाव-सागर से उद्धार ही नहीं हो सकता ---

“सेवक सेब्य भाव बिनु भाव न तरिअ उरगारि |
भजहु राम पद पंकज अस सिद्धांत विचारि ||”

श्री लक्ष्मण, हनुमान, अंगद आदि इस दास्य-भक्ति के आदर्श उदाहरण हैं |

हनुमान जी का तो सारा जीवन ही दास्य-भक्ति से ओत-प्रोत है | प्रथम ही ऋष्यमूक पर्वत पर भगवान् श्रीराम चन्द्र जी को पहचानकर हनुमान जी कहते हैं ------

“एकु मैं मंद मोहबस कुटिल हृदय अज्ञान |
पुनि प्रभु मोहि बिसारेउ दीनबंधु भगवान् ||”
जदपि नाथ बहु अवगुण मोरे | सेवक प्रभुहि परै जनि भोरें ||
नाथ जीव तव मायाँ मोहा | सो निस्तरइ तुम्हारेहिं छोहा ||
सेवक सुत पति मातु भरोंसे | रहइ असोच बनइ प्रभु पोसें ||”

भगवान् भी अपनी सेवक वत्सलता का परिचय देते हुए हनुमान जी को उठाकर हृदय से लगा लेते हैं और प्रेमाश्रुओं से उनके अंगों का सिंचन करते हुए कहते हैं ---

“सुनु कपि जियँ मानसी जी ऊना | तैं मम प्रिय लछिमन ते दूना ||
समदरसी मोहि कह सब कोऊ | सेवक प्रिय अनन्य गति सोऊ ||”

दास्य-भक्ति का भक्त अपने स्वामी की कृपा का कितना विश्वासी होता है, इसके सम्बन्ध में हनुमान जी ने विभीषण से जो कुछ कहा वह स्मरण रखने योग्य है –

“सुनहु विभीषण प्रभु कै रीती | करहीं सदा सेवक पर प्रीती ||
कहहु कवन मैं परम कुलीना | कपि चंचल सब विधि हीना ||”
“अस मैं अधम सखा सुनु मोहू पर रघुबीर |
कीन्ही कृपा सुमिरि गुन भरे विलोचन नीर ||”
मंगल भवन अमंगल हारी | द्रवहुं सो दशरथ अजिर बिहारि ||
जय सियाराम जय सियाराम जय सियाराम जय जय सियाराम !!

(नवधा भक्ति-पुस्तक कोड २९२,गीताप्रेस,गोरखपुर)


श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - नवाँ अध्याय..(पोस्ट०४)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ श्रीमद्भागवतमहापुराण  सप्तम स्कन्ध – नवाँ अध्याय..(पोस्ट०४) प्रह्लादजी के द्वारा नृसिंहभगवान्‌ की स्तुति सर्वे ह्य...