मंगलवार, 5 दिसंबर 2017

भगवान्‌ विष्णु .....(पोस्ट.०३)


।। जय श्रीहरिः ।।
भगवान्‌ विष्णु .....(पोस्ट.०३)
ब्रह्मवैवर्त पुराण में उस परब्रह्म परमात्मा को ही द्विभुज कृष्ण और चतुर्भुज विष्णुरूप से बताया गया है‒
‘त्वमेव भगवानाद्यो निर्गुणः प्रकृतेः परः ।
अर्द्धाङ्गो द्विभुजः कृष्णोऽप्यर्द्धाङ्गेन चतुर्भुजः ॥‘
......................(प्रकृति॰ १२ । १५)
‘आप सबके आदि, निर्गुण और प्रकृतिसे अतीत भगवान्‌ ही अपने आधे अंगसे द्विभुज कृष्ण और आधे अंगसे चतुर्भुज विष्णुके रूपमें प्रकट हुए हैं ।’
“द्विभुजो राधिकाकान्तो लक्ष्मीकान्तश्चतुर्भुजः ।
गोलोके द्विभुजस्तस्थौ गोपैर्गोपीभिरावृतः ॥
चतुर्भुजश्च वैकुण्ठं प्रययौ पद्मया सह ।
सर्वांशेन समौ तौ द्वौ कृष्णनारायणौ परौ ॥“
.......................(प्रकृति॰ ३५ । १४-१५)
‘द्विभुज कृष्ण राधिकापति हैं और चतुर्भुज विष्णु लक्ष्मीपति हैं । कृष्ण गोप-गोपियों से आवृत हो कर गोलोक में और विष्णु वैकुण्ठ में स्थित हैं । वे कृष्ण और विष्णु‒दोनों सब प्रकारसे समान ही हैं ।’
जब भगवान्‌ के अत्युग्र विराट्‌रूप (सहस्रभुजरूप) को देखकर अर्जुन भयभीत हो गये, तब उनको आश्वासन देने के लिये भगवान् पहले चतुर्भुजरूप से और फिर द्विभुजरूप से अर्जुनके सामने प्रकट हुए‒
“इत्यर्जुनं वासुदेवस्तथोक्त्वा
स्वकं रूपं दर्शयामास भूयः ।
आश्वासयामास च भीतमेनं
भूत्वा पुनः सौम्यवपुर्महात्मा ॥“
...................(गीता ११ । ५०)
‘वासुदेव भगवान्‌ ने अर्जुन से ऐसा कहकर फिर उसी प्रकार से अपना देवरूप (चतुर्भुजरूप) दिखाया और महात्मा श्रीकृष्ण ने पुनः सौम्यरूप (द्विभुजरूप) होकर भयभीत अर्जुनको आश्वासन दिया [*] ।’ तात्पर्य है कि एक ही परब्रह्म परमात्मा द्विभुज, चतुर्भुज, सहस्रभुज आदि अनेक रूपोंमें प्रकट होते हैं ।
-----------------------------------
[*] द्विभुज होने के कारण सौम्यरूप को मनुष्यरूप भी कहा गया है‒”दृष्ट्वेदं मानुषं रूपं तव सौम्यं जनार्दन” ...(गीता ११ । ५१) ।
नारायण ! नारायण !! नारायण !!!
(शेष आगामी पोस्ट में)
‒---- गीता प्रेस,गोरखपुर से प्रकाशित ‘कल्याण-पथ’ पुस्तक से


भगवान्‌ विष्णु .....(पोस्ट.०३)


।। जय श्रीहरिः ।।
भगवान्‌ विष्णु .....(पोस्ट.०३)
ब्रह्मवैवर्त पुराण में उस परब्रह्म परमात्मा को ही द्विभुज कृष्ण और चतुर्भुज विष्णुरूप से बताया गया है‒
‘त्वमेव भगवानाद्यो निर्गुणः प्रकृतेः परः ।
अर्द्धाङ्गो द्विभुजः कृष्णोऽप्यर्द्धाङ्गेन चतुर्भुजः ॥‘
......................(प्रकृति॰ १२ । १५)
‘आप सबके आदि, निर्गुण और प्रकृतिसे अतीत भगवान्‌ ही अपने आधे अंगसे द्विभुज कृष्ण और आधे अंगसे चतुर्भुज विष्णुके रूपमें प्रकट हुए हैं ।’
“द्विभुजो राधिकाकान्तो लक्ष्मीकान्तश्चतुर्भुजः ।
गोलोके द्विभुजस्तस्थौ गोपैर्गोपीभिरावृतः ॥
चतुर्भुजश्च वैकुण्ठं प्रययौ पद्मया सह ।
सर्वांशेन समौ तौ द्वौ कृष्णनारायणौ परौ ॥“
.......................(प्रकृति॰ ३५ । १४-१५)
‘द्विभुज कृष्ण राधिकापति हैं और चतुर्भुज विष्णु लक्ष्मीपति हैं । कृष्ण गोप-गोपियों से आवृत हो कर गोलोक में और विष्णु वैकुण्ठ में स्थित हैं । वे कृष्ण और विष्णु‒दोनों सब प्रकारसे समान ही हैं ।’
जब भगवान्‌ के अत्युग्र विराट्‌रूप (सहस्रभुजरूप) को देखकर अर्जुन भयभीत हो गये, तब उनको आश्वासन देने के लिये भगवान् पहले चतुर्भुजरूप से और फिर द्विभुजरूप से अर्जुनके सामने प्रकट हुए‒
“इत्यर्जुनं वासुदेवस्तथोक्त्वा
स्वकं रूपं दर्शयामास भूयः ।
आश्वासयामास च भीतमेनं
भूत्वा पुनः सौम्यवपुर्महात्मा ॥“
...................(गीता ११ । ५०)
‘वासुदेव भगवान्‌ ने अर्जुन से ऐसा कहकर फिर उसी प्रकार से अपना देवरूप (चतुर्भुजरूप) दिखाया और महात्मा श्रीकृष्ण ने पुनः सौम्यरूप (द्विभुजरूप) होकर भयभीत अर्जुनको आश्वासन दिया [*] ।’ तात्पर्य है कि एक ही परब्रह्म परमात्मा द्विभुज, चतुर्भुज, सहस्रभुज आदि अनेक रूपोंमें प्रकट होते हैं ।
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[*] द्विभुज होने के कारण सौम्यरूप को मनुष्यरूप भी कहा गया है‒”दृष्ट्वेदं मानुषं रूपं तव सौम्यं जनार्दन” ...(गीता ११ । ५१) ।
नारायण ! नारायण !! नारायण !!!
(शेष आगामी पोस्ट में)
‒---- गीता प्रेस,गोरखपुर से प्रकाशित ‘कल्याण-पथ’ पुस्तक से


भजनमें दिखावा..(02)



|| ॐ श्री परमात्मने नम: ||
भजनमें दिखावा..(02)
“गुप्त अकाम निरन्तर ध्यान सहित सानन्द ।
आदर जुत जपसे तुरत पावत परमानन्द ॥“
ये छः बातें जिस जप में होती हैं, उस जप का तुरन्त और विशेष माहात्म्य होता है । भगवान्‌ का नाम गुप्त रीति से लिया जाय, वह बढ़िया है । लोग देखें ही नहीं, पता ही न लगे‒यह बढ़िया बात है परंतु कम-से-कम दिखावटीपन तो होना ही नहीं चाहिये । इससे असली नाम-जप नहीं होता । नाम का निरादर होता है ।नामके बदले मान-बड़ाई खरीदते हैं, आदर खरीदते हैं, लोगों को अपनी तरफ खींचते हैं‒यह नाम महाराज की बिक्री करना है । यह बिक्री की चीज थोड़े ही है ! नाम जैसा धन, बताने के लिये है क्या ? लौकिक धन भी लोग नहीं बताते, खूब छिपाकर रखते हैं । यह तो भीतर रखनेका है, असली धन है ।
“माई मेरे निरधनको धन राम ।
रामनाम मेरे हृदयमें राखूं ज्यूं लोभी राखे दाम ॥
दिन दिन सूरज सवायो उगे, घटत न एक छदाम ।
सूरदास के इतनी पूँजी, रतन मणि से नहीं काम ॥“
यह अपने हृदय की बात है । मेरे निर्धन का धन यही है । कैसा बढ़िया धन है यह ! अन्त में कहते हैं यह जो रत्न-मणि, सोना आदि है, इनसे मेरे मतलब नहीं है । ये पत्थर के टुकड़े हैं । इनसे क्या काम ! निर्धन का असली धन तो ‘राम’ नाम है ।
“धनवन्ता सोइ जानिये जाके ‘राम’ नाम धन होय ।“
यह धन जिसके पास है, वही धनी है । उसके बिना कंगले हैं सभी ।
“सम्मीलने नयनयोर्न हि किञ्चिदस्ति ।
करोड़ों रुपये आज पास में हैं, पर ये दोनों आँखें सदा के लिये जिस दिन बन्द हो गयीं, उस दिन कुछ नहीं है । सब यहाँ का यहीं रह जायगा ।
“सुपना सो हो जावसी सुत कुटुम्ब धन धाम ।“
यह स्वप्न की तरह हो जायगा । आँख खुलते ही स्वप्न कुछ नहीं और आँख मिचते ही यहाँ का धन कुछ नहीं ।
स्थूल बुद्धिवाले बिना समझे कह देते हैं कि ‘राम’ नामसे क्या होता है ? वे बेचारे इस बात को जानते नहीं, उन्हें पता ही नहीं है । इस विद्या को जानने वाले ही जानते हैं भाई ! सच्ची लगन जिसके लगी है वह जानता है । दूसरों को क्या पता ?
‘जिसके लागी है सोई जाने दूजा क्या जाने रे भाई’
…भगवान्‌ का नाम लेनेवालों का बड़े-बड़े लोकों में जहाँ जाते हैं, वहाँ आदर होता है कि भगवान्‌ के भक्त पधारे हैं । हमारा लोक पवित्र हो जाय । भगवन्नाम से रोम-रोम, कण-कण पवित्र हो जाता है, महान् पवित्रता छा जाती है । ऐसा भगवान्‌ का नाम है । जिसके हृदयमें नामके प्रति प्रेम जाग्रत् हो गया, वह असली धनी है । इससे भगवान् प्रकट हो जाते हैं । वह खुद ऐसा विलक्षण हो जाता है कि उसके दर्शन, स्पर्श, भाषण से दूसरों पर असर पड़ता है । नाम लेनेवाले सन्त-महात्माओं के दर्शनसे शान्ति मिलती है । अशान्ति दूर हो जाती है, शोक-चिन्ता दूर हो जाते हैं और पापोंका नाश हो जाता है । जहाँ वे रहते हैं, वे धाम पवित्र हो जाते हैं और जहाँ वे चलते हैं वहाँ का वायुमण्डल पवित्र हो जाता है ।
राम ! राम !! राम !!!
---गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित, श्रद्धेय स्वामी रामसुखदास जी की “मानस में नाम-वन्दना” पुस्तकसे


हनुमान् जी साक्षात् शंकर जी या उनके अंशरूप में !



जय सियाराम जय जय सियाराम ! विघ्न विनाशक जय हनुमान !!
शंकर सुवन केसरी नन्दन । तेज प्रताप महा जगवन्दन ।।
हनुमान् जी साक्षात् शंकर जी या उनके अंशरूप में !
पवननन्दन हनुमान जी का चरित भगवान श्रीराम चंद्र जी से इतना अनुस्यूत है कि श्रीराम चर्चा के प्रसंग में मारुति चर्चा अनिवार्य है | पौराणिक आख्यानों में हनुमान जी का यथार्थ परिचय मिलता है |
हनुमान जी कहीं शंकरजी के अंशरूप में और कहीं साक्षात् शंकर जी के रूप में वर्णित किये गए हैं | इसके प्रमाणस्वरूप शिवपुराण की “शतरुद्रसंहिता” के बीसवें अध्याय का अनुशीलन करना चाहिए | वहाँ हनुमान जी की जन्म-कथा का विशिष्ट उल्लेख है | श्रीराम कार्य की सिद्धि के लिए शिवजी ने स्वयं हनुमान जी का रूप धारण किया था | दानवों को मोह में डालने के लिए विष्णु ने जब मोहिनीरूप धारण किया, तब उस रूप के अलोकसामान्य सौंदर्य पर शिवजी विक्षुब्ध हो गए | उस अंत: क्षोभ से स्खलित शिववीर्य को सप्तॠषियों ने कानों के मार्ग से गौतम की पुत्री अञ्जना के गर्भ में संक्रान्त कर दिया और इस गर्भ से हनुमान जी का जन्म हुआ | इस प्रकार हनुमान जी शिवजी के वीर्योत्पन्न पुत्र हैं | हनुमान जी के ‘शंकरसुवन’ होने के प्रसिद्धि केवल भारतवर्ष तक ही सीमित नहीं है प्रत्युत् वह बृहत्तर भारत के ‘मलय एशिया’ देश में भी फ़ैली है | इसका पूर्ण विवरण वहाँ के प्रचलित रामायण में उपलब्ध होता है | सूर्य को फल मानकर खाना, सूर्य से सब विद्याएँ सीखना और सूर्य के आदेश पर सुग्रीव की सेवा में उपस्थित होना—ये समग्र घटनाएं “शतरुद्र संहिता” के बीसवें अध्याय में विस्तार से वर्णित हैं |
“बृहद्धर्म पुराण” में वर्णित रामायण कथा देवी-तंत्र के द्वारा प्रभावित हुआ है | इसके १८ वें अध्याय में वर्णन मिलता है कि शिव-पार्वती, रावण की रक्षा के लिए लंका में निवास करते थे | उनके पास देवगण रावण के अत्याचार की कथा सुनाने के लिए गए | तब सीता के अपमान से खुब्ध होकर, पार्वती ने लंका छोडने की बात कही | श्री राम-काज की सिद्धि के लिए शिवजी ने हनुमान बनना स्वीकार किया एवं ब्रह्मा ने जाम्बवान् तथा धर्म ने विभीषण रूप धारण किया | इस पुराण के २० वें अध्याय में हनुमान जी के शिव रूप होने का प्रमाण प्रस्तुत किया गया है | अशोक-वाटिका में जब हनुमान जी ने चण्डिका-मन्दिर को देखा, तब अपने को शिवजी का रूप बतलाकर, देवी से लंका को छोडने के लिए आग्रह किया | हनुमान जी ( शिव ) ने अपने विश्वरूप का दर्शन कराया, जिसमें देवी ने रावण की सेना को संकट में और श्रीराम की सेना को सफल रूप में देखा | इस प्रकार पौराणिक-साक्ष्य पर हनुमानजी शिवजी के साक्षात् अवतार सिद्ध होते हैं | यह “बृहद्धर्म पुराण” उपपुराणों के अंतर्गत माना जाता है |
स्कंदपुराण का अवन्तीखंड कहता है कि हनुमान जी से बढ़कर जगत में कोई भी प्राणी नहीं है | किसी भी दृष्टि से –चाहे पराक्रम,उत्साह,मति और प्रताप को देखें, चाहे सुशीलता, माधुर्य तथा नीति को परखें , चाहे गाम्भीर्य, चातुर्य, सुवीर्य और धैर्य पर दृष्टि डालें, हनुमान जी के सदृश इस विशाल ब्रह्माण्ड में कोई प्राणी है ही नहीं | विक्षुब्ध महासागर, सम्पूर्ण लोकों को दग्ध कर डालने के लिए उद्यत हुए संवर्तक अग्नि तथा प्रजाओं का संहार करने के लिए उठे हुए काल के समान प्रभावशाली इन हनुमान जी के सामने कौन ठहर सकेगा !
“पराक्रमोत्साहमतिप्रतापै:
सौशील्यमाधुर्यनयादिकैश्च |
गाम्भीर्यचातुर्यसुवीर्यधैर्यै-
र्हनुमत:कोऽप्यधिकोऽस्ति लोके ||
ममेव विक्षोभितसागरस्य
लोकान् दिधक्षोरिव पावकस्य |
प्रजां जिहीर्षोरिव चान्तकस्य
हनूमत: स्थास्यति क: पुरस्तात् ||” (७९/४२.४३)
(कल्याण- श्री हनुमान-अंक)


सोमवार, 4 दिसंबर 2017

भजन में दिखावा..(01)


|| ॐ श्री परमात्मने नम: ||
भजन में दिखावा..(01)
भगवान्‌ का नाम प्रेमपूर्वक लेता रहे, नेत्रोंसे जल झरता रहे, हृदय में स्नेह उमड़ता रहे, रोमांच होता रहे तो देखो, उनमें कितनी विलक्षणता आ जाती है, पर वही दूसरों को दिखाने के लिये, दूसरों को सुनाने के लिये करेंगे तो उसका मूल्य घट जायगा । यह चीज औरों को दिखाने की नहीं है । धन तिजोरी में रखने का होता है । किसी ने एक सेठ से पूछा‒‘तुम घरमें रहते हो या दूकान में ? कहाँ सोते हो ? ’ तो सेठने कहा‒ ‘हम हाट में सो वें, बाट में सोवें, घर में सोवें, सोवें और न भी सोवें ।’
अगर हम कहें कि दूकान में सोते हैं तो घर में चोरी कर लेगा ! घर में सोने की कहें तो दूकान में चोरी कर लेगा । अर्थ यह हुआ कि तुम चोरी करने मत आना । लौकिक धनके लिये इतनी सावधानी है कि साफ नहीं कह सकते हो कि कहाँ सोते हैं ? और नाम के लिये इतनी उदारता कि लोगों को दिखावें ! राम, राम, राम ! कितनी बेसमझी है ! यह क्या बात है ? नाम को धन नहीं समझा है । इसको धन समझते तो गुप्त रखते ।
एक राजा भगवान्‌के बड़े भक्त थे, वे गुप्त रीति से भगवान्‌ का भजन करते थे । उनकी रानी भी बड़ी भक्त थी । बचपन से ही वह भजन में लगी हुई थी । इस राजा के यहाँ ब्याहकर आयी तो यहाँ भी ठाकुरजी का खूब उत्सव मनाती,ब्राह्मणों की सेवा, दीन-दुःखियों की सेवा करती; भजन-ध्यानमें, उत्सवमें लगी रहती । राजा साहब उसे मना नहीं करते । वह रानी कभी-कभी कहती कि ‘महाराज ! आप भी कभी-कभी राम-राम‒ऐसे भगवान्‌ का नाम तो लिया करो ।’ वे हँस दिया करते । रानी के मनमें इस बात का बड़ा दुःख रहता कि क्या करें, और सब बड़ा अच्छा है । मेरे को सत्संग, भजन, ध्यान करते हुए मना नहीं करते; परन्तु राजा साहब स्वयं भजन नहीं करते ।
ऐसे होते-होते एक बार रानीने देखा कि राजा साहब गहरी नींद में सोये हैं । करवट बदली तो नींद में ही ‘राम’ नाम कह दिया । अब सुबह होते ही रानी ने उत्सव मनाया । बहुत ब्राह्मणों को निमन्त्रण दिया; बच्चों को, कन्याओं को भोजन कराया, उत्सव मनाया । राजासाहब ने पूछा‒‘आज उत्सव किस का मना रही हो ?आज तो ठाकुरजीका भी कोई दिन विशेष नहीं है ।’ रानी ने कहा‒‘आज हमारे बहुत ही खुशी की बात है ।’ क्या खुशीकी बात है ? ‘महाराज ! बरसोंसे मेरे मन में था कि आप भगवान्‌ का नाम उच्चारण करें । रात में आपके मुख से नींद में भगवान्‌ का नाम निकला ।’ निकल गया ? ‘हाँ’ इतना कहते ही राजा के प्राण निकल गये । ‘अरे मैंने उमर भर जिसे छिपा कर रखा था, आज निकल गया तो अब क्या जीना ?’
राम ! राम !! राम !!!
(शेष आगामी पोस्ट में )
---गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित, श्रद्धेय स्वामी रामसुखदास जी की “मानस में नाम-वन्दना” पुस्तकसे


भगवान्‌ विष्णु .....(पोस्ट.०२)




।। जय श्रीहरिः ।।
भगवान्‌ विष्णु .....(पोस्ट.०२)

वे परमात्मा स्वयं विभाग-रहित होने पर भी अलग-अलग प्राणियों में विभक्त की तरह प्रतीत होते हैं । वे सम्पूर्ण जगत्‌को प्रकाशित करते हैं, पर उनको कोई प्रकाशित नहीं कर सकता । वे ज्ञानस्वरूप, प्रकाशस्वरूप परमात्मा सब के हृदय में नित्य-निरन्तर विद्यमान हैं ।
ऐसे वे जानने योग्य एक परमात्मा ही रजोगुण की प्रधानता स्वीकार करके ब्रह्मारूप से सबको उत्पन्न करते हैं, सत्त्वगुण की प्रधानता स्वीकार करके विष्णुरूप से सब का भरण-पोषण करते हैं और तमोगुण की प्रधानता स्वीकार करके शिवरूप से सब का संहार करते हैं‒
‘भूतभर्तृ च तज्ज्ञेयं ग्रसिष्णु प्रभविष्णु च’ (गीता १३ । १६) [†] ।
ऐसा करनेपर भी वे सम्पूर्ण गुणोंसे रहित और निर्लिप्त रहते हैं । वे परब्रह्म परमात्मा ही सगुणरूप में ‘महाविष्णु’ नाम से कहे जाते हैं । अनन्त ब्रह्माण्डों की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय करने वाले ब्रह्मा, विष्णु और महेश अनन्त हैं, पर महाविष्णु एक ही है । उस महाविष्णु से ही अलग-अलग ब्रह्माण्डों के अलग-अलग ब्रह्मा, विष्णु और महेश प्रकट होते हैं‒
‘संभु बिरंचि बिष्नु भगवाना ।
उपजहिं जासु अंस तें नाना ॥‘
.....................(मानस १ । १४४ । ३)
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[†] ‘सृष्टिस्थित्यन्तकरणाद् ब्रह्माविष्णुशिवात्मक:| ससंज्ञां याति भगवानेक एव जनार्दन:||’...................(पद्मपुराण सृष्टि ० २.११४)
.
....अर्थात् एक ही भगवान् जनार्दन सृष्टि, पालन और संहार करने के कारण ब्रह्मा, विष्णु तथा शिव का नाम धारण करते हैं |

नारायण ! नारायण !! नारायण !!!

(शेष आगामी पोस्ट में)
‒---- गीता प्रेस,गोरखपुर से प्रकाशित ‘कल्याण-पथ’ पुस्तक से


रविवार, 3 दिसंबर 2017

भगवान्‌ विष्णु .....(पोस्ट.०१)


।। जय श्रीहरिः ।।
भगवान्‌ विष्णु .....(पोस्ट.०१)
परब्रह्म परमात्मा एक ही हैं । उनसे बढ़कर दूसरा कोई व्यापक, निर्विकार, सदा रहनेवाला तत्त्व नहीं है । गीतामें उस तत्त्वका ‘ज्ञेय’ नामसे वर्णन किया गया है (१३ । १२-१७) । जिसको जान सकते हैं, जो जानने योग्य है तथा जिसको अवश्य जानना चाहिये, उसको ‘ज्ञेय’ कहते हैं । उसको जान लेने पर मनुष्य ज्ञातज्ञातव्य होकर सदा के लिये जन्म-मरणसे रहित हो जाता है । उस अनादि और परब्रह्म परमात्मतत्त्वको सत् भी नहीं कह सकते और असत् भी नहीं कह सकते अर्थात् उसमें सत्-असत् शब्दों की पहुँच नहीं होती; क्योंकि वह शब्दातीत है ।
जैसे स्याही में सब जगह सब तरह की लिपियाँ विद्यमान रहती हैं और सोने में सब जगह सब तरह के गहने, मूर्तियाँ और उनके अवयव विद्यमान रहते हैं, ऐसे ही उस परमात्मतत्त्वमें सब जगह अनन्त वस्तुएँ, व्यक्ति और उनके अवयव विद्यमान रहते हैं । इसलिये वे सम्पूर्ण ब्रह्माण्डोंको अपने एक अंशसे व्याप्त करके स्थित हैं‒‘विष्टभ्याहमिदं कृत्स्नमेकांशेन स्थितो जगत्’ (गीता १० । ४२) । वे परमात्मा सम्पूर्ण इन्द्रियोंसे रहित होनेपर भी इन्द्रियोंके विषयोंको ग्रहण करते हैं, आसक्तिरहित होने पर भी सम्पूर्ण संसारका भरण-पोषण करते हैं और निर्गुण होनेपर भी गुणोंके भोक्ता बनते हैं । वे सम्पूर्ण प्राणियों के बाहर-भीतर परिपूर्ण हैं और उन प्राणियों के रूप में भी वे ही हैं‒‘वासुदेवः सर्वम्’ (गीता ७ । १९) । देश, काल और वस्तु‒तीनों ही दृष्टियों से वे परमात्मा दूर-से-दूर भी हैं और नजदीक-से-नजदीक भी हैं ।[*] अत्यन्त सूक्ष्म होने से वे इन्द्रियों और अन्तःकरण की पकड़ में नहीं आते ।
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[*] दूर से दूर देश में भी वे परमात्मा हैं और नजदीक-से-नजदीक देश में भी वे परमात्मा हैं | सबसे पहले भी वे परमात्मा थे, सबके बाद भी वे परमात्मा रहेंगे और अब वस्तुओं के रूप में भी वे परमात्मा हैं |
नारायण ! नारायण !! नारायण !!!
(शेष आगामी पोस्ट में)
‒---- गीता प्रेस,गोरखपुर से प्रकाशित ‘कल्याण-पथ’ पुस्तक से


पाप का बाप..(02)


| ॐ श्री परमात्मने नम: ||
पाप का बाप..(02)
“पर उपदेस कुसल बहुतेरे ।
जे आचरहिं ते नर न घनेरे ॥“
..………..(मानस, लंकाकाण्ड, दोहा ७८ । २)
दूसरों को उपदेश देनेमें तो लोग कुशल होते हैं, परंतु उपदेश के अनुसार ही खुद आचरण करने वाले बहुत ही कम लोग होते हैं ।
मनुष्य खयाल नहीं करता कि क्या करना चाहिये और क्या नहीं करना चाहिये । औरों को समझाते हुए पण्डित बन जाते हैं । अपना काम जब सामने आता है, तब पण्डिताई भूल जाते हैं, वह याद नहीं रहती ।
“परोपदेशवेलायां शिष्टाः सर्वे भवन्ति हि ।
विस्मरन्तीह शिष्टत्वं स्वकार्ये समुपस्थिते ॥“
दूसरों को उपदेश देते समय जो पण्डिताई होती है, वही अगर अपने काम पड़े, उस समय आ जाय तो आदमी निहाल हो जाय । जानने की कमी नहीं है,काम में लाने की कमी है । हमें एक सज्जन ने बड़ी शिक्षाकी बात कही कि आप व्याख्यान देते हुए साथ-साथ खुद भी सुना करो । इसका अर्थ यह हुआ कि मैं जो बातें कह रहा हूँ तो मेरे आचरण में कहाँ कमी आती है ? कहाँ-कहाँ गलती होती है? जो आदमी अपना कल्याण चाहे तो वह दूसरों को सुननेके लिये व्याख्यान न दे । अपने सुननेके लिये व्याख्यान दे । लोग सुनने के लिये सामने आते हैं, उस समय कई बातें पैदा होती हैं । अकेले बैठे इतनी पैदा नहीं होतीं । इसलिये उन बातोंको स्वयं भी सुनें । केवल औरों की तरफ ज्ञानका प्रवाह होता है, यह गलती होती है ।
“पण्डिताई पाले पड़ी ओ पूरबलो पाप ।
ओराँ ने परमोदताँ खाली रह गया आप ॥
पण्डित केरी पोथियाँ ज्यूँ तीतरको ज्ञान ।
ओराँ सगुन बतावहि आपा फंद न जान ॥
करनी बिन कथनी कथे अज्ञानी दिन रात ।
कूकर ज्यूँ भुसता फिरे सुनी सुनाई बात ॥“
हमें एक ने बताया‒‘कूकर ज्यूँ भुसता फिरे’‒इसका अर्थ यह हुआ कि एक कुत्ता यहाँ किसी को देखकर भुसेगा तो दूसरे मोहल्लेके कुत्ते भी देखा-देखी भुसने लग जायेंगे । एक-एक को सुनकर सब कुत्ते भुसने लग जायेंगे । अब उनको पूछा जाय कि किस को भुसते हो ? यह तो पता नहीं । दूसरा भुसता है न, इसलिये बिना देखे ही भुसना शुरू कर दिया । ऐसे ही दूसरा कहता है तो अपने भी कहना शुरू कर दिया । अरे, वह क्यों कहता है ? क्या शिक्षा देता है ? उसका क्या विचार है ? सुनी-सुनायी बात कहना शुरू कर देनेसे बोध नहीं होता । इसलिये मनुष्य को अपनी जानकारी अपने आचरणमें लानी चाहिये ।
राम ! राम !! राम !!!
---गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित, श्रद्धेय स्वामी रामसुखदास जी की “मानस में नाम-वन्दना” पुस्तकसे


शनिवार, 2 दिसंबर 2017

पाप का बाप..(01)




|| ॐ श्री परमात्मने नम: ||

पाप का बाप..(01)

एक प्रसिद्ध कहानी है‒एक पण्डितजी काशी से पढ़कर आये । ब्याह हुआ,स्त्री आयी । कई दिन हो गये । एक दिन स्त्री ने प्रश्न पूछा कि ‘पण्डित जी महाराज ! यह तो बताओ कि पाप का बाप कौन है ?’ पण्डित जी पोथी देखते रहे, पर पता नहीं लगा, उत्तर नहीं दे सके । अब बड़ी शर्म आयी कि स्त्री पूछती है पाप का बाप कौन है ? हमने इतनी पढ़ाई की, पर पता नहीं लगा । वे वापस काशी जाने लगे ।

मार्गमें ही एक वेश्या रहती थी । उसने सुन रखा था कि पण्डितजी काशी पढ़कर आये हैं । उसने पूछा‒‘कहाँ जा रहे हैं महाराज ?’ तो बोले‒‘मैं काशी जा रहा हूँ ।’ काशी क्यों जा रहे हैं ? आप तो पढ़कर आये हैं ? तो बोले‒‘क्या करूँ ? मेरे घरमें स्त्रीने यह प्रश्र पूछ लिया कि पाप का बाप कौन है ? मेरे को उत्तर देना आया नहीं । अब पढ़ाई करके देखूँगा कि पापका बाप कौन है ?’ वह वेश्या बोली‒‘आप वहाँ क्यों जाते हो ? यह तो मैं यहीं बता सकती हूँ आपको ।’

बहुत अच्छी बात । इतनी दूर जाना ही नहीं पड़ेगा । ‘आप घरपर पधारो । आपको पाप का बाप मैं बताऊँगी ।’ अमावस्या के एक दिन पहले पण्डित जी महाराज को अपने घर बुलाया । सौ रुपया सामने भेंट दे दिये और कहा कि ‘महाराज ! आप मेरे यहाँ कल भोजन करो ।’ पण्डित जी ने कह दिया‒‘क्या हर्ज है,कर लेंगे !’

पण्डितजी के लिये रसोई बनानेका सब सामान तैयार कर दिया । अब पण्डितजी महाराज पधार गये और रसोई बनाने लगे तो वह बोली‒‘देखो, पक्की रसोई तो आप पाते ही हो, कच्ची रसोई हरेक के हाथकी नहीं पाते । पक्की रसोई मैं बना दूँ, आप पा लेना’ ! ऐसा कह कर सौ रुपये पास में और रख दिये । उन्होंने देखा कि पक्की रसोई हम दूसरोंके हाथ की लेते ही हैं, कोई हर्ज नहीं, ऐसा करके स्वीकार कर लिया । अब रसोई बनाकर पण्डितजी को परोस दिया । सौ रुपये और पण्डित जी महाराज के आगे रख दिये और नमस्कार करके बोली‒‘महाराज ! जब मेरे हाथ से बनी रसोई आप पा रहें हैं तो मैं अपने हाथ से ग्रास दे दूँ । हाथ तो वे ही हैं, जिनसे रसोई बनायी है, ऐसी कृपा करो ।’ पण्डित जी तैयार हो गये उसकी बात पर । उसने ग्रास को मुँह के सामने किया और उन्होंने ज्यों ही ग्रास लेनेके लिये मुँह खोला कि उठाकर मारी थप्पड़ जोरसे, और वह बोली‒‘अभी तक आपको ज्ञान नहीं हुआ ? खबरदार ! जो मेरे घर का अन्न खाया तो ! आप जैसे पण्डित का मैं धर्म-भ्रष्ट करना नहीं चाहती । यह तो मैंने पाप का बाप कौन है, इसका ज्ञान कराया है ।’ रुपये ज्यों-ज्यों आगे रखते गये पण्डित जी ढीले होते गये ।
इससे सिद्ध क्या हुआ ? पापका बाप कौन हुआ ? रुपयोंका लोभ !

‘त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः’ (गीता १६ । २१) ।

काम, क्रोध और लोभ‒ये नरकके खास दरवाजे हैं ।

राम ! राम !! राम !!!

(शेष आगामी पोस्ट में )
---गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित, श्रद्धेय स्वामी रामसुखदास जी की “मानस में नाम-वन्दना” पुस्तकसे


पाप का बाप..(01)




|| ॐ श्री परमात्मने नम: ||

पाप का बाप..(01)

एक प्रसिद्ध कहानी है‒एक पण्डितजी काशी से पढ़कर आये । ब्याह हुआ,स्त्री आयी । कई दिन हो गये । एक दिन स्त्री ने प्रश्न पूछा कि ‘पण्डित जी महाराज ! यह तो बताओ कि पाप का बाप कौन है ?’ पण्डित जी पोथी देखते रहे, पर पता नहीं लगा, उत्तर नहीं दे सके । अब बड़ी शर्म आयी कि स्त्री पूछती है पाप का बाप कौन है ? हमने इतनी पढ़ाई की, पर पता नहीं लगा । वे वापस काशी जाने लगे ।

मार्गमें ही एक वेश्या रहती थी । उसने सुन रखा था कि पण्डितजी काशी पढ़कर आये हैं । उसने पूछा‒‘कहाँ जा रहे हैं महाराज ?’ तो बोले‒‘मैं काशी जा रहा हूँ ।’ काशी क्यों जा रहे हैं ? आप तो पढ़कर आये हैं ? तो बोले‒‘क्या करूँ ? मेरे घरमें स्त्रीने यह प्रश्र पूछ लिया कि पाप का बाप कौन है ? मेरे को उत्तर देना आया नहीं । अब पढ़ाई करके देखूँगा कि पापका बाप कौन है ?’ वह वेश्या बोली‒‘आप वहाँ क्यों जाते हो ? यह तो मैं यहीं बता सकती हूँ आपको ।’

बहुत अच्छी बात । इतनी दूर जाना ही नहीं पड़ेगा । ‘आप घरपर पधारो । आपको पाप का बाप मैं बताऊँगी ।’ अमावस्या के एक दिन पहले पण्डित जी महाराज को अपने घर बुलाया । सौ रुपया सामने भेंट दे दिये और कहा कि ‘महाराज ! आप मेरे यहाँ कल भोजन करो ।’ पण्डित जी ने कह दिया‒‘क्या हर्ज है,कर लेंगे !’

पण्डितजी के लिये रसोई बनानेका सब सामान तैयार कर दिया । अब पण्डितजी महाराज पधार गये और रसोई बनाने लगे तो वह बोली‒‘देखो, पक्की रसोई तो आप पाते ही हो, कच्ची रसोई हरेक के हाथकी नहीं पाते । पक्की रसोई मैं बना दूँ, आप पा लेना’ ! ऐसा कह कर सौ रुपये पास में और रख दिये । उन्होंने देखा कि पक्की रसोई हम दूसरोंके हाथ की लेते ही हैं, कोई हर्ज नहीं, ऐसा करके स्वीकार कर लिया । अब रसोई बनाकर पण्डितजी को परोस दिया । सौ रुपये और पण्डित जी महाराज के आगे रख दिये और नमस्कार करके बोली‒‘महाराज ! जब मेरे हाथ से बनी रसोई आप पा रहें हैं तो मैं अपने हाथ से ग्रास दे दूँ । हाथ तो वे ही हैं, जिनसे रसोई बनायी है, ऐसी कृपा करो ।’ पण्डित जी तैयार हो गये उसकी बात पर । उसने ग्रास को मुँह के सामने किया और उन्होंने ज्यों ही ग्रास लेनेके लिये मुँह खोला कि उठाकर मारी थप्पड़ जोरसे, और वह बोली‒‘अभी तक आपको ज्ञान नहीं हुआ ? खबरदार ! जो मेरे घर का अन्न खाया तो ! आप जैसे पण्डित का मैं धर्म-भ्रष्ट करना नहीं चाहती । यह तो मैंने पाप का बाप कौन है, इसका ज्ञान कराया है ।’ रुपये ज्यों-ज्यों आगे रखते गये पण्डित जी ढीले होते गये ।
इससे सिद्ध क्या हुआ ? पापका बाप कौन हुआ ? रुपयोंका लोभ !

‘त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः’ (गीता १६ । २१) ।

काम, क्रोध और लोभ‒ये नरकके खास दरवाजे हैं ।

राम ! राम !! राम !!!

(शेष आगामी पोस्ट में )
---गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित, श्रद्धेय स्वामी रामसुखदास जी की “मानस में नाम-वन्दना” पुस्तकसे


“मोहमूल बहुसूलप्रद त्यागहुँ तम अभिमान | भजहु राम रघुनायक कृपा सिंधु भगवान ||”



जय सियाराम जय सियाराम जय सियाराम जय जय सियाराम
“मोहमूल बहुसूलप्रद त्यागहुँ तम अभिमान |
भजहु राम रघुनायक कृपा सिंधु भगवान ||”
जब हृदय में विश्वास का अभाव रहता है, तब संसार के समस्त रोगों को दूर करने वाली महौषधि देने पर भी रोगी अविश्वासी बनकर उसका पान नहीं करता और अपने विनाश का कारण स्वयं प्रस्तुत कर लेता है | रावण ने भी यही मार्ग अपनाया | भक्तिस्वरूपा सीताजी को अपनी लंका में लाकर वह अपना कल्याण दो कारणों से नहीं कर सका; पहला कारण था-- संशय और दूसरा था—अभिमान |
परोपकारी सन्त श्री हनुमान जी रावण की दशा पर दया करके असाध्य रोग से ग्रसित रावण को समझाते हैं –
“मोहमूल बहुसूलप्रद त्यागहुँ तम अभिमान |
भजहु राम रघुनायक कृपा सिंधु भगवान ||”
...........(मानस ५.२३)
‘हे रावण ! मोह ही जिसका मूल है –ऐसे अत्यधिक पीड़ा देने वाले तमरूप अभिमान का तुम त्याग कर दो और कृपा के समुद्र राघवेन्द्र भगवान् श्री राम का भजन करो |’ भला अन्धकार और सूर्य में कभी मैत्री हो सकती है !
{गीताप्रेस- श्री हनुमान अंक}


“मोहमूल बहुसूलप्रद त्यागहुँ तम अभिमान | भजहु राम रघुनायक कृपा सिंधु भगवान ||”



जय सियाराम जय सियाराम जय सियाराम जय जय सियाराम
“मोहमूल बहुसूलप्रद त्यागहुँ तम अभिमान |
भजहु राम रघुनायक कृपा सिंधु भगवान ||”
जब हृदय में विश्वास का अभाव रहता है, तब संसार के समस्त रोगों को दूर करने वाली महौषधि देने पर भी रोगी अविश्वासी बनकर उसका पान नहीं करता और अपने विनाश का कारण स्वयं प्रस्तुत कर लेता है | रावण ने भी यही मार्ग अपनाया | भक्तिस्वरूपा सीताजी को अपनी लंका में लाकर वह अपना कल्याण दो कारणों से नहीं कर सका; पहला कारण था-- संशय और दूसरा था—अभिमान |
परोपकारी सन्त श्री हनुमान जी रावण की दशा पर दया करके असाध्य रोग से ग्रसित रावण को समझाते हैं –
“मोहमूल बहुसूलप्रद त्यागहुँ तम अभिमान |
भजहु राम रघुनायक कृपा सिंधु भगवान ||”
...........(मानस ५.२३)
‘हे रावण ! मोह ही जिसका मूल है –ऐसे अत्यधिक पीड़ा देने वाले तमरूप अभिमान का तुम त्याग कर दो और कृपा के समुद्र राघवेन्द्र भगवान् श्री राम का भजन करो |’ भला अन्धकार और सूर्य में कभी मैत्री हो सकती है !
{गीताप्रेस- श्री हनुमान अंक}


शुभाशुभ कर्म का फल अवश्य ही भोगना पड़ता है


---:श्री परमात्मने नम:---
शुभाशुभ कर्म का फल अवश्य ही भोगना पड़ता है
वेद का यह निश्चित सिद्धांत है कि प्रत्येक व्यक्ति को उसके द्वारा किये गए कर्म का फल अवश्य ही भोगना पड़ता है | शुभकर्म का फल शुभ और अशुभ कर्म का फल अशुभ मिलता है | यह सिद्धांत केवल मनुष्यों पर ही घटित नहीं होता प्रत्युत देवता भी इस परिधि में आते हैं | जब देवताओं को भी कर्म का फल मिलता है तो फिर मनुष्यों को मिले तो इसमें क्या आश्चर्य ! ऋग्वेद के एक ऋचा (१/३५/९) में संकेत आया है कि अपने अशुभ कर्म के कारण सवितादेव को हिरण्यपाणि होना पड़ा ..(हिरण्यपाणि: सविता) | आख्यान इस प्रकार है कि एक बार जब एक देवयाग में अध्वर्युओं ने पुरोडाश सविता देव के निमित्त प्रदान किया तो उस समय सवितादेव ने अमंत्रक ही वह पुरोडाश अपने हाथ में ग्रहण कर लिया | इस निषिद्ध कर्म के फलस्वरूप उनका वह हाथ कट गया, बाद में अध्वर्युओं ने स्वर्णनिर्मित हाथ को प्रतिष्ठित किया | इसी प्रकार उस यज्ञ में भग देवता को नेत्रविहीन होना पड़ा और पूषादेव को दंतविहीन होना पड़ा |
अत: कल्याणकामी व्यक्ति को चाहिए कि शास्त्रविहित एवं प्रशस्त उत्तम कर्मों का ही अनुष्ठान करे, निषिद्ध और निन्द्य कर्मों का अनुष्ठान कभी भी न करे | नीति मंजरी में इस आख्यान का संकेत इस प्रकार दिया गया है –
“शुभाशुभं कृतं कर्म भुंजते देवता अपि |
सविता हेमहस्तोऽभूद्भगोऽन्ध:पूषकोऽद्विज: ||”...(१.१५)
...(कल्याण नीतिसार अंक)


शुभाशुभ कर्म का फल अवश्य ही भोगना पड़ता है


---:श्री परमात्मने नम:---
शुभाशुभ कर्म का फल अवश्य ही भोगना पड़ता है
वेद का यह निश्चित सिद्धांत है कि प्रत्येक व्यक्ति को उसके द्वारा किये गए कर्म का फल अवश्य ही भोगना पड़ता है | शुभकर्म का फल शुभ और अशुभ कर्म का फल अशुभ मिलता है | यह सिद्धांत केवल मनुष्यों पर ही घटित नहीं होता प्रत्युत देवता भी इस परिधि में आते हैं | जब देवताओं को भी कर्म का फल मिलता है तो फिर मनुष्यों को मिले तो इसमें क्या आश्चर्य ! ऋग्वेद के एक ऋचा (१/३५/९) में संकेत आया है कि अपने अशुभ कर्म के कारण सवितादेव को हिरण्यपाणि होना पड़ा ..(हिरण्यपाणि: सविता) | आख्यान इस प्रकार है कि एक बार जब एक देवयाग में अध्वर्युओं ने पुरोडाश सविता देव के निमित्त प्रदान किया तो उस समय सवितादेव ने अमंत्रक ही वह पुरोडाश अपने हाथ में ग्रहण कर लिया | इस निषिद्ध कर्म के फलस्वरूप उनका वह हाथ कट गया, बाद में अध्वर्युओं ने स्वर्णनिर्मित हाथ को प्रतिष्ठित किया | इसी प्रकार उस यज्ञ में भग देवता को नेत्रविहीन होना पड़ा और पूषादेव को दंतविहीन होना पड़ा |
अत: कल्याणकामी व्यक्ति को चाहिए कि शास्त्रविहित एवं प्रशस्त उत्तम कर्मों का ही अनुष्ठान करे, निषिद्ध और निन्द्य कर्मों का अनुष्ठान कभी भी न करे | नीति मंजरी में इस आख्यान का संकेत इस प्रकार दिया गया है –
“शुभाशुभं कृतं कर्म भुंजते देवता अपि |
सविता हेमहस्तोऽभूद्भगोऽन्ध:पूषकोऽद्विज: ||”...(१.१५)
...(कल्याण नीतिसार अंक)


गुरुवार, 30 नवंबर 2017

श्री गीताजयन्ती की शुभकामनाएं



'श्री गीताजयन्ती' एवं 'मोक्षदा एकादशी' के अवसर पर
आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएँ.....
“वसुदेवसुतं देवं कंस चाणूरमर्दनं |
देवकीपरमानन्दं कृष्णं वंदे जगद्गुरुम् ||”
“ श्रीमद्भगवद्गीता “ भगवान की दिव्यातिदिव्य वाणी है”
वेद, भगवान के नि:श्वास हैं और गीता भगवान की वाणी है | नि:श्वास तो स्वाभाविक होते हैं,पर गीता भगवान ने योग में स्थित होकर कही है | अत: वेदों की अपेक्षा भी गीता विशेष है |
“ न शक्यं तन्मया भूयस्तथा वक्तुमशेषत:|
परं हि ब्रह्म कथितं योगयुक्तेन तन्मया ||” (महाभारत आश्व०१६/१२-१३)
गीता उपनिषदों का सार है | गीता की बात उपनिषदों से ही विशेष है |गीता में किसी मत का आग्रह नहीं है केवल जीव के कल्याण का ही आग्रह है | मतभेद यदि कोई है तो गीता में नहीं , प्रस्तुत टीकाकारों में है | गीता में भगवान साधक को समग्र की ओर ले जाते हैं | सगुण निर्गुण,साकार-निराकार, द्विभुज,चतुर्भुज,सहस्रभुज आदि सब रूप परमात्मा के ही अंतर्गत हैं | समग्र रूप में कोई भी रूप बाकी नहीं रहता | किसी की भी उपासना करें,सम्पूर्ण उपासनाएं, सम्पूर्ण दर्शन,समग्र रूप के अंतर्गत आ जाते हैं | अत: सब कुछ परमात्मा के ही अंतर्गत है, परमात्मा के सिवाय किंचिन्मात्र भी कुछ भी नहीं- इसी भाव में सम्पूर्ण गीता है | गीता का तात्पर्य “वासुदेव: सर्वम्” में है | एक परमात्म तत्व के सिवाय दूसरी सत्ता की मान्यता रहने से प्रवृत्ति का उदय होता है और दूसरी सत्ता की मान्यता मिटने से निवृत्ति की दृढता होती है | प्रवृत्ति का उदय होना ‘भोग’ है और निवृत्ति की दृढता होना ‘योग’ है |
गीता “सब कुछ परमात्मा है”-- ऐसा मानती है और इसी को महत्त्व देती है | संसार में कार्यरूप से,कारणरूप से,प्रभावरूप से, सब रूपों से “में-ही-में-हूं” यह बताने के लिये भगवान ने गीता में चार जगह (सातवें,नवें,दसवें,और पन्द्रहवें अध्याय मे) अपनी विभूतियों का वर्णन किया है | ब्रह्म (निर्गुण-निराकार),कृत्स्न अध्यात्म (अनंत योनियों के अनंत जीव), अखिल कर्म (उत्पत्ति-स्थिति-प्रलय आदि सम्पूर्ण क्रियाएँ), अधिभूत (अपने शरीरसहित सम्पूर्ण पांच भौतिक जगत्) अधिदैव (मन,इन्द्रियों के अधिष्ठातृ देवता सहित ब्रह्माजी आदि सभी देवता) तथा अधियज्ञ (अंतर्यामी विष्णु और उनके सभी रूप)- ये सब -के -सब “ वासुदेव:सर्वम् “ के अंतर्गत आ जाते हैं (सातवें अध्याय का उन्तीसवाँ -तीसवां श्लोक) | तात्पर्य है कि सत् , असत् और उसके परे जो कुछ भी है, वह सब परमात्मा ही हैं – “त्वमक्षरं सद्सत्त्परं यत्” (गीता ११/३७) |
संसार अपने राग के कारण ही दीखता है | राग के कारण ही दूसरी सत्ता दीखती है | राग न हों तो एक परमात्मा के सिवाय कुछ भी नहीं है | जैसे भगवान ने कहा है – “सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्ट:” (गीता १५/१५) “ मैं ही सम्पूर्ण प्राणियों के हृदय में स्थित हूं “ | जिस हृदय में भगवान रहते हैं, उसी हृदय में राग-द्वेष, हलचल,अशांति होते हैं | हृदय में ही सुख होता है और हृदय में ही दु:ख आता है | समुद्र मंथन में वहीं से विष निकला,वहीं से अमृत निकला | भगवान शंकर ने विष पी लिया तो अमृत निकल आया | इसी तरह राग द्वेष को मिटा दें तो परमात्मा निकल आएंगे | सन्त महात्माओं के हृदय में राग द्वेष नहीं रहते; अत: वहाँ परमात्मा रहते हैं | गीता, ज्ञानयोग और कर्मयोग दोनों को समकक्ष और लौकिक बताती है | क्षर (जगत् और अक्षर (जीव) दोनों लौकिक हैं – “द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च” (गीता १५/१६१६) पर भगवान अलौकिक हैं – “उत्तम:पुरुषस्त्वन्य:” (गीता १५/१७) क्षर को लेकर कर्मयोग और अक्षर को लेकर ज्ञान योग चलता है; अत: कर्मयोग और ज्ञानयोग- दोनों लौकिक हैं | परन्तु भक्तियोग भगवान को लेकर चलता है; अत: भक्तियोग अलौकिक है |
भगवान की वाणी बड़े बड़े ऋषि-मुनियों की वाणी से भी ठोस और श्रेष्ट है; क्योंकि भगवान, ऋषि-मुनियों के भी आदि हैं— “ अहमादिर्हि देवानां महर्षीणां च सर्वश: “ (गीता १०/२) अत: कितने ही बड़े ऋषी – मुनि, सन्त महात्मा क्यों न हों और उनकी वाणी कितनी ही श्रेष्ठ क्यों न हों, पर वह भगवान की दिव्यातिदिव्य वाणी “ गीता “ की बराबरी नहीं कर सकती |
(गीताप्रेस-श्रीमद्भगवद्गीता साधक संजीवनी से संकलित)


वैराग्य- संदीपनी (Post 05)

  ।।श्री हरि:।।   श्रीमद्गोस्वामी तुलसीदासजीकृत   वैराग्य- संदीपनी ( Post 05)   शान्ति-वर्णन   दोहा - रैनि को भूषन इंदु है ...