शुक्रवार, 29 नवंबर 2019

श्रीमद्भागवतमहापुराण नवम स्कन्ध –चौथा अध्याय..(पोस्ट०२)


॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण
नवम स्कन्ध चौथा अध्याय..(पोस्ट०२)

नाभाग और अम्बरीष की कथा

तं कश्चित् स्वीकरिष्यन्तं पुरुषः कृष्णदर्शनः ।
 उवाचोत्तरतोऽभ्येत्य ममेदं वास्तुकं वसु ॥ ६ ॥
 ममेदं ऋषिभिः दत्तं इति तर्हि स्म मानवः ।
 स्यान्नौ ते पितरि प्रश्नः पृष्टवान् पितरं यथा ॥ ७ ॥
 यज्ञवास्तुगतं सर्वं उच्छिष्टं ऋषयः क्वचित् ।
 चक्रुर्विभागं रुद्राय स देवः सर्वमर्हति ॥ ८ ॥
 नाभागस्तं प्रणम्याह तवेश किल वास्तुकम् ।
 इत्याह मे पिता ब्रह्मन् शिरसा त्वां प्रसादये ॥ ९ ॥
 यत् ते पितावदद् धर्मं त्वं च सत्यं प्रभाषसे ।
 ददामि ते मन्त्रदृशे ज्ञानं ब्रह्म सनातनम् ॥ १० ॥
 गृहाण द्रविणं दत्तं मत्सत्रे परिशेषितम् ।
 इत्युक्त्वान्तर्हितो रुद्रो भगवान् सत्यवत्सलः ॥ ११ ॥
 य एतत् संस्मरेत् प्रातः सायं च सुसमाहितः ।
 कविर्भवति मंत्रज्ञो गतिं चैव तथाऽऽत्मनः ॥ १२ ॥
 नाभागाद् अंबरीषोऽभूत् महाभागवतः कृती ।
 नास्पृशद् ब्रह्मशापोऽपि यं न प्रतिहतः क्वचित् ॥ १३ ॥

जब नाभाग उस धनको लेने लगा, तब उत्तर दिशासे एक काले रंगका पुरुष आया। उसने कहा—‘इस यज्ञभूमिमें जो कुछ बचा हुआ है, वह सब धन मेरा है॥ ६ ॥
नाभागने कहा—‘ऋषियोंने यह धन मुझे दिया है, इसलिये मेरा है।इसपर उस पुरुषने कहा—‘हमारे विवादके विषयमें तुम्हारे पितासे ही प्रश्र किया जाय।तब नाभाग ने जाकर पितासे पूछा ॥ ७ ॥ पिताने कहा—‘एक बार दक्षप्रजापतिके यज्ञमें ऋषिलोग यह निश्चय कर चुके हैं कि यज्ञभूमिमें जो कुछ बच रहता है, वह सब रुद्रदेवका हिस्सा है। इसलिये वह धन तो महादेवजी को ही मिलना चाहिये॥ ८ ॥ नाभाग ने जाकर उन काले रंगके पुरुष रुद्रभगवान्‌ को प्रणाम किया और कहा कि प्रभो ! यज्ञभूमिकी सभी वस्तुएँ आपकी हैं, मेरे पिता ने ऐसा ही कहा है। भगवन् ! मुझसे अपराध हुआ, मैं सिर झुकाकर आपसे क्षमा माँगता हूँ॥ ९ ॥ तब भगवान्‌ रुद्रने कहा—‘तुम्हारे पिताने धर्मके अनुकूल निर्णय दिया है और तुमने भी मुझसे सत्य ही कहा है। तुम वेदोंका अर्थ तो पहलेसे ही जानते हो। अब मैं तुम्हें सनातन ब्रह्मतत्त्वका ज्ञान देता हूँ ॥ १० ॥ यहाँ यज्ञमें बचा हुआ मेरा जो अंश है, यह धन भी मैं तुम्हें ही दे रहा हूँ; तुम इसे स्वीकार करो।इतना कहकर सत्यप्रेमी भगवान्‌ रुद्र अन्तर्धान हो गये ॥ ११ ॥ जो मनुष्य प्रात: और सायंकाल एकाग्रचित्तसे इस आख्यानका स्मरण करता है, वह प्रतिभाशाली एवं वेदज्ञ तो होता ही है, साथ ही अपने स्वरूपको भी जान लेता है ॥ १२ ॥ नाभागके पुत्र हुए अम्बरीष। वे भगवान्‌ के बड़े प्रेमी एवं उदार धर्मात्मा थे। जो ब्रह्मशाप कभी कहीं रोका नहीं जा सका, वह भी अम्बरीषका स्पर्श न कर सका ॥ १३ ॥

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गुरुवार, 28 नवंबर 2019

श्रीमद्भागवतमहापुराण नवम स्कन्ध –चौथा अध्याय..(पोस्ट०१)


॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण
नवम स्कन्ध चौथा अध्याय..(पोस्ट०१)

नाभाग और अम्बरीष की कथा

श्रीशुक उवाच ।
 नाभागो नभगापत्यं यं ततं भ्रातरः कविम् ।
 यविष्ठं व्यभजन् दायं ब्रह्मचारिणमागतम् ॥ १ ॥
 भ्रातरोऽभाङ्‌क्त किं मह्यं भजाम पितरं तव ।
 त्वां ममार्यास्तताभाङ्‌क्षुः मा पुत्रक तदादृथाः ॥ २ ॥
 इमे अंगिरसः सत्रं आसतेऽद्य सुमेधसः ।
 षष्ठं षष्ठं उपेत्याहः कवे मुह्यन्ति कर्मणि ॥ ३ ॥
 तांन् त्वं शंसय सूक्ते द्वे वैश्वदेवे महात्मनः ।
 ते स्वर्यन्तो धनं सत्र परिशेषितमात्मनः ॥ ४ ॥
 दास्यन्ति तेऽथ तान् गच्छ तथा स कृतवान् यथा ।
 तस्मै दत्त्वा ययुः स्वर्गं ते सत्रपरिशेषणम् ॥ ५ ॥

श्रीशुकदेवजी कहते हैंपरीक्षित्‌ ! मनुपुत्र नभग का पुत्र था नाभाग । जब वह दीर्घकाल तक ब्रह्मचर्यका पालन करके लौटा, तब बड़े भाइयोंने अपनेसे छोटे किन्तु विद्वान् भाई को हिस्से में केवल पिता को ही दिया (सम्पत्ति तो उन्होंने पहले ही आपसमें बाँट ली थी) ॥ १ ॥ उसने अपने भाइयों से पूछा—‘भाइयो ! आपलोगों ने मुझे हिस्सेमें क्या दिया है ?’ तब उन्होंने उत्तर दिया कि हम तुम्हारे हिस्से में पिताजी को ही तुम्हें देते हैं।उसने अपने पिता से जाकर कहा—‘पिताजी ! मेरे बड़े भाइयोंने हिस्सेमें मेरे लिये आपको ही दिया है।पिताने कहा—‘बेटा ! तुम उनकी बात न मानो ॥ २ ॥ देखो, ये बड़े बुद्धिमान् आङ्गिरस-गोत्र के ब्राह्मण इस समय एक बहुत बड़ा यज्ञ कर रहे हैं। परंतु मेरे विद्वान् पुत्र ! वे प्रत्येक छठे दिन अपने कर्ममें भूल कर बैठते हैं ॥ ३ ॥ तुम उन महात्माओंके पास जाकर उन्हें वैश्वदेवसम्बन्धी दो सूक्त बतला दो; जब वे स्वर्ग जाने लगेंगे, तब यज्ञसे बचा हुआ अपना सारा धन तुम्हें दे देंगे। इसलिये अब तुम उन्हींके पास चले जाओ।उसने अपने पिताके आज्ञानुसार वैसा ही किया। उन आङ्गिरसगोत्री ब्राह्मणों ने भी यज्ञका बचा हुआ धन उसे दे दिया और वे स्वर्ग में चले गये ॥ ४-५ ॥

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श्रीमद्भागवतमहापुराण नवम स्कन्ध –तीसरा अध्याय..(पोस्ट०५)


॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण
नवम स्कन्ध तीसरा अध्याय..(पोस्ट०५)

महर्षि च्यवन और सुकन्या का चरित्र, राजा शर्याति का वंश

अहो राजन् निरुद्धास्ते कालेन हृदि ये कृताः ।
तत्पुत्रपौत्र नप्तॄणां गोत्राणि च न श्रृण्महे ॥ ३२ ॥
कालोऽभियातस्त्रिणव चतुर्युगविकल्पितः ।
तद्‍गच्छ देवदेवांशो बलदेवो महाबलः ॥ ३३ ॥
कन्यारत्‍नमिदं राजन् नररत्‍नाय देहि भोः ।
भुवो भारावताराय भगवान् भूतभावनः ॥ ३४ ॥
अवतीर्णो निजांशेन पुण्यश्रवणकीर्तनः ।
इत्यादिष्टोऽभिवन्द्याजं नृपः स्वपुरमागतः ।
त्यक्तं पुण्यजनत्रासाद्‍भ्रातृभिर्दिक्ष्ववस्थितैः ॥ ३५ ॥
सुतां दत्त्वानवद्याङ्‌गीं बलाय बलशालिने ।
बदर्याख्यं गतो राजा तप्तुं नारायणाश्रमम् ॥ ३६ ॥



महाराज ! तुमने अपने मनमें जिन लोगोंके विषयमें सोच रखा था, वे सब तो काल के गालमें चले गये। अब उनके पुत्र, पौत्र अथवा नातियोंकी तो बात ही क्या है, गोत्रोंके नाम भी नहीं सुनायी पड़ते ॥ ३२ ॥ इस बीचमें सत्ताईस चतुर्युगीका समय बीत चुका है। इसलिये तुम जाओ। इस समय भगवान्‌ नारायणके अंशावतार महाबली बलदेवजी पृथ्वीपर विद्यमान हैं ॥ ३३ ॥ राजन् ! उन्हीं नररत्न को यह कन्यारत्न तुम समर्पित कर दो। जिनके नाम, लीला आदिका श्रवण-कीर्तन बड़ा ही पवित्र हैवे ही प्राणियोंके जीवनसर्वस्व भगवान्‌ पृथ्वीका भार उतारनेके लिये अपने अंशसे अवतीर्ण हुए हैं।राजा ककुद्मीने ब्रह्माजीका यह आदेश प्राप्त करके उनके चरणोंकी वन्दना की और अपने नगरमें चले आये। उनके वंशजोंने यक्षोंके भयसे वह नगरी छोड़ दी थी और जहाँ-तहाँ यों ही निवास कर रहे थे ॥ ३४-३५ ॥ राजा ककुद्मी ने अपनी सर्वाङ्गसुन्दरी पुत्री परम बलशाली बलरामजी को सौंप दी और स्वयं तपस्या करनेके लिये भगवान्‌ नर-नारायणके आश्रम बदरीवन की ओर चल दिये ॥ ३६ ॥

इति श्रीमद्‍भागवते महापुराणे पारमहंस्यां
संहितायां नवमस्कन्धे तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥

हरिः ॐ तत्सत् श्रीकृष्णार्पणमस्तु ॥

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बुधवार, 27 नवंबर 2019

श्रीमद्भागवतमहापुराण नवम स्कन्ध –तीसरा अध्याय..(पोस्ट०४)


॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण
नवम स्कन्ध तीसरा अध्याय..(पोस्ट०४)

महर्षि च्यवन और सुकन्या का चरित्र, राजा शर्याति का वंश

सोमेन याजयन् वीरं ग्रहं सोमस्य चाग्रहीत् ।
असोमपोः अपि अश्विनोः च्यवनः स्वेन तेजसा ॥ २४ ॥
हन्तुं तमाददे वज्रं सद्यो मन्युरमर्षितः ।
सवज्रं स्तम्भयामास भुजं इन्द्रस्य भार्गवः ॥ २५ ॥
अन्वजानन् ततः सर्वे ग्रहं सोमस्य चाश्विनोः ।
भिषजाविति यत् पूर्वं सोमाहुत्या बहिष्कृतौ ॥ २६ ॥
उत्तानबर्हिरानर्तो भूरिषेण इति त्रयः ।
शर्यातेरभवन् पुत्रा आनर्ताद् रेवतोऽभवत् ॥ २७ ॥
सोऽन्तःसमुद्रे नगरीं विनिर्माय कुशस्थलीम् ।
आस्थितोऽभुङ्‌क्त विषयान् आनर्तादीन् अरिन्दम ॥ २८ ॥
तस्य पुत्रशतं जज्ञे ककुद्मि ज्येष्ठमुत्तमम् ।
ककुद्मी रेवतीं कन्यां स्वां आदाय विभुं गतः ॥ २९ ॥
पुत्र्या वरं परिप्रष्टुं ब्रह्मलोकं अपावृतम् ।
आवर्तमाने गान्धर्वे स्थितोऽलब्धक्षणः क्षणम् ॥ ३० ॥
तदन्त आद्यमानम्य स्वाभिप्रायं न्यवेदयत् ।
तत् श्रुत्वा भगवान् ब्रह्मा प्रहस्य तमुवाच ह ॥ ३१ ॥

महर्षि च्यवन ने वीर शर्यातिसे सोमयज्ञ का अनुष्ठान करवाया और सोमपान के अधिकारी न होने पर भी अपने प्रभाव से अश्विनीकुमारोंको सोमपान कराया ॥ २४ ॥ इन्द्र बहुत जल्दी क्रोध कर बैठते हैं। इसलिये उनसे यह सहा न गया। उन्होंने चिढक़र शर्याति को मारनेके लिये वज्र उठाया। महर्षि च्यवनने वज्रके साथ उनके हाथको वहीं स्तम्भित कर दिया ॥ २५ ॥ तब सब देवताओंने अश्विनीकुमारोंको सोमका भाग देना स्वीकार कर लिया। उन लोगोंने वैद्य होनेके कारण पहले अश्विनीकुमारों का सोमपान से बहिष्कार कर रखा था ॥ २६ ॥
परीक्षित्‌ ! शर्याति के तीन पुत्र थेउत्तानबर्हि, आनर्त और भूरिषेण। आनर्त  से रेवत हुए ॥२७॥ महाराज ! रेवतने समुद्रके भीतर कुशस्थली नामकी एक नगरी बसायी थी। उसीमें रहकर वे आनर्त आदि देशोंका राज्य करते थे ॥ २८ ॥ उनके सौ श्रेष्ठ पुत्र थे, जिनमें सबसे बड़े थे ककुद्मी। ककुद्मी अपनी कन्या रेवतीको लेकर उसके लिये वर पूछनेके उद्देश्यसे ब्रह्माजीके पास गये। उस समय ब्रह्मलोकका रास्ता ऐसे लोगोंके लिये बेरोक-टोक था। ब्रह्मलोकमें गाने-बजानेकी धूम मची हुई थी। बातचीतके लिये अवसर न मिलनके कारण वे कुछ क्षण वहीं ठहर गये ॥ २९-३० ॥ उत्सवके अन्तमें ब्रह्माजीको नमस्कार करके उन्होंने अपना अभिप्राय निवेदन किया। उनकी बात सुनकर भगवान्‌ ब्रह्माजीने हँसकर उनसे कहा ॥ ३१ ॥

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श्रीमद्भागवतमहापुराण नवम स्कन्ध –तीसरा अध्याय..(पोस्ट०३)


॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण
नवम स्कन्ध तीसरा अध्याय..(पोस्ट०३)

महर्षि च्यवन और सुकन्या का चरित्र, राजा शर्याति का वंश

यक्ष्यमाणोऽथ शर्यातिः च्यवनस्याश्रमं गतः ।
ददर्श दुहितुः पार्श्वे पुरुषं सूर्यवर्चसम् ॥ १८ ॥
राजा दुहितरं प्राह कृतपादाभिवन्दनाम् ।
आशिषश्चाप्रयुञ्जानो नातिप्रीतिमना इव ॥ १९ ॥
चिकीर्षितं ते किमिदं पतिस्त्वया
प्रलम्भितो लोकनमस्कृतो मुनिः ।
यत्त्वं जराग्रस्तमसत्यसम्मतं
विहाय जारं भजसेऽमुमध्वगम् ॥ २० ॥
कथं मतिस्तेऽवगतान्यथा सतां
कुलप्रसूते कुलदूषणं त्विदम् ।
बिभर्षि जारं यदपत्रपा कुलं
पितुश्च भर्तुश्च नयस्यधस्तमः ॥ २१ ॥
एवं ब्रुवाणं पितरं स्मयमाना शुचिस्मिता ।
उवाच तात जामाता तवैष भृगुनन्दनः ॥ २२ ॥
शशंस पित्रे तत् सर्वं वयोरूपाभिलम्भनम् ।
विस्मितः परमप्रीतः तनयां परिषस्वजे ॥ २३ ॥

कुछ समयके बाद यज्ञ करने की इच्छासे राजा शर्याति च्यवन मुनि के आश्रमपर आये। वहाँ उन्होंने देखा कि उनकी कन्या सुकन्याके पास एक सूर्य के समान तेजस्वी पुरुष बैठा हुआ है ॥ १८ ॥ सुकन्याने उनके चरणोंकी वन्दना की। शर्याति ने उसे आशीर्वाद नहीं दिया और कुछ अप्रसन्न-से होकर बोले ॥ १९ ॥ दुष्टे ! यह तूने क्या किया ? क्या तूने सबके वन्दनीय च्यवन मुनिको धोखा दे दिया ! अवश्य ही तूने उनको बूढ़ा और अपने कामका न समझकर छोड़ दिया और अब तू इस राह चलते जार पुरुषकी सेवा कर रही है ॥ २० ॥ तेरा जन्म तो बड़े ऊँचे कुलमें हुआ था। यह उलटी बुद्धि तुझे कैसे प्राप्त हुई ? तेरा यह व्यवहार तो कुलमें कलङ्क लगानेवाला है। अरे राम-राम ! तू निर्लज्ज होकर जार पुरुषकी सेवा कर रही है और इस प्रकार अपने पिता और पति दोनोंके वंशको घोर नरकमें ले जा रही है॥ २१ ॥ राजा शर्यातिके इस प्रकार कहनेपर पवित्र मुसकानवाली सुकन्याने मुसकराकर कहा—‘पिताजी ! ये आपके जामाता स्वयं भृगुनन्दन महर्षि च्यवन ही हैं॥ २२ ॥ इसके बाद उसने अपने पितासे महर्षि च्यवनके यौवन और सौन्दर्यकी प्राप्तिका सारा वृत्तान्त कह सुनाया। वह सब सुनकर राजा शर्याति अत्यन्त विस्मित हुए। उन्होंने बड़े प्रेमसे अपनी पुत्रीको गलेसे लगा लिया ॥ २३ ॥

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मंगलवार, 26 नवंबर 2019

श्रीमद्भागवतमहापुराण नवम स्कन्ध –तीसरा अध्याय..(पोस्ट०२)



॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण
नवम स्कन्ध तीसरा अध्याय..(पोस्ट०२)

महर्षि च्यवन और सुकन्या का चरित्र, राजा शर्याति का वंश

सुकन्या च्यवनं प्राप्य पतिं परमकोपनम् ।
प्रीणयामास चित्तज्ञा अप्रमत्तानुवृत्तिभिः ॥ १० ॥
कस्यचित् त्वथ कालस्य नासत्यावाश्रमागतौ ।
तौ पूजयित्वा प्रोवाच वयो मे दत्तमीश्वरौ ॥ ११ ॥
ग्रहं ग्रहीष्ये सोमस्य यज्ञे वामप्यसोमपोः ।
क्रियतां मे वयो रूपं प्रमदानां यदीप्सितम् ॥ १२ ॥
बाढं इति ऊचतुर्विप्रं अभिनन्द्य भिषक्तमौ ।
निमज्जतां भवान् अस्मिन् ह्रदे सिद्धविनिर्मिते ॥ १३ ॥
इत्युक्त्वा जरया ग्रस्त देहो धमनिसन्ततः ।
ह्रदं प्रवेशितोऽश्विभ्यां वलीपलित विप्रियः ॥ १४ ॥
पुरुषास्त्रय उत्तस्थुः अपीव्या वनिताप्रियाः ।
पद्मस्रजः कुण्डलिनः तुल्यरूपाः सुवाससः ॥ १५ ॥
तान् निरीक्ष्य वरारोहा सरूपान् सूर्यवर्चसः ।
अजानती पतिं साध्वी अश्विनौ शरणं ययौ ॥ १६ ॥
दर्शयित्वा पतिं तस्यै पातिव्रत्येन तोषितौ ।
ऋषिमामन्त्र्य ययतुः विमानेन त्रिविष्टपम् ॥ १७ ॥

इधर सुकन्या परम क्रोधी च्यवन मुनि को अपने पतिके रूपमें प्राप्त करके बड़ी सावधानी से उनकी सेवा करती हुई उन्हें प्रसन्न करने लगी। वह उनकी मनोवृत्तिको जानकर उसके अनुसार ही बर्ताव करती थी ॥ १० ॥ कुछ समय बीत जानेपर उनके आश्रमपर दोनों अश्विनीकुमार आये। च्यवन मुनिने उनका यथोचित सत्कार किया और कहा कि—‘आप दोनों समर्थ हैं, इसलिये मुझे युवा अवस्था प्रदान कीजिये। मेरा रूप एवं अवस्था ऐसी कर दीजिये, जिसे युवती स्त्रियाँ चाहती हैं। मैं जानता हूँ कि आपलोग सोमपान के अधिकारी नहीं हैं, फिर भी मैं आपको यज्ञ में सोमरस का भाग दूँगा ॥ ११-१२ ॥ वैद्यशिरोमणि अश्विनीकुमारों  ने महर्षि च्यवनका अभिनन्दन करके कहा, ‘ठीक है।और इसके बाद उनसे कहा कि यह सिद्धोंके द्वारा बनाया हुआ कुण्ड है, आप इसमें स्नान कीजिये॥ १३ ॥ च्यवन मुनिके शरीरको बुढ़ापेने घेर रखा था। सब ओर नसें दीख रही थीं, झुरिर्याँ पड़ जाने एवं बाल पक जानेके कारण वे देखनेमें बहुत भद्दे लगते थे। अश्विनीकुमारोंने उन्हें अपने साथ लेकर कुण्डमें प्रवेश किया ॥ १४ ॥ उसी समय कुण्डसे तीन पुरुष बाहर निकले। वे तीनों ही कमलोंकी माला, कुण्डल और सुन्दर वस्त्र पहने एक-से मालूम होते थे। वे बड़े ही सुन्दर एवं स्त्रियोंको प्रिय लगनेवाले थे ॥ १५ ॥ परम साध्वी सुन्दरी सुकन्याने जब देखा कि ये तीनों ही एक आकृतिके तथा सूर्यके समान तेजस्वी हैं, तब अपने पतिको न पहचानकर उसने अश्विनी- कुमारोंकी शरण ली ॥ १६ ॥ उसके पातिव्रत्यसे अश्विनीकुमार बहुत सन्तुष्ट हुए। उन्होंने उसके पतिको बतला दिया और फिर च्यवन मुनिसे आज्ञा लेकर विमानके द्वारा वे स्वर्गको चले गये ॥ १७ ॥

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श्रीमद्भागवतमहापुराण नवम स्कन्ध –तीसरा अध्याय..(पोस्ट०१)


॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण
नवम स्कन्ध तीसरा अध्याय..(पोस्ट०१)

महर्षि च्यवन और सुकन्या का चरित्र,राजा शर्याति का वंश

श्रीशुक उवाच ।
शर्यातिर्मानवो राजा ब्रह्मिष्ठः संबभूव ह ।
यो वा अंगिरसां सत्रे द्वितीयं अह ऊचिवान् ॥ १ ॥
सुकन्या नाम तस्यासीत् कन्या कमललोचना ।
तया सार्धं वनगतो हि अगमत् व्यवनाश्रमम् ॥ २ ॥
सा सखीभिः परिवृता विचिन्वन्त्यंघ्रिपान् वने ।
वल्मीकरन्ध्रे ददृशे खद्योते इव ज्योतिषी ॥ ३ ॥
ते दैवचोदिता बाला ज्योतिषी कण्टकेन वै ।
अविध्यन् मुग्धभावेन सुस्रावासृक् ततो बहिः ॥ ४ ॥
शकृत् मूत्रनिरोधोऽभूत् सैनिकानां च तत्क्षणात् ।
राजर्षिः तं उपालक्ष्य पुरुषान् विस्मितोऽब्रवीत् ॥ ५ ॥
अप्यभद्रं न युष्माभिः भार्गवस्य विचेष्टितम् ।
व्यक्तं केनापि नस्तस्य कृतं आश्रमदूषणम् ॥ ६ ॥
सुकन्या प्राह पितरं भीता किञ्चित् कृतं मया ।
द्वे ज्योतिषी अजानन्त्या निर्भिन्ने कण्टकेन वै ॥ ७ ॥
दुहितुस्तद् वचः श्रुत्वा शर्यातिर्जातसाध्वसः ।
मुनिं प्रसादयामास वल्मीकान्तर्हितं शनैः ॥ ८ ॥
तद् अभिप्रायमाज्ञाय प्रादाद् दुहितरं मुनेः ।
कृच्छ्रात् मुक्तः तमामंत्र्य पुरं प्रायात् समाहितः ॥ ९ ॥

श्रीशुकदेवजी कहते हैंपरीक्षित्‌ ! मनुपुत्र राजा शर्याति वेदोंका निष्ठावान् विद्वान् था। उसने अङ्गिरा-गोत्रके ऋषियोंके यज्ञमें दूसरे दिनका कर्म बतलाया था ॥ १ ॥ उसकी एक कमललोचना कन्या थी। उसका नाम था सुकन्या। एक दिन राजा शर्याति अपनी कन्याके साथ वनमें घूमते- घूमते च्यवन ऋषिके आश्रमपर जा पहुँचे ॥ २ ॥ सुकन्या अपनी सखियोंके साथ वनमें घूम-घूमकर वृक्षोंका सौन्दर्य देख रही थी। उसने एक स्थानपर देखा कि बाँबी (दीमकोंकी एकत्रित की हुई मिट्टी) के छेदमेंसे जुगनूकी तरह दो ज्योतियाँ दीख रही हैं ॥ ३ ॥ दैवकी कुछ ऐसी ही प्रेरणा थी, सुकन्याने बालसुलभ चपलतासे एक काँटेके द्वारा उन ज्योतियोंको वेध दिया। इससे उनमेंसे बहुत- सा-खून बह चला ॥ ४ ॥ उसी समय राजा शर्यातिके सैनिकोंका मल-मूत्र रुक गया। राजर्षि शर्यातिको यह देखकर बड़ा आश्चर्य हुआ, उन्होंने अपने सैनिकोंसे कहा ॥ ५ ॥ अरे, तुम लोगों ने कहीं महर्षि च्यवनजी के प्रति कोई अनुचित व्यवहार तो नहीं कर दिया ? मुझे तो यह स्पष्ट जान पड़ता है कि हमलोगोंमेंसे किसी-न-किसीने उनके आश्रममें कोई अनर्थ किया है॥ ६ ॥ तब सुकन्याने अपने पिता से डरते-डरते कहा कि पिताजी ! मैंने कुछ अपराध अवश्य किया है। मैंने अनजान में दो ज्योतियों को काँटे से छेद दिया है ॥ ७ ॥ अपनी कन्याकी यह बात सुनकर शर्याति घबरा गये। उन्होंने धीरे-धीरे स्तुति करके बाँबीमें छिपे हुए च्यवन मुनिको प्रसन्न किया ॥ ८ ॥ तदनन्तर च्यवन मुनिका अभिप्राय जानकर उन्होंने अपनी कन्या उन्हें समर्पित कर दी और इस संकटसे छूटकर बड़ी सावधानीसे उनकी अनुमति लेकर वे अपनी राजधानीमें चले आये ॥ ९ ॥

शेष आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से



सोमवार, 25 नवंबर 2019

श्रीमद्भागवतमहापुराण नवम स्कन्ध –दूसरा अध्याय..(पोस्ट०५)


॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण
नवम स्कन्ध दूसरा अध्याय..(पोस्ट०५)

पृषध्र, आदि मनु के पाँच पुत्रों का वंश

मरुत्तस्य दमः पुत्रः तस्यासीद् राज्यवर्धनः ।
सुधृतिस्तत्सुतो जज्ञे सौधृतेयो नरः सुतः ॥ २९ ॥
तत्सुतः केवलः तस्माद् बन्धुमान् वेगवान् ततः ।
बुधस्तस्याभवद् यस्य तृणबिन्दुर्महीपतिः ॥ ३० ॥
तं भेजेऽलम्बुषा देवी भजनीयगुणालयम् ।
वराप्सरा यतः पुत्राः कन्या च इडविडाभवत् ॥ ३१ ॥
यस्यां उत्पादयामास विश्रवा धनदं सुतम् ।
प्रादाय विद्यां परमां ऋषिर्योगेश्वरः पितुः ॥ ३२ ॥
विशालः शून्यबन्धुश्च धूम्रकेतुश्च तत्सुताः ।
विशालो वंशकृद् राजा वैशालीं निर्ममे पुरीम् ॥ ३३ ॥
हेमचन्द्रः सुतस्तस्य धूम्राक्षः तस्य चात्मजः ।
तत्पुत्रात् संयमादासीत् कृशाश्वः सहदेवजः ॥ ३४ ॥
कृशाश्वात् सोमदत्तोऽभूद् योऽश्वमेधैः इडस्पतिम् ।
इष्ट्वा पुरुषमापाग्र्यां गतिं योगेश्वराश्रिताम् ॥ ३५ ॥
सौमदत्तिस्तु सुमतिः तत्सुतो जनमेजयः ।
एते वैशालभूपालाः तृणबिन्दोर्यशोधराः ॥ ३६ ॥

मरुत्त के पुत्र का नाम था दम। दमसे राज्यवर्धन, उससे सुधृति और सुधृतिसे नर नामक पुत्रकी उत्पत्ति हुई ॥ २९ ॥ नरसे केवल, केवलसे बन्धुमान्, बन्धुमान् से  वेगवान्, वेगवान्  से बन्धु और बन्धुसे राजा तृणबिन्दुका जन्म हुआ ॥ ३० ॥ तृणबिन्दु आदर्श गुणोंके भण्डार थे। अप्सराओंमें श्रेष्ठ अलम्बुषा देवीने उनको वरण किया, जिससे उनके कई पुत्र और इडविडा नामकी एक कन्या उत्पन्न हुई ॥ ३१ ॥ मुनिवर विश्रवाने अपने योगेश्वर पिता पुलस्त्यजीसे उत्तम विद्या प्राप्त करके इडविडाके गर्भसे लोकपाल कुबेरको पुत्ररूपमें उत्पन्न किया ॥ ३२ ॥ महाराज तृणबिन्दुके अपनी धर्मपत्नीसे तीन पुत्र हुएविशाल, शून्यबन्धु और धूम्रकेतु। उनमेंसे राजा विशाल वंशधर हुए और उन्होंने वैशाली नामकी नगरी बसायी ॥ ३३ ॥ विशालसे हेमचन्द्र, हेमचन्द्र से धूम्राक्ष, धूम्राक्ष से संयम और संयमसे दो पुत्र हुएकृशाश्व और देवज ॥ ३४ ॥ कृशाश्व के पुत्रका नाम था सोमदत्त। उसने अश्वमेध यज्ञोंके द्वारा यज्ञपति भगवान्‌ की आराधना की और योगेश्वर संतोंका आश्रय लेकर उत्तम गति प्राप्त की ॥ ३५ ॥ सोमदत्त का पुत्र हुआ सुमति और सुमतिसे जनमेजय। ये सब तृणबिन्दु की कीर्ति को बढ़ानेवाले विशालवंशी राजा हुए ॥ ३६ ॥

इति श्रीमद्‍भागवते महापुराणे पारमहंस्यां
संहितायां नवमस्कन्धे द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥

हरिः ॐ तत्सत् श्रीकृष्णार्पणमस्तु ॥

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गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से




श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - नवाँ अध्याय..(पोस्ट०४)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ श्रीमद्भागवतमहापुराण  सप्तम स्कन्ध – नवाँ अध्याय..(पोस्ट०४) प्रह्लादजी के द्वारा नृसिंहभगवान्‌ की स्तुति सर्वे ह्य...