बुधवार, 25 दिसंबर 2019

श्रीमद्भागवतमहापुराण नवम स्कन्ध –तेरहवाँ अध्याय..(पोस्ट०१)


॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥



श्रीमद्भागवतमहापुराण

नवम स्कन्ध तेरहवाँ अध्याय..(पोस्ट०१)



राजा निमि के वंश का वर्णन


श्रीशुक उवाच ।

निमिरिक्ष्वाकुतनयो वसिष्ठं अवृतर्त्विजम् ।

आरभ्य सत्रं सोऽप्याह शक्रेण प्राग्वृतोऽस्मि भोः ॥ १ ॥

तं निर्वर्त्यागमिष्यामि तावन्मां प्रतिपालय ।

तूष्णीं आसीद् गृहपतिः सोऽपीन्द्रस्याकरोन् मखम् ॥ २ ॥

निमिश्चलमिदं विद्वान् सत्रमारभतामात्मवान् ।

ऋत्विग्भिः अपरैस्तावत् नागमद्यावता गुरुः ॥ ३ ॥

शिष्यव्यतिक्रमं वीक्ष्य तं निर्वर्त्य गुरुरागतः ।

अशपत् पतताद् देहो निमेः पण्डितमानिनः ॥ ४ ॥

निमिः प्रतिददौ शापं गुरवेऽधर्मवर्तिने ।

तवापि पतताद् देहो लोभाद् धर्ममजानतः ॥ ५ ॥

इत्युत्ससर्ज स्वं देहं निमिरध्यात्मकोविदः ।

मित्रावरुणयोर्जज्ञे उर्वश्यां प्रपितामहः ॥ ६ ॥

गन्धवस्तुषु तद् देहं निधाय मुनिसत्तमाः ।

समाप्ते सत्रयागेऽथ देवान् ऊचुः समागतान् ॥ ७ ॥

राज्ञो जीवतु देहोऽयं प्रसन्नाः प्रभवो यदि ।

तथेत्युक्ते निमिः प्राह मा भून्मे देहबन्धनम् ॥ ८ ॥

यस्य योगं न वाञ्छन्ति वियोगभयकातराः ।

भजन्ति चरणाम्भोजं मुनयो हरिमेधसः ॥ ९ ॥

देहं नावरुरुत्सेऽहं दुःखशोकभयावहम् ।

सर्वत्रास्य यतो मृत्युं मत्स्यानां उदके यथा ॥ १० ॥



देवा ऊचुः ।

विदेह उष्यतां कामं लोचनेषु शरीरिणाम् ।

उन्मेषणनिमेषाभ्यां लक्षितोऽध्यात्मसंस्थितः ॥ ११ ॥

अराजकभयं नॄणां मन्यमाना महर्षयः ।

देहं ममन्थुः स्म निमेः कुमारः समजायत ॥ १२ ॥

जन्मना जनकः सोऽभूद् वैदेहस्तु विदेहजः ।

मिथिलो मथनाज्जातो मिथिला येन निर्मिता ॥ १३॥


श्रीशुकदेवजी कहते हैंपरीक्षित्‌ ! इक्ष्वाकु के पुत्र थे निमि। उन्होंने यज्ञ आरम्भ करके महर्षि वसिष्ठको ऋत्विज् के रूपमें वरण किया। वसिष्ठजी ने कहा कि राजन् ! इन्द्र अपने यज्ञ के लिये मुझे पहले ही वरण कर चुके हैं ॥ १ ॥ उनका यज्ञ पूरा करके मैं तुम्हारे पास आऊँगा। तबतक तुम मेरी प्रतीक्षा करना।यह बात सुनकर राजा निमि चुप हो रहे और वसिष्ठजी इन्द्रका यज्ञ कराने चले गये ॥ २ ॥ विचारवान् निमिने यह सोचकर कि जीवन तो क्षणभङ्गुर है, विलम्ब करना उचित न समझा और यज्ञ प्रारम्भ कर दिया। जबतक गुरु वसिष्ठजी न लौटें, तबतकके लिये उन्होंने दूसरे ऋत्विजोंको वरण कर लिया ॥ ३ ॥ गुरु वसिष्ठजी जब इन्द्रका यज्ञ सम्पन्न करके लौटे, तो उन्होंने देखा कि उनके शिष्य निमि ने तो उनकी बात न मानकर यज्ञ प्रारम्भ कर दिया है। उस समय उन्होंने शाप दिया कि निमिको अपनी विचारशीलता और पाण्डित्यका बड़ा घमंड है, इसलिये इसका शरीरपात हो जाय॥ ४ ॥ निमि की दृष्टिमें गुरु वसिष्ठका यह शाप धर्मके अनुकूल नहीं, प्रतिकूल था। इसलिये उन्होंने भी शाप दिया कि आपने लोभवश अपने धर्मका आदर नहीं किया, इसलिये आपका शरीर भी गिर जाय॥ ५ ॥ यह कहकर आत्मविद्यामें निपुण निमिने अपने शरीर का त्याग कर दिया। परीक्षित्‌ ! इधर हमारे वृद्ध प्रपितामह वसिष्ठजीने भी अपना शरीर त्याग कर मित्रावरुणके द्वारा उर्वशीके गर्भसे जन्म ग्रहण किया ॥ ६ ॥ राजा निमिके यज्ञमें आये हुए श्रेष्ठ मुनियोंने राजाके शरीरको सुगन्धित वस्तुओंमें रख दिया। जब सत्रयागकी समाप्ति हुई और देवतालोग आये, तब उन लोगोंने उनसे प्रार्थना की ॥ ७ ॥ महानुभावो ! आपलोग समर्थ हैं। यदि आप प्रसन्न हैं तो राजा निमिका यह शरीर पुन: जीवित हो उठे।देवताओंने कहा—‘ऐसा ही हो।उस समय निमिने कहा—‘मुझे देहका बन्धन नहीं चाहिये ॥ ८ ॥ विचारशील मुनिजन अपनी बुद्धिको पूर्णरूपसे श्रीभगवान्‌में ही लगा देते हैं और उन्हींके चरणकमलोंका भजन करते हैं। एक- न-एक दिन यह शरीर अवश्य ही छूटेगाइस भयसे भीत होनेके कारण वे इस शरीरका कभी संयोग ही नहीं चाहते; वे तो मुक्त ही होना चाहते हैं ॥ ९ ॥ अत: मैं अब दु:ख, शोक और भयके मूल कारण इस शरीरको धारण करना नहीं चाहता। जैसे जलमें मछलीके लिये सर्वत्र ही मृत्युके अवसर हैं, वैसे ही इस शरीरके लिये भी सब कहीं मृत्यु-ही-मृत्यु है॥ १० ॥
देवताओंने कहा—‘मुनियो ! राजा निमि बिना शरीरके ही प्राणियोंके नेत्रोंमें अपनी इच्छाके अनुसार निवास करें। वे वहाँ रहकर सूक्ष्मशरीरसे भगवान्‌का चिन्तन करते रहें। पलक उठने और गिरनेसे उनके अस्तित्वका पता चलता रहेगा ॥ ११ ॥ इसके बाद महर्षियोंने यह सोचकर कि राजाके न रहनेपर लोगोंमें अराजकता फैल जायगीनिमिके शरीरका मन्थन किया। उस मन्थनसे एक कुमार उत्पन्न हुआ ॥ १२ ॥ जन्म लेनेके कारण उसका नाम हुआ जनक। विदेहसे उत्पन्न होनेके कारण वैदेहऔर मन्थनसे उत्पन्न होनेके कारण उसी बालकका नाम मिथिलहुआ। उसीने मिथिलापुरी बसायी ॥ १३ ॥



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मंगलवार, 24 दिसंबर 2019

श्रीमद्भागवतमहापुराण नवम स्कन्ध –बारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०२)


॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥



श्रीमद्भागवतमहापुराण

नवम स्कन्ध बारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०२)



इक्ष्वाकुवंश के शेष राजाओं का वर्णन

एते हि ईक्ष्वाकुभूपाला अतीताः श्रृण्वनागतान् ।

बृहद्‍बलस्य भविता पुत्रो नाम्ना बृहद्रणः ॥ ९ ॥

ऊरुक्रियः सुतस्तस्य वत्सवृद्धो भविष्यति ।

प्रतिव्योमस्ततो भानुः दिवाको वाहिनीपतिः ॥ १० ॥

सहदेवस्ततो वीरो बृहदश्वोऽथ भानुमान् ।

प्रतीकाश्वो भानुमतः सुप्रतीकोऽथ तत्सुतः ॥ ११ ॥

भविता मरुदेवोऽथ सुनक्षत्रोऽथ पुष्करः ।

तस्यान्तरिक्षः तत्पुत्रः सुतपास्तद् अमित्रजित् ॥ १२ ॥

बृहद्राजस्तु तस्यापि बर्हिस्तस्मात् कृतञ्जयः ।

रणञ्जयस्तस्य सुतः सञ्जयो भविता ततः ॥ १३ ॥

तस्माच्छाक्योऽथ शुद्धोदो लांगलस्तत्सुतः स्मृतः ।

ततः प्रसेनजित् तस्मात् क्षुद्रको भविता ततः ॥ १४ ॥

रणको भविता तस्मात् सुरथस्तनयस्ततः ।

सुमित्रो नाम निष्ठान्त एते बार्हद्‍बलान्वयाः ॥ १५ ॥

इक्ष्वाकूणां अयं वंशः सुमित्रान्तो भविष्यति ।

यतस्तं प्राप्य राजानं संस्थां प्राप्स्यति वै कलौ ॥ १६ ॥


परीक्षित्‌ ! इक्ष्वाकुवंश के इतने नरपति हो चुके हैं। अब आनेवालोंके विषयमें सुनो। बृहद्वलका पुत्र होगा बृहद्रण ॥ ९ ॥ बृहद्रणका उरुक्रिय, उसका वत्सवृद्ध, वत्सवृद्धका प्रतिव्योम, प्रतिव्योमका भानु और भानुका पुत्र होगा सेनापति दिवाक ॥ १० ॥ दिवाक का वीर सहदेव, सहदेवका बृहदश्व, बृहदश्व का भानुमान्, भानुमान् का प्रतीकाश्व और प्रतीकाश्व का पुत्र होगा सुप्रतीक ॥ ११ ॥ सुप्रतीकका मरुदेव, मरुदेवका सुनक्षत्र, सुनक्षत्रका पुष्कर, पुष्करका अन्तरिक्ष, अन्तरिक्षका सुतपा और उसका पुत्र होगा अमित्रजित् ॥ १२ ॥ अमित्रजित्से बृहद्राज, बृहद्राजसे बर्हि, बर्हिसे कृतञ्जय, कृतञ्जयसे रणञ्जय और उससे सञ्जय होगा ॥ १३ ॥ सञ्जयका शाक्य, उसका शुद्धोद और शुद्धोद का लाङ्गल, लाङ्गल का प्रसेनजित् और प्रसेनजित् का पुत्र क्षुद्रक होगा ॥ १४ ॥ क्षुद्रक से रणक, रणक से सुरथ और सुरथ से इस वंशके अन्तिम राजा सुमित्रका जन्म होगा। ये सब बृहद्वल के वंशधर होंगे ॥ १५ ॥ इक्ष्वाकु का यह वंश सुमित्र तक ही रहेगा। क्योंकि सुमित्र के राजा होने पर कलियुग में यह वंश समाप्त हो जायगा ॥ १६ ॥



इति श्रीमद्‍भागवते महापुराणे पारमहंस्यां

संहितायां नवमस्कन्धे द्वादशोऽध्यायः ॥ १२ ॥



हरिः ॐ तत्सत् श्रीकृष्णार्पणमस्तु ॥



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श्रीमद्भागवतमहापुराण नवम स्कन्ध –बारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०१)


॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥



श्रीमद्भागवतमहापुराण

नवम स्कन्ध बारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०१)



इक्ष्वाकुवंश के शेष राजाओं का वर्णन

श्रीशुक उवाच ।

कुशस्य चातिथिस्तस्मात् निषधस्तत्सुतो नभः ।

पुण्डरीकोऽथ तत्पुत्रः क्षेमधन्वाभवत्ततः ॥ १ ॥

देवानीकस्ततोऽनीहः पारियात्रोऽथ तत्सुतः ।

ततो बलस्थलः तस्मात् वज्रनाभोऽर्कसंभवः ॥ २ ॥

खसगणः तत्सुतः तस्माद् विधृतिश्चाभवत्सुतः ।

ततो हिरण्यनाभोऽभूद् योगाचार्यस्तु जैमिनेः ॥ ३ ॥

शिष्यः कौशल्य आध्यात्मं याज्ञवल्क्योऽध्यगाद् यतः ।

योगं महोदयं ऋषिः हृदयग्रन्थि भेदकम् ॥ ४ ॥

पुष्यो हिरण्यनाभस्य ध्रुवसन्धिः ततोऽभवत् ।

सुदर्शनोऽथाग्निवर्णः शीघ्रस्तस्य मरुः सुतः ॥ ५ ॥

सोऽसावास्ते योगसिद्धः कलापग्राममास्थितः ।

कलेरन्ते सूर्यवंशं नष्टं भावयिता पुनः ॥ ६ ॥

तस्मात् प्रसुश्रुतः तस्य सन्धिः तस्याप्यमर्षणः ।

महस्वांन् तत्सुतः तस्माद् विश्वबाहुरजायत ॥ ७ ॥

ततः प्रसेनजित् तस्मात् तक्षको भविता पुनः ।

ततो बृहद्‍बलो यस्तु पित्रा ते समरे हतः ॥ ८ ॥


श्रीशुकदेवजी कहते हैंपरीक्षित्‌ ! कुश का पुत्र हुआ अतिथि, उसका निषध, निषध का नभ, नभ का पुण्डरीक और पुण्डरीक का क्षेमधन्वा ॥ १ ॥ क्षेमधन्वा का देवानीक, देवानीक का अनीह, अनीहका पारियात्र, पारियात्र का बलस्थल और बलस्थल का पुत्र हुआ वज्रनाभ। यह सूर्य का अंश था ॥ २ ॥ वज्रनाभ से खगण, खगण से विधृति और विधृति से हिरण्यनाभ की उत्पत्ति हुई। वह जैमिनि का  शिष्य और योगाचार्य था ॥ ३ ॥ कोसलदेशवासी याज्ञवल्क्य ऋषि ने उसकी  शिष्यता स्वीकार करके उससे अध्यात्मयोगकी शिक्षा ग्रहण की थी। वह योग हृदयकी गाँठ काट देनेवाला तथा परम सिद्धि देनेवाला है ॥ ४ ॥ हिरण्यनाभका पुष्य, पुष्यका ध्रुवसन्धि, ध्रुवसन्धिका सुदर्शन, सुदर्शन का अग्निवर्ण, अग्निवर्ण का शीघ्र और शीघ्र का पुत्र हुआ मरु ॥ ५ ॥ मरु ने योगसाधना से सिद्धि प्राप्त कर ली और वह इस समय भी कलाप नामक ग्राम में रहता है। कलियुगके अन्तमें सूर्यवंशके नष्ट हो जानेपर वह उसे फिरसे चलायेगा ॥ ६ ॥ मरुसे प्रसुश्रुत, उससे सन्धि और सन्धि से अमर्षणका जन्म हुआ। अमर्षणका महस्वान् और महस्वान्का विश्वसाह्व ॥ ७ ॥ विश्वसाह्व का प्रसेनजित्, प्रसेनजित् का तक्षक और तक्षक का पुत्र बृहद्वल हुआ। परीक्षित्‌ ! इसी बृहद्वल को तुम्हारे पिता अभिमन्यु ने युद्धमें मार डाला था ॥ ८ ॥



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सोमवार, 23 दिसंबर 2019

श्रीमद्भागवतमहापुराण नवम स्कन्ध –ग्यारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०६)


॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥



श्रीमद्भागवतमहापुराण

नवम स्कन्ध ग्यारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०६)



भगवान्‌ श्रीराम की शेष लीलाओं का वर्णन


अथ प्रविष्टः स्वगृहं जुष्टं स्वैः पूर्वराजभिः ।

अनन्ताखिलकोषाढ्यं मनर्घ्योरुपरिच्छदम् ॥ ३१ ॥

विद्रुमोदुम्बरद्वारैः वैदूर्य स्तंभपङ्‌क्तिभिः ।

स्थलैर्मारकतैः स्वच्छैः भाजत्स्फटिकभित्तिभिः ॥ ३२ ॥

चित्रस्रग्भिः पट्टिकाभिः वासोमणिगणांशुकैः ।

मुक्ताफलैश्चिदुल्लासैः कान्तकामोपपत्तिभिः ॥ ३३ ॥

धूपदीपैः सुरभिभिः मण्डितं पुष्पमण्डनैः ।

स्त्रीपुम्भिः सुरसङ्‌काशैः जुष्टं भूषणभूषणैः ॥ ३४ ॥

तस्मिन् स भगवान् रामः स्निग्धया प्रिययेष्टया ।

रेमे स्वारामधीराणां ऋषभः सीतया किल ॥ ३५ ॥

बुभुजे च यथाकालं कामान् धर्ममपीडयन् ।

वर्षपूगान् बहून् नृणां अभिध्यातांघ्रिपल्लवः ॥ ३६ ॥


इस प्रकार प्रजाका निरीक्षण करके भगवान्‌ फिर अपने महलोंमें आ जाते । उनके वे महल पूर्ववर्ती राजाओं के द्वारा सेवित थे। उनमें इतने बड़े-बड़े सब प्रकारके खजाने थे, जो कभी समाप्त नहीं होते थे। वे बड़ी-बड़ी बहुमूल्य बहुत-सी सामग्रियोंसे सुसज्जित थे ॥ ३१ ॥ महलोंके द्वार तथा देहलियाँ मूँगेकी बनी हुई थीं। उनमें जो खंभे थे, वे वैदूर्यमणिके थे। मरकतमणिके बड़े सुन्दर-सुन्दर फर्श थे, तथा स्फटिकमणिकी दीवारें चमकती रहती थीं ॥ ३२ ॥ रगं-बिरंगी मालाओं, पताकाओं, मणियोंकी चमक, शुद्ध चेतनके समान उज्ज्वल मोती, सुन्दर-सुन्दर भोग- सामग्री, सुगन्धित धूप-दीप तथा फूलोंके गहनोंसे वे महल खूब सजाये हुए थे। आभूषणोंको भी भूषित करनेवाले देवताओंके समान स्त्री-पुरुष उसकी सेवामें लगे रहते थे ॥ ३३-३४ ॥ परीक्षित्‌ ! भगवान्‌ श्रीरामजी आत्माराम जितेन्द्रिय पुरुषोंके शिरोमणि थे। उसी महल में वे अपनी प्राणप्रिया प्रेममयी पत्नी श्रीसीताजीके साथ विहार करते थे ॥ ३५ ॥ सभी स्त्री-पुरुष जिनके चरणकमलोंका ध्यान करते रहते हैं, वे ही भगवान्‌ श्रीराम बहुत वर्षोंतक धर्मकी मर्यादाका पालन करते हुए समयानुसार भोगोंका उपभोग करते रहे ॥ ३६ ॥



इति श्रीमद्‍भागवते महापुराणे पारमहंस्यां

संहितायां नवमस्कन्धे एकादशोऽध्यायः ॥ ११ ॥



हरिः ॐ तत्सत् श्रीकृष्णार्पणमस्तु ॥



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श्रीमद्भागवतमहापुराण नवम स्कन्ध –ग्यारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०५)


॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥



श्रीमद्भागवतमहापुराण

नवम स्कन्ध ग्यारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०५)



भगवान्‌ श्रीराम की शेष लीलाओं का वर्णन


श्रीराजोवाच ।

कथं स भगवान् रामो भ्रातॄन् वा स्वयमात्मनः ।

तस्मिन् वा तेऽन्ववर्तन्त प्रजाः पौराश्च ईश्वरे ॥ २४ ॥



श्रीशुक उवाच ।

अथादिशद् दिग्विजये भ्रातॄन् त्रिभुवनेश्वरः ।

आत्मानं दर्शयन् स्वानां पुरीमैक्षत सानुगः ॥ २५ ॥

आसिक्तमार्गां गन्धोदैः करिणां मदशीकरैः ।

स्वामिनं प्राप्तमालोक्य मत्तां वा सुतरामिव ॥ २६ ॥

प्रासादगोपुरसभा चैत्यदेवगृहादिषु ।

विन्यस्तहेमकलशैः पताकाभिश्च मण्डिताम् ॥ २७ ॥

पूगैः सवृन्तै रम्भाभिः पट्टिकाभिः सुवाससाम् ।

आदर्शैरंशुकैः स्रग्भिः कृतकौतुकतोरणाम् ॥ २८ ॥

तं उपेयुस्तत्र तत्र पौरा अर्हणपाणयः ।

आशिषो युयुजुर्देव पाहीमां प्राक् त्वयोद्‌धृताम् ॥ २९ ॥

ततः प्रजा वीक्ष्य पतिं चिरागतं

दिदृक्षयोत्सृष्टगृहाः स्त्रियो नराः ।

आरुह्य हर्म्याण्यरविन्दलोचनं

अतृप्तनेत्राः कुसुमैरवाकिरन् ॥ ३० ॥


राजा परीक्षित्‌ने पूछाभगवान्‌ श्रीराम स्वयं अपने भाइयोंके साथ किस प्रकारका व्यवहार करते थे ? तथा भरत आदि भाई, प्रजाजन और अयोध्यावासी भगवान्‌ श्रीरामके प्रति कैसा बर्ताव करते थे ? ॥ २४ ॥
श्रीशुकदेवजी कहते हैंत्रिभुवनपति महाराज श्रीराम ने राजसिंहासन स्वीकार करने के बाद अपने भाइयों को दिग्विजय की आज्ञा दी और स्वयं अपने निजजनों को दर्शन देते हुए अपने अनुचरोंके साथ वे पुरी की देख-रेख करने लगे ॥ २५ ॥ उस समय अयोध्यापुरी के मार्ग सुगन्धित जल और हाथियों के मदकणों से सिंचे रहते। ऐसा जान पड़ता, मानो यह नगरी अपने स्वामी भगवान्‌ श्रीराम को देखकर अत्यन्त मतवाली हो रही है ॥ २६ ॥ उसके महल,फाटक,सभाभवन, विहार और देवालय आदि में सुवर्ण के कलश रखे हुऐ थे और स्थान-स्थानपर पताकाएँ फहरा रही थीं ॥ २७ ॥ वह डंठलसमेत सुपारी, केले के खंभे और सुन्दर वस्त्रों के पट्टों से सजायी हुई थी। दर्पण, वस्त्र और पुष्पमालाओंसे तथा माङ्गलिक चित्रकारियों और बंदनवारों से सारी नगरी जगमगा रही थी ॥ २८ ॥ नगरवासी अपने हाथोंमें तरह-तरहकी भेंटें लेकर भगवान्‌ के पास आते और उनसे प्रार्थना करते कि देव ! पहले आपने ही वराहरूप से पृथ्वीका उद्धार किया था; अब आप ही इसका पालन कीजिये ॥ २९ ॥ परीक्षित्‌ ! उस समय जब प्रजा को मालूम होता कि बहुत दिनोंके बाद भगवान्‌ श्रीराम जी इधर पधारे हैं, तब सभी स्त्री-पुरुष उनके दर्शन की लालसा से घर-द्वार छोडक़र दौड़ पड़ते। वे ऊँची-ऊँची अटारियों पर चढ़ जाते और अतृप्त नेत्रोंसे कमलनयन भगवान्‌को देखते हुए उनपर पुष्पोंकी वर्षा करते ॥ ३० ॥



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रविवार, 22 दिसंबर 2019

श्रीमद्भागवतमहापुराण नवम स्कन्ध –ग्यारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०४)


॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥



श्रीमद्भागवतमहापुराण

नवम स्कन्ध ग्यारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०४)



भगवान्‌ श्रीराम की शेष लीलाओं का वर्णन


यस्यामलं नृपसस्सु यशोऽधुनापि ।

गायन्त्यघघ्नमृषयो दिगिभेन्द्रपट्टम् ॥

तं नाकपालवसुपालकिरीटजुष्ट ।

पादाम्बुजं रघुपतिं शरणं प्रपद्ये ॥ २१ ॥

स यैः स्पृष्टोऽभिदृष्टो वा संविष्टोऽनुगतोऽपि वा ।

कोसलास्ते ययुः स्थानं यत्र गच्छन्ति योगिनः ॥ २२ ॥

पुरुषो रामचरितं श्रवणैरुपधारयन् ।

आनृशंस्यपरो राजन् कर्मबन्धैः विमुच्यते ॥ २३ ॥


भगवान्‌ श्रीराम का निर्मल यश समस्त पापों को नष्ट कर देनेवाला है। वह इतना फैल गया है कि दिग्गजों का श्यामल शरीर भी उसकी उज्ज्वलता से चमक उठता है। आज भी बड़े-बड़े ऋषि- महर्षि राजाओं की सभामें उसका गान करते रहते हैं। स्वर्गके देवता और पृथ्वी के नरपति अपने कमनीय किरीटों से उनके चरणकमलों की सेवा करते रहते हैं। मैं उन्हीं रघुवंशशिरोमणि भगवान्‌ श्रीरामचन्द्र की शरण ग्रहण करता हूँ ॥ २१ ॥ जिन्होंने भगवान्‌ श्रीरामका दर्शन और स्पर्श किया, उनका सहवास अथवा अनुगमन कियावे सब-के-सब तथा कोसलदेश के निवासी भी उसी लोकमें गये, जहाँ बड़े-बड़े योगी योगसाधनाके द्वारा जाते हैं ॥ २२ ॥ जो पुरुष अपने कानोंसे भगवान्‌ श्रीरामका चरित्र सुनता हैउसे सरलता, कोमलता आदि गुणोंकी प्राप्ति होती है। परीक्षित्‌ ! केवल इतना ही नहीं, वह समस्त कर्म-बन्धनोंसे मुक्त हो जाता है ॥ २३ ॥



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श्रीमद्भागवतमहापुराण नवम स्कन्ध –ग्यारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०३)


॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥



श्रीमद्भागवतमहापुराण

नवम स्कन्ध ग्यारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०३)



भगवान्‌ श्रीराम की शेष लीलाओं का वर्णन


मुनौ निक्षिप्य तनयौ सीता भर्त्रा विवासिता ।

ध्यायन्ती रामचरणौ विवरं प्रविवेश ह ॥ १५ ॥

तर् श्रुत्वा भगवान् रामो रुन्धन्नपि धिया शुचः ।

स्मरंस्तस्या गुणान् तान् तान् नाशक्नोत् रोद्धुमीश्वरः ॥ १६ ॥

स्त्रीपुंप्रसङ्‌ग एतादृक् सर्वत्र त्रासमावहः ।

अपीश्वराणां किमुत ग्राम्यस्य गृहचेतसः ॥ १७ ॥

तत ऊर्ध्वं ब्रह्मचर्यं धारयन् अजुहोत् प्रभुः ।

त्रयोदशाब्दसाहस्रं अग्निहोत्रं अखण्डितम् ॥ १८ ॥

स्मरतां हृदि विन्यस्य विद्धं दण्डककण्टकैः ।

स्वपादपल्लवं राम आत्मज्योतिरगात् ततः ॥ १९ ॥

नेदं यशो रघुपतेः सुरयाच्ञयात्त ।

लीलातनोरधिकसाम्यविमुक्तधाम्नः ॥

रक्षोवधो जलधिबन्धनमस्त्र पूगैः ।

किं तस्य शत्रुहनने कपयः सहायाः ॥ २० ॥



भगवान्‌ श्रीराम के द्वारा निर्वासित सीताजी ने अपने पुत्रों को वाल्मीकि जी के हाथों में सौंप दिया और भगवान्‌ श्रीराम के चरणकमलों का ध्यान करती हुई वे पृथ्वीदेवी के लोकमें चली गयीं ॥ १५ ॥ यह समाचार सुनकर भगवान्‌ श्रीरामने अपने शोकावेश को बुद्धिके द्वारा रोकना चाहा, परंतु परम समर्थ होनेपर भी वे उसे रोक न सके। क्योंकि उन्हें जानकी जी के पवित्र गुण बार-बार स्मरण हो आया करते थे ॥ १६ ॥ परीक्षित्‌ ! यह स्त्री और पुरुष का सम्बन्ध सब कहीं इसी प्रकार दु:खका कारण है। यह बात बड़े-बड़े समर्थ लोगों के विषय में भी ऐसी ही है, फिर गृहासक्त विषयी पुरुष के सम्बन्धमें तो कहना ही क्या है ॥ १७ ॥ इसके बाद भगवान्‌ श्रीरामने ब्रह्मचर्य धारण करके तेरह हजार वर्षतक अखण्डरूपसे अग्निहोत्र किया ॥ १८ ॥ तदनन्तर अपना स्मरण करनेवाले भक्तोंके हृदयमें अपने उन चरणकमलोंको स्थापित करके, जो दण्डकवनके काँटोंसे बिंध गये थे, अपने स्वयंप्रकाश परम ज्योतिर्मय धाम में चले गये ॥ १९ ॥
परीक्षित्‌ ! भगवान्‌ के समान प्रतापशाली और कोई नहीं है, फिर उनसे बढक़र तो हो ही कैसे सकता है। उन्होंने देवताओंकी प्रार्थनासे ही यह लीला-विग्रह धारण किया था। ऐसी स्थितिमें रघुवंशशिरोमणि भगवान्‌ श्रीरामके लिये यह कोई बड़े गौरवकी बात नहीं है कि उन्होंने अस्त्र- शस्त्रोंसे राक्षसोंको मार डाला या समुद्रपर पुल बाँध दिया। भला, उन्हें शत्रुओंको मारनेके लिये बंदरोंकी सहायताकी भी आवश्यकता थी क्या ? यह सब उनकी लीला ही है ॥ २० ॥



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शनिवार, 21 दिसंबर 2019

श्रीमद्भागवतमहापुराण नवम स्कन्ध –बारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०२)


॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥



श्रीमद्भागवतमहापुराण

नवम स्कन्ध बारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०२)



इक्ष्वाकुवंश के शेष राजाओं का वर्णन

एते हि ईक्ष्वाकुभूपाला अतीताः श्रृण्वनागतान् ।

बृहद्‍बलस्य भविता पुत्रो नाम्ना बृहद्रणः ॥ ९ ॥

ऊरुक्रियः सुतस्तस्य वत्सवृद्धो भविष्यति ।

प्रतिव्योमस्ततो भानुः दिवाको वाहिनीपतिः ॥ १० ॥

सहदेवस्ततो वीरो बृहदश्वोऽथ भानुमान् ।

प्रतीकाश्वो भानुमतः सुप्रतीकोऽथ तत्सुतः ॥ ११ ॥

भविता मरुदेवोऽथ सुनक्षत्रोऽथ पुष्करः ।

तस्यान्तरिक्षः तत्पुत्रः सुतपास्तद् अमित्रजित् ॥ १२ ॥

बृहद्राजस्तु तस्यापि बर्हिस्तस्मात् कृतञ्जयः ।

रणञ्जयस्तस्य सुतः सञ्जयो भविता ततः ॥ १३ ॥

तस्माच्छाक्योऽथ शुद्धोदो लांगलस्तत्सुतः स्मृतः ।

ततः प्रसेनजित् तस्मात् क्षुद्रको भविता ततः ॥ १४ ॥

रणको भविता तस्मात् सुरथस्तनयस्ततः ।

सुमित्रो नाम निष्ठान्त एते बार्हद्‍बलान्वयाः ॥ १५ ॥

इक्ष्वाकूणां अयं वंशः सुमित्रान्तो भविष्यति ।

यतस्तं प्राप्य राजानं संस्थां प्राप्स्यति वै कलौ ॥ १६ ॥


परीक्षित्‌ ! इक्ष्वाकुवंश के इतने नरपति हो चुके हैं। अब आनेवालोंके विषयमें सुनो। बृहद्वलका पुत्र होगा बृहद्रण ॥ ९ ॥ बृहद्रणका उरुक्रिय, उसका वत्सवृद्ध, वत्सवृद्धका प्रतिव्योम, प्रतिव्योमका भानु और भानुका पुत्र होगा सेनापति दिवाक ॥ १० ॥ दिवाक का वीर सहदेव, सहदेवका बृहदश्व, बृहदश्व का भानुमान्, भानुमान् का प्रतीकाश्व और प्रतीकाश्व का पुत्र होगा सुप्रतीक ॥ ११ ॥ सुप्रतीकका मरुदेव, मरुदेवका सुनक्षत्र, सुनक्षत्रका पुष्कर, पुष्करका अन्तरिक्ष, अन्तरिक्षका सुतपा और उसका पुत्र होगा अमित्रजित् ॥ १२ ॥ अमित्रजित्से बृहद्राज, बृहद्राजसे बर्हि, बर्हिसे कृतञ्जय, कृतञ्जयसे रणञ्जय और उससे सञ्जय होगा ॥ १३ ॥ सञ्जयका शाक्य, उसका शुद्धोद और शुद्धोद का लाङ्गल, लाङ्गल का प्रसेनजित् और प्रसेनजित् का पुत्र क्षुद्रक होगा ॥ १४ ॥ क्षुद्रक से रणक, रणक से सुरथ और सुरथ से इस वंशके अन्तिम राजा सुमित्रका जन्म होगा। ये सब बृहद्वल के वंशधर होंगे ॥ १५ ॥ इक्ष्वाकु का यह वंश सुमित्र तक ही रहेगा। क्योंकि सुमित्र के राजा होने पर कलियुग में यह वंश समाप्त हो जायगा ॥ १६ ॥



इति श्रीमद्‍भागवते महापुराणे पारमहंस्यां

संहितायां नवमस्कन्धे द्वादशोऽध्यायः ॥ १२ ॥



हरिः ॐ तत्सत् श्रीकृष्णार्पणमस्तु ॥



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गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से




श्रीमद्भागवतमहापुराण नवम स्कन्ध –ग्यारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०२)


॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥



श्रीमद्भागवतमहापुराण

नवम स्कन्ध ग्यारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०२)



भगवान्‌ श्रीराम की शेष लीलाओं का वर्णन


कदाचित् लोकजिज्ञासुः गूढो रात्र्यामलक्षितः ।

चरन् वाचोऽश्रृणोद् रामो भार्यां उद्दिश्य कस्यचित् ॥ ८ ॥

नाहं बिभर्मि त्वां दुष्टां असतीं परवेश्मगाम् ।

स्त्रैणो हि बिभृयात् सीतां रामो नाहं भजे पुनः ॥ ९ ॥

इति लोकाद् बहुमुखाद् दुराराध्यादसंविदः ।

पत्या भीतेन सा त्यक्ता प्राप्ता प्राचेतसाश्रमम् ॥ १० ॥

अन्तर्वत्‍न्यागते काले यमौ सा सुषुवे सुतौ ।

कुशो लव इति ख्यातौ तयोश्चक्रे क्रिया मुनिः ॥ ॥

अङ्‌गदश्चित्रकेतुश्च लक्ष्मणस्यात्मजौ स्मृतौ ।

तक्षः पुष्कल इत्यास्तां भरतस्य महीपते ॥ १२ ॥

सुबाहुः श्रुतसेनश्च शत्रुघ्नस्य बभूवतुः ।

गन्धर्वान् कोटिशो जघ्ने भरतो विजये दिशाम् ॥ १३ ॥

तदीयं धनमानीय सर्वं राज्ञे न्यवेदयत् ।

शत्रुघ्नश्च मधोः पुत्रं लवणं नाम राक्षसम् ।

हत्वा मधुवने चक्रे मथुरां नाम वै पुरीम् ॥ १४ ॥


परीक्षित्‌ ! एक बार अपनी प्रजाकी स्थिति जानने के लिये भगवान्‌ श्रीराम जी रात के समय छिपकर बिना किसी को बतलाये घूम रहे थे। उस समय उन्होंने किसी की यह बात सुनी। वह अपनी पत्नीसे कह रहा था ॥ ८ ॥ अरी ! तू दुष्ट और कुलटा है। तू पराये घरमें रह आयी है। स्त्री-लोभी राम भले ही सीताको रख लें, परंतु मैं तुझे फिर नहीं रख सकता॥ ९ ॥ सचमुच सब लोगोंको प्रसन्न रखना टेढ़ी खीर है। क्योंकि मूर्खों की तो कमी नहीं है। जब भगवान्‌ श्रीराम ने बहुतोंके मुँहसे ऐसी बात सुनी, तो वे लोकापवाद से कुछ भयभीत-से हो गये। उन्होंने श्रीसीताजी का परित्याग कर दिया और वे वाल्मीकिमुनि के आश्रममें रहने लगीं ॥ १० ॥ सीताजी उस समय गर्भवती थीं। समय आनेपर उन्होंने एक साथ ही दो पुत्र उत्पन्न किये। उनके नाम हुएकुश और लव। वाल्मीकि मुनि ने उनके जातकर्मादि संस्कार किये ॥ ११ ॥ लक्ष्मणजी के दो पुत्र हुएअंगद और चित्रकेतु। परीक्षित्‌ ! इसी प्रकार भरतजीके भी दो ही पुत्र थेतक्ष और पुष्कल ॥ १२ ॥ तथा शत्रुघ्न के भी दो पुत्र हुएसुबाहु और श्रुतसेन। भरतजी ने दिग्विजय में करोड़ों गन्धर्वों का संहार किया ॥ १३ ॥ उन्होंने उनका सब धन लाकर अपने बड़े भाई भगवान्‌ श्रीरामकी सेवामें निवेदन किया। शत्रुघ्नजी ने मधुवनमें मधु के पुत्र लवण नामक राक्षसको मारकर वहाँ मथुरा नामकी पुरी बसायी ॥ १४ ॥



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श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - नवाँ अध्याय..(पोस्ट०४)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ श्रीमद्भागवतमहापुराण  सप्तम स्कन्ध – नवाँ अध्याय..(पोस्ट०४) प्रह्लादजी के द्वारा नृसिंहभगवान्‌ की स्तुति सर्वे ह्य...