रविवार, 29 दिसंबर 2019

श्रीमद्भागवतमहापुराण नवम स्कन्ध –पंद्रहवाँ अध्याय..(पोस्ट०१)


॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥



श्रीमद्भागवतमहापुराण

नवम स्कन्ध पंद्रहवाँ अध्याय..(पोस्ट०१)



ऋचीक, जमदग्नि और परशुरामजी का चरित्र


श्रीशुक उवाच ।

ऐलस्य च उर्वशीगर्भात् षडासन्नात्मजा नृप ।

आयुः श्रुतायुः सत्यायू रयोऽथ विजयो जयः ॥ १ ॥

श्रुतायोर्वसुमान्पुत्रः सत्यायोश्च श्रुतञ्जयः ।

रयस्य सुत एकश्च जयस्य तनयोऽमितः ॥ २ ॥

भीमस्तु विजयस्याथ काञ्चनो होत्रकस्ततः ।

तस्य जह्नुः सुतो गंगां गण्डूषीकृत्य योऽपिबत् ।

जह्नोस्तु पूरुस्तस्याथ बलाकश्चात्मजोऽजकः ॥ ३ ॥

ततः कुशः कुशस्यापि कुशाम्बुस्तनयो वसुः ।

कुशनाभश्च चत्वारो गाधिरासीत् कुशाम्बुजः ॥ ४ ॥


श्रीशुकदेव जी कहते हैंपरीक्षित्‌ ! उर्वशी के गर्भ से पुरूरवा के छ: पुत्र हुएआयु, श्रुतायु, सत्यायु, रय, विजय और जय ॥ १ ॥ श्रुतायु का पुत्र था वसुमान्, सत्यायु का श्रुतञ्जय, रयका एक और जयका अमित ॥ २ ॥ विजयका भीम, भीमका काञ्चन, काञ्चनका होत्र और होत्रका पुत्र था जह्नु। ये जह्नु वही थे, जो गङ्गाजी को अपनी अञ्जलि में लेकर पी गये थे। जह्नु का पुत्र था पूरु, पूरु का बलाक और बलाक का अजक ॥ ३ ॥ अजक का कुश था। कुश के चार पुत्र थेकुशाम्बु, तनय, वसु और कुशनाभ। इनमें से कुशाम्बु के पुत्र गाधि हुए ॥ ४ ॥



शेष आगामी पोस्ट में --

गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


शनिवार, 28 दिसंबर 2019

श्रीमद्भागवतमहापुराण नवम स्कन्ध –चौदहवाँ अध्याय..(पोस्ट०६)


॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥



श्रीमद्भागवतमहापुराण

नवम स्कन्ध चौदहवाँ अध्याय..(पोस्ट०६)



चन्द्रवंश का वर्णन


अन्तर्वत्‍नीमुपालक्ष्य देवीं स प्रययौ पुरीम् ।

पुनस्तत्र गतोऽब्दान्ते उर्वशीं वीरमातरम् ॥ ४० ॥

उपलभ्य मुदा युक्तः समुवास तया निशाम् ।

अथैनमुर्वशी प्राह कृपणं विरहातुरम् ॥ ४१ ॥

गन्धर्वान् उपधावेमान् तुभ्यं दास्यन्ति मामिति ।

तस्य संस्तुवतस्तुष्टा अग्निस्थालीं ददुर्नृप ।

उर्वशीं मन्यमानस्तां सोऽबुध्यत चरन् वने ॥ ४२ ॥

स्थालीं न्यस्य वने गत्वा गृहानाध्यायतो निशि ।

त्रेतायां सम्प्रवृत्तायां मनसि त्रय्यवर्तत ॥ ४३ ॥

स्थालीस्थानं गतोऽश्वत्थं शमीगर्भं विलक्ष्य सः ।

तेन द्वे अरणी कृत्वा उर्वशीलोककाम्यया ॥ ४४ ॥

उर्वशीं मन्त्रतो ध्यायन् अधरारणिमुत्तराम् ।

आत्मानं उभयोर्मध्ये यत्तत् प्रजननं प्रभुः ॥ ४५ ॥

तस्य निर्मन्थनात् जातो जातवेदा विभावसुः ।

त्रय्या स विद्यया राज्ञा पुत्रत्वे कल्पितस्त्रिवृत् ॥ ४६ ॥

तेनायजत यज्ञेशं भगवन्तं अधोक्षजम् ।

उर्वशीलोकमन्विच्छन् सर्वदेवमयं हरिम् ॥ ४७ ॥

एक एव पुरा वेदः प्रणवः सर्ववाङ्‌मयः ।

देवो नारायणो नान्य एकोऽग्निर्वर्ण एव च ॥ ४८ ॥

पुरूरवस एवासीत् त्वयी त्रेतामुखे नृप ।

अग्निना प्रजया राजा लोकं गान्धर्वमेयिवान् ॥ ४९ ॥


राजा पुरूरवाने देखा कि उर्वशी गर्भवती है, इसलिये वे अपनी राजधानीमें लौट आये। एक वर्षके बाद फिर वहाँ गये। तबतक उर्वशी एक वीर पुत्रकी माता हो चुकी थी ॥ ४० ॥ उर्वशीके मिलनेसे पुरूरवाको बड़ा सुख मिला और वे एक रात उसीके साथ रहे। प्रात:काल जब वे विदा होने लगे, तब विरहके दु:खसे वे अत्यन्त दीन हो गये। उर्वशीने उनसे कहा॥ ४१ ॥ तुम इन गन्धर्वोंकी स्तुति करो, ये चाहें तो तुम्हें मुझे दे सकते हैं। तब राजा पुरूरवाने गन्धर्वोंकी स्तुति की। परीक्षित्‌ ! राजा पुरूरवाकी स्तुतिसे प्रसन्न होकर गन्धर्वोंने उन्हें एक अग्निस्थाली (अग्निस्थापन करनेका पात्र) दी। राजाने समझा यही उर्वशी है, इसलिये उसको हृदयसे लगाकर वे एक वनसे दूसरे वनमें घूमते रहे ॥ ४२ ॥ जब उन्हें होश हुआ, तब वे स्थालीको वनमें छोडक़र अपने महलमें लौट आये एवं रात के समय उर्वशी का ध्यान करने रहे। इस प्रकार जब त्रेतायुगका प्रारम्भ हुआ, तब उनके हृदयमें तीनों वेद प्रकट हुए ॥ ४३ ॥ फिर वे उस स्थानपर गये, जहाँ उन्होंने वह अग्निस्थाली छोड़ी थी। अब उस स्थानपर शमीवृक्षके गर्भमें एक पीपलका वृक्ष उग आया था, उसे देखकर उन्होंने उससे दो अरणियाँ (मन्थनकाष्ठ) बनायीं। फिर उन्होंने उर्वशीलोककी कामनासे नीचेकी अरणिको उर्वशी, ऊपरकी अरणिको पुरूरवा और बीचके काष्ठको पुत्ररूपसे चिन्तन करते हुए अग्नि प्रज्वलित करनेवाले मन्त्रोंसे मन्थन किया ॥ ४४-४५ ॥ उनके मन्थनसे जातवेदानामका अग्नि प्रकट हुआ। राजा पुरूरवाने अग्निदेवता को त्रयीविद्याके द्वारा आहवनीय, गाहर्पत्य और दक्षिणाग्निइन तीन भागोंमें विभक्त करके पुत्ररूपसे स्वीकार कर लिया ॥ ४६ ॥ फिर उर्वशीलोककी इच्छासे पुरूरवाने उन तीनों अग्नियोंद्वारा सर्वदेवस्वरूप इन्द्रियातीत यज्ञपति भगवान्‌ श्रीहरिका यजन किया ॥ ४७ ॥
परीक्षित्‌ ! त्रेताके पूर्व सत्ययुगमें एकमात्र प्रणव (ॐ कार) ही वेद था। सारे वेद-शास्त्र उसीके अन्तर्भूत थे। देवता थे एकमात्र नारायण; और कोई न था। अग्नि भी तीन नहीं, केवल एक था और वर्ण भी केवल एक हंसही था ॥ ४८ ॥ परीक्षित्‌ ! त्रेताके प्रारम्भमें पुरूरवासे ही वेदत्रयी और अग्नित्रयी का आविर्भाव हुआ। राजा पुरूरवाने अग्नि को सन्तानरूपसे स्वीकार करके गन्धर्वलोक की प्राप्ति की ॥ ४९ ॥



इति श्रीमद्‍भागवते महापुराणे पारमहंस्यां

संहितायां नवमस्कन्धे चतुर्दशोऽध्यायः ॥ १४ ॥



हरिः ॐ तत्सत् श्रीकृष्णार्पणमस्तु ॥



शेष आगामी पोस्ट में --

गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से




श्रीमद्भागवतमहापुराण नवम स्कन्ध –चौदहवाँ अध्याय..(पोस्ट०५)


॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥



श्रीमद्भागवतमहापुराण

नवम स्कन्ध चौदहवाँ अध्याय..(पोस्ट०५)



चन्द्रवंश का वर्णन


तच्चित्तो विह्वलः शोचन् बभ्रामोन्मत्तवन् महीम् ॥ ३२ ॥

स तां वीक्ष्य कुरुक्षेत्रे सरस्वत्यां च तत्सखीः ।

पञ्च प्रहृष्टवदनाः प्राह सूक्तं पुरूरवाः ॥ ३३ ॥

अहो जाये तिष्ठ तिष्ठ घोरे न त्यक्तुमर्हसि ।

मां त्वमद्याप्यनिर्वृत्य वचांसि कृणवावहै ॥ ३४ ॥

सुदेहोऽयं पतत्यत्र देवि दूरं हृतस्त्वया ।

खादन्त्येनं वृका गृध्राः त्वत्प्रसादस्य नास्पदम् ॥ ३५ ॥



उर्वश्युवाच ।

मा मृथाः पुरुषोऽसि त्वं मा स्म त्वाद्युर्वृका इमे ।

क्वापि सख्यं न वै स्त्रीणां वृकाणां हृदयं यथा ॥ ३६ ॥

स्त्रियो ह्यकरुणाः क्रूरा दुर्मर्षाः प्रियसाहसाः ।

घ्नन्त्यल्पार्थेऽपि विश्रब्धं पतिं भ्रातरमप्युत ॥ ३७ ॥

विधायालीकविश्रम्भं अज्ञेषु त्यक्तसौहृदाः ।

नवं नवमभीप्सन्त्यः पुंश्चल्यः स्वैरवृत्तयः ॥ ३८ ॥

संवत्सरान्ते हि भवान् एकरात्रं मयेश्वरः ।

वस्यत्यपत्यानि च ते भविष्यन्त्यपराणि भोः ॥ ३९ ॥


परीक्षित्‌ ! राजा पुरूरवा ने जब अपने शयनागार में अपनी प्रियतमा उर्वशी को नहीं देखा तो वे अनमने हो गये। उनका चित्त उर्वशीमें ही बसा हुआ था। वे उसके लिये शोकसे विह्वल हो गये और उन्मत्तकी भाँति पृथ्वी में इधर-उधर भटकने लगे ॥ ३२ ॥ एक दिन कुरुक्षेत्र में सरस्वती नदीके तटपर उन्होंने उर्वशी और उसकी पाँच प्रसन्नमुखी सखियोंको देखा और बड़ी मीठी वाणीसे कहा॥ ३३ ॥ प्रिये ! तनिक ठहर जाओ। एक बार मेरी बात मान लो। निष्ठुरे ! अब आज तो मुझे सुखी किये बिना मत जाओ। क्षणभर ठहरो; आओ हम दोनों कुछ बातें तो कर लें ॥ ३४ ॥ देवि ! अब इस शरीरपर तुम्हारा कृपा-प्रसाद नहीं रहा, इसीसे तुमने इसे दूर फेंक दिया है। अत: मेरा यह सुन्दर शरीर अभी ढेर हुआ जाता है और तुम्हारे देखते-देखते इसे भेडिय़े और गीध खा जायँगे॥ ३५ ॥
उर्वशीने कहाराजन् ! तुम पुरुष हो। इस प्रकार मत मरो। देखो, सचमुच ये भेडिय़े तुम्हें खा न जायँ ! स्त्रियोंकी किसीके साथ मित्रता नहीं हुआ करती। स्त्रियोंका हृदय और भेडिय़ोंका हृदय बिलकुल एक-जैसा होता है ॥ ३६ ॥ स्त्रियाँ निर्दय होती हैं। क्रूरता तो उनमें स्वाभाविक ही रहती है। तनिक-सी बातमें चिढ़ जाती हैं और अपने सुखके लिये बड़े-बड़े साहसके काम कर बैठती हैं, थोड़े-से स्वार्थके लिये विश्वास दिलाकर अपने पति और भाईतकको मार डालती हैं ॥ ३७ ॥ इनके हृदयमें सौहार्द तो है ही नहीं। भोले-भाले लोगोंको झूठ-मूठका विश्वास दिलाकर फाँस लेती हैं और नये-नये पुरुषकी चाहसे कुलटा और स्वच्छन्दचारिणी बन जाती हैं ॥ ३८ ॥ तो फिर तुम धीरज धरो। तुम राजराजेश्वर हो। घबराओ मत। प्रति एक वर्षके बाद एक रात तुम मेरे साथ रहोगे। तब तुम्हारे और भी सन्तानें होंगी ॥ ३९ ॥



शेष आगामी पोस्ट में --

गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से




शुक्रवार, 27 दिसंबर 2019

श्रीमद्भागवतमहापुराण नवम स्कन्ध –चौदहवाँ अध्याय..(पोस्ट०४)


॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥



श्रीमद्भागवतमहापुराण

नवम स्कन्ध चौदहवाँ अध्याय..(पोस्ट०४)



चन्द्रवंश का वर्णन


तया स पुरुषश्रेष्ठो रमयन्त्या यथार्हतः ।

रेमे सुरविहारेषु कामं चैत्ररथादिषु ॥ २४ ॥

रममाणस्तया देव्या पद्मकिञ्जल्क गन्धया ।

तन्मुखामोदमुषितो मुमुदेऽहर्गणान् बहून् ॥ २५ ॥

अपश्यन् उर्वशीं इन्द्रो गन्धर्वान् समचोदयत् ।

उर्वशीरहितं मह्यं आस्थानं नातिशोभते ॥ २६ ॥

ते उपेत्य महारात्रे तमसि प्रत्युपस्थिते ।

उर्वश्या उरणौ जह्रुः न्यस्तौ राजनि जायया ॥ २७ ॥

निशम्याक्रन्दितं देवी पुत्रयोः नीयमानयोः ।

हतास्म्यहं कुनाथेन नपुंसा वीरमानिना ॥ २८ ॥

यद् विश्रम्भादहं नष्टा हृतापत्या च दस्युभिः ।

यः शेते निशि संत्रस्तो यथा नारी दिवा पुमान् ॥ २९ ॥

इति वाक् सायकैर्बिद्धः प्रतोत्त्रैरिव कुञ्जरः ।

निशि निस्त्रिंशमादाय विवस्त्रोऽभ्यद्रवद् रुषा ॥ ३० ॥

ते विसृज्योरणौ तत्र व्यद्योतन्त स्म विद्युतः ।

आदाय मेषावायान्तं नग्नमैक्षत सा पतिम् ॥ ३१ ॥


परीक्षित्‌ ! तब उर्वशी कामशास्त्रोक्त पद्धति से पुरुष-श्रेष्ठ पुरूरवा के साथ विहार करने लगी। वे भी देवताओं की विहारस्थली चैत्ररथ, नन्दनवन आदि उपवनोंमें उसके साथ स्वच्छन्द विहार करने लगे ॥ २४ ॥ देवी उर्वशीके शरीर से कमलकेसरकी-सी सुगन्ध निकला करती थी। उसके साथ राजा पुरूरवा ने बहुत वर्षोंतक आनन्द-विहार किया। वे उसके मुखकी सुरभि से अपनी सुध-बुध खो बैठते थे ॥ २५ ॥ इधर जब इन्द्रने उर्वशीको नहीं देखा, तब उन्होंने गन्धर्वोंको उसे लानेके लिये भेजा और कहा—‘उर्वशीके बिना मुझे यह स्वर्ग फीका जान पड़ता है॥ २६ ॥ वे गन्धर्व आधी रातके समय घोर अन्धकारमें वहाँ गये और उर्वशीके दोनों भेड़ोंको, जिन्हें उसने राजाके पास धरोहर रखा था, चुराकर चलते बने ॥ २७ ॥ उर्वशीने जब गन्धर्वोंके द्वारा ले जाये जाते हुए अपने पुत्रके समान प्यारे भेड़ोंकी बें-बेंसुनी, तब वह कह उठी कि अरे, इस कायरको अपना स्वामी बनाकर मैं तो मारी गयी। यह नपुंसक अपनेको बड़ा वीर मानता है। यह मेरे भेड़ोंको भी न बचा सका ॥ २८ ॥ इसीपर विश्वास करनेके कारण लुटेरे मेरे बच्चोंको लूटकर लिये जा रहे हैं। मैं तो मर गयी। देखो तो सही, यह दिनमें तो मर्द बनता है और रातमें स्त्रियोंकी तरह डरकर सोया रहता है॥ २९ ॥ परीक्षित्‌ ! जैसे कोई हाथीको अंकुशसे बेध डाले, वैसे ही उर्वशीने अपने वचन-बाणोंसे राजाको बींध दिया। राजा पुरूरवाको बड़ा क्रोध आया और हाथमें तलवार लेकर वस्त्रहीन अवस्थामें ही वे उस ओर दौड़ पड़े ॥ ३० ॥ गन्धर्वोंने उनके झपटते ही भेड़ोंको तो वहीं छोड़ दिया और स्वयं बिजलीकी तरह चमकने लगे। जब राजा पुरूरवा भेड़ोंको लेकर लौटे, तब उर्वशीने उस प्रकाशमें उन्हें वस्त्रहीन अवस्थामें देख लिया। (बस,वह उसी समय उन्हें छोडक़र चली गयी) ॥ ३१ ॥



शेष आगामी पोस्ट में --

गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


श्रीमद्भागवतमहापुराण नवम स्कन्ध –चौदहवाँ अध्याय..(पोस्ट०३)


॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥



श्रीमद्भागवतमहापुराण

नवम स्कन्ध चौदहवाँ अध्याय..(पोस्ट०३)



चन्द्रवंश का वर्णन


ततः पुरूरवा जज्ञे इलायां य उदाहृतः ।
तस्य रूपगुणौदार्य शीलद्रविणविक्रमान् ॥ १५ ॥
श्रुत्वोर्वशीन्द्रभवने गीयमानान् सुरर्षिणा ।
तदन्तिकमुपेयाय देवी स्मरशरार्दिता ॥ १६ ॥
मित्रावरुणयोः शापाद् आपन्ना नरलोकताम् ।

निशम्य पुरुषश्रेष्ठं कन्दर्पमिव रूपिणम् ।
धृतिं विष्टभ्य ललना उपतस्थे तदन्तिके ॥ १७ ॥
स तां विलोक्य नृपतिः हर्षेणोत्फुल्ललोचनः ।
उवाच श्लक्ष्णया वाचा देवीं हृष्टतनूरुहः ॥ १८ ॥

श्रीराजोवाच ।
स्वागतं ते वरारोहे आस्यतां करवाम किम् ।
संरमस्व मया साकं रतिर्नौ शाश्वतीः समाः ॥ १९ ।।


उर्वश्युवाच ।
कस्यास्त्वयि न सज्जेत मनो दृष्टिश्च सुन्दर ।
यदङ्‌गान्तरमासाद्य च्यवते ह रिरंसया ॥ २० ॥
एतौ उरणकौ राजन् न्यासौ रक्षस्व मानद ।
संरंस्ये भवता साकं श्लाघ्यः स्त्रीणां वरः स्मृतः ॥ २१ ॥
घृतं मे वीर भक्ष्यं स्यात् नेक्षे त्वान्यत्र मैथुनात् ।
विवाससं तत् तथेति प्रतिपेदे महामनाः ॥ २२ ॥
अहो रूपमहो भावो नरलोकविमोहनम् ।
को न सेवेत मनुजो देवीं त्वां स्वयमागताम् ॥ २३ ॥

परीक्षित्‌ ! बुध के द्वारा इला के गर्भ से पुरूरवा का जन्म हुआ। इसका वर्णन मैं पहले ही कर चुका हूँ। एक दिन इन्द्रकी सभा में देवर्षि नारदजी पुरूरवा के रूप, गुण, उदारता, शील-स्वभाव, धन-सम्पत्ति और पराक्रमका गान कर रहे थे। उन्हें सुनकर उर्वशी के हृदयमें कामभावका उदय हो आया और उससे पीडि़त होकर वह देवाङ्गना पुरूरवाके पास चली आयी ॥ १५-१६ ॥ यद्यपि उर्वशीको मित्रावरुणके शापसे ही मृत्युलोकमें आना पड़ा था, फिर भी पुरुषशिरोमणि पुरूरवा मूर्तिमान् कामदेवके समान सुन्दर हैंयह सुनकर सुर-सुन्दरी उर्वशीने धैर्य धारण किया और वह उनके पास चली आयी ॥ १७ ॥ देवाङ्गना उर्वशीको देखकर राजा पुरूरवाके नेत्र हर्षसे खिल उठे। उनके शरीरमें रोमाञ्च हो आया। उन्होंने बड़ी मीठी वाणीसे कहा॥ १८ ॥
राजा पुरूरवाने कहासुन्दरी ! तुम्हारा स्वागत है। बैठो, मैं तुम्हारी क्या सेवा करूँ ? तुम मेरे साथ विहार करो और हम दोनोंका यह विहार अनन्त कालतक चलता रहे ॥ १९ ॥
उर्वशीने कहा—‘राजन् ! आप सौन्दर्यके मूर्तिमान् स्वरूप हैं। भला, ऐसी कौन कामिनी है जिसकी दृष्टि और मन आपमें आसक्त न हो जाय ? क्योंकि आपके समीप आकर मेरा मन रमणकी इच्छासे अपना धैर्य खो बैठा है ॥ २० ॥ राजन् ! जो पुरुष रूप-गुण आदिके कारण प्रशंसनीय होता है, वही स्त्रियोंको अभीष्ट होता है। अत: मैं आपके साथ अवश्य विहार करूँगी। परंतु मेरे प्रेमी महाराज ! मेरी एक शर्त है। मैं आपको धरोहरके रूपमें भेडक़े दो बच्चे सौंपती हूँ। आप इनकी रक्षा करना ॥ २१ ॥ वीरशिरोमणे ! मैं केवल घी खाऊँगी और मैथुन के अतिरिक्त और किसी भी समय आपको वस्त्रहीन न देख सकूँगी।परम मनस्वी पुरूवा ने ठीक हैऐसा कहकर उसकी शर्त स्वीकार कर ली ॥ २२ ॥ और फिर उर्वशीसे कहा—‘तुम्हारा यह सौन्दर्य अद्भुत है। तुम्हारा भाव अलौकिक है। यह तो सारी मनुष्यसृष्टिको मोहित करनेवाला है। और देवि ! कृपा करके तुम स्वयं यहाँ आयी हो। फिर कौन ऐसा मनुष्य है जो तुम्हारा सेवन न करेगा ? ॥ २३ ॥


शेष आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


गुरुवार, 26 दिसंबर 2019

श्रीमद्भागवतमहापुराण नवम स्कन्ध –चौदहवाँ अध्याय..(पोस्ट०२)


॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥



श्रीमद्भागवतमहापुराण

नवम स्कन्ध चौदहवाँ अध्याय..(पोस्ट०२)



चन्द्रवंश का वर्णन


निवेदितोऽथाङ्‌गिरसा सोमं निर्भर्त्स्य विश्वकृत् ।

तारां स्वभर्त्रे प्रायच्छद् अन्तर्वत्‍नीमवैत् पतिः ॥ ८ ॥

त्यज त्यजाशु दुष्प्रज्ञे मत्क्षेत्रात् आहितं परैः ।

नाहं त्वां भस्मसात्कुर्यां स्त्रियं सान्तानिकः सति ॥ ९ ॥

तत्याज व्रीडिता तारा कुमारं कनकप्रभम् ।

स्पृहामाङ्‌गिरसश्चक्रे कुमारे सोम एव च ॥ १० ॥

ममायं न तवेत्युच्चैः तस्मिन् विवदमानयोः ।

पप्रच्छुः ऋषयो देवा नैवोचे व्रीडिता तु सा ॥ ११ ॥

कुमारो मातरं प्राह कुपितोऽलीकलज्जया ।

किं न वोचस्यसद्‌वृत्ते आत्मावद्यं वदाशु मे ॥ १२ ॥

ब्रह्मा तां रह आहूय समप्राक्षीच्च सान्त्वयन् ।

सोमस्येत्याह शनकैः सोमस्तं तावदग्रहीत् ॥ १३ ॥

तस्यात्मयोनिरकृत बुध इत्यभिधां नृप ।

बुद्ध्या गम्भीरया येन पुत्रेणापोडुराण्मुदम् ॥१४



तदनन्तर अङ्गिरा ऋषि ने ब्रह्माजी के पास जाकर यह युद्ध बंद कराने की प्रार्थना की। इसपर ब्रह्माजीने चन्द्रमा को बहुत डाँटा-फटकारा और तारा को उसके पति बृहस्पतिजी के हवाले कर दिया। जब बृहस्पतिजी को यह मालूम हुआ कि तारा तो गर्भवती है, तब उन्होंने कहा॥ ८ ॥ दुष्टे ! मेरे क्षेत्र में यह तो किसी दूसरे का गर्भ है। इसे तू अभी त्याग दे, तुरंत त्याग दे। डर मत, मैं तुझे जलाऊँगा नहीं। क्योंकि एक तो तू स्त्री है और दूसरे मुझे भी सन्तानकी कामना है। देवी होनेके कारण तू निर्दोष भी है ही॥ ९ ॥ अपने पतिकी बात सुनकर तारा अत्यन्त लज्ङ्क्षजत हुई। उसने सोनेके समान चमकता हुआ एक बालक अपने गर्भसे अलग कर दिया। उस बालकको देखकर बृहस्पति और चन्द्रमा दोनों ही मोहित हो गये और चाहने लगे कि यह हमें मिल जाय ॥ १० ॥ अब वे एक-दूसरे से इस प्रकार जोर-जोर से झगड़ा करने लगे कि यह तुम्हारा नहीं, मेरा है।ऋषियों और देवताओं ने तारा से पूछा कि यह किसका लडक़ा है।परंतु तारा ने लज्जावश कोई उत्तर न दिया ॥ ११ ॥ बालक ने अपनी माता की झूठी लज्जा से क्रोधित होकर कहा—‘दुष्टे ! तू बतलाती क्यों नहीं ? तू अपना कुकर्म मुझे शीघ्र-से-शीघ्र बतला दे॥ १२ ॥ उसी समय ब्रह्माजी ने तारा को एकान्त में बुलाकर बहुत कुछ समझा-बुझाकर पूछा। तब तारा  ने धीरे से कहा कि चन्द्रमाका।इसलिये चन्द्रमा ने उस बालक को ले लिया ॥ १३ ॥ परीक्षित्‌ ! ब्रह्माजी ने उस बालक का नाम रखा बुध’, क्योंकि उसकी बुद्धि बड़ी गम्भीर थी। ऐसा पुत्र प्राप्त करके चन्द्रमा को बहुत आनन्द हुआ ॥ १४ ॥



शेष आगामी पोस्ट में --

गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से




श्रीमद्भागवतमहापुराण नवम स्कन्ध –चौदहवाँ अध्याय..(पोस्ट०१)


॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥



श्रीमद्भागवतमहापुराण

नवम स्कन्ध चौदहवाँ अध्याय..(पोस्ट०१)



चन्द्रवंश का वर्णन


श्रीशुक उवाच ।



अथातः श्रूयतां राजन् वंशः सोमस्य पावनः ।

यस्मिन्नैलादयो भूपाः कीर्त्यन्ते पुण्यकीर्तयः ॥ १ ॥

सहस्रशिरसः पुंसो नाभिह्रद सरोरुहात् ।

जातस्यासीत् सुतो धातुः अत्रिः पितृसमो गुणैः ॥ २ ॥

तस्य दृग्भ्योऽभवत् पुत्रः सोमोऽमृतमयः किल ।

विप्रौषध्युडुगणानां ब्रह्मणा कल्पितः पतिः ॥ ३ ॥

सोऽयजद् राजसूयेन विजित्य भुवनत्रयम् ।

पत्‍नीं बृहस्पतेर्दर्पात् तारां नामाहरद् बलात् ॥ ४ ॥

यदा स देवगुरुणा याचितोऽभीक्ष्णशो मदात् ।

नात्यजत् तत्कृते जज्ञे सुरदानवविग्रहः ॥ ५ ॥

शुक्रो बृहस्पतेर्द्वेषाद् अग्रहीत् सासुरोडुपम् ।

हरो गुरुसुतं स्नेहात् सर्वभूतगणावृतः ॥ ६ ॥

सर्वदेवगणोपेतो महेन्द्रो गुरुमन्वयात् ।

सुरासुरविनाशोऽभूत् समरस्तारकामयः ॥ ७ ॥


श्रीशुकदेवजी कहते हैंपरीक्षित्‌ ! अब मैं तुम्हें चन्द्रमा के पावन वंश का वर्णन सुनाता हूँ। इस वंश में पुरूरवा आदि बड़े-बड़े पवित्रकीर्ति राजाओं का कीर्तन किया जाता है ॥ १ ॥ सहस्रों सिरवाले विराट् पुरुष नारायण  के नाभि-सरोवर के कमल से ब्रह्माजी की उत्पत्ति हुई। ब्रह्माजी के पुत्र हुए अत्रि। वे अपने गुणोंके कारण ब्रह्माजीके समान ही थे ॥ २ ॥ उन्हीं अत्रि के नेत्रों से  अमृतमय चन्द्रमा का जन्म हुआ। ब्रह्माजी ने चन्द्रमा को ब्राह्मण, ओषधि और नक्षत्रों का अधिपति बना दिया ॥ ३ ॥ उन्होंने तीनों लोकोंपर विजय प्राप्त की और राजसूय यज्ञ किया। इससे उनका घमंड बढ़ गया और उन्होंने बलपूर्वक बृहस्पति की पत्नी तारा को हर लिया ॥ ४ ॥ देवगुरु बृहस्पति ने अपनी पत्नी को लौटा देने के लिये उनसे बार-बार याचना की, परंतु वे इतने मतवाले हो गये थे कि उन्होंने किसी प्रकार उनकी पत्नीको नहीं लौटाया। ऐसी परिस्थिति में उसके लिये देवता और दानव  में घोर संग्राम छिड़ गया ॥ ५ ॥ शुक्राचार्यजी ने बृहस्पतिजी के द्वेषसे असुरोंके साथ चन्द्रमाका पक्ष ले लिया और महादेवजीने स्नेहवश समस्त भूतगणोंके साथ अपने विद्यागुरु अङ्गिराजीके पुत्र बृहस्पतिका पक्ष लिया ॥ ६ ॥ देवराज इन्द्रने भी समस्त देवताओंके साथ अपने गुरु बृहस्पतिजीका ही पक्ष लिया। इस प्रकार ताराके निमित्तसे देवता और असुरोंका संहार करनेवाला घोर संग्राम हुआ ॥ ७ ॥



शेष आगामी पोस्ट में --

गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


बुधवार, 25 दिसंबर 2019

श्रीमद्भागवतमहापुराण नवम स्कन्ध –तेरहवाँ अध्याय..(पोस्ट०२)


॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥



श्रीमद्भागवतमहापुराण

नवम स्कन्ध तेरहवाँ अध्याय..(पोस्ट०२)



राजा निमि के वंश का वर्णन



तस्माद् उदावसुस्तस्य पुत्रोऽभूत् नन्दिवर्धनः ।

ततः सुकेतुस्तस्यापि देवरातो महीपते ॥ १४ ॥

तस्माद् बृहद्रथस्तस्य महावीर्यः सुधृत्पिता ।

सुधृतेर्धृष्टकेतुर्वै हर्यश्वोऽथ मरुस्ततः ॥ १५ ॥

मरोः प्रतीपकस्तस्मात् जातः कृतरथो यतः ।

देवमीढस्तस्य पुत्रो विश्रुतोऽथ महाधृतिः ॥ १६ ॥

कृतिरातः ततस्तस्मात् महारोमा च तत्सुतः ।

स्वर्णरोमा सुतस्तस्य ह्रस्वरोमा व्यजायत ॥ १७ ॥

ततः शीरध्वजो जज्ञे यज्ञार्थं कर्षतो महीम् ।

सीता शीराग्रतो जाता तस्मात् सीरध्वजः स्मृतः ॥ १८ ॥

कुशध्वजस्तस्य पुत्रः ततो धर्मध्वजो नृपः ।

धर्मध्वजस्य द्वौ पुत्रौ कृतध्वजमितध्वजौ ॥ १९ ॥

कृतध्वजात् केशिध्वजः खाण्डिक्यस्तु मितध्वजात् ।

कृतध्वजसुतो राजन् आत्मविद्याविशारदः ॥ २० ॥

खाण्डिक्यः कर्मतत्त्वज्ञो भीतः केशिध्वजाद् द्रुतः ।

भानुमांस्तस्य पुत्रोऽभूत् शतद्युम्नस्तु तत्सुतः ॥ २१ ॥

शुचिस्तु तनयस्तस्मात् सनद्वाजः सुतोऽभवत् ।

ऊर्जकेतुः सनद्वाजाद् अजोऽथ पुरुजित्सुतः ॥ २२ ॥

अरिष्टनेमिस्तस्यापि श्रुतायुः तत्सुपार्श्वकः ।

ततश्चित्ररथो यस्य क्षेमाधिर्मिथिलाधिपः ॥ २३ ॥

तस्मात् समरथस्तस्य सुतः सत्यरथस्ततः ।

आसीद् उपगुरुस्तस्माद् उपगुप्तोऽग्निसंभवः ॥ २४ ॥

वस्वनन्तोऽथ तत्पुत्रो युयुधो यत् सुभाषणः ।

श्रुतस्ततो जयस्तस्माद् विजयोऽस्मादृतः सुतः ॥ २५ ॥

शुनकस्तत्सुतो जज्ञे वीतहव्यो धृतिस्ततः ।

बहुलाश्वो धृतेस्तस्य कृतिरस्य महावशी ॥ २६ ॥

एते वै मैथिला राजन् आत्मविद्याविशारदाः ।

योगेश्वरप्रसादेन द्वन्द्वैर्मुक्ता गृहेष्वपि ॥ २७ ॥



परीक्षित्‌ ! जनक का उदावसु, उसका नन्दिवर्धन, नन्दिवर्धन का सुकेतु, उसका देवरात, देवरात का बृहद्रथ, बृहद्रथ का महावीर्य, महावीर्य का सुधृति, सुधृति का धृष्टकेतु, धृष्टकेतु का हर्यश्व और उसका मरु नामक पुत्र हुआ ॥ १४-१५ ॥ मरु से प्रतीपक, प्रतीपक से कृतिरथ, कृतिरथ से देवमीढ, देवमीढ से विश्रुत और विश्रुत से महाधृति का जन्म हुआ ॥ १६ ॥ महाधृति का कृतिरात, कृतिरात  का महारोमा, महारोमा का स्वर्णरोमा और स्वर्णरोमा का पुत्र हुआ ह्रस्वरोमा ॥ १७ ॥ इसी ह्रस्वरोमा के पुत्र महाराज सीरध्वज थे। वे जब यज्ञके लिये धरती जोत रहे थे, तब उनके सीर (हल) के अग्रभाग (फाल) से सीताजीकी उत्पत्ति हुई। इसीसे उनका नाम सीरध्वजपड़ा ॥ १८ ॥ सीरध्वजके कुशध्वज, कुशध्वजके धर्मध्वज और धर्मध्वजके दो पुत्र हुएकृतध्वज और मितध्वज ॥ १९ ॥ कृतध्वजके केशिध्वज और मितध्वजके खाण्डिक्य हुए। परीक्षित्‌ ! केशिध्वज आत्मविद्यामें बड़ा प्रवीण था ॥ २० ॥ खाण्डिक्य था कर्मकाण्डका मर्मज्ञ। वह केशिध्वजसे भयभीत होकर भाग गया। केशिध्वजका पुत्र भानुमान् और भानुमान्का शतद्युम्र था ॥ २१ ॥ शतद्युम्रसे शुचि, शुचिसे सनद्वाज, सनद्वाजसे ऊध्र्वकेतु, ऊध्र्वकेतुसे अज, अजसे पुरुजित्, पुरुजित्से अरिष्टनेमि, अरिष्टनेमिसे श्रुतायु, श्रुतायुसे सुपाश्र्वक, सुपाश्र्वकसे चित्ररथ और चित्ररथसे मिथिलापति क्षेमधिका जन्म हुआ ॥ २२-२३ ॥ क्षेमधिसे समरथ, समरथसे सत्यरथ, सत्यरथसे उपगुरु और उपगुरुसे उपगुप्त नामक पुत्र हुआ। यह अग्नि का अंश था ॥ २४ ॥ उपगुप्त का वस्वनन्त, वस्वनन्तका युयुध, युयुधका सुभाषण, सुभाषणका श्रुत, श्रुतका जय, जय का विजय और विजयका ऋत नामक पुत्र हुआ ॥ २५ ॥ ऋतका शुनक, शुनकका वीतहव्य, वीतहव्यका धृति, धृतिका बहुलाश्व, बहुलाश्वका कृति और कृतिका पुत्र हुआ महावशी ॥ २६ ॥ परीक्षित्‌ ! ये मिथिलके वंशमें उत्पन्न सभी नरपति मैथिलकहलाते हैं। ये सब-के-सब आत्मज्ञानसे सम्पन्न एवं गृहस्थाश्रममें रहते हुए भी सुख-दु:ख आदि द्वन्द्वोंसे मुक्त थे। क्यों न हो, याज्ञवल्क्य आदि बड़े-बड़े योगेश्वरोंकी इनपर महान् कृपा जो थी ॥ २७ ॥



इति श्रीमद्‍भागवते महापुराणे पारमहंस्यां

संहितायां नवमस्कन्धे त्रयोदशोऽध्यायः ॥ १३ ॥



हरिः ॐ तत्सत् श्रीकृष्णार्पणमस्तु ॥



शेष आगामी पोस्ट में --

गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से




श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - नवाँ अध्याय..(पोस्ट०४)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ श्रीमद्भागवतमहापुराण  सप्तम स्कन्ध – नवाँ अध्याय..(पोस्ट०४) प्रह्लादजी के द्वारा नृसिंहभगवान्‌ की स्तुति सर्वे ह्य...