सोमवार, 22 जून 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - पाँचवां अध्याय..(पोस्ट१३)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
सप्तम स्कन्ध – पाँचवाँ अध्याय..(पोस्ट१३)

हिरण्यकशिपु के द्वारा प्रह्लादजी के वध का प्रयत्न

इति तच्चिन्तया किञ्चिन्म्लानश्रियमधोमुखम्
शण्डामर्कावौशनसौ विविक्त इति होचतुः ||४८||
जितं त्वयैकेन जगत्त्रयं भ्रुवो-
र्विजृम्भणत्रस्तसमस्तधिष्ण्यपम्
न तस्य चिन्त्यं तव नाथ चक्ष्वहे 
न वै शिशूनां गुणदोषयोः पदम् ||४९||
इमं तु पाशैर्वरुणस्य बद्ध्वा 
निधेहि भीतो न पलायते यथा
बुद्धिश्च पुंसो वयसार्यसेवया 
यावद्गुरुर्भार्गव आगमिष्यति ||५०||

इस प्रकार सोच-विचार करते-करते उसका चेहरा कुछ उतर गया। शुक्राचार्य के पुत्र शण्ड और अमर्क ने जब देखा कि हिरण्यकशिपु तो मुँह लटकाकर बैठा हुआ है, तब उन्होंने एकान्त में जाकर उससे यह बात कही— ॥ ४८ ॥ ‘स्वामी ! आपने अकेले ही तीनों लोकों पर विजय प्राप्त कर ली। आपके भौंहें टेढ़ी करनेपर ही सारे लोकपाल काँप उठते हैं। हमारे देखने में तो आपके लिये चिन्ता की कोई बात नहीं है। भला, बच्चोंके खिलवाड़ में भी भलाई-बुराई सोचने की कोई बात है ॥ ४९ ॥ जब तक हमारे पिता शुक्राचार्य जी नहीं आ जाते, तब तक यह डरकर कहीं भाग न जाय। इसलिये इसे वरुणके पाशों से बाँध रखिये। प्राय: ऐसा होता है कि अवस्था की वृद्धि के साथ-साथ और गुरुजनों की सेवा से बुद्धि सुधर जाया करती है’ ॥ ५० ॥

शेष आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - पाँचवां अध्याय..(पोस्ट१२)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
सप्तम स्कन्ध – पाँचवाँ अध्याय..(पोस्ट१२)

हिरण्यकशिपु के द्वारा प्रह्लादजी के वध का प्रयत्न

चिन्तां दीर्घतमां प्राप्तस्तत्कर्तुं नाभ्यपद्यत
एष मे बह्वसाधूक्तो वधोपायाश्च निर्मिताः
तैस्तैद्रोहैरसद्धर्मैर्मुक्तः स्वेनैव तेजसा ||४५||
वर्तमानोऽविदूरे वै बालोऽप्यजडधीरयम्
न विस्मरति मेऽनार्यं शुनः शेप इव प्रभुः ||४६||
अप्रमेयानुभावोऽयमकुतश्चिद्भयोऽमरः
नूनमेतद्विरोधेन मृत्युर्मे भविता न वा ||४७||

वह (हिरण्यकशिपु ) सोचने लगा—‘इसे मैंने बहुत कुछ बुरा- भला कहा, मार डालने के बहुत-से उपाय किये। परंतु यह मेरे द्रोह और दुर्व्यवहारों से बिना किसी की सहायता से अपने प्रभाव से ही बचता गया ॥ ४५ ॥ यह बालक होने पर भी समझदार है और मेरे पास ही नि:शङ्क भाव से रहता है। हो-न-हो इसमें कुछ सामर्थ्य अवश्य है। जैसे शुन:शेप[*] अपने पिता की करतूतों से उसका विरोधी हो गया था, वैसे ही यह भी मेरे किये अपकारों को न भूलेगा ॥ ४६ ॥ न तो यह किसी से डरता है और न इसकी मृत्यु ही होती है। इसकी शक्ति की थाह नहीं है। अवश्य ही इसके विरोध से मेरी मृत्यु होगी। सम्भव है, न भी हो’ ॥ ४७ ॥
...................................... 
[*] शुन:शेप अजीगर्त का मँझला पुत्र था। उसे पिता ने वरुण के यज्ञ में बलि देने के लिये हरिश्चन्द्र के पुत्र रोहिताश्व के हाथ बेच दिया था। तब उसके मामा विश्वामित्रजी ने उसकी रक्षा की और वह अपने पिता से विरुद्ध होकर उनके विपक्षी विश्वामित्रजी के ही गोत्र में हो गया। यह कथा आगे ‘नवम स्कन्ध’के सातवें अध्याय में आवेगी।

शेष आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


रविवार, 21 जून 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - पाँचवां अध्याय..(पोस्ट११)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
सप्तम स्कन्ध – पाँचवाँ अध्याय..(पोस्ट११)

हिरण्यकशिपु के द्वारा प्रह्लादजी के वध का प्रयत्न

प्रयासेऽपहते तस्मिन्दैत्येन्द्रः परिशङ्कितः
चकार तद्वधोपायान्निर्बन्धेन युधिष्ठिर ||४२||
दिग्गजैर्दन्दशूकेन्द्रैरभिचारावपातनैः
मायाभिः सन्निरोधैश्च गरदानैरभोजनैः ||४३||
हिमवाय्वग्निसलिलैः पर्वताक्रमणैरपि
न शशाक यदा हन्तुमपापमसुरः सुतम् ||४४||

युधिष्ठिर ! जब शूलों की मार से प्रह्लाद के शरीर पर कोई असर नहीं हुआ, तब हिरण्यकशिपु को बड़ी शङ्का हुई। अब वह प्रह्लाद को मार डालनेके लिये बड़े हठ से भाँति-भाँति के उपाय करने लगा ॥ ४२ ॥ उसने उन्हें बड़े-बड़े मतवाले हाथियों से कुचलवाया, विषधर साँपों से डँसवाया, पुरोहितों से कृत्या राक्षसी उत्पन्न करायी, पहाडक़ी चोटी से नीचे डलवा दिया, शम्बरासुर से अनेकों प्रकार की माया का प्रयोग करवाया, अँधेरी कोठरियों में बंद करा दिया, विष पिलाया और खाना बंद कर दिया ॥ ४३ ॥ बर्फीली जगह, दहकती हुई आग और समुद्रमें बारी-बारीसे डलवाया, आँधीमें छोड़ दिया तथा पर्वतोंके नीचे दबवा दिया; परंतु इनमेंसे किसी भी उपायसे वह अपने पुत्र निष्पाप प्रह्लादका बाल भी बाँका न कर सका। अपनी विवशता देखकर हिरण्यकशिपु को बड़ी चिन्ता हुई। उसे प्रह्लाद को मारने के लिये और कोई उपाय नहीं सूझ पड़ा ॥ ४४ ॥

शेष आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - पाँचवां अध्याय..(पोस्ट१०)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
सप्तम स्कन्ध – पाँचवाँ अध्याय..(पोस्ट१०)

हिरण्यकशिपु के द्वारा प्रह्लादजी के वध का प्रयत्न

नैर्ॠतास्ते समादिष्टा भर्त्रा वै शूलपाणयः
तिग्मदंष्ट्रकरालास्यास्ताम्रश्मश्रुशिरोरुहाः ||३९||
नदन्तो भैरवं नादं छिन्धि भिन्धीति वादिनः
आसीनं चाहनन्शूलैः प्रह्लादं सर्वमर्मसु ||४०||
परे ब्रह्मण्यनिर्देश्ये भगवत्यखिलात्मनि
युक्तात्मन्यफला आसन्नपुण्यस्येव सत्क्रियाः ||४१||

जब हिरण्यकशिपु ने दैत्योंको इस प्रकार आज्ञा दी, तब तीखी दाढ़, विकराल वदन, लाल- लाल दाढ़ी-मूँछ एवं केशोंवाले दैत्य हाथोंमें त्रिशूल ले-लेकर ‘मारो, काटो’—इस प्रकार बड़े जोरसे चिल्लाने लगे। प्रह्लाद चुपचाप बैठे हुए थे और दैत्य उनके सभी मर्मस्थानोंमें शूलसे घाव कर रहे थे ॥ ३९-४० ॥ उस समय प्रह्लादजी का चित्त उन परमात्मामें लगा हुआ था, जो मन-वाणी के अगोचर, सर्वात्मा, समस्त शक्तियों के आधार एवं परब्रह्म हैं। इसलिये उनके सारे प्रहार ठीक वैसे ही निष्फल हो गये, जैसे भाग्यहीनों के बड़े-बड़े उद्योग-धंधे व्यर्थ होते हैं ॥ ४१ ॥ 

शेष आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


शनिवार, 20 जून 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - पाँचवां अध्याय..(पोस्ट०९)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
सप्तम स्कन्ध – पाँचवाँ अध्याय..(पोस्ट०९)

हिरण्यकशिपु के द्वारा प्रह्लादजी के वध का प्रयत्न

नैषां मतिस्तावदुरुक्रमाङ्घ्रिं 
स्पृशत्यनर्थापगमो यदर्थः
महीयसां पादरजोऽभिषेकं 
निष्किञ्चनानां न वृणीत यावत् ||३२||
इत्युक्त्वोपरतं पुत्रं हिरण्यकशिपू रुषा
अन्धीकृतात्मा स्वोत्सङ्गान्निरस्यत महीतले ||३३|
आहामर्षरुषाविष्टः कषायीभूतलोचनः
वध्यतामाश्वयं वध्यो निःसारयत नैर्ॠताः ||३४||
अयं मे भ्रातृहा सोऽयं हित्वा स्वान्सुहृदोऽधमः
पितृव्यहन्तुः पादौ यो विष्णोर्दासवदर्चति ||३५||
विष्णोर्वा साध्वसौ किं नु करिष्यत्यसमञ्जसः
सौहृदं दुस्त्यजं पित्रोरहाद्यः पञ्चहायनः ||३६||
परोऽप्यपत्यं हितकृद्यथौषधं 
स्वदेहजोऽप्यामयवत्सुतोऽहितः
छिन्द्यात्तदङ्गं यदुतात्मनोऽहितं 
शेषं सुखं जीवति यद्विवर्जनात्       ||३७||
सर्वैरुपायैर्हन्तव्यः सम्भोजशयनासनैः
सुहृल्लिङ्गधरः शत्रुर्मुनेर्दुष्टमिवेन्द्रियम् ||३८||

जिनकी बुद्धि भगवान्‌ के चरणकमलोंका स्पर्श कर लेती है, उनके जन्म-मृत्युरूप अनर्थका सर्वथा नाश हो जाता है। परंतु जो लोग अकिञ्चन भगवत्प्रेमी महात्माओं के चरणोंकी धूलमें स्नान नहीं कर लेते, उनकी बुद्धि काम्यकर्मों का पूरा सेवन करने पर भी भगवच्चरणों का स्पर्श नहीं कर सकती ॥ ३२ ॥
प्रह्लाद जी इतना कहकर चुप हो गये। हिरण्यकशिपु ने क्रोध के मारे अन्धा होकर उन्हें अपनी गोद से उठाकर भूमिपर पटक दिया ॥ ३३ ॥ प्रह्लाद की बात को वह सह न सका । रोष के मारे उसके नेत्र लाल हो गये। वह कहने लगा—दैत्यो ! इसे यहाँ से बाहर ले जाओ और तुरंत मार डालो। यह मार ही डालनेयोग्य है ॥ ३४ ॥ देखो तो सही—जिसने इसके चाचा को मार डाला, अपने सुहृद्- स्वजनों को छोडक़र यह नीच दास के समान उसी विष्णु के चरणोंकी पूजा करता है ! हो-न-हो, इसके रूप में मेरे भाई को मारनेवाला विष्णु ही आ गया है ॥ ३५ ॥ अब यह विश्वासके योग्य नहीं है। पाँच बरस की अवस्था में ही जिसने अपने माता-पिताके दुस्त्यज वात्सल्यस्नेह को भुला दिया—वह कृतघ्न भला, विष्णु का ही क्या हित करेगा ॥ ३६ ॥ कोई दूसरा भी यदि औषधके समान भलाई करे तो वह एक प्रकारसे पुत्र ही है। पर यदि अपना पुत्र भी अहित करने लगे तो रोगके समान वह शत्रु है। अपने शरीरके ही किसी अङ्गसे सारे शरीरको हानि होती हो तो उसको काट डालना चाहिये। क्योंकि उसे काट देने से शेष शरीर सुख से जी सकता है ॥ ३७ ॥ यह स्वजन का बाना पहनकर मेरा कोई शत्रु ही आया है। जैसे योगी की भोगलोलुप इन्द्रियाँ उसका अनिष्ट करती हैं, वैसे ही यह मेरा अहित करनेवाला है। इसलिये खाने, सोने, बैठने आदि के समय किसी भी उपाय से इसे मार डालो’ ॥ ३८ ॥

शेष आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - पाँचवां अध्याय..(पोस्ट०८)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
सप्तम स्कन्ध – पाँचवाँ अध्याय..(पोस्ट०८)

हिरण्यकशिपु के द्वारा प्रह्लादजी के वध का प्रयत्न

श्रीगुरुपुत्र उवाच
न मत्प्रणीतं न परप्रणीतं सुतो वदत्येष तवेन्द्र शत्रो
नैसर्गिकीयं मतिरस्य राजन्नियच्छ मन्युं कददाः स्म मा नः ||२८||

श्रीनारद उवाच
गुरुणैवं प्रतिप्रोक्तो भूय आहासुरः सुतम्
न चेद्गुरुमुखीयं ते कुतोऽभद्रा सती मतिः ||२९||

श्रीप्रह्लाद उवाच
मतिर्न कृष्णे परतः स्वतो वा 
मिथोऽभिपद्येत गृहव्रतानाम्
अदान्तगोभिर्विशतां तमिस्रं 
पुनः पुनश्चर्वितचर्वणानाम् ||३०||
न ते विदुः स्वार्थगतिं हि विष्णुं 
दुराशया ये बहिरर्थमानिनः
अन्धा यथान्धैरुपनीयमाना-
स्तेऽपीशतन्त्र्यामुरुदाम्नि बद्धाः ||३१||

गुरुपुत्रने कहा—इन्द्रशत्रो ! आपका पुत्र जो कुछ कह रहा है, वह मेरे या और किसी के बहकाने से नहीं कह रहा है। राजन् ! यह तो इस की जन्मजात स्वाभाविक बुद्धि है । आप क्रोध शान्त कीजिये । व्यर्थ में हमें दोष न लगाइये ॥ २८ ॥
नारदजी कहते हैं—युधिष्ठिर ! जब गुरुजी ने ऐसा उत्तर दिया, तब हिरण्यकशिपु ने फिर प्रह्लाद से पूछा—‘क्यों रे ! यदि तुझे ऐसी अहित करनेवाली खोटी बुद्धि गुरुमुख से नहीं मिली तो बता, कहाँसे प्राप्त हुई ?’ ॥ २९ ॥
प्रह्लादजीने कहा—पिताजी ! संसारके लोग तो पिसे हुएको पीस रहे हैं, चबाये हुए को चबा रहे हैं। उनकी इन्द्रियाँ वशमें न होनेके कारण वे भोगे हुए विषयों को ही फिर-फिर भोगने के लिये संसाररूप घोर नरक की ओर जा रहे हैं। ऐसे गृहासक्त पुरुषों की बुद्धि अपने-आप किसी के सिखाने से अथवा अपने ही जैसे लोगोंके सङ्ग से भगवान्‌ श्रीकृष्णमें नहीं लगती ॥ ३० ॥ जो इन्द्रियों से दीखनेवाले बाह्य विषयों को परम इष्ट समझकर मूर्खतावश अन्धों के पीछे अन्धों की तरह गड्ढेमें गिरनेके लिये चले जा रहे हैं और वेदवाणीरूप रस्सीके—काम्यकर्मों के दीर्घ बन्धन में बँधे हुए हैं, उनको यह बात मालूम नहीं कि हमारे स्वार्थ और परमार्थ भगवान्‌ विष्णु ही हैं—उन्हीं की प्राप्ति से हमें सब पुरुषार्थोंकी प्राप्ति हो सकती है ॥ ३१ ॥ 

शेष आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


शुक्रवार, 19 जून 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - पाँचवां अध्याय..(पोस्ट०७)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
सप्तम स्कन्ध – पाँचवाँ अध्याय..(पोस्ट०७)

हिरण्यकशिपु के द्वारा प्रह्लादजी के वध का प्रयत्न

हिरण्यकशिपुरुवाच
प्रह्रादानूच्यतां तात स्वधीतं किञ्चिदुत्तमम्
कालेनैतावतायुष्मन्यदशिक्षद्गुरोर्भवान् ||२२||

श्रीप्रह्लाद उवाच
श्रवणं कीर्तनं विष्णोः स्मरणं पादसेवनम्
अर्चनं वन्दनं दास्यं सख्यमात्मनिवेदनम् ||२३||
इति पुंसार्पिता विष्णौ भक्तिश्चेन्नवलक्षणा
क्रियेत भगवत्यद्धा तन्मन्येऽधीतमुत्तमम् ||२४||
निशम्यैतत्सुतवचो हिरण्यकशिपुस्तदा
गुरुपुत्रमुवाचेदं रुषा प्रस्फुरिताधरः ||२५||
ब्रह्मबन्धो किमेतत्ते विपक्षं श्रयतासता
असारं ग्राहितो बालो मामनादृत्य दुर्मते ||२६||
सन्ति ह्यसाधवो लोके दुर्मैत्राश्छद्मवेषिणः
तेषामुदेत्यघं काले रोगः पातकिनामिव ||२७||

हिरण्यकशिपुने कहा—चिरञ्जीव बेटा प्रह्लाद ! इतने दिनों में तुमने गुरुजी से जो शिक्षा प्राप्त की है, उसमेंसे कोई अच्छी-सी बात हमें सुनाओ ॥ २२ ॥
प्रह्लादजी ने कहा—पिताजी ! विष्णुभगवान्‌ की भक्ति के नौ भेद हैं—भगवान्‌ के गुण-लीला- नाम आदि का श्रवण, उन्हीं का कीर्तन, उनके रूप-नाम आदि का स्मरण, उनके चरणों की सेवा, पूजा-अर्चा, वन्दन, दास्य, सख्य और आत्मनिवेदन । यदि भगवान्‌ के प्रति समर्पण के भावसे यह नौ प्रकारकी भक्ति की जाय, तो मैं उसीको उत्तम अध्ययन समझता हूँ ॥ २३-२४ ॥ प्रह्लादकी यह बात सुनते ही क्रोध के मारे हिरण्यकशिपु के ओठ फडक़ने लगे। उसने गुरुपुत्र से कहा— ॥ २५ ॥ रे नीच ब्राह्मण ! यह तेरी कैसी करतूत है; दुर्बुद्धि ! तूने मेरी कुछ भी परवाह न करके इस बच्चे को कैसी निस्सार शिक्षा दे दी ? अवश्य ही तू हमारे शत्रुओं के आश्रित है ॥ २६ ॥ संसारमें ऐसे दुष्टों की कमी नहीं है, जो मित्र का बाना धारण कर छिपे-छिपे शत्रु का काम करते हैं। परंतु उनकी कलई ठीक वैसे ही खुल जाती है, जैसे छिपकर पाप करनेवालों का पाप समय पर रोग के रूप में प्रकट होकर उनकी पोल खोल देता है ॥ २७ ॥

शेष आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - पाँचवां अध्याय..(पोस्ट०६)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
सप्तम स्कन्ध – पाँचवाँ अध्याय..(पोस्ट०६)

हिरण्यकशिपु के द्वारा प्रह्लादजी के वध का प्रयत्न

तत एनं गुरुर्ज्ञात्वा ज्ञातज्ञेयचतुष्टयम्
दैत्येन्द्रं दर्शयामास मातृमृष्टमलङ्कृतम् ||१९||
पादयोः पतितं बालं प्रतिनन्द्याशिषासुरः
परिष्वज्य चिरं दोर्भ्यां परमामाप निर्वृतिम् ||२०||
आरोप्याङ्कमवघ्राय मूर्धन्यश्रुकलाम्बुभिः
आसिञ्चन्विकसद्वक्त्रमिदमाह युधिष्ठिर ||२१||

कुछ समय के बाद जब गुरुजी ने देखा कि प्रह्लाद ने साम, दान, भेद और दण्ड के सम्बन्ध की सारी बातें जान ली हैं, तब वे उन्हें उनकी माँ के पास ले गये । माता ने बड़े लाड़-प्यार से उन्हें नहला-धुलाकर अच्छी तरह गहने-कपड़ों से सजा दिया । इसके बाद वे उन्हें हिरण्यकशिपु के पास ले गये ॥ १९ ॥ प्रह्लाद अपने पिता के चरणों में लोट गये। हिरण्यकशिपु ने उन्हें आशीर्वाद दिया और दोनों हाथों से उठाकर बहुत देर तक गले से लगाये रखा। उस समय दैत्यराज का हृदय आनन्द से भर रहा था ॥ २० ॥ युधिष्ठिर ! हिरण्यकशिपु ने प्रसन्नमुख प्रह्लाद को अपनी गोद में बैठाकर उनका सिर सूँघा। उनके नेत्रों से प्रेम के आँसू गिर-गिरकर प्रह्लाद के शरीर को भिगोने लगे। उसने अपने पुत्र से पूछा ॥ २१ ॥

शेष आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - पाँचवां अध्याय..(पोस्ट०५)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
सप्तम स्कन्ध – पाँचवाँ अध्याय..(पोस्ट०५)

हिरण्यकशिपु के द्वारा प्रह्लादजी के वध का प्रयत्न

श्रीनारद उवाच
एतावद्ब्राह्मणायोक्त्वा विरराम महामतिः
तं सन्निभर्त्स्य कुपितः सुदीनो राजसेवकः ||१५||
आनीयतामरे वेत्रमस्माकमयशस्करः
कुलाङ्गारस्य दुर्बुद्धेश्चतुर्थोऽस्योदितो दमः ||१६||
दैतेयचन्दनवने जातोऽयं कण्टकद्रुमः
यन्मूलोन्मूलपरशोर्विष्णोर्नालायितोऽर्भकः ||१७||
इति तं विविधोपायैर्भीषयंस्तर्जनादिभिः
प्रह्लादं ग्राहयामास त्रिवर्गस्योपपादनम् ||१८||

नारदजी कहते हैं—परमज्ञानी प्रह्लाद अपने गुरु जी से इतना कहकर चुप हो गये। पुरोहित बेचारे राजा के सेवक एवं पराधीन थे। वे डर गये। उन्होंने क्रोध से प्रह्लाद को झिडक़ दिया और कहा— ॥ १५ ॥ ‘अरे, कोई मेरा बेंत तो लाओ । यह हमारी कीर्ति में कलङ्क लगा रहा है। इस दुर्बुद्धि कुलाङ्गार को ठीक करने के लिये चौथा उपाय दण्ड ही उपयुक्त होगा ॥ १६ ॥ दैत्यवंश के चन्दनवन में यह काँटेदार बबूल कहाँ से पैदा हुआ ? जो विष्णु इस वन की जड़ काटने में कुल्हाड़े का काम करते हैं, यह नादान बालक उन्हीं की बेंट बन रहा है; सहायक हो रहा है ॥ १७ ॥ इस प्रकार गुरुजी ने तरह-तरहसे डाँट-डपटकर प्रह्लाद को धमकाया और अर्थ, धर्म एवं कामसम्बन्धी शिक्षा दी ॥१८॥ 

शेष आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


बुधवार, 17 जून 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - पाँचवां अध्याय..(पोस्ट०४)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
सप्तम स्कन्ध – पाँचवाँ अध्याय..(पोस्ट०४)

हिरण्यकशिपु के द्वारा प्रह्लादजी के वध का प्रयत्न

स यदानुव्रतः पुंसां पशुबुद्धिर्विभिद्यते
अन्य एष तथान्योऽहमिति भेदगतासती ||१२||
स एष आत्मा स्वपरेत्यबुद्धिभि-
र्दुरत्ययानुक्रमणो निरूप्यते
मुह्यन्ति यद्वर्त्मनि वेदवादिनो 
ब्रह्मादयो ह्येष भिनत्ति मे मतिम् ||१३||
यथा भ्राम्यत्ययो ब्रह्मन्स्वयमाकर्षसन्निधौ
तथा मे भिद्यते चेतश्चक्रपाणेर्यदृच्छया ||१४||

(प्रह्लादजी कह रहे हैं) वे भगवान्‌ ही जब कृपा करते हैं, तब मनुष्यों की पाशविक बुद्धि नष्ट होती है। इस पशुबुद्धि के कारण ही तो ‘यह मैं हूँ और यह मुझसे भिन्न है’ इस प्रकार का झूठा भेदभाव पैदा होता है ॥ १२ ॥ वही परमात्मा यह आत्मा है। अज्ञानी लोग अपने और पराये का भेद करके उसी का वर्णन किया करते हैं। उनका न जानना भी ठीक ही है; क्योंकि उसके तत्त्व को जानना बहुत कठिन है और ब्रह्मा आदि बड़े-बड़े वेदज्ञ भी उसके विषय में मोहित हो जाते हैं। वही परमात्मा आपलोगों के शब्दों में मेरी बुद्धि ‘बिगाड़’ रहा है ॥ १३ ॥ गुरुजी ! जैसे चुम्बक के पास लोहा स्वयं खिंच आता है, वैसे ही चक्रपाणि भगवान्‌ की स्वच्छन्द इच्छा शक्ति से मेरा चित्त भी संसार से अलग होकर उनकी ओर बरबस खिंच जाता है ॥ १४ ॥

शेष आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - पाँचवां अध्याय..(पोस्ट०३)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
सप्तम स्कन्ध – पाँचवाँ अध्याय..(पोस्ट०३)

हिरण्यकशिपु के द्वारा प्रह्लादजी के वध का प्रयत्न

श्रीप्रह्लाद उवाच

परः स्वश्चेत्यसद्ग्राहः पुंसां यन्मायया कृतः
विमोहितधियां दृष्टस्तस्मै भगवते नमः ||११||

प्रह्लादजी ने कहा—जिन मनुष्यों की बुद्धि मोह से ग्रस्त हो रही है, उन्हीं को भगवान्‌ की माया से यह झूठा दुराग्रह होता देखा गया है कि यह ‘अपना’ है और यह ‘पराया’। उन मायापति भगवान्‌ को मैं नमस्कार करता हूँ ॥ ११ ॥ 

शेष आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


मंगलवार, 16 जून 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - पाँचवां अध्याय..(पोस्ट०२)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
सप्तम स्कन्ध – पाँचवाँ अध्याय..(पोस्ट०२)

हिरण्यकशिपु के द्वारा प्रह्लादजी के वध का प्रयत्न

एकदासुरराट्पुत्रमङ्कमारोप्य पाण्डव
पप्रच्छ कथ्यतां वत्स मन्यते साधु यद्भवान् ||४||

श्रीप्रह्लाद उवाच
तत्साधु मन्येऽसुरवर्य देहिनां 
सदा समुद्विग्नधियामसद्ग्रहात्
हित्वात्मपातं गृहमन्धकूपं 
वनं गतो यद्धरिमाश्रयेत ||५||

श्रीनारद उवाच
श्रुत्वा पुत्रगिरो दैत्यः परपक्षसमाहिताः
जहास बुद्धिर्बालानां भिद्यते परबुद्धिभिः ||६||
सम्यग्विधार्यतां बालो गुरुगेहे द्विजातिभिः
विष्णुपक्षैः प्रतिच्छन्नैर्न भिद्येतास्य धीर्यथा ||७||
गृहमानीतमाहूय प्रह्रादं दैत्ययाजकाः
प्रशस्य श्लक्ष्णया वाचा समपृच्छन्त सामभिः ||८||
वत्स प्रह्लाद भद्रं ते सत्यं कथय मा मृषा
बालानति कुतस्तुभ्यमेष बुद्धिविपर्ययः ||९||
बुद्धिभेदः परकृत उताहो ते स्वतोऽभवत्
भण्यतां श्रोतुकामानां गुरूणां कुलनन्दन ||१०||

युधिष्ठिर ! एक दिन हिरण्यकशिपु ने अपने पुत्र प्रह्लाद को बड़े प्रेमसे गोदमें लेकर पूछा—‘बेटा ! बताओ तो सही, तुम्हें कौन-सी बात अच्छी लगती है ?’ ॥ ४ ॥
प्रह्लादजी ने कहा—पिताजी ! संसारके प्राणी ‘मैं’ और ‘मेरे’ के झूठे आग्रहमें पडक़र सदा ही अत्यन्त उद्विग्न रहते हैं। ऐसे प्राणियोंके लिये मैं यही ठीक समझता हूँ कि वे अपने अध:पतन के मूल कारण, घास से ढके हुए अँधेरे कूएँ के समान इस घर को छोडक़र वनमें चले जायँ और भगवान्‌ श्रीहरि की शरण ग्रहण करें ॥ ५ ॥
नारदजी कहते हैं—प्रह्लादजी के मुँह से शत्रुपक्ष की प्रशंसा से भरी बात सुनकर हिरण्यकशिपु ठठाकर हँस पड़ा। उसने कहा—‘दूसरोंके बहकाने से बच्चों की बुद्धि यों ही बिगड़ जाया करती है ॥ ६ ॥ जान पड़ता है गुरुजी के घर पर विष्णु के पक्षपाती कुछ ब्राह्मण वेष बदलकर रहते हैं। बालक की भलीभाँति देख-रेख की जाय, जिससे अब इसकी बुद्धि बहकने न पाये ॥ ७ ॥
जब दैत्योंने प्रह्लादको गुरुजीके घर पहुँचा दिया, तब पुरोहितोंने उनको बहुत पुचकारकर और फुसलाकर बड़ी मधुर वाणीसे पूछा ॥ ८ ॥ बेटा प्रह्लाद ! तुम्हारा कल्याण हो। ठीक-ठीक बतलाना। देखो, झूठ न बोलना। यह तुम्हारी बुद्धि उलटी कैसे हो गयी ? और किसी बालककी बुद्धि तो ऐसी नहीं हुई ॥ ९ ॥ कुलनन्दन प्रह्लाद ! बताओ तो बेटा ! हम तुम्हारे गुरुजन यह जानना चाहते हैं कि तुम्हारी बुद्धि स्वयं ऐसी हो गयी या किसी ने सचमुच तुम को बहका दिया है ? ॥ १० ॥

शेष आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - पाँचवां अध्याय..(पोस्ट०१)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
सप्तम स्कन्ध – पाँचवाँ अध्याय..(पोस्ट०१)

हिरण्यकशिपु के द्वारा प्रह्लादजी के वध का प्रयत्न

श्रीनारद उवाच

पौरोहित्याय भगवान्वृतः काव्यः किलासुरैः
षण्डामर्कौ सुतौ तस्य दैत्यराजगृहान्तिके ||१||
तौ राज्ञा प्रापितं बालं प्रह्लादं नयकोविदम्
पाठयामासतुः पाठ्यानन्यांश्चासुरबालकान् ||२||
यत्तत्र गुरुणा प्रोक्तं शुश्रुवेऽनुपपाठ च
न साधु मनसा मेने स्वपरासद्ग्रहाश्रयम् ||३||

नारदजी कहते हैं—युधिष्ठिर! दैत्यों ने भगवान्‌ श्रीशुक्राचार्य जी को अपना पुरोहित बनाया था । उनके दो पुत्र थे—शण्ड और अमर्क । वे दोनों राजमहल के पास ही रहकर हिरण्यकशिपु के द्वारा भेजे हुए नीतिनिपुण बालक प्रह्लाद को और दूसरे पढ़ानेयोग्य दैत्य-बालकोंको राजनीति, अर्थनीति आदि पढ़ाया करते थे ॥ १-२ ॥ प्रह्लाद गुरुजी का पढ़ाया हुआ पाठ सुन लेते थे और उसे ज्यों-का- त्यों उन्हें सुना भी दिया करते थे। किन्तु वे उसे मन से अच्छा नहीं समझते थे । क्योंकि उस पाठ का मूल आधार था अपने और पराये का झूठा आग्रह ॥ ३ ॥ 

शेष आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


सोमवार, 15 जून 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - चौथा अध्याय..(पोस्ट०९)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
सप्तम स्कन्ध – चौथा अध्याय..(पोस्ट०९)

हिरण्यकशिपु के अत्याचार और प्रह्लाद के गुणों का वर्णन

युधिष्ठिर उवाच - 

देवर्ष एतदिच्छामो वेदितुं तव सुव्रत । 
यदात्मजाय शुद्धाय पितादात्साधवे ह्यघम् ॥ ४४ ॥ 
पुत्रान् विप्रतिकूलान् स्वान् पितरः पुत्रवत्सलाः । 
उपालभन्ते शिक्षार्थं नैवाघमपरो यथा ॥ ४५ ॥ 
किमुतानुवशान् साधून् तादृशान् गुरुदेवतान् । 
एतत्कौतूहलं ब्रह्मन् अस्माकं विधम प्रभो । 
पितुः पुत्राय यद्द्वेषो मरणाय प्रयोजितः ॥ ४६ ॥ 

युधिष्ठिरने पूछा—नारदजी ! आपका व्रत अखण्ड है। अब हम आपसे यह जानना चाहते हैं कि हिरण्यकशिपु ने पिता होकर भी ऐसे शुद्धहृदय महात्मा पुत्र से द्रोह क्यों किया ॥४४॥ पिता तो स्वभाव से ही अपने पुत्रों से प्रेम करते हैं। यदि पुत्र कोई उलटा काम करता है, तो वे उसे शिक्षा देने के लिये ही डाँटते हैं, शत्रु की तरह वैर-विरोध तो नहीं करते ॥४५॥ फिर प्रह्लाद–जी जैसे अनुकूल, शुद्धहृदय एवं गुरुजनों में भगवद्भाव करने वाले पुत्रों से भला, कोई द्वेष कर ही कैसे सकता है । नारदजी ! आप सब कुछ जानते हैं। हमें यह जानकर बड़ा कौतूहल हो रहा है कि पिता ने द्वेष के कारण पुत्र को मार डालना चाहा । आप कृपा करके मेरा यह कुतूहल शान्त कीजिये॥४६॥

इति श्रीमद्‌भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां सप्तमस्कन्धे प्रह्लादचरिते चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥ 

हरिः ॐ तत्सत् श्रीकृष्णार्पणमस्तु ॥

शेष आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


रविवार, 14 जून 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - चौथा अध्याय..(पोस्ट०८)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
सप्तम स्कन्ध – चौथा अध्याय..(पोस्ट०८)

हिरण्यकशिपु के अत्याचार और प्रह्लाद के गुणों का वर्णन

क्वचिदुत्पुलकस्तूष्णीं आस्ते संस्पर्शनिर्वृतः । 
अस्पन्दप्रणयानन्द सलिलामीलितेक्षणः ॥ ४१ ॥ 
स उत्तमश्लोकपदारविन्दयोः 
     निषेवयाकिञ्चनसङ्‌गलब्धया । 
तन्वन् परां निर्वृतिमात्मनो मुहुः 
     दुसङ्‌गदीनस्य मनः शमं व्यधात् ॥ ४२ ॥ 
तस्मिन् महाभागवते महाभागे महात्मनि । 
हिरण्यकशिपू राजन् अकरोद् अघमात्मजे ॥ ४३ ॥ 

कभी भीतर-ही-भीतर भगवान्‌ का कोमल संस्पर्श अनुभव करके (प्रह्लाद)आनन्द में मग्न हो जाते और चुपचाप शान्त होकर बैठ रहते। उस समय उनका रोम-रोम पुलकित हो उठता। अधखुले नेत्र अविचल प्रेम और आनन्द के आँसुओं से भरे रहते ॥ ४१ ॥ भगवान्‌ श्रीकृष्ण के चरणकमलों की यह भक्ति अकिञ्चन भगवत्प्रेमी महात्माओं के सङ्ग से ही प्राप्त होती है। इसके द्वारा वे स्वयं तो परमानन्द में मग्न रहते ही थे; जिन बेचारों का मन कुसङ्ग के कारण अत्यन्त दीन-हीन हो रहा था, उन्हें भी बार-बार शान्ति प्रदान करते थे ॥ ४२ ॥ युधिष्ठिर ! प्रह्लाद भगवान्‌ के परम प्रेमी भक्त, परम भाग्यवान् और ऊँची कोटि के महात्मा थे। हिरण्यकशिपु ऐसे साधु पुत्र को भी अपराधी बतलाकर उनका अनिष्ट करने की चेष्टा करने लगा ॥ ४३ ॥

शेष आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - चौथा अध्याय..(पोस्ट०७)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
सप्तम स्कन्ध – चौथा अध्याय..(पोस्ट०७)

हिरण्यकशिपु के अत्याचार और प्रह्लाद के गुणों का वर्णन

न्यस्तक्रीडनको बालो जडवत् तन्मनस्तया । 
कृष्णग्रहगृहीतात्मा न वेद जगदीदृशम् ॥ ३७ ॥ 
आसीनः पर्यटन् अश्नन् शयानः प्रपिबन् ब्रुवन् । 
नानुसन्धत्त एतानि गोविन्दपरिरम्भितः ॥ ३८ ॥ 
क्वचिद् रुदति वैकुण्ठ चिन्ताशबलचेतनः । 
क्वचिद् हसति तच्चिन्ता ह्लाद उद्‍गायति क्वचित् ॥ ३९ ॥ 
नदति क्वचिद् उत्कण्ठो विलज्जो नृत्यति क्वचित् । 
क्वचित्तद्‍भावनायुक्तः तन्मयोऽनुचकार ह ॥ ४० ॥ 

युधिष्ठिर ! प्रह्लाद बचपनमें ही खेल-कूद छोडक़र भगवान्‌ के ध्यान में जडवत् तन्मय हो जाया करते। भगवान्‌ श्रीकृष्ण के अनुग्रहरूप ग्रह ने उनके हृदय को इस प्रकार खींच लिया था कि उन्हें जगत् की कुछ सुध-बुध ही न रहती ॥ ३७ ॥ उन्हें ऐसा जान पड़ता कि भगवान्‌ मुझे अपनी गोद में लेकर आलिङ्गन कर रहे हैं। इसलिये उन्हें सोते-बैठते, खाते-पीते, चलते-फिरते और बातचीत करते समय भी इन बातों का ध्यान बिलकुल न रहता ॥ ३८ ॥ कभी-कभी भगवान्‌ मुझे छोडक़र चले गये, इस भावना में उनका हृदय इतना डूब जाता कि वे जोर-जोर से रोने लगते। कभी मन-ही-मन उन्हें अपने सामने पाकर आनन्दोद्रेक से ठठाकर हँसने लगते। कभी उनके ध्यान के मधुर आनन्द का अनुभव करके जोर से गाने लगते ॥ ३९ ॥ वे कभी उत्सुक हो बेसुरा चिल्ला पड़ते। कभी-कभी लोक-लज्जा का त्याग करके प्रेम में छककर नाचने भी लगते थे। कभी-कभी उनकी लीला के चिन्तन में इतने तल्लीन हो जाते कि उन्हें अपनी याद ही न रहती, उन्हीं का अनुकरण करने लगते ॥ ४० ॥ 

शेष आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


शनिवार, 13 जून 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - चौथा अध्याय..(पोस्ट०६)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
सप्तम स्कन्ध – चौथा अध्याय..(पोस्ट०६)

हिरण्यकशिपु के अत्याचार और प्रह्लाद के गुणों का वर्णन

यस्मिन्महद्‍गुणा राजन् गृह्यन्ते कविभिर्मुहुः । 
न तेऽधुना पिधीयन्ते यथा भगवतीश्वरे ॥ ३४ ॥ 
यं साधुगाथासदसि रिपवोऽपि सुरा नृप । 
प्रतिमानं प्रकुर्वन्ति किमुतान्ये भवादृशाः ॥ ३५ ॥ 
गुणैरलमसंख्येयै माहात्म्यं तस्य सूच्यते । 
वासुदेवे भगवति यस्य नैसर्गिकी रतिः ॥ ३६ ॥ 

जैसे भगवान्‌ के गुण अनन्त हैं, वैसे ही प्रह्लादके श्रेष्ठ गुणों की भी कोई सीमा नहीं है। महात्मा लोग सदा से उनका वर्णन करते और उन्हें अपनाते आये हैं। तथापि वे आज भी ज्यों-के-त्यों बने हुए हैं ॥ ३४ ॥ युधिष्ठिर ! यों तो देवता उनके शत्रु हैं; परंतु फिर भी भक्तोंका चरित्र सुननेके लिये जब उन लोगोंकी सभा होती है, तब वे दूसरे भक्तों को प्रह्लाद के समान कहकर उनका सम्मान करते हैं। फिर आप-जैसे अजातशत्रु भगवद्भक्त उनका आदर करेंगे, इसमें तो सन्देह ही क्या है ॥ ३५ ॥ उनकी महिमा का वर्णन करने के लिये अगणित गुणों के कहने-सुनने की आवश्यकता नहीं। केवल एक ही गुण—भगवान्‌ श्रीकृष्ण के चरणों में स्वाभाविक, जन्मजात प्रेम उनकी महिमा को प्रकट करने के लिये पर्याप्त है ॥ ३६ ॥

शेष आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - चौथा अध्याय..(पोस्ट०५)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
सप्तम स्कन्ध – चौथा अध्याय..(पोस्ट०५)

हिरण्यकशिपु के अत्याचार और प्रह्लाद के गुणों का वर्णन

नारद उवाच - 
इत्युक्ता लोकगुरुणा तं प्रणम्य दिवौकसः । 
न्यवर्तन्त गतोद्वेगा मेनिरे चासुरं हतम् ॥ २९ ॥ 
तस्य दैत्यपतेः पुत्राश्चत्वारः परमाद्‍भुताः । 
प्रह्लादोऽभून् महांन् तेषां गुणैर्महदुपासकः ॥ ३० ॥ 
ब्रह्मण्यः शीलसम्पन्नः सत्यसन्धो जितेन्द्रियः । 
आत्मवत्सर्वभूतानां एकः प्रियसुहृत्तमः ॥ ३१ ॥ 
दासवत्सन्नतार्याङ्‌घ्रिः पितृवद् दीनवत्सलः । 
भ्रातृवत्सदृशे स्निग्धो गुरुषु ईश्वरभावनः ॥ ३२ ॥ 
विद्यार्थरूपजन्माढ्यो मानस्तम्भविवर्जितः ॥ ३२ ॥ 
नोद्विग्नचित्तो व्यसनेषु निःस्पृहः 
     श्रुतेषु दृष्टेषु गुणेष्ववस्तुदृक् । 
दान्तेन्द्रियप्राणशरीरधीः सदा 
     प्रशान्तकामो रहितासुरोऽसुरः ॥ ३३ ॥ 

नारदजी कहते हैं—सबके हृदय में ज्ञान का सञ्चार करनेवाले भगवान्‌ ने जब देवताओंको यह आदेश दिया, तब वे उन्हें प्रणाम करके लौट आये। उनका सारा उद्वेग मिट गया और उन्हें ऐसा मालूम होने लगा कि हिरण्यकशिपु मर गया ॥ २९ ॥
युधिष्ठिर ! दैत्यराज हिरण्यकशिपु के बड़े ही विलक्षण चार पुत्र थे। उनमें प्रह्लाद यों तो सबसे छोटे थे, परंतु गुणों में सबसे बड़े थे। वे बड़े संतसेवी थे ॥ ३० ॥ ब्राह्मणभक्त, सौम्यस्वभाव, सत्यप्रतिज्ञ एवं जितेन्द्रिय थे तथा समस्त प्राणियों के साथ अपने ही समान समता का बर्ताव करते और सब के एकमात्र प्रिय और सच्चे हितैषी थे ॥ ३१ ॥ बड़े लोगों के चरणों में सेवक की तरह झुककर रहते थे। गरीबों पर पिता के समान स्नेह रखते थे। बराबरी वालों से भाई के समान प्रेम करते और गुरुजनों में भगवद्भाव रखते थे। विद्या, धन, सौन्दर्य और कुलीनता से सम्पन्न होनेपर भी घमंड और हेकड़ी उन्हें छू तक नहीं गयी थी ॥ ३२ ॥ बड़े-बड़े दु:खोंमें भी वे तनिक भी घबराते न थे। लोक-परलोक के विषयों को उन्होंने देखा-सुना तो बहुत था, परंतु वे उन्हें नि:सार और असत्य समझते थे। इसलिये उनके मन में किसी भी वस्तु की लालसा न थी। इन्द्रिय, प्राण, शरीर और मन उनके वशमें थे। उनके चित्त में कभी किसी प्रकारकी कामना नहीं उठती थी। जन्मसे असुर होनेपर भी उनमें आसुरी सम्पत्तिका लेश भी नहीं था ॥ ३३ ॥ 

शेष आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


शुक्रवार, 12 जून 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - चौथा अध्याय..(पोस्ट०४)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
सप्तम स्कन्ध – चौथा अध्याय..(पोस्ट०४)

हिरण्यकशिपु के अत्याचार और प्रह्लाद के गुणों का वर्णन

एवं ऐश्वर्यमत्तस्य दृप्तस्योच्छास्त्रवर्तिनः । 
कालो महान् व्यतीयाय ब्रह्मशापं उपेयुषः ॥ २० ॥ 
तस्योग्रदण्डसंविग्नाः सर्वे लोकाः सपालकाः । 
अन्यत्रालब्धशरणाः शरणं ययुरच्युतम् ॥ २१ ॥ 
तस्यै नमोऽस्तु काष्ठायै यत्रात्मा हरिरीश्वरः । 
यद्‍गत्वा न निवर्तन्ते शान्ताः संन्यासिनोऽमलाः ॥ २२ ॥ 
इति ते संयतात्मानः समाहितधियोऽमलाः । 
उपतस्थुर्हृषीकेशं विनिद्रा वायुभोजनाः ॥ २३ ॥ 
तेषां आविरभूद्वाणी अरूपा मेघनिःस्वना । 
सन्नादयन्ती ककुभः साधूनां अभयङ्‌करी ॥ २४ ॥ 
मा भैष्ट विबुधश्रेष्ठाः सर्वेषां भद्रमस्तु वः । 
मद्दर्शनं हि भूतानां सर्वश्रेयोपपत्तये ॥ २५ ॥ 
ज्ञातमेतस्य दौरात्म्यं दैतेयापसदस्य यत् । 
तस्य शान्तिं करिष्यामि कालं तावत्प्रतीक्षत ॥ २६ ॥ 
यदा देवेषु वेदेषु गोषु विप्रेषु साधुषु । 
धर्मे मयि च विद्वेषः स वा आशु विनश्यति ॥ २७ ॥ 
निर्वैराय प्रशान्ताय स्वसुताय महात्मने । 
प्रह्रादाय यदा द्रुह्येद् हनिष्येऽपि वरोर्जितम् ॥ २८ ॥

युधिष्ठिर ! इस रूप में भी वह भगवान्‌ का वही पार्षद है, जिसे सनकादिकों ने शाप दिया था। वह ऐश्वर्यके मदसे मतवाला हो रहा था तथा घमंडमें चूर होकर शास्त्रोंकी मर्यादाका उल्लङ्घन कर रहा था। देखते-ही-देखते उसके जीवनका बहुत-सा समय बीत गया ॥ २० ॥ उसके कठोर शासनसे सब लोक और लोकपाल घबरा गये। जब उन्हें और कहीं किसीका आश्रय न मिला, तब उन्होंने भगवान्‌की शरण ली ॥ २१ ॥ (उन्होंने मन-ही-मन कहा—)‘जहाँ सर्वात्मा जगदीश्वर श्रीहरि निवास करते हैं और जिसे प्राप्त करके शान्त एवं निर्मल संन्यासी महात्मा फिर लौटते नहीं, भगवान्‌के उस परम धामको हम नमस्कार करते हैं’ ॥ २२ ॥ इस भावसे अपनी इन्द्रियोंका संयम और मनको समाहित करके उन लोगोंने खाना-पीना और सोना छोड़ दिया तथा निर्मल हृदयसे भगवान्‌की आराधना की ॥ २३ ॥ एक दिन उन्हें मेघके समान गम्भीर आकाशवाणी सुनायी पड़ी। उसकी ध्वनिसे दिशाएँ गूँज उठीं। साधुओंको अभय देनेवाली वह वाणी यों थी— ॥ २४ ॥ ‘श्रेष्ठ देवताओ ! डरो मत। तुम सब लोगोंका कल्याण हो। मेरे दर्शनसे प्राणियोंको परम कल्याणकी प्राप्ति हो जाती है ॥ २५ ॥ इस नीच दैत्यकी दुष्टताका मुझे पहलेसे ही पता है। मैं इसको मिटा दूँगा। अभी कुछ दिनोंतक समयकी प्रतीक्षा करो ॥ २६ ॥ कोई भी प्राणी जब देवता, वेद, गाय, ब्राह्मण, साधु, धर्म और मुझसे द्वेष करने लगता है, तब शीघ्र ही उसका विनाश हो जाता है ॥ २७ ॥ जब यह अपने वैरहीन, शान्त और महात्मा पुत्र प्रह्लादसे द्रोह करेगा—उसका अनिष्ट करना चाहेगा, तब वर के कारण शक्तिसम्पन्न होने पर भी इसे मैं अवश्य मार डालूँगा।’ ॥ २८ ॥

शेष आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - चौथा अध्याय..(पोस्ट०३)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
सप्तम स्कन्ध – चौथा अध्याय..(पोस्ट०३)

हिरण्यकशिपु के अत्याचार और प्रह्लाद के गुणों का वर्णन

स एव वर्णाश्रमिभिः क्रतुभिर्भूरिदक्षिणैः । 
इज्यमानो हविर्भागान् अग्रहीत् स्वेन तेजसा ॥ १५ ॥ 
अकृष्टपच्या तस्यासीत् सप्तद्वीपवती मही । 
तथा कामदुघा गावो नानाश्चर्यपदं नभः ॥ १६ ॥ 
रत्‍नाकराश्च रत्‍नौघान् तत्पत्‍न्यश्चोहुरूर्मिभिः । 
क्षारसीधुघृतक्षौद्र दधिक्षीरामृतोदकाः ॥ १७ ॥ 
शैला द्रोणीभिराक्रीडं सर्वर्तुषु गुणान् द्रुमाः । 
दधार लोकपालानां एक एव पृथग्गुणान् ॥ १८ ॥ 
स इत्थं निर्जितककुब् एकराड् वियान् प्रियान् । 
यथोपजोषं भुञ्जानो नातृप्यदजितेन्द्रियः ॥ १९ ॥ 

युधिष्ठिर ! वह इतना तेजस्वी था कि वर्णाश्रमधर्म का पालन करनेवाले पुरुष जो बड़ी-बड़ी दक्षिणावाले यज्ञ करते, उनके यज्ञोंकी आहुति वह स्वयं छीन लेता ॥ १५ ॥ पृथ्वीके सातों द्वीपोंमें उसका अखण्ड राज्य था। सभी जगह बिना ही जोते-बोये धरतीसे अन्न पैदा होता था। वह जो कुछ चाहता, अन्तरिक्षसे उसे मिल जाता तथा आकाश उसे भाँति-भाँतिकी आश्चर्यजनक वस्तुएँ दिखा- दिखाकर उसका मनोरंजन करता था ॥ १६ ॥ इसी प्रकार खारे पानी, सुरा, घृत, इक्षुरस, दधि, दुग्ध और मीठे पानीके समुद्र भी अपनी पत्नी नदियोंके साथ तरङ्गोंके द्वारा उसके पास रत्नराशि पहुँचाया करते थे ॥ १७ ॥ पर्वत अपनी घाटियोंके रूपमें उसके लिये खेलनेका स्थान जुटाते और वृक्ष सब ऋतुओंमें फूलते-फलते। वह अकेला ही सब लोकपालोंके विभिन्न गुणों को धारण करता ॥ १८ ॥ इस प्रकार दिग्विजयी और एकच्छत्र सम्राट् होकर वह अपने को प्रिय लगनेवाले विषयों का स्वच्छन्द उपभोग करने लगा। परंतु इतने विषयों से भी उसकी तृप्ति न हो सकी। क्योंकि अन्तत: वह इन्द्रियों का दास ही तो था ॥ १९ ॥

शेष आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - पाँचवां अध्याय..(पोस्ट१३)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ श्रीमद्भागवतमहापुराण  सप्तम स्कन्ध – पाँचवाँ अध्याय..(पोस्ट१३) हिरण्यकशिपु के द्वारा प्रह्लादजी के वध का प्रयत्न इ...