गुरुवार, 31 अक्टूबर 2019

श्रीमद्भागवतमहापुराण अष्टम स्कन्ध – उन्नीसवाँ अध्याय..(पोस्ट०४)


॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण
अष्टम स्कन्ध – उन्नीसवाँ अध्याय..(पोस्ट०४)

भगवान्‌ वामन का बलि से तीन पग पृथ्वी माँगना,
बलि का वचन देना और शुक्राचार्यजी का उन्हें रोकना

श्रीबलिरुवाच -
अहो ब्राह्मणदायाद वाचस्ते वृद्धसम्मताः ।
त्वं बालो बालिशमतिः स्वार्थं प्रत्यबुधो यथा ॥ १८ ॥
मां वचोभिः समाराध्य लोकानां एकमीश्वरम् ।
पदत्रयं वृणीते यो अबुद्धिमान् द्वीपदाशुषम् ॥ १९ ॥
न पुमान् मां उपव्रज्य भूयो याचितुमर्हति ।
तस्माद् वृत्तिकरीं भूमिं वटो कामं प्रतीच्छ मे ॥ २० ॥

राजा बलिने कहाब्राह्मणकुमार ! तुम्हारी बातें तो वृद्धों-जैसी हैं, परंतु तुम्हारी बुद्धि अभी बच्चोंकी-सी ही है। अभी तुम हो भी तो बालक ही न, इसीसे अपना हानि-लाभ नहीं समझ रहे हो ॥ १८ ॥ मैं तीनों लोकोंका एकमात्र अधिपति हूँ और द्वीप-का-द्वीप दे सकता हूँ। जो मुझे अपनी वाणीसे प्रसन्न कर ले और मुझसे केवल तीन डग भूमि माँगेवह भी क्या बुद्धिमान् कहा जा सकता है ? ॥ १९ ॥ ब्रह्मचारीजी ! जो एक बार कुछ माँगनेके लिये मेरे पास आ गया, उसे फिर कभी किसीसे कुछ माँगनेकी आवश्यकता नहीं पडऩी चाहिये। अत: अपनी जीविका चलानेके लिये तुम्हें जितनी भूमिकी आवश्यकता हो, उतनी मुझसे माँग लो ॥ २० ॥

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गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


बुधवार, 30 अक्टूबर 2019

श्रीमद्भागवतमहापुराण अष्टम स्कन्ध – उन्नीसवाँ अध्याय..(पोस्ट०३)


॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण
अष्टम स्कन्ध – उन्नीसवाँ अध्याय..(पोस्ट०३)

भगवान्‌ वामन का बलि से तीन पग पृथ्वी माँगना,
बलि का वचन देना और शुक्राचार्यजी का उन्हें रोकना


एवं स निश्चित्य रिपोः शरीरं
     आधावतो निर्विविशेऽसुरेन्द्र ।
श्वासानिलान्तर्हितसूक्ष्मदेहः
     तत्प्राणरन्ध्रेण विविग्नचेताः ॥ १० ॥
स तन्निकेतं परिमृश्य
     शून्यमपश्यमानः कुपितो ननाद ।
क्ष्मां द्यां दिशः खं विवरान्समुद्रान्
     विष्णुं विचिन्वन् न ददर्श वीरः ॥ ११ ॥
अपश्यन् इति होवाच मयान्विष्टमिदं जगत् ।
भ्रातृहा मे गतो नूनं यतो नावर्तते पुमान् ॥ १२ ॥
वैरानुबन्ध एतावान् आमृत्योरिह देहिनाम् ।
अज्ञानप्रभवो मन्युः अहंमानोपबृंहितः ॥ १३ ॥
पिता प्रह्लादपुत्रस्ते तद्विद्वान् द्विजवत्सलः ।
स्वमायुर्द्विजलिंगेभ्यो देवेभ्योऽदात् स याचितः ॥ १४ ॥
भवान् आचरितान् धर्मान् आस्थितो गृहमेधिभिः ।
ब्राह्मणैः पूर्वजैः शूरैः अन्यैश्चोद्दामकीर्तिभिः ॥ १५ ॥
तस्मात् त्वत्तो महीमीषद् वृणेऽहं वरदर्षभात् ।
पदानि त्रीणि दैत्येन्द्र सम्मितानि पदा मम ॥ १६ ॥
न अन्यत् ते कामये राजन् वदान्यात् जगदीश्वरात् ।
नैनः प्राप्नोति वै विद्वान् यावदर्थप्रतिग्रहः ॥ १७ ॥

असुरशिरोमणे ! जिस समय हिरण्यकशिपु उनपर झपट रहा था, उसी समय ऐसा निश्चय करके डरसे काँपते हुए विष्णुभगवान्‌ ने अपने शरीर को सूक्ष्म बना लिया और उसके प्राणों के द्वारा नासिकामें से होकर हृदयमें जा बैठे ॥ १० ॥ हिरण्यकशिपु ने उनके लोकको भलीभाँति छान डाला, परंतु उनका कहीं पता न चला। इसपर क्रोधित होकर वह सिंहनाद करने लगा। उस वीरने पृथ्वी, स्वर्ग, दिशा, आकाश, पाताल और समुद्रसब कहीं विष्णुभगवान्‌को ढूँढ़ा, परंतु वे कहीं भी उसे दिखायी न दिये ॥ ११ ॥ उनको कहीं न देखकर वह कहने लगामैंने सारा जगत् छान डाला, परंतु वह मिला नहीं। अवश्य ही वह भ्रातृघाती उस लोकमें चला गया, जहाँ जाकर फिर लौटना नहीं होता ॥ १२ ॥ बस, अब उससे वैरभाव रखनेकी आवश्यकता नहीं, क्योंकि वैर तो देहके साथ ही समाप्त हो जाता है। क्रोधका कारण अज्ञान है और अहंकारसे उसकी वृद्धि होती है ॥ १३ ॥ राजन् ! आपके पिता प्रह्लादनन्दन विरोचन बड़े ही ब्राह्मण भक्त थे। यहाँतक कि उनके शत्रु देवताओंने ब्राह्मणोंका वेष बनाकर उनसे उनकी आयुका दान माँगा और उन्होंने ब्राह्मणोंके छलको जानते हुए भी अपनी आयु दे डाली ॥ १४ ॥ आप भी उसी धर्मका आचरण करते हैं, जिसका शुक्राचार्य आदि गृहस्थ ब्राह्मण, आपके पूर्वज प्रह्लाद और दूसरे यशस्वी वीरोंने पालन किया है ॥ १५ ॥ दैत्येन्द्र ! आप मुँहमाँगी वस्तु देनेवालोंमें श्रेष्ठ हैं। इसीसे मैं आपसे थोड़ी-सी पृथ्वीकेवल अपने पैरोंसे तीन डग माँगता हूँ ॥ १६ ॥ माना कि आप सारे जगत्के स्वामी और बड़े उदार हैं, फिर भी मैं आपसे इससे अधिक नहीं चाहता। विद्वान् पुरुषको केवल अपनी आवश्यकताके अनुसार ही दान स्वीकार करना चाहिये। इससे वह प्रतिग्रहजन्य पापसे बच जाता है ॥ १७ ॥

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श्रीमद्भागवतमहापुराण अष्टम स्कन्ध – उन्नीसवाँ अध्याय..(पोस्ट०२)


॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण
अष्टम स्कन्ध – उन्नीसवाँ अध्याय..(पोस्ट०२)

भगवान्‌ वामन का बलि से तीन पग पृथ्वी माँगना,
बलि का वचन देना और शुक्राचार्यजी का उन्हें रोकना

यतो जातो हिरण्याक्षः चरन्नेक इमां महीम् ।
प्रतिवीरं दिग्विजये नाविन्दत गदायुधः ॥ ५ ॥
यं विनिर्जित्य कृच्छ्रेण विष्णुः क्ष्मोद्धार आगतम् ।
आत्मानं जयिनं मेने तद्वीर्यं भूर्यनुस्मरन् ॥ ६ ॥
निशम्य तद्वधं भ्राता हिरण्यकशिपुः पुरा ।
हन्तुं भ्रातृहणं क्रुद्धो जगाम निलयं हरेः ॥ ७ ॥
तं आयान्तं समालोक्य शूलपाणिं कृतान्तवत् ।
चिन्तयामास कालज्ञो विष्णुर्मायाविनां वरः ॥ ८ ॥
यतो यतोऽहं तत्रासौ मृत्युः प्राणभृतामिव ।
अतोऽहं अस्य हृदयं प्रवेक्ष्यामि पराग्दृशः ॥ ९ ॥

(श्रीभगवान् राजा बलि से कह रहे हैं) आपके कुल में ही हिरण्याक्ष-जैसे वीर का जन्म हुआ था। वह वीर जब हाथ में गदा लेकर अकेला ही दिग्विजय के लिये निकला, तब सारी पृथ्वी में घूमने पर भी उसे अपनी जोड क़ा कोई वीर न मिला ॥ ५ ॥ जब विष्णुभगवान्‌ जल में से पृथ्वी का उद्धार कर रहे थे, तब वह उनके सामने आया और बड़ी कठिनाईसे उन्होंने उसपर विजय प्राप्त की। परंतु उसके बहुत बाद भी उन्हें बार-बार हिरण्याक्षकी शक्ति और बलका स्मरण हो आया करता था और उसे जीत लेनेपर भी वे अपनेको विजयी नहीं समझते थे ॥ ६ ॥ जब हिरण्याक्षके भाई हिरण्यकशिपुको उसके वधका वृत्तान्त मालूम हुआ, तब वह अपने भाईका वध करनेवालेको मार डालनेके लिये क्रोध करके भगवान्‌के निवासस्थान वैकुण्ठधाममें पहुँचा ॥ ७ ॥ विष्णुभगवान्‌ माया रचनेवालोंमें सबसे बड़े हैं और समयको खूब पहचानते हैं। जब उन्होंने देखा कि हिरण्यकशिपु तो हाथमें शूल लेकर कालकी भाँति मेरे ही ऊपर धावा कर रहा है, तब उन्होंने विचार किया ॥ ८ ॥ जैसे संसारके प्राणियोंके पीछे मृत्यु लगी रहती हैवैसे ही मैं जहाँ-जहाँ जाऊँगा, वहीं-वहीं यह मेरा पीछा करेगा। इसलिये मैं इसके हृदयमें प्रवेश कर जाऊँ, जिससे यह मुझे देख न सके; क्योंकि यह तो बहिर्मुख है, बाहरकी वस्तुएँ ही देखता है ॥ ९ ॥

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मंगलवार, 29 अक्टूबर 2019

श्रीमद्भागवतमहापुराण अष्टम स्कन्ध – उन्नीसवाँ अध्याय..(पोस्ट०१)


॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण
अष्टम स्कन्ध – उन्नीसवाँ अध्याय..(पोस्ट०१)

भगवान्‌ वामन का बलि से तीन पग पृथ्वी माँगना,
बलि का वचन देना और शुक्राचार्यजी का उन्हें रोकना

श्रीशुक उवाच -

इति वैरोचनेर्वाक्यं धर्मयुक्तं स सूनृतम् ।
निशम्य भगवान्प्रीतः प्रतिनन्द्येदमब्रवीत् ॥ १ ॥

श्रीभगवानुवाच -

वचस्तवैतत् जनदेव सूनृतं
     कुलोचितं धर्मयुतं यशस्करम् ।
यस्य प्रमाणं भृगवः सांपराये
     पितामहः कुलवृद्धः प्रशान्तः ॥ २ ॥
न ह्येतस्मिन्कुले कश्चित् निःसत्त्वः कृपणः पुमान् ।
प्रत्याख्याता प्रतिश्रुत्य यो वादाता द्विजातये ॥ ३ ॥
न सन्ति तीर्थे युधि चार्थिनार्थिताः
     पराङ्‌मुखा ये त्वमनस्विनो नृपाः ।
युष्मत्कुले यद् यशसामलेन
     प्रह्लाद उद्‍भाति यथोडुपः खे ॥ ४ ॥

श्रीशुकदेवजी कहते हैंराजा बलिके ये वचन धर्मभावसे भरे और बड़े मधुर थे। उन्हें सुनकर भगवान्‌ वामन ने बड़ी प्रसन्नता से उनका अभिनन्दन किया और कहा ॥ १ ॥
श्रीभगवान्‌ ने कहाराजन् ! आपने जो कुछ कहा, वह आपकी कुलपरम्परा के अनुरूप, धर्मभाव से परिपूर्ण, यश को बढ़ानेवाला और अत्यन्त मधुर है । क्यों न हो, परलोकहितकारी धर्म के सम्बन्ध में आप भृगुपुत्र शुक्राचार्य को परम प्रमाण जो मानते हैं । साथ ही अपने कुलवृद्ध पितामह परम शान्त प्रह्लादजी की आज्ञा भी तो आप वैसे ही मानते हैं ॥२॥ आपकी वंशपरम्परा में कोई धैर्यहीन अथवा कृपण पुरुष कभी हुआ ही नहीं । ऐसा भी कोई नहीं हुआ, जिसने ब्राह्मणको कभी दान न दिया हो अथवा जो एक बार किसी को कुछ देनेकी प्रतिज्ञा करके बादमें मुकर गया हो ॥ ३ ॥ दान के अवसर पर याचकों की याचना सुनकर और युद्धके अवसर पर शत्रु के ललकारने पर उनकी ओर से मुँह मोड़ लेनेवाला कायर आपके वंश में कोई भी नहीं हुआ। क्यों न हो, आपकी कुलपरम्परा में प्रह्लाद अपने निर्मल यश से वैसे ही शोभायमान होते हैं, जैसे आकाश में चन्द्रमा ॥ ४ ॥

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श्रीमद्भागवतमहापुराण अष्टम स्कन्ध – अठारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०७)


ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण
अष्टम स्कन्ध – अठारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०७)

वामन भगवान्‌ का प्रकट होकर
राजा बलि की यज्ञशाला में पधारना

श्रीबलिरुवाच
स्वागतं ते नमस्तुभ्यं ब्रह्मन्किं करवाम ते
ब्रह्मर्षीणां तपः साक्षान्मन्ये त्वार्य वपुर्धरम् ॥ २९ ॥
अद्य नः पितरस्तृप्ता अद्य नः पावितं कुलम्
अद्य स्विष्टः क्रतुरयं यद्भवानागतो गृहान् ॥ ३० ॥
अद्याग्नयो मे सुहुता यथाविधि
द्विजात्मज त्वच्चरणावनेजनैः
हतांहसो वार्भिरियं च भूरहो
तथा पुनीता तनुभिः पदैस्तव ॥ ३१ ॥
यद्यद्वटो वाञ्छसि तत्प्रतीच्छ मे
त्वामर्थिनं विप्रसुतानुतर्कये
गां काञ्चनं गुणवद्धाम मृष्टं
तथान्नपेयमुत वा विप्रकन्याम्
ग्रामान्समृद्धांस्तुरगान्गजान्वा
रथांस्तथार्हत्तम सम्प्रतीच्छ ॥ ३२ ॥

बलिने कहाब्राह्मणकुमार ! आप भले पधारे। आपको मैं नमस्कार करता हूँ। आज्ञा कीजिये, मैं आपकी क्या सेवा करूँ ? आर्य ! ऐसा जान पड़ता है कि बड़े-बड़े ब्रहमर्षियों की तपस्या ही स्वयं मूर्तिमान् होकर मेरे सामने आयी है ॥ २९ ॥ आज आप मेरे घर पधारे, इससे मेरे पितर तृप्त हो गये। आज मेरा वंश पवित्र हो गया। आज मेरा यह यज्ञ सफल हो गया ॥ ३० ॥ ब्राह्मण- कुमार ! आपके पाँव पखारनेसे मेरे सारे पाप धुल गये और विधिपूर्वक यज्ञ करनेसे, अग्नि में आहुति डालनेसे जो फल मिलता, वह अनायास ही मिल गया। आपके इन नन्हें-नन्हें चरणों और इनके धोवनसे पृथ्वी पवित्र हो गयी ॥ ३१ ॥ ब्राह्मणकुमार ! ऐसा जान पड़ता है कि आप कुछ चाहते हैं। परम पूज्य ब्रह्मचारीजी ! आप जो चाहते होंगाय, सोना, सामग्रियोंसे सुसज्जित घर, पवित्र अन्न, पीनेकी वस्तु, विवाहके लिये ब्राह्मणकी कन्या, सम्पत्तियों से भरे हुए गाँव, घोड़े, हाथी, रथवह सब आप मुझ से माँग लीजिये। अवश्य ही वह सब मुझ से माँग लीजिये ॥ ३२ ॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायामष्टमस्कन्धे
वामनप्रादुर्भावे बलिवामनसंवादोऽष्टादशोऽध्यायः

हरिः ॐ तत्सत् श्रीकृष्णार्पणमस्तु ॥

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सोमवार, 28 अक्टूबर 2019

श्रीमद्भागवतमहापुराण अष्टम स्कन्ध – अठारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०६)


ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण
अष्टम स्कन्ध – अठारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०६)

वामन भगवान्‌ का प्रकट होकर
राजा बलि की यज्ञशाला में पधारना

इत्थं सशिष्येषु भृगुष्वनेकधा
वितर्क्यमाणो भगवान्स वामनः
छत्रं सदण्डं सजलं कमण्डलुं
विवेश बिभ्रद्धयमेधवाटम् ॥ २३ ॥
मौञ्ज्या मेखलया वीतमुपवीताजिनोत्तरम्
जटिलं वामनं विप्रं मायामाणवकं हरिम् ॥ २४ ॥
प्रविष्टं वीक्ष्य भृगवः सशिष्यास्ते सहाग्निभिः
प्रत्यगृह्णन्समुत्थाय सङ्क्षिप्तास्तस्य तेजसा ॥ २५ ॥
यजमानः प्रमुदितो दर्शनीयं मनोरमम्
रूपानुरूपावयवं तस्मा आसनमाहरत् ॥ २६ ॥
स्वागतेनाभिनन्द्याथ पादौ भगवतो बलिः
अवनिज्यार्चयामास मुक्तसङ्गमनोरमम् ॥ २७ ॥
तत्पादशौचं जनकल्मषापहं
  धर्मविन्मूर्ध्न्यदधात्सुमङ्गलम्
यद्देवदेवो गिरिशश्चन्द्र मौलि-
र्दधार मूर्ध्ना परया च भक्त्या ॥ २८ ॥

भृगुके पुत्र शुक्राचार्य आदि अपने शिष्यों के साथ इसी प्रकार अनेकों कल्पनाएँ कर रहे थे। उसी समय हाथ में छत्र, दण्ड और जलसे भरा कमण्डलु लिये हुए वामन भगवान्‌ ने अश्वमेध यज्ञके मण्डप में प्रवेश किया ॥ २३ ॥ वे कमर में मूँज की मेखला और गले में यज्ञोपवीत धारण किये हुए थे। बगलमें मृगचर्म था और सिरपर जटा थी। इसी प्रकार बौने ब्राह्मण के वेष में अपनी मायासे ब्रह्मचारी बने हुए भगवान्‌ ने जब उनके यज्ञमण्डपमें प्रवेश किया, तब भृगुवंशी ब्राह्मण उन्हें देखकर अपने शिष्योंके साथ उनके तेजसे प्रभावित एवं निष्प्रभ हो गये। वे सब-के-सब अग्नियों के साथ उठ खड़े हुए और उन्होंने वामन भगवान्‌ का स्वागत-सत्कार किया ॥ २४-२५ ॥ भगवान्‌ के लघुरूप के अनुरूप सारे अङ्ग छोटे-छोटे बड़े ही मनोरम एवं दर्शनीय थे। उन्हें देखकर बलिको बड़ा आनन्द हुआ और उन्होंने वामनभगवान्‌ को एक उत्तम आसन दिया ॥ २६ ॥ फिर स्वागत-वाणीसे उनका अभिनन्दन करके पाँव पखारे और सङ्गरहित महापुरुषोंको भी अत्यन्त मनोहर लगनेवाले वामन भगवान्‌ की पूजा की ॥ २७ ॥ भगवान्‌ के चरणकमलों का धोवन परम मङ्गलमय है। उससे जीवोंके सारे पाप-ताप धुल जाते हैं। स्वयं देवाधिदेव चन्द्रमौलि भगवान्‌ शङ्करने अत्यन्त भक्तिभावसे उसे अपने सिरपर धारण किया था। आज वही चरणामृत धर्म के मर्मज्ञ राजा बलिको प्राप्त हुआ। उन्होंने बड़े प्रेमसे उसे अपने मस्तकपर रखा ॥ २८ ॥

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श्रीमद्भागवतमहापुराण अष्टम स्कन्ध – अठारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०५)


ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण
अष्टम स्कन्ध – अठारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०५)

वामन भगवान्‌ का प्रकट होकर
राजा बलि की यज्ञशाला में पधारना

श्रुत्वाश्वमेधैर्यजमानमूर्जितं
बलिं भृगूणामुपकल्पितैस्ततः
जगाम तत्रालिसारसम्भृतो
भारेण गां सन्नमयन्पदे पदे ॥ २० ॥
तं नर्मदायास्तट उत्तरे बले-
र्य ऋत्विजस्ते भृगुकच्छसंज्ञके
प्रवर्तयन्तो भृगवः क्रतूत्तमं
व्यचक्षतारादुदितं यथा रविम् ॥ २१ ॥
ते ऋत्विजो यजमानः सदस्या
हतत्विषो वामनतेजसा नृप
सूर्यः किलायात्युत वा विभावसुः
सनत्कुमारोऽथ दिदृक्षया क्रतोः ॥ २२ ॥

परीक्षित्‌ ! उसी समय भगवान्‌ ने सुना कि सब प्रकार की सामग्रियों से सम्पन्न यशस्वी बलि भृगुवंशी ब्राह्मणों के आदेशानुसार बहुत-से अश्वमेध यज्ञ कर रहे हैं, तब उन्होंने वहाँ के लिये यात्रा की। भगवान्‌ समस्त शक्तियोंसे युक्त हैं। उनके चलनेके समय उनके भारसे पृथ्वी पग-पगपर झुकने लगी ॥ २० ॥ नर्मदा नदीके उत्तर तटपर भृगुकच्छनामका एक बड़ा सुन्दर स्थान है। वहीं बलिके भृगुवंशी ऋत्विज् श्रेष्ठ यज्ञका अनुष्ठान करा रहे थे। उन लोगोंने दूरसे ही वामन भगवान्‌ को देखा, तो उन्हें ऐसा जान पड़ा, मानो साक्षात् सूर्यदेव का उदय हो रहा हो ॥ २१ ॥ परीक्षित्‌ ! वामन भगवान्‌ के तेजसे ऋत्विज्, यजमान और सदस्यसब-के-सब निस्तेज हो गये। वे लोग सोचने लगे कि कहीं यज्ञ देखनेके लिये सूर्य, अग्रि अथवा सनत्कुमार तो नहीं आ रहे हैं ॥ २२ ॥

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श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - नवाँ अध्याय..(पोस्ट०४)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ श्रीमद्भागवतमहापुराण  सप्तम स्कन्ध – नवाँ अध्याय..(पोस्ट०४) प्रह्लादजी के द्वारा नृसिंहभगवान्‌ की स्तुति सर्वे ह्य...