शनिवार, 8 अगस्त 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - तेरहवाँ अध्याय..(पोस्ट०५)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
सप्तम स्कन्ध – तेरहवाँ अध्याय..(पोस्ट०५)

यतिधर्मका निरूपण और अवधूत-प्रह्लाद-संवाद

सुखमस्यात्मनो रूपं सर्वेहोपरतिस्तनुः
मनःसंस्पर्शजान्दृष्ट्वा भोगान्स्वप्स्यामि संविशन् ॥ २६ ॥
इत्येतदात्मनः स्वार्थं सन्तं विस्मृत्य वै पुमान्
विचित्रामसति द्वैते घोरामाप्नोति संसृतिम् ॥ २७ ॥
जलं तदुद्भवैश्छन्नं हित्वाज्ञो जलकाम्यया
मृगतृष्णामुपाधावेत्तथान्यत्रार्थदृक्स्वतः ॥ २८ ॥
देहादिभिर्दैवतन्त्रैरात्मनः सुखमीहतः
दुःखात्ययं चानीशस्य क्रिया मोघाः कृताः कृताः ॥ २९ ॥
आध्यात्मिकादिभिर्दुःखैरविमुक्तस्य कर्हिचित्
मर्त्यस्य कृच्छ्रोपनतैरर्थैः कामैः क्रियेत किम् ॥ ३० ॥
पश्यामि धनिनां क्लेशं लुब्धानामजितात्मनाम्
भयादलब्धनिद्रा णां सर्वतोऽभिविशङ्किनाम् ॥ ३१ ॥
राजतश्चौरतः शत्रोः स्वजनात्पशुपक्षितः
अर्थिभ्यः कालतः स्वस्मान्नित्यं प्राणार्थवद्भयम् ॥ ३२ ॥
शोकमोहभयक्रोध रागक्लैब्यश्रमादयः
यन्मूलाः स्युर्नृणां जह्यात्स्पृहां प्राणार्थयोर्बुधः ॥ ३३ ॥

सुख ही आत्माका स्वरूप है। समस्त चेष्टाओंकी निवृत्ति ही उसका शरीर—उसके प्रकाशित होनेका स्थान है। इसलिये समस्त भोगोंको मनोराज्यमात्र समझकर मैं अपने प्रारब्धको भोगता हुआ पड़ा रहता हूँ ॥ २६ ॥ मनुष्य अपने सच्चे स्वार्थ अर्थात् वास्तविक सुखको, जो अपना स्वरूप ही है, भूलकर इस मिथ्या द्वैतको सत्य मानता हुआ अत्यन्त भयङ्कर और विचित्र जन्मों और मृत्युओंमें भटकता रहता है ॥ २७ ॥ जैसे अज्ञानी मनुष्य जलमें उत्पन्न तिनके और सेवार से ढके हुए जल को जल न समझकर जलके लिये मृगतृष्णा की ओर दौड़ता है, वैसे ही अपनी आत्मा से भिन्न वस्तु में सुख समझनेवाला पुरुष आत्मा को छोडक़र विषयों की ओर दौड़ता है ॥ २८ ॥ प्रह्लादजी ! शरीर आदि तो प्रारब्धके अधीन हैं। उनके द्वारा जो अपने लिये सुख पाना और दु:ख मिटाना चाहता है, वह कभी अपने कार्यमें सफल नहीं हो सकता। उसके बार-बार किये हुए सारे कर्म व्यर्थ हो जाते हैं ॥ २९ ॥ मनुष्य सर्वदा शारीरिक, मानसिक आदि दु:खोंसे आक्रान्त ही रहता है। मरणशील तो है ही, यदि उसने बड़े श्रम और कष्टसे कुछ धन और भोग प्राप्त कर भी लिया तो क्या लाभ है ? ॥ ३० ॥ लोभी और इन्द्रियोंके वशमें रहनेवाले धनियोंका दु:ख तो मैं देखता ही रहता हूँ। भयके मारे उन्हें नींद नहीं आती। सबपर उनका सन्देह बना रहता है ॥ ३१ ॥ जो जीवन और धनके लोभी हैं—वे राजा, चोर, शत्रु, स्वजन, पशु-पक्षी, याचक और कालसे, यहाँतक कि ‘कहीं मैं भूल न कर बैठूँ, अधिक न खर्च कर दूँ’—इस आशङ्का से अपने-आपसे भी सदा डरते रहते हैं ॥ ३२ ॥ इसलिये बुद्धिमान् पुरुषको चाहिये कि जिसके कारण शोक, मोह, भय, क्रोध, राग, कायरता और श्रम आदिका शिकार होना पड़ता है—उस धन और जीवनकी स्पृहा का त्याग कर दे ॥ ३३ ॥

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श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - तेरहवाँ अध्याय..(पोस्ट०४)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
सप्तम स्कन्ध – तेरहवाँ अध्याय..(पोस्ट०४)

यतिधर्मका निरूपण और अवधूत-प्रह्लाद-संवाद

तृष्णया भववाहिन्या योग्यैः कामैरपूर्यया
कर्माणि कार्यमाणोऽहं नानायोनिषु योजितः ॥ २३ ॥
यदृच्छया लोकमिमं प्रापितः कर्मभिर्भ्रमन्
स्वर्गापवर्गयोर्द्वारं तिरश्चां पुनरस्य च ॥ २४ ॥
तत्रापि दम्पतीनां च सुखायान्यापनुत्तये
कर्माणि कुर्वतां दृष्ट्वा निवृत्तोऽस्मि विपर्ययम् ॥ २५ ॥

(दत्तात्रेयजी कह रहे हैं) प्रह्लादजी ! तृष्णा एक ऐसी वस्तु है, जो इच्छानुसार भोगों के प्राप्त होने पर भी पूरी नहीं होती। उसी के कारण जन्म-मृत्यु के चक्कर में भटकना पड़ता है। तृष्णा ने मुझसे न जाने कितने कर्म करवाये और उनके कारण न जाने कितनी योनियोंमें मुझे डाला ॥ २३ ॥ कर्मोंके कारण अनेकों योनियोंमें भटकते-भटकते दैववश मुझे यह मनुष्ययोनि मिली है, जो स्वर्ग, मोक्ष, तिर्यग्योनि तथा इस मानवदेहकी भी प्राप्तिका द्वार है—इसमें पुण्य करें तो स्वर्ग, पाप करें तो पशु-पक्षी आदिकी योनि, निवृत्त हो जायँ तो मोक्ष और दोनों प्रकारके कर्म किये जायँ तो फिर मनुष्य-योनिकी ही प्राप्ति हो सकती है ॥ २४ ॥ परंतु मैं देखता हूँ कि संसारके स्त्री-पुरुष कर्म तो करते हैं सुखकी प्राप्ति और दु:खकी निवृत्तिके लिये, किन्तु उसका फल उलटा होता ही है—वे और भी दु:खमें पड़ जाते हैं। इसीलिये मैं कर्मोंसे उपरत हो गया हूँ ॥ २५ ॥

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शुक्रवार, 7 अगस्त 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - तेरहवाँ अध्याय..(पोस्ट०३)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
सप्तम स्कन्ध – तेरहवाँ अध्याय..(पोस्ट०३)

यतिधर्मका निरूपण और अवधूत-प्रह्लाद-संवाद

श्रीनारद उवाच

स इत्थं दैत्यपतिना परिपृष्टो महामुनिः
स्मयमानस्तमभ्याह तद्वागमृतयन्त्रितः ॥ १९ ॥

श्रीब्राह्मण उवाच

वेदेदमसुरश्रेष्ठ भवान्नन्वार्यसम्मतः
ईहोपरमयोर्नॄणां पदान्यध्यात्मचक्षुषा ॥ २० ॥
यस्य नारायणो देवो भगवान्हृद्गतः सदा
भक्त्या केवलयाज्ञानं धुनोति ध्वान्तमर्कवत् ॥ २१ ॥
तथापि ब्रूमहे प्रश्नांस्तव राजन्यथाश्रुतम्
सम्भाषणीयो हि भवानात्मनः शुद्धिमिच्छता ॥ २२ ॥

नारदजी कहते हैं—धर्मराज ! जब प्रह्लादजीने महामुनि दत्तात्रेयजीसे इस प्रकार प्रश्न किया, तब वे उनकी अमृतमयी वाणीके वशीभूत हो मुसकराते हुए बोले ॥ १९ ॥
दत्तात्रेयजीने कहा—दैत्यराज ! सभी श्रेष्ठ पुरुष तुम्हारा सम्मान करते हैं। मनुष्योंको कर्मोंकी प्रवृत्ति और उनकी निवृत्तिका क्या फल मिलता है, यह बात तुम अपनी ज्ञानदृष्टिसे जानते ही हो ॥ २० ॥ तुम्हारी अनन्य भक्तिके कारण देवाधिदेव भगवान्‌ नारायण सदा तुम्हारे हृदयमें विराजमान रहते हैं और जैसे सूर्य अन्धकारको नष्ट कर देते हैं, वैसे ही वे तुम्हारे अज्ञानको नष्ट करते रहते हैं ॥ २१ ॥ तो भी प्रह्लाद ! मैंने जैसा कुछ जाना है, उसके अनुसार मैं तुम्हारे प्रश्नों का उत्तर देता हूँ। क्योंकि आत्मशुद्धि के अभिलाषियों को तुम्हारा सम्मान अवश्य करना चाहिये ॥ २२ ॥

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श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - तेरहवाँ अध्याय..(पोस्ट०२)

।। ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण
सप्तम स्कन्ध – तेरहवाँ अध्याय..(पोस्ट०२)

यतिधर्मका निरूपण और अवधूत-प्रह्लाद-संवाद

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम्
प्रह्रादस्य च संवादं मुनेराजगरस्य च ॥ ११ ॥
तं शयानं धरोपस्थे कावेर्यां सह्यसानुनि
रजस्वलैस्तनूदेशैर्निगूढामलतेजसम् ॥ १२ ॥
ददर्श लोकान्विचरन्लोकतत्त्वविवित्सया
वृतोऽमात्यैः कतिपयैः प्रह्रादो भगवत्प्रियः ॥ १३ ॥
कर्मणाकृतिभिर्वाचा लिङ्गैर्वर्णाश्रमादिभिः
न विदन्ति जना यं वै सोऽसाविति न वेति च ॥ १४ ॥
तं नत्वाभ्यर्च्य विधिवत्पादयोः शिरसा स्पृशन्
विवित्सुरिदमप्राक्षीन्महाभागवतोऽसुरः ॥ १५ ॥
बिभर्षि कायं पीवानं सोद्यमो भोगवान्यथा
वित्तं चैवोद्यमवतां भोगो वित्तवतामिह
भोगिनां खलु देहोऽयं पीवा भवति नान्यथा ॥ १६ ॥
न ते शयानस्य निरुद्यमस्य ब्रह्मन्नु हार्थो यत एव भोगः
अभोगिनोऽयं तव विप्र देहः पीवा यतस्तद्वद नः क्षमं चेत् ॥ १७ ॥
कविः कल्पो निपुणदृक्चित्रप्रियकथः समः
लोकस्य कुर्वतः कर्म शेषे तद्वीक्षितापि वा ॥ १८ ॥

युधिष्ठिर ! इस विषय में महात्मालोग एक प्राचीन इतिहास का वर्णन करते हैं। वह है दत्तात्रेय मुनि और भक्तराज प्रह्लाद का संवाद ॥ ११ ॥ एक बार भगवान्‌ के परम प्रेमी प्रह्लाद जी कुछ मन्त्रियों के साथ लोगों के हृदयकी बात जाननेकी इच्छासे लोकोंमें विचरण कर रहे थे। उन्होंने देखा कि सह्य पर्वतकी तलहटीमें कावेरी नदीके तटपर पृथ्वीपर ही एक मुनि पड़े हुए हैं। उनके शरीरकी निर्मल ज्योति अङ्गोंके धूलि-धूसरित होनेके कारण ढकी हुई थी ॥ १२-१३ ॥ उनके कर्म, आकार, वाणी और वर्ण-आश्रम आदिके चिह्नोंसे लोग यह नहीं समझ सकते थे कि वे कोई सिद्ध पुरुष हैं या नहीं ॥ १४ ॥ भगवान्‌के परम प्रेमी भक्त प्रह्लादजीने अपने सिरसे उनके चरणोंका स्पर्श करके प्रणाम किया और विधिपूर्वक उनकी पूजा करके जाननेकी इच्छासे यह प्रश्न किया ॥ १५ ॥ भगवन् ! आपका शरीर उद्योगी और भोगी पुरुषोंके समान हृष्ट-पुष्ट है। संसारका यह नियम है कि उद्योग करनेवालोंको धन मिलता है, धनवालोंको ही भोग प्राप्त होता है और भोगियोंका ही शरीर हृष्ट-पुष्ट होता है। और कोई दूसरा कारण तो हो नहीं सकता ॥ १६ ॥ भगवन् ! आप कोई उद्योग तो करते नहीं, यों ही पड़े रहते हैं। इसलिये आपके पास धन है नहीं। फिर आपको भोग कहाँसे प्राप्त होंगे ? ब्राह्मणदेवता ! बिना भोगके ही आपका यह शरीर इतना हृष्ट-पुष्ट कैसे है ? यदि हमारे सुननेयोग्य हो, तो अवश्य बतलाइये ॥ १७ ॥ आप विद्वान्, समर्थ और चतुर हैं। आपकी बातें बड़ी अद्भुत और प्रिय होती हैं। ऐसी अवस्थामें आप सारे संसारको कर्म करते हुए देखकर भी समभाव से पड़े हुए हैं, इसका क्या कारण है ?’ ॥ १८ ॥

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बुधवार, 5 अगस्त 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - तेरहवाँ अध्याय..(पोस्ट०१)

।। ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण
सप्तम स्कन्ध – तेरहवाँ अध्याय..(पोस्ट०१)

यतिधर्मका निरूपण और अवधूत-प्रह्लाद-संवाद

श्रीनारद उवाच
कल्पस्त्वेवं परिव्रज्य देहमात्रावशेषितः
ग्रामैकरात्रविधिना निरपेक्षश्चरेन्महीम् ॥ १ ॥
बिभृयाद्यद्यसौ वासः कौपीनाच्छादनं परम्
त्यक्तं न लिङ्गाद्दण्डादेरन्यत्किञ्चिदनापदि ॥ २ ॥
एक एव चरेद्भिक्षुरात्मारामोऽनपाश्रयः
सर्वभूतसुहृच्छान्तो नारायणपरायणः ॥ ३ ॥
पश्येदात्मन्यदो विश्वं परे सदसतोऽव्यये
आत्मानं च परं ब्रह्म सर्वत्र सदसन्मये ॥ ४ ॥
सुप्तिप्रबोधयोः सन्धावात्मनो गतिमात्मदृक्
पश्यन्बन्धं च मोक्षं च मायामात्रं न वस्तुतः ॥ ५ ॥
नाभिनन्देद्ध्रुवं मृत्युमध्रुवं वास्य जीवितम्
कालं परं प्रतीक्षेत भूतानां प्रभवाप्ययम् ॥ ६ ॥
नासच्छास्त्रेषु सज्जेत नोपजीवेत जीविकाम्
वादवादांस्त्यजेत्तर्कान्पक्षं कंच न संश्रयेत् ॥ ७ ॥
न शिष्याननुबध्नीत ग्रन्थान्नैवाभ्यसेद्बहून्
न व्याख्यामुपयुञ्जीत नारम्भानारभेत्क्वचित् ॥ ८ ॥
न यतेराश्रमः प्रायो धर्महेतुर्महात्मनः
शान्तस्य समचित्तस्य बिभृयादुत वा त्यजेत् ॥ ९ ॥
अव्यक्तलिङ्गो व्यक्तार्थो मनीष्युन्मत्तबालवत्
कविर्मूकवदात्मानं स दृष्ट्या दर्शयेन्नृणाम् ॥ १० ॥

नारदजी कहते हैंधर्मराज ! यदि वानप्रस्थीमें ब्रह्मविचारका सामर्थ्य हो, तो शरीरके अतिरिक्त और सब कुछ छोडक़र वह संन्यास ले ले; तथा किसी भी व्यक्ति, वस्तु, स्थान और समय की अपेक्षा न रखकर एक गाँवमें एक ही रात ठहरनेका नियम लेकर पृथ्वीपर विचरण करे ॥ १ ॥ यदि वह वस्त्र पहने तो केवल कौपीन, जिससे उसके गुप्त अङ्ग ढक जायँ। और जबतक कोई आपत्ति न आवे, तबतक दण्ड तथा अपने आश्रमके चिह्नोंके सिवा अपनी त्यागी हुई किसी भी वस्तुको ग्रहण न करे ॥ २ ॥ संन्यासीको चाहिये कि वह समस्त प्राणियोंका हितैषी हो, शान्त रहे, भगवत्परायण रहे और किसीका आश्रय न लेकर अपने-आपमें ही रमे एवं अकेला ही विचरे ॥ ३ ॥ इस सम्पूर्ण विश्वको कार्य और कारणसे अतीत परमात्मामें अध्यस्त जाने और कार्य-कारणस्वरूप इस जगत् में  ब्रह्मस्वरूप अपने आत्माको परिपूर्ण देखे ॥ ४ ॥ आत्मदर्शी संन्यासी सुषुप्ति और जागरणकी सन्धिमें अपने स्वरूपका अनुभव करे और बन्धन तथा मोक्ष दोनों ही केवल माया हैं, वस्तुत: कुछ नहींऐसा समझे ॥ ५ ॥ न तो शरीरकी अवश्य होनेवाली मृत्युका अभिनन्दन करे और न अनिश्चित जीवनका। केवल समस्त प्राणियोंकी उत्पत्ति और नाशके कारण कालकी प्रतीक्षा करता रहे ॥ ६ ॥ असत्यअनात्मवस्तुका प्रतिपादन करनेवाले शास्त्रोंसे प्रीति न करे। अपने जीवन-निर्वाहके लिये कोई जीविका न करे, केवल वाद-विवादके लिये कोई तर्क न करे और संसारमें किसीका पक्ष न ले ॥ ७ ॥ शिष्य-मण्डली न जुटावे, बहुत-से ग्रन्थोंका अभ्यास न करे, व्याख्यान न दे और बड़े-बड़े कामोंका आरम्भ न करे ॥ ८ ॥ शान्त, समदर्शी एवं महात्मा संन्यासीके लिये किसी आश्रमका बन्धन धर्मका कारण नहीं है। वह अपने आश्रमके चिह्नोंको धारण करे, चाहे छोड़ दे ॥ ९ ॥ उसके पास कोई आश्रमका चिह्न न हो, परंतु वह आत्मानुसन्धान में मग्न हो। हो तो अत्यन्त विचारशील, परंतु जान पड़े पागल और बालककी तरह। वह अत्यन्त प्रतिभाशील होनेपर भी साधारण मनुष्योंकी दृष्टिसे ऐसा जान पड़े मानो कोई गूँगा है ॥ १० ॥

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सोमवार, 3 अगस्त 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - बारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०५)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण
सप्तम स्कन्ध – बारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०५)

ब्रह्मचर्य और वानप्रस्थ-आश्रमोंके नियम

यदाकल्पः स्वक्रियायां व्याधिभिर्जरयाथवा ।
आन्वीक्षिक्यां वा विद्यायां कुर्यादनशनादिकम् ॥ २३ ॥
आत्मन्यग्नीन् समारोप्य सन्न्यस्याहं ममात्मताम् ।
कारणेषु न्यसेत् सम्यक् संघातं तु यथार्हतः ॥ २४ ॥
खे खानि वायौ निश्वासान् तजःसूष्माणमात्मवान् ।
अप्स्वसृक्श्लेष्मपूयानि क्षितौ शेषं यथोद्‍भवम् ॥ २५ ॥
वाचमग्नौ सवक्तव्यां इन्द्रे शिल्पं करावपि ।
पदानि गत्या वयसि रत्योपस्थं प्रजापतौ ॥ २६ ॥
मृत्यौ पायुं विसर्गं च यथास्थानं विनिर्दिशेत् ।
दिक्षु श्रोत्रं सनादेन स्पर्शेनाध्यात्मनि त्वचम् ॥ २७ ॥
रूपाणि चक्षुषा राजन् ज्योतिष्यभिनिवेशयेत् ।
अप्सु प्रचेतसा जिह्वां घ्रेयैर्घ्राणं क्षितौ न्यसेत् ॥ २८ ॥
मनो मनोरथैश्चन्द्रे बुद्धिं बोध्यैः कवौ परे ।
कर्माण्यध्यात्मना रुद्रे यदहं ममताक्रिया ।
सत्त्वेन चित्तं क्षेत्रज्ञे गुणैर्वैकारिकं परे ॥ २९ ॥
अप्सु क्षितिमपो ज्योतिषि अदो वायौ नभस्यमुम् ।
कूटस्थे तच्च महति तदव्यक्तेऽक्षरे च तत् ॥ ३० ॥
इत्यक्षरतयाऽऽत्मानं चिन्मात्रमवशेषितम् ।
ज्ञात्वाद्वयोऽथ विरमेद् दग्धयोनिरिवानलः ॥ ३१ ॥

वानप्रस्थी पुरुष जब रोग अथवा बुढ़ापे के कारण अपने कर्म पूरे न कर सके और वेदान्त- विचार करने की भी सामर्थ्य न रहे, तब उसे अनशन आदि व्रत करने चाहिये ॥ २३ ॥ अनशन के पूर्व ही वह अपने आहवनीय आदि अग्नियों को अपनी आत्मा में लीन कर ले। मैंपनऔर मेरेपनका त्याग करके शरीरको उसके कारण भूत तत्त्वों में यथायोग्य भलीभाँति लीन करे ॥ २४ ॥ जितेन्द्रिय पुरुष अपने शरीरके छिद्राकाशोंको आकाशमें, प्राणोंको वायुमें, गरमीको अग्रिमें, रक्त, कफ, पीब आदि जलीय तत्त्वोंको जलमें और हड्डी आदि ठोस वस्तुओंको पृथ्वीमें लीन करे ॥ २५ ॥ इसी प्रकार वाणी और उसके कर्म भाषणको उसके अधिष्ठातृ-देवता अग्रिमें, हाथ और उसके द्वारा होनेवाले कला-कौशलको इन्द्रमें, चरण और उसकी गतिको कालस्वरूप विष्णुमें, रति और उपस्थको प्रजापतिमें एवं पायु और मलोत्सर्गको उनके आश्रयके अनुसार मृत्युमें लीन कर दे। श्रोत्र और उसके द्वारा सुने जानेवाले शब्दको दिशाओंमें, स्पर्श और त्वचाको वायुमें, नेत्रसहित रूपको ज्योतिमें, मधुर आदि रसके सहित[*] रसनेन्द्रियको जलमें और युधिष्ठिर ! घ्राणेन्द्रिय एवं उसके द्वारा सूँघे जानेवाले गन्धको पृथ्वीमें लीन कर दे ॥ २६२८ ॥ मनोरथोंके साथ मनको चन्द्रमामें, समझमें आनेवाले पदार्थोंके सहित बुद्धिको ब्रह्मामें तथा अहंता और ममतारूप क्रिया करनेवाले अहंकारको उसके कर्मोंके साथ रुद्रमें लीन कर दे। इसी प्रकार चेतना-सहित चित्तको क्षेत्रज्ञ (जीव)में और गुणोंके कारण विकारी-से प्रतीत होनेवाले जीवको परब्रह्ममें लीन कर दे ॥ २९ ॥ साथ ही पृथ्वीका जलमें, जलका अग्रिमें, अग्रिका वायुमें, वायुका आकाशमें, आकाशका अहंकारमें, अहंकारका महत्तत्त्वमें, महत्तत्त्वका अव्यक्तमें और अव्यक्तका अविनाशी परमात्मामें लय कर दे ॥ ३० ॥ इस प्रकार अविनाशी परमात्माके रूपमें अवशिष्ट जो चिद्वस्तु है, वह आत्मा है, वह मैं हूँयह जानकर अद्वितीय भावमें स्थित हो जाय। जैसे अपने आश्रय काष्ठादि के भस्म हो जानेपर अग्रि शान्त होकर अपने स्वरूपमें स्थित हो जाता है, वैसे ही वह भी उपरत हो जाय ॥ ३१ ॥
.................................................................
[*] यहाँ मूलमें प्रचेतसापद है, जिसका अर्थ वरुणके सहितहोता है। वरुण रसनेन्द्रियके अधिष्ठाता हैं। श्रीधरस्वामीने भी इसी मतको स्वीकार किया है। परंतु इस प्रसङ्गमें सर्वत्र इन्द्रिय और उसके विषयका अधिष्ठातृदेवमें लय करना बताया गया है, फिर रसनेन्द्रियके लिये ही नया क्रम युक्तियुक्त नहीं जँचता। इसलिये यहाँ श्रीविश्वनाथ चक्रवर्तीके मतानुसार प्रचेतसापदका (प्रकृष्टं चेतो यत्र स प्रचेतो मधुरादिरसस्तेन’—जिसकी ओर चित्त अधिक आकृष्ट हो, वह मधुरादि रस प्रचेतस्है, उसके सहित) इस विग्रहके अनुसार प्रस्तुत अर्थ किया गया है और यही युक्तियुक्त मालूम होता है।

इति श्रीमद्‌भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां सप्तमस्कन्धे युधिष्ठिरनारदसंवादे सदाचारनिर्णयो नाम द्वादशोऽध्यायः ॥ १२ ॥

हरिः ॐ तत्सत् श्रीकृष्णार्पणमस्तु ॥

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श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - बारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०४)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण
सप्तम स्कन्ध – बारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०४)

ब्रह्मचर्य और वानप्रस्थ-आश्रमोंके नियम

वानप्रस्थस्य वक्ष्यामि नियमान् मुनिसम्मतान् ।
यानास्थाय मुनिर्गच्छेद् ऋषिलोकमुहाञ्जसा ॥ १७ ॥
न कृष्टपच्यमश्नीयाद् अकृष्टं चाप्यकालतः ।
अग्निपक्वमथामं वा अर्कपक्वमुताहरेत् ॥ १८ ॥
वन्यैश्चरुपुरोडाशान् निर्वपेत्कालचोदितान् ।
लब्धे नवे नवेऽन्नाद्ये पुराणं च परित्यजेत् ॥ १९ ॥
अग्न्यर्थमेव शरणं उटजं वाद्रिकन्दरम् ।
श्रयेत हिमवाय्वग्नि वर्षार्कातपषाट् स्वयम् ॥ २० ॥
केशरोमनखश्मश्रु मलानि जटिलो दधत् ।
कमण्डल्वजिने दण्ड वल्कलाग्निपरिच्छदान् ॥ २१ ॥
चरेद् वने द्वादशाब्दान् अष्टौ वा चतुरो मुनिः ।
द्वावेकं वा यथा बुद्धिः न विपद्येत कृच्छ्रतः ॥ २२ ॥

(नारदजी कह रहे हैं) अब मैं ऋषियों के मतानुसार वानप्रस्थ-आश्रम के नियम बतलाता हूँ। इनका आचरण करनेसे वानप्रस्थ-आश्रमीको अनायास ही ऋषियोंके लोक महर्लोककी प्राप्ति हो जाती है ॥ १७ ॥ वानप्रस्थ-आश्रमीको जोती हुई भूमिमें उत्पन्न होनेवाले चावल, गेहूँ आदि अन्न नहीं खाने चाहिये। बिना जोते पैदा हुआ अन्न भी यदि असमयमें पका हो, तो उसे भी न खाना चाहिये। आगसे पकाया हुआ या कच्चा अन्न भी न खाय। केवल सूर्यके तापसे पके हुए कन्द, मूल, फल आदिका ही सेवन करे ॥ १८ ॥ जंगलोंमें अपने-आप पैदा हुए धान्योंसे नित्य-नैमित्तिक चरु और पुरोडाशका हवन करे। जब नये-नये अन्न, फल, फूल आदि मिलने लगें, तब पहलेके इकट्ठेकिये हुए अन्नका परित्याग कर दे ॥ १९ ॥ अग्निहोत्र के अग्नि की रक्षाके लिये ही घर, पर्णकुटी अथवा पहाडक़ी गुफाका आश्रय ले। स्वयं शीत, वायु, अग्नि, वर्षा और घामका सहन करे ॥ २० ॥ सिरपर जटा धारण करे और केश, रोम, नख एवं दाढ़ी-मूँछ न कटवाये तथा मैलको भी शरीरसे अलग न करे। कमण्डलु, मृगचर्म, दण्ड, वल्कल-वस्त्र और अग्रिहोत्रकी सामग्रियोंको अपने पास रखे ॥ २१ ॥ विचारवान् पुरुषको चाहिये कि बारह, आठ, चार, दो या एक वर्षतक वानप्रस्थ-आश्रमके नियमोंका पालन करे। ध्यान रहे कि कहीं अधिक तपस्याका क्लेश सहन करनेसे बुद्धि बिगड़ न जाय ॥ २२ ॥

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रविवार, 2 अगस्त 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - बारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०३)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण
सप्तम स्कन्ध – बारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०३)

ब्रह्मचर्य और वानप्रस्थ-आश्रमोंके नियम

अग्नौ गुरावात्मनि च सर्वभूतेष्वधोक्षजम् ।
भूतैः स्वधामभिः पश्येद् अप्रविष्टं प्रविष्टवत् ॥ १५ ॥
एवं विधो ब्रह्मचारी वानप्रस्थो यतिर्गृही ।
चरन्विदितविज्ञानः परं ब्रह्माधिगच्छति ॥ १६ ॥

यद्यपि भगवान्‌ स्वरूपत: सर्वत्र एकरस स्थित हैं, अतएव उनका कहीं प्रवेश करना या निकलना नहीं हो सकताफिर भी अग्नि, गुरु, आत्मा और समस्त प्राणियोंमें अपने आश्रित जीवोंके साथ वे विशेषरूपसे विराजमान हैं। इसलिये उनपर सदा दृष्टि जमी रहनी चाहिये ॥ १५ ॥ इस प्रकार आचरण करनेवाला ब्रह्मचारी, वानप्रस्थ, संन्यासी अथवा गृहस्थ विज्ञानसम्पन्न होकर परब्रह्मतत्त्व का अनुभव प्राप्त कर लेता है ॥ १६ ॥

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श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - बारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०२)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
सप्तम स्कन्ध – बारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०२)

ब्रह्मचर्य और वानप्रस्थ-आश्रमोंके नियम

केशप्रसाधनोन्मर्द स्नपनाभ्यञ्जनादिकम् । 
गुरुस्त्रीभिर्युवतिभिः कारयेन्नात्मनो युवा ॥ ८ ॥ 
नन्वग्निः प्रमदा नाम घृतकुम्भसमः पुमान् । 
सुतामपि रहो जह्याद् अन्यदा यावदर्थकृत् ॥ ९ ॥ 
कल्पयित्वाऽऽत्मना यावद् आभासमिदमीश्वरः । 
द्वैतं तावन्न विरमेत् ततो ह्यस्य विपर्ययः ॥ १० ॥ 
एतत् सर्वं गृहस्थस्य समाम्नातं यतेरपि । 
गुरुवृत्तिर्विकल्पेन गृहस्थस्यर्तुगामिनः ॥ ११ ॥ 
अञ्जनाभ्यञ्जनोन्मर्द त्र्यवलेखामिषं मधु । 
स्रग् गन्धलेपालंकारान् त्यजेयुर्ये बृहद्व्रताः ॥ १२ ॥ 
उषित्वैवं गुरुकुले द्विजोऽधीत्यावबुध्य च । 
त्रयीं साङ्‌गोपनिषदं यावदर्थं यथाबलम् ॥ १३ ॥ 
दत्त्वा वरमनुज्ञातो गुरोः कामं यदीश्वरः । 
गृहं वनं वा प्रविशेत् प्रव्रजेत् तत्र वा वसेत् ॥ १४ ॥ 

युवक ब्रह्मचारी युवती गुरुपत्नियोंसे बाल सुलझवाना, शरीर मलवाना, स्नान करवाना, उबटन लगवाना इत्यादि कार्य न करावे ॥ ८ ॥ स्त्रियाँ आगके समान हैं और पुरुष घीके घड़ेके समान। एकान्तमें तो अपनी कन्याके साथ भी न रहना चाहिये। जब वह एकान्तमें न हो, तब भी आवश्यकताके अनुसार ही उसके पास रहना चाहिये ॥ ९ ॥ जबतक यह जीव आत्मसाक्षात्कारके द्वारा इन देह और इन्द्रियोंको प्रतीतिमात्र निश्चय करके स्वतन्त्र नहीं हो जाता, तबतक ‘मैं पुरुष हूँ और यह स्त्री है’—यह द्वैत नहीं मिटता। और तबतक यह भी निश्चित है कि ऐसे पुरुष यदि स्त्रीके संसर्गमें रहेंगे, तो उनकी उनमें भोग्यबुद्धि हो ही जायगी ॥ १० ॥
ये सब शील-रक्षादि गुण गृहस्थके लिये और संन्यासीके लिये भी विहित हैं। गृहस्थके लिये गुरुकुलमें रहकर गुरुकी सेवा-शुश्रूषा वैकल्पिक है, क्योंकि ऋतुगमनके कारण उसे वहाँसे अलग भी होना पड़ता है ॥ ११ ॥ जो ब्रह्मचर्यका व्रत धारण करें, उन्हें चाहिये कि वे सुरमा या तेल न लगावें। उबटन न मलें। स्त्रियोंके चित्र न बनावें। मांस और मद्यसे कोई सम्बन्ध न रखें। फूलोंके हार, इत्र-फुलेल, चन्दन और आभूषणोंका त्याग कर दें ॥ १२ ॥ इस प्रकार गुरुकुलमें निवास करके द्विजातिको अपनी शक्ति और आवश्यकताके अनुसार वेद, उनके अङ्ग—शिक्षा, कल्प आदि और उपनिषदोंका अध्ययन तथा ज्ञान प्राप्त करना चाहिये ॥ १३ ॥ फिर यदि सामथ्र्य हो तो गुरुको मुँहमाँगी दक्षिणा देनी चाहिये। इसके बाद उनकी आज्ञासे गृहस्थ, वानप्रस्थ अथवा संन्यास-आश्रममें प्रवेश करे या आजीवन ब्रह्मचर्यका पालन करते हुए उसी आश्रममें रहे ॥ १४ ॥ 

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शनिवार, 1 अगस्त 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - बारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०१)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
सप्तम स्कन्ध – बारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०१)

ब्रह्मचर्य और वानप्रस्थ-आश्रमोंके नियम

नारद उवाच - 

ब्रह्मचारी गुरुकुले वसन्दान्तो गुरोर्हितम् । 
आचरन् दासवत् नीचो गुरौ सुदृढसौहृदः ॥ १ ॥ 
सायं प्रातरुपासीत गुर्वग्न्यर्कसुरोत्तमान् । 
सन्ध्ये उभे च यतवाग् जपन्ब्रह्म समाहितः ॥ २ ॥ 
छन्दांस्यधीयीत गुरोः आहूतश्चेत् सुयन्त्रितः । 
उपक्रमेऽवसाने च चरणौ शिरसा नमेत् ॥ ३ ॥ 
मेखलाजिनवासांसि जटादण्डकमण्डलून् । 
बिभृयाद् उपवीतं च दर्भपाणिर्यथोदितम् ॥ ४ ॥ 
सायं प्रातश्चरेद्‍भैक्ष्यं गुरवे तन्निवेदयेत् । 
भुञ्जीत यद्यनुज्ञातो नो चेदुपवसेत् क्वचित् ॥ ५ ॥ 
सुशीलो मितभुग् दक्षः श्रद्दधानो जितेन्द्रियः । 
यावदर्थं व्यवहरेत् स्त्रीषु स्त्रीनिर्जितेषु च ॥ ६ ॥ 
वर्जयेत्प्रमदागाथां अगृहस्थो बृहद्व्रतः । 
इन्द्रियाणि प्रमाथीनि हरन्त्यपि यतेर्मनः ॥ ७ ॥ 

नारदजी कहते हैं—धर्मराज ! गुरुकुल में निवास करने वाला ब्रह्मचारी अपनी इन्द्रियों को वश में रखकर दास के समान अपने को छोटा माने, गुरुदेव के चरणों में सुदृढ़ अनुराग रखे और उनके हितके कार्य करता रहे ॥ १ ॥ सायंकाल और प्रात:काल गुरु, अग्नि, सूर्य और श्रेष्ठ देवताओंकी उपासना करे और मौन होकर एकाग्रतासे गायत्रीका जप करता हुआ दोनों समयकी सन्ध्या करे ॥ २ ॥ गुरुजी जब बुलावें तभी पूर्णतया अनुशासनमें रहकर उनसे वेदोंका स्वाध्याय करे। पाठके प्रारम्भ और अन्तमें उनके चरणोंमें सिर टेककर प्रणाम करे ॥ ३ ॥ शास्त्रकी आज्ञाके अनुसार मेखला, मृगचर्म, वस्त्र, जटा, दण्ड, कमण्डलु, यज्ञोपवीत तथा हाथमें कुश धारण करे ॥ ४ ॥ सायंकाल और प्रात:काल भिक्षा माँगकर लावे और उसे गुरुजीको समर्पित कर दे। वे आज्ञा दें, तब भोजन करे और यदि कभी आज्ञा न दें तो उपवास कर ले ॥ ५ ॥ अपने शीलकी रक्षा करे। थोड़ा खाये। अपने कामों को निपुणता के साथ करे। श्रद्धा रखे और इन्द्रियों को अपने वशमें रखे। स्त्री और स्त्रियों के वश में रहने वालों के साथ जितनी आवश्यकता हो, उतना ही व्यवहार करे ॥ ६ ॥ जो गृहस्थ नहीं हैं और ब्रह्मचर्यका व्रत लिये हुए हैं, उसे स्त्रियोंकी चर्चासे ही अलग रहना चाहिये। इन्द्रियाँ बड़ी बलवान् हैं। ये प्रयत्नपूर्वक साधन करनेवालोंके मनको भी क्षुब्ध करके खींच लेती हैं ॥ ७ ॥ 

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श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - ग्यारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०६)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
सप्तम स्कन्ध – ग्यारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०६)

मानवधर्म, वर्णधर्म और स्त्रीधर्म का निरूपण

वृत्तिः सङ्‌करजातीनां तत्तत्कुलकृता भवेत् । 
अचौराणां अपापानां अन्त्यजान्तेऽवसायिनाम् ॥ ३० ॥ 
प्रायः स्वभावविहितो नृणां धर्मो युगे युगे । 
वेददृग्भिः स्मृतो राजन् प्रेत्य चेह च शर्मकृत् ॥ ३१ ॥ 
वृत्त्या स्वभावकृतया वर्तमानः स्वकर्मकृत् । 
हित्वा स्वभावजं कर्म शनैर्निर्गुणतामियात् ॥ ३२ ॥ 
उप्यमानं मुहुः क्षेत्रं स्वयं निर्वीर्यतामियात् । 
न कल्पते पुनः सूत्यै उप्तं बीजं च नश्यति ॥ ३३ ॥ 
एवं कामाशयं चित्तं कामानामतिसेवया । 
विरज्येत यथा राजन् अग्निवत् कामबिन्दुभिः ॥ ३४ ॥ 
यस्य यल्लक्षणं प्रोक्तं पुंसो वर्णाभिव्यञ्जकम् । 
यदन्यत्रापि दृश्येत तत्तेनैव विनिर्दिशेत् ॥ ३५ ॥ 

युधिष्ठिर ! जो चोरी तथा अन्यान्य पाप-कर्म नहीं करते—उन अन्त्यज तथा चाण्डाल आदि अन्तेवसायी वर्णसङ्कर जातियोंकी वृत्तियाँ वे ही हैं, जो कुल-परम्परासे उनके यहाँ चली आयी हैं ॥ ३० ॥ वेददर्शी ऋषि-मुनियोंने युग-युगमें प्राय: मनुष्योंके स्वभावके अनुसार धर्मकी व्यवस्था की है। वही धर्म उनके लिये इस लोक और परलोकमें कल्याणकारी है ॥ ३१ ॥ जो स्वाभाविक वृत्ति का आश्रय लेकर अपने स्वधर्म का पालन करता है, वह धीरे-धीरे उन स्वाभाविक कर्मों से भी ऊपर उठ जाता है और गुणातीत हो जाता है ॥ ३२ ॥ महाराज ! जिस प्रकार बार-बार बोनेसे खेत स्वयं ही शक्तिहीन हो जाता है और उसमें अङ्कुर उगना बंद हो जाता है, यहाँतक कि उसमें बोया हुआ बीज भी नष्ट हो जाता है—उसी प्रकार यह चित्त, जो वासनाओंका खजाना है, विषयोंका अत्यन्त सेवन करनेसे स्वयं ही ऊब जाता है। परंतु स्वल्प भोगोंसे ऐसा नहीं होता। जैसे एक-एक बूँद घी डालनेसे आग नहीं बुझती, परंतु एक ही साथ अधिक घी पड़ जाय तो वह बुझ जाती है ॥ ३३-३४ ॥ जिस पुरुषके वर्णको बतलानेवाला जो लक्षण कहा गया है, वह यदि दूसरे वर्णवालेमें भी मिले तो उसे भी उसी वर्णका समझना चाहिये ॥ ३५ ॥

इति श्रीमद्‌भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां सप्तमस्कन्धे युधिष्ठिरनारदसंवादे सदाचारनिर्णयो नाम एकादशोऽध्यायः ॥ ११ ॥ 

हरिः ॐ तत्सत् श्रीकृष्णार्पणमस्तु ॥

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शुक्रवार, 31 जुलाई 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - ग्यारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०५)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
सप्तम स्कन्ध – ग्यारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०५)

मानवधर्म, वर्णधर्म और स्त्रीधर्म का निरूपण

स्त्रीणां च पतिदेवानां तत् शुश्रूषानुकूलता । 
तद्‍बन्धुष्वनुवृत्तिश्च नित्यं तद्व्रतधारणम् ॥ २५ ॥ 
सम्मार्जनोपलेपाभ्यां गृहमण्डनवर्तनैः । 
स्वयं च मण्डिता नित्यं परिमृष्टपरिच्छदा ॥ २६ ॥ 
कामैरुच्चावचैः साध्वी प्रश्रयेण दमेन च । 
वाक्यैः सत्यैः प्रियैः प्रेम्णा काले काले भजेत्पतिम् ॥ २७ ॥ 
सन्तुष्टालोलुपा दक्षा धर्मज्ञा प्रियसत्यवाक् । 
अप्रमत्ता शुचिः स्निग्धा पतिं त्वपतितं भजेत् ॥ २८ ॥ 
या पतिं हरिभावेन भजेत् श्रीरिव तत्परा । 
हर्यात्मना हरेर्लोके पत्या श्रीरिव मोदते ॥ २९ ॥ 

पतिकी सेवा करना, उसके अनुकूल रहना, पतिके सम्बन्धियोंको प्रसन्न रखना और सर्वदा पतिके नियमोंकी रक्षा करना—ये पतिको ही ईश्वर माननेवाली पतिव्रता स्त्रियोंके धर्म हैं ॥ २५ ॥ साध्वी स्त्रीको चाहिये कि झाडऩे-बुहारने, लीपने तथा चौक पूरने आदिसे घरको और मनोहर वस्त्राभूषणोंसे अपने शरीरको अलंकृत रखे। सामग्रियोंको साफ-सुथरी रखे ॥ २६ ॥ अपने पतिदेवकी छोटी-बड़ी इच्छाओंको समयके अनुसार पूर्ण करे। विनय, इन्द्रिय-संयम, सत्य एवं प्रिय वचनोंसे प्रेमपूर्वक पतिदेवकी सेवा करे ॥ २७ ॥ जो कुछ मिल जाय, उसीमें सन्तुष्ट रहे; किसी भी वस्तुके लिये ललचावे नहीं। सभी कार्योंमें चतुर एवं धर्मज्ञ हो। सत्य और प्रिय बोले। अपने कर्तव्यमें सावधान रहे। पवित्रता और प्रेमसे परिपूर्ण रहकर, यदि पति पतित न हो तो, उसका सहवास करे ॥ २८ ॥ जो लक्ष्मीजीके समान पतिपरायणा होकर अपने पतिकी उसे साक्षात् भगवान्‌का स्वरूप समझकर सेवा करती है, उसके पतिदेव वैकुण्ठलोक में भगवत्सारूप्य को प्राप्त होते हैं और वह लक्ष्मीजीके समान उनके साथ आनन्दित होती है ॥ २९ ॥

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श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - ग्यारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०४)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
सप्तम स्कन्ध – ग्यारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०४)

मानवधर्म, वर्णधर्म और स्त्रीधर्म का निरूपण

शमो दमस्तपः शौचं सन्तोषः क्षान्तिरार्जवम् । 
ज्ञानं दयाच्युतात्मत्वं सत्यं च ब्रह्मलक्षणम् ॥ २१ ॥ 
शौर्यं वीर्यं धृतिस्तेजः त्याग आत्मजयः क्षमा । 
ब्रह्मण्यता प्रसादश्च सत्यं च क्षत्रलक्षणम् ॥ २२ ॥ 
देवगुर्वच्युते भक्तिः त्रिवर्गपरिपोषणम् । 
आस्तिक्यं उद्यमो नित्यं नैपुण्यं वैश्यलक्षणम् ॥ २३ ॥ 
शूद्रस्य सन्नतिः शौचं सेवा स्वामिन्यमायया । 
अमन्त्रयज्ञो ह्यस्तेयं सत्यं गोविप्र रक्षणम् ॥ २४ ॥

शम, दम, तप, शौच, सन्तोष, क्षमा, सरलता, ज्ञान, दया, भगवत्परायणता और सत्य—ये ब्राह्मणके लक्षण हैं ॥ २१ ॥ युद्धमें उत्साह, वीरता, धीरता, तेजस्विता, त्याग, मनोजय, क्षमा, ब्राह्मणोंके प्रति भक्ति, अनुग्रह और प्रजाकी रक्षा करना—ये क्षत्रियके लक्षण हैं ॥ २२ ॥ देवता, गुरु और भगवान्‌ के प्रति भक्ति, अर्थ, धर्म और काम—इन तीनों पुरुषार्थों की रक्षा करना; आस्तिकता, उद्योगशीलता और व्यावहारिक निपुणता—ये वैश्य के लक्षण हैं ॥ २३ ॥ उच्च वर्णों के सामने विनम्र रहना, पवित्रता, स्वामीकी निष्कपट सेवा, वैदिक मन्त्रोंसे रहित यज्ञ, चोरी न करना, सत्य तथा गौ-ब्राह्मणोंकी रक्षा करना—ये शूद्रके लक्षण हैं ॥ २४ ॥

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गुरुवार, 30 जुलाई 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - ग्यारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०३)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
सप्तम स्कन्ध – ग्यारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०३)

मानवधर्म, वर्णधर्म और स्त्रीधर्म का निरूपण

संस्कारा यदविच्छिन्नाः स द्विजोऽजो जगाद यम् । 
इज्याध्ययनदानानि विहितानि द्विजन्मनाम् । 
जन्मकर्मावदातानां क्रियाश्चाश्रमचोदिताः ॥ १३ ॥ 
विप्रस्याध्ययनादीनि षडन्यस्याप्रतिग्रहः । 
राज्ञो वृत्तिः प्रजागोप्तुः अविप्राद् वा करादिभिः ॥ १४ ॥ 
वैश्यस्तु वार्तावृत्तिश्च नित्यं ब्रह्मकुलानुगः । 
शूद्रस्य द्विजशुश्रूषा वृत्तिश्च स्वामिनो भवेत् ॥ १५ ॥ 
वार्ता विचित्रा शालीन यायावरशिलोञ्छनम् । 
विप्रवृत्तिश्चतुर्धेयं श्रेयसी चोत्तरोत्तरा ॥ १६ ॥ 
जघन्यो नोत्तमां वृत्तिं अनापदि भजेन्नरः । 
ऋते राजन्यमापत्सु सर्वेषामपि सर्वशः ॥ १७ ॥ 
ऋतां ऋताभ्यां जीवेत मृतेन प्रमृतेन वा । 
सत्यानृताभ्यां जीवेत न श्ववृत्त्या कदाचन ॥ १८ ॥ 
ऋतमुञ्छशिलं प्रोक्तं अमृतं यद् अयाचितम् । 
मृतं तु नित्ययांच्या स्यात् प्रमृतं कर्षणं स्मृतम् ॥ १९ ॥ 
सत्यानृतं च वाणिज्यं श्ववृत्तिर्नीचसेवनम् । 
वर्जयेत्तां सदा विप्रो राजन्यश्च जुगुप्सिताम् । 
सर्ववेदमयो विप्रः सर्वदेवमयो नृपः ॥ २० ॥ 

धर्मराज ! जिनके वंशमें अखण्डरूप से संस्कार होते आये हैं और जिन्हें ब्रह्माजी ने संस्कार के योग्य स्वीकार किया है, उन्हें द्विज कहते हैं। जन्म और कर्म से शुद्ध द्विजोंके लिये यज्ञ, अध्ययन, दान और ब्रह्मचर्य आदि आश्रमों के विशेष कर्मों का विधान है ॥ १३ ॥ अध्ययन, अध्यापन, दान लेना, दान देना और यज्ञ करना, यज्ञ कराना—ये छ: कर्म ब्राह्मणके हैं। क्षत्रियको दान नहीं लेना चाहिये। प्रजाकी रक्षा करनेवाले क्षत्रियका जीवन-निर्वाह ब्राह्मणके सिवा और सबसे यथायोग्य कर तथा दण्ड (जुर्माना) आदिके द्वारा होता है ॥ १४ ॥ वैश्यको सर्वदा ब्राह्मण वंशका अनुयायी रहकर गोरक्षा, कृषि एवं व्यापारके द्वारा अपनी जीविका चलानी चाहिये। शूद्रका धर्म है द्विजातियोंकी सेवा। उसकी जीविका का निर्वाह उसका स्वामी करता है ॥ १५ ॥ 
ब्राह्मणके जीवन-निर्वाहके साधन चार प्रकार के हैं—१-वार्ता (यज्ञादि कराकर धन लेना), २-शालीन (बिना मांगे जो कुछ मिल जाए उसीमें निर्वाह करना), ३-यायावर(नित्यप्रति धान्यादि मांग लाना) और ४-शिलोञ्छन [*] । इनमेंसे पीछे-पीछेकी वृत्तियाँ अपेक्षाकृत श्रेष्ठ हैं ॥ १६ ॥ निम्नवर्ण का पुरुष बिना आपत्तिकाल के उत्तम वर्णकी वृत्तियोंका अवलम्बन न करे। क्षत्रिय दान लेना छोडक़र ब्राह्मणकी शेष पाँचों वृत्तियोंका अवलम्बन ले सकता है। आपत्तिकालमें सभी सब वृत्तियोंको स्वीकार कर सकते हैं ॥ १७ ॥ 
ऋत, अमृत, मृत, प्रमृत और सत्यानृत—इनमेंसे किसी भी वृत्तिका आश्रय ले, परंतु श्वानवृत्ति का अवलम्बन कभी न करे ॥ १८ ॥ बाजारमें पड़े हुए अन्न (उञ्छ) तथा खेतोंमें पड़े हुए अन्न (शिल) को बीनकर ‘शिलोञ्छ’ वृत्तिसे जीविका-निर्वाह करना ‘ऋत’ है। बिना माँगे जो कुछ मिल जाय, उसी अयाचित (शालीन) वृत्तिके द्वारा जीवन-निर्वाह करना ‘अमृत’ है। नित्य माँगकर लाना अर्थात् ‘ययावर’ वृत्तिके द्वारा जीवन-यापन करना ‘मृत’ है। कृषि आदिके द्वारा ‘वार्ता’ वृत्तिसे जीवन-निर्वाह करना ‘प्रमृत’ है ॥ १९ ॥ वाणिज्य ‘सत्यानृत’ है और निम्नवर्णकी सेवा करना श्वानवृत्ति है। ब्राह्मण और क्षत्रियको इस अन्तिम निन्दित वृत्तिका कभी आश्रय नहीं लेना चाहिये। क्योंकि ब्राह्मण सर्ववेदमय और क्षत्रिय (राजा) सर्वदेवमय है ॥ २० ॥
.............................................................
[*] किसानके खेत काटकर अन्न घरको ले जानेपर पृथ्वीपर जो कण पड़े रह जाते हैं, उन्हें ‘शिल’ तथा बाजारमें पड़े हुए अन्नके दानों को ‘उञ्छ’ कहते हैं। उन शिल और उञ्छोंको बीनकर अपना निर्वाह करना ‘शिलोञ्छन’ वृत्ति है।

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श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - ग्यारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०२)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
सप्तम स्कन्ध – ग्यारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०२)

मानवधर्म, वर्णधर्म और स्त्रीधर्म का निरूपण

धर्ममूलं हि भगवान् सर्ववेदमयो हरिः । 
स्मृतं च तद्विदां राजन् येन चात्मा प्रसीदति ॥ ७ ॥ 
सत्यं दया तपः शौचं तितिक्षेक्षा शमो दमः । 
अहिंसा ब्रह्मचर्यं च त्यागः स्वाध्याय आर्जवम् ॥ ८ ॥ 
सन्तोषः समदृक् सेवा ग्राम्येहोपरमः शनैः । 
नृणां विपर्ययेहेक्षा मौनं आत्मविमर्शनम् ॥ ९ ॥ 
अन्नाद्यादेः संविभागो भूतेभ्यश्च यथार्हतः । 
तेष्वात्मदेवताबुद्धिः सुतरां नृषु पाण्डव ॥ १० ॥ 
श्रवणं कीर्तनं चास्य स्मरणं महतां गतेः । 
सेवेज्यावनतिर्दास्यं सख्यमात्म समर्पणम् ॥ ११ ॥ 
नृणामयं परो धर्मः सर्वेषां समुदाहृतः । 
त्रिंशत् लक्षणवान् राजन् सर्वात्मा येन तुष्यति ॥ १२ ॥ 

युधिष्ठिर ! सर्ववेदस्वरूप भगवान्‌ श्रीहरि, उनका तत्त्व जाननेवाले महर्षियोंकी स्मृतियाँ और जिससे आत्मग्लानि न होकर आत्मप्रसाद की उपलब्धि हो, वह कर्म धर्मके मूल हैं ॥ ७ ॥
युधिष्ठिर ! धर्मके ये तीस लक्षण शास्त्रोंमें कहे गये हैं—सत्य, दया, तपस्या, शौच, तितिक्षा, उचित-अनुचितका विचार, मनका संयम, इन्द्रियोंका संयम, अहिंसा, ब्रह्मचर्य, त्याग, स्वाध्याय, सरलता, सन्तोष, समदर्शी महात्माओंकी सेवा, धीरे-धीरे सांसारिक भोगोंकी चेष्टासे निवृत्ति, मनुष्यके अभिमानपूर्ण प्रयत्नोंका फल उलटा ही होता है—ऐसा विचार, मौन, आत्मचिन्तन, प्राणियोंको अन्न आदिका यथायोग्य विभाजन, उनमें और विशेष करके मनुष्योंमें अपने आत्मा तथा इष्टदेवका भाव, संतोंके परम आश्रय भगवान्‌ श्रीकृष्णके नाम-गुण-लीला आदिका श्रवण, कीर्तन, स्मरण, उनकी सेवा, पूजा और नमस्कार; उनके प्रति दास्य, सख्य और आत्म-समर्पण— यह तीस प्रकारका आचरण सभी मनुष्योंका परम धर्म है। इसके पालनसे सर्वात्मा भगवान्‌ प्रसन्न होते हैं ॥ ८—१२ ॥

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बुधवार, 29 जुलाई 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - ग्यारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०१)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
सप्तम स्कन्ध – ग्यारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०१)

मानवधर्म, वर्णधर्म और स्त्रीधर्म का निरूपण

श्रीशुक उवाच - 
श्रुत्वेहितं साधु सभासभाजितं 
     महत्तमाग्रण्य उरुक्रमात्मनः । 
युधिष्ठिरो दैत्यपतेर्मुदा युतः 
     पप्रच्छ भूयस्तनयं स्वयम्भुवः ॥ १ ॥ 

युधिष्ठिर उवाच - 

भगवन् श्रोतुमिच्छामि नृणां धर्मं सनातनम् । 
वर्णाश्रमाचारयुतं यत् पुमान् विन्दते परम् ॥ २ ॥ 
भवान् प्रजापतेः साक्षात् आत्मजः परमेष्ठिनः । 
सुतानां सम्मतो ब्रह्मन् तपोयोगसमाधिभिः ॥ ३ ॥ 
नारायणपरा विप्रा धर्मं गुह्यं परं विदुः । 
करुणाः साधवः शान्ताः त्वद्विधा न तथापरे ॥ ४ ॥ 

नारद उवाच - 
नत्वा भगवतेऽजाय लोकानां धर्महेतवे । 
वक्ष्ये सनातनं धर्मं नारायणमुखात् श्रुतम् ॥ ५ ॥ 
योऽवतीर्यात्मनोंऽशेन दाक्षायण्यां तु धर्मतः । 
लोकानां स्वस्तयेऽध्यास्ते तपो बदरिकाश्रमे ॥ ६ ॥ 

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—भगवन्मय प्रह्लादजी के साधुसमाज में सम्मानित पवित्र चरित्र सुनकर संतशिरोमणि युधिष्ठिरको बड़ा आनन्द हुआ। उन्होंने नारदजीसे और भी पूछा ॥ १ ॥
युधिष्ठिरजीने कहा—भगवन् ! अब मैं वर्ण और आश्रमोंके सदाचारके साथ मनुष्योंके सनातनधर्म का श्रवण करना चाहता हूँ, क्योंकि धर्मसे ही मनुष्यको ज्ञान, भगवत्प्रेम और साक्षात् परम पुरुष भगवान्‌की प्राप्ति होती है ॥ २ ॥ आप स्वयं प्रजापति ब्रह्माजीके पुत्र हैं और नारदजी ! आपकी तपस्या, योग एवं समाधिके कारण वे अपने दूसरे पुत्रोंकी अपेक्षा आपका अधिक सम्मान, भी करते हैं ॥ ३ ॥ आपके समान नारायण-परायण, दयालु, सदाचारी और शान्त ब्राह्मण धर्मके गुप्त-से-गुप्त रहस्यको जैसा यथार्थरूपसे जानते हैं, दूसरे लोग वैसा नहीं जानते ॥ ४ ॥
नारदजीने कहा—युधिष्ठिर ! अजन्मा भगवान्‌ ही समस्त धर्मोंके मूल कारण हैं। वही प्रभु चराचर जगत् के कल्याणके लिये धर्म और दक्षपुत्री मूर्तिके द्वारा अपने अंशसे अवतीर्ण होकर बदरिकाश्रममें तपस्या कर रहे हैं। उन नारायण भगवान्‌को नमस्कार करके उन्हींके मुखसे सुने हुए सनातनधर्मका मैं वर्णन करता हूँ ॥ ५-६ ॥ 

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श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - दसवाँ अध्याय..(पोस्ट०९)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
सप्तम स्कन्ध – दसवाँ अध्याय..(पोस्ट०९)

प्रह्लादजी के राज्याभिषेक और त्रिपुरदहन की कथा

विलोक्य भग्नसङ्कल्पं विमनस्कं वृषध्वजम्
तदायं भगवान्विष्णुस्तत्रोपायमकल्पयत् ॥ ६१ ॥
वत्सश्चासीत्तदा ब्रह्मा स्वयं विष्णुरयं हि गौः
प्रविश्य त्रिपुरं काले रसकूपामृतं पपौ ॥ ६२ ॥
तेऽसुरा ह्यपि पश्यन्तो न न्यषेधन्विमोहिताः
तद्विज्ञाय महायोगी रसपालानिदं जगौ ॥ ६३ ॥
स्मयन्विशोकः शोकार्तान्स्मरन्दैवगतिं च ताम्
देवोऽसुरो नरोऽन्यो वा नेश्वरोऽस्तीह कश्चन ॥ ६४ ॥
आत्मनोऽन्यस्य वा दिष्टं दैवेनापोहितुं द्वयोः
अथासौ शक्तिभिः स्वाभिः शम्भोः प्राधानिकं व्यधात् ॥ ६५ ॥
धर्मज्ञानविरक्त्यृद्धि तपोविद्याक्रियादिभिः
रथं सूतं ध्वजं वाहान्धनुर्वर्मशरादि यत् ॥ ६६ ॥
सन्नद्धो रथमास्थाय शरं धनुरुपाददे
शरं धनुषि सन्धाय मुहूर्तेऽभिजितीश्वरः ॥ ६७ ॥
ददाह तेन दुर्भेद्या हरोऽथ त्रिपुरो नृप
दिवि दुन्दुभयो नेदुर्विमानशतसङ्कुलाः ॥ ६८ ॥
देवर्षिपितृसिद्धेशा जयेति कुसुमोत्करैः
अवाकिरन्जगुर्हृष्टा ननृतुश्चाप्सरोगणाः ॥ ६९ ॥
एवं दग्ध्वा पुरस्तिस्रो भगवान्पुरहा नृप
ब्रह्मादिभिः स्तूयमानः स्वं धाम प्रत्यपद्यत ॥ ७० ॥
एवं विधान्यस्य हरेः स्वमायया 
विडम्बमानस्य नृलोकमात्मनः
वीर्याणि गीतान्यृषिभिर्जगद्गुरो-
र्लोकं पुनानान्यपरं वदामि किम् ॥ ७१ ॥

इन्हीं भगवान्‌ श्रीकृष्णने जब देखा कि महादेवजी तो अपना संकल्प पूरा न होनेके कारण उदास हो गये हैं, तब उन असुरों पर विजय प्राप्त करने के लिये इन्होंने एक युक्ति की ॥ ६१ ॥ यही भगवान्‌ विष्णु उस समय गौ बन गये और ब्रह्माजी बछड़ा बने। दोनों ही मध्याह्न के समय उन तीनों पुरोंमें गये और उस सिद्धरसके कुएँका सारा अमृत पी गये ॥ ६२ ॥ यद्यपि उसके रक्षक दैत्य इन दोनोंको देख रहे थे, फिर भी भगवान्‌की मायासे वे इतने मोहित हो गये कि इन्हें रोक न सके। जब उपाय जाननेवालोंमें श्रेष्ठ मयासुरको यह बात मालूम हुई, तब भगवान्‌की इस लीलाका स्मरण करके उसे कोई शोक न हुआ। शोक करनेवाले अमृत रक्षकोंसे उसने कहा—‘भाई ! देवता, असुर, मनुष्य अथवा और कोई भी प्राणी अपने, पराये अथवा दोनोंके लिये जो प्रारब्धका विधान है, उसे मिटा नहीं सकता। जो होना था, हो गया। शोक करके क्या करना है ?’ इसके बाद भगवान्‌ श्रीकृष्णने अपनी शक्तियोंके द्वारा भगवान्‌ शङ्करके युद्धकी सामग्री तैयार की ॥ ६३—६५ ॥ उन्होंने धर्मसे रथ, ज्ञानसे सारथि, वैराग्यसे ध्वजा, ऐश्वर्यसे घोड़े, तपस्यासे धनुष, विद्यासे कवच, क्रियासे बाण और अपनी अन्यान्य शक्तियोंसे अन्यान्य वस्तुओंका निर्माण किया ॥ ६६ ॥ इन सामग्रियोंसे सज-धजकर भगवान्‌ शङ्कर रथपर सवार हुए एवं धनुष-बाण धारण किया। भगवान्‌ शङ्करने अभिजित् मुहूर्तमें धनुषपर बाण चढ़ाया और उन तीनों दुर्भेद्य विमानोंको भस्म कर दिया। युधिष्ठिर ! उसी समय स्वर्गमें दुन्दुभियाँ बजने लगीं। सैंकड़ों विमानोंकी भीड़ लग गयी ॥ ६७-६८ ॥ देवता, ऋषि, पितर और सिद्धेश्वर आनन्दसे जय-जयकार करते हुए पुष्पोंकी वर्षा करने लगे। अप्सराएँ नाचने और गाने लगीं ॥ ६९ ॥ युधिष्ठिर ! इस प्रकार उन तीनों पुरोंको जलाकर भगवान्‌ शङ्करने ‘पुरारि’की पदवी प्राप्त की और ब्रह्मादिकोंकी स्तुति सुनते हुए अपने धामको चले गये ॥ ७० ॥ आत्मस्वरूप जगद्गुरु भगवान्‌ श्रीकृष्ण इस प्रकार अपनी मायासे जो मनुष्योंकी-सी लीलाएँ करते हैं, ऋषिलोग उन्हीं अनेकों लोकपावन लीलाओंका गान किया करते हैं। बताओ, अब मैं तुम्हें और क्या सुनाऊँ ॥ ७१ ॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां सप्तमस्कन्धे युधिष्ठिरनारदसंवादे त्रिपुरविजये नाम दशमोऽध्यायः

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मंगलवार, 28 जुलाई 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - दसवाँ अध्याय..(पोस्ट०८)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
सप्तम स्कन्ध – दसवाँ अध्याय..(पोस्ट०८)

प्रह्लादजी के राज्याभिषेक और त्रिपुरदहन की कथा

राजोवाच
कस्मिन्कर्मणि देवस्य मयोऽहन्जगदीशितुः
यथा चोपचिता कीर्तिः कृष्णेनानेन कथ्यताम् ॥ ५२ ॥

श्रीनारद उवाच
निर्जिता असुरा देवैर्युध्यनेनोपबृंहितैः
मायिनां परमाचार्यं मयं शरणमाययुः ॥ ५३ ॥
स निर्माय पुरस्तिस्रो हैमीरौप्यायसीर्विभुः
दुर्लक्ष्यापायसंयोगा दुर्वितर्क्यपरिच्छदाः ॥ ५४ ॥
ताभिस्तेऽसुरसेनान्यो लोकांस्त्रीन्सेश्वरान्नृप
स्मरन्तो नाशयां चक्रुः पूर्ववैरमलक्षिताः ॥ ५५ ॥
ततस्ते सेश्वरा लोका उपासाद्येश्वरं नताः
त्राहि नस्तावकान्देव विनष्टांस्त्रिपुरालयैः ॥ ५६ ॥
अथानुगृह्य भगवान्मा भैष्टेति सुरान्विभुः
शरं धनुषि सन्धाय पुरेष्वस्त्रं व्यमुञ्चत ॥ ५७ ॥
ततोऽग्निवर्णा इषव उत्पेतुः सूर्यमण्डलात्
यथा मयूखसन्दोहा नादृश्यन्त पुरो यतः ॥ ५८ ॥
तैः स्पृष्टा व्यसवः सर्वे निपेतुः स्म पुरौकसः
तानानीय महायोगी मयः कूपरसेऽक्षिपत् ॥ ५९ ॥
सिद्धामृतरसस्पृष्टा वज्रसारा महौजसः
उत्तस्थुर्मेघदलना वैद्युता इव वह्नयः ॥ ६० ॥

राजा युधिष्ठिरने पूछा—नारदजी ! मय दानव किस कार्यमें जगदीश्वर रुद्रदेवका यश नष्ट करना चाहता था ? और भगवान्‌ श्रीकृष्णने किस प्रकार उनके यशकी रक्षा की ? आप कृपा करके बतलाइये ॥ ५२ ॥
नारदजीने कहा—एक बार इन्हीं भगवान्‌ श्रीकृष्णसे शक्ति प्राप्त करके देवताओंने युद्धमें असुरोंको जीत लिया था। उस समय सब-के-सब असुर मायावियोंके परमगुरु मय दानवकी शरणमें गये ॥ ५३ ॥ शक्तिशाली मयासुरने सोने, चाँदी और लोहेके तीन विमान बना दिये। वे विमान क्या थे, तीन पुर ही थे। वे इतने विलक्षण थे कि उनका आना-जाना जान नहीं पड़ता था। उनमें अपरिमित सामग्रियाँ भरी हुई थीं ॥ ५४ ॥ युधिष्ठिर ! दैत्यसेनापतियोंके मनमें तीनों लोक और लोकपतियोंके प्रति वैरभाव तो था ही, अब उसकी याद करके उन तीनों विमानोंके द्वारा वे उनमें छिपे रहकर सबका नाश करने लगे ॥ ५५ ॥ तब लोकपालोंके साथ सारी प्रजा भगवान्‌ शङ्करकी शरणमें गयी और उनसे प्रार्थना की कि ‘प्रभो ! त्रिपुरमें रहनेवाले असुर हमारा नाश कर रहे हैं। हम आपके हैं; अत: देवाधिदेव ! आप हमारी रक्षा कीजिये’ ॥ ५६ ॥
उनकी प्रार्थना सुनकर भगवान्‌ शङ्करने कृपापूर्ण शब्दोंमें कहा—‘डरो मत।’ फिर उन्होंने अपने धनुषपर बाण चढ़ाकर तीनों पुरोंपर छोड़ दिया ॥ ५७ ॥ उनके उस बाणसे सूर्यमण्डलसे निकलनेवाली किरणोंके समान अन्य बहुत-से बाण निकले। उनमेंसे मानो आगकी लपटें निकल रही थीं। उनके कारण उन पुरों का दीखना बंद हो गया ॥ ५८ ॥ उनके स्पर्श से सभी विमाननिवासी निष्प्राण होकर गिर पड़े। महामायावी मय बहुत-से उपाय जानता था, वह उन दैत्योंको उठा लाया और अपने बनाये हुए अमृतके कुएँमें डाल दिया ॥ ५९ ॥ उस सिद्ध अमृत-रसका स्पर्श होते ही असुरोंका शरीर अत्यन्त तेजस्वी और वज्रके समान सुदृढ़ हो गया। वे बादलोंको विदीर्ण करनेवाली बिजलीकी आगकी तरह उठ खड़े हुए ॥ ६० ॥

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श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - दसवाँ अध्याय..(पोस्ट०७)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
सप्तम स्कन्ध – दसवाँ अध्याय..(पोस्ट०७)

प्रह्लादजी के राज्याभिषेक और त्रिपुरदहन की कथा

यूयं नृलोके बत भूरिभागा 
लोकं पुनाना मुनयोऽभियन्ति
येषां गृहानावसतीति साक्षाद्
गूढं परं ब्रह्म मनुष्यलिङ्गम् ॥ ४८ ॥
स वा अयं ब्रह्म महद्विमृग्य 
कैवल्यनिर्वाणसुखानुभूतिः
प्रियः सुहृद्वः खलु मातुलेय 
आत्मार्हणीयो विधिकृद्गुरुश्च ॥ ४९ ॥
न यस्य साक्षाद्भवपद्मजादिभी 
रूपं धिया वस्तुतयोपवर्णितम्
मौनेन भक्त्योपशमेन पूजितः 
प्रसीदतामेष स सात्वतां पतिः ॥ ५० ॥
स एष भगवान्राजन्व्यतनोद्विहतं यशः
पुरा रुद्र स्य देवस्य मयेनानन्तमायिना ॥ ५१ ॥

युधिष्ठिर ! इस मनुष्यलोकमें तुमलोगोंके भाग्य अत्यन्त प्रशंसनीय हैं, क्योंकि तुम्हारे घरमें साक्षात् परब्रह्म परमात्मा मनुष्यका रूप धारण करके गुप्तरूपसे निवास करते हैं। इसीसे सारे संसारको पवित्र कर देनेवाले ऋषि-मुनि बार-बार उनका दर्शन करनेके लिये चारों ओरसे तुम्हारे पास आया करते हैं ॥ ४८ ॥ बड़े-बड़े महापुरुष निरन्तर जिनको ढूँढ़ते रहते हैं, जो मायाके लेशसे रहित परम शान्त परमानन्दानुभवस्वरूप परब्रह्म परमात्मा हैं—वे ही तुम्हारे प्रिय, हितैषी, ममेरे भाई, पूज्य, आज्ञाकारी, गुरु और स्वयं आत्मा श्रीकृष्ण हैं ॥ ४९ ॥ शङ्कर, ब्रह्मा आदि भी अपनी सारी बुद्धि लगाकर ‘वे यह हैं’—इस रूपमें उनका वर्णन नहीं कर सके। फिर हम तो कर ही कैसे सकते हैं। हम तो मौन, भक्ति और संयमके द्वारा ही उनकी पूजा करते हैं। कृपया हमारी यह पूजा स्वीकार करके भक्तवत्सल भगवान्‌ हमपर प्रसन्न हों ॥ ५० ॥ युधिष्ठिर यही एकमात्र आराध्यदेव हैं। प्राचीन कालमें बहुत बड़े मायावी मयासुरने जब रुद्रदेवकी कमनीय कीर्तिमें कलङ्क लगाना चाहा था, तब इन्हीं भगवान्‌ श्रीकृष्णने फरिसे उनके यशकी रक्षा और विस्तार किया था ॥ ५१ ॥

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सोमवार, 27 जुलाई 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - दसवाँ अध्याय..(पोस्ट०६)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
सप्तम स्कन्ध – दसवाँ अध्याय..(पोस्ट०६)

प्रह्लादजी के राज्याभिषेक और त्रिपुरदहन की कथा

आख्यातं सर्वमेतत्ते यन्मां त्वं परिपृष्टवान्
दमघोषसुतादीनां हरेः सात्म्यमपि द्विषाम् ॥ ४१ ॥
एषा ब्रह्मण्यदेवस्य कृष्णस्य च महात्मनः
अवतारकथा पुण्या वधो यत्रादिदैत्ययोः ॥ ४२ ॥
प्रह्लादस्यानुचरितं महाभागवतस्य च
भक्तिर्ज्ञानं विरक्तिश्च याथार्थ्यं चास्य वै हरेः ॥ ४३ ॥
सर्गस्थित्यप्ययेशस्य गुणकर्मानुवर्णनम्
परावरेषां स्थानानां कालेन व्यत्ययो महान् ॥ ४४ ॥
धर्मो भागवतानां च भगवान्येन गम्यते
आख्यानेऽस्मिन्समाम्नातमाध्यात्मिकमशेषतः ॥ ४५ ॥
य एतत्पुण्यमाख्यानं विष्णोर्वीर्योपबृंहितम्
कीर्तयेच्छ्रद्धया श्रुत्वा कर्मपाशैर्विमुच्यते ॥ ४६ ॥
एतद्य आदिपुरुषस्य मृगेन्द्र लीलां
दैत्येन्द्र यूथपवधं प्रयतः पठेत
दैत्यात्मजस्य च सतां प्रवरस्य पुण्यं
श्रुत्वानुभावमकुतोभयमेति लोकम् ॥ ४७ ॥

युधिष्ठिर ! तुमने मुझसे पूछा था कि भगवान्‌ से द्वेष करनेवाले शिशुपाल आदि को उनके सारूप्य की प्राप्ति कैसे हुई। उसका उत्तर मैंने तुम्हें दे दिया ॥ ४१ ॥ ब्रह्मण्यदेव परमात्मा श्रीकृष्ण का यह परम पवित्र अवतार-चरित्र है। इसमें हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु इन दोनों दैत्यों के वध का वर्णन है ॥ ४२ ॥ इस प्रसङ्ग में भगवान्‌ के परम भक्त प्रह्लादका चरित्र, भक्ति, ज्ञान, वैराग्य; एवं संसारकी सृष्टि, स्थिति और प्रलयके स्वामी श्रीहरिके यथार्थ स्वरूप तथा उनके दिव्य गुण एवं लीलाओंका वर्णन है। इस आख्यानमें देवता और दैत्योंके पदोंमें कालक्रमसे जो महान् परिवर्तन होता है, उसका भी निरूपण किया गया है ॥ ४३-४४ ॥ जिसके द्वारा भगवान्‌की प्राप्ति होती है, उस भागवतधर्मका भी वर्णन है। अध्यात्मके सम्बन्धमें भी सभी जाननेयोग्य बातें इसमें हैं ॥ ४५ ॥ भगवान्‌के पराक्रमसे पूर्ण इस पवित्र आख्यानको जो कोई पुरुष श्रद्धासे कीर्तन करता और सुनता है, वह कर्मबन्धनसे मुक्त हो जाता है ॥ ४६ ॥ जो मनुष्य परम पुरुष परमात्माकी यह श्रीनृसिंह- लीला, सेनापतियोंसहित हिरण्यकशिपुका वध और संतशिरोमणि प्रह्लादजीका पावन प्रभाव एकाग्र मनसे पढ़ता और सुनता है, वह भगवान्‌के अभयपद वैकुण्ठको प्राप्त होता है ॥ ४७ ॥

शेष आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - तेरहवाँ अध्याय..(पोस्ट०५)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ श्रीमद्भागवतमहापुराण  सप्तम स्कन्ध – तेरहवाँ अध्याय..(पोस्ट०५) यतिधर्मका निरूपण और अवधूत-प्रह्लाद-संवाद सुखमस्यात्...